भक्त शिरोमणि धन्ना जाट
धन्ना जी का जन्म 1415 ईस्वी में गांव धुंआ जिला टोंक राजस्थान में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता एक किसान थे।
वे बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। एक बार वे अपने पिता के साथ एक मन्दिर में गए तो पण्डित जी भगवान का भोग लगा रहे थे। तो धन्ना ने पण्डित जी से भगवान की मूर्ति लेने की जिद्द की। पण्डित जी के पास कोई दूसरी मूर्ति नहीं थी लेकिन बालक की जिद्द को देखकर उन्होंने बालक धन्ना को एक पत्थर देकर बोला कि ये ही भगवान की मूर्ति है।
धन्ना ने उस पत्थर को ही भगवान श्री कृष्ण समझकर पूजना शुरू कर दिया।
उन्होंने भगवान को खाना खाने के लिए बुलाया लेकिन अबोध बालक को क्या पता कि पत्थर खाना नहीं खाता।
लेकिन उन्होंने जिद्द कर ली और खुद भी खाना छोड़ दिया। अंत में स्वयं भगवान उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
भगवान ने उसके साथ खाना खाया व धन्ना ने उन्हें अपना सखा बनने की जिद्द की।
फिर रोज भगवान धन्ना के साथ खाना खाने आते थे।और धन्ना की सहायता करते थे।
फिर धन्ना बड़े होकर काशी में गुरु रामानन्द जी के पास दीक्षा ग्रहण की।
एक दिन धन्ना अपने खेत मे अनाज बोने गए तो रास्ते मे कुछ साधुओं ने उनसे भिक्षा मांगी।तो उन्होंने बोने के लिए लाए गए अनाज को भिक्षा में दे दिया।
लेकिन घरवालो के डर से धन्ना ने भगवान का नाम लेकर खाली हल ही खेत में जोत दिया।
और अंत मे फसल काटने के लिए जब गए तो उन्हें भरपयर अनाज खेत मे मिला।
इससे उनकी भक्ति की चर्चा बहुत दूर तक फैल गयी।
और उनका भजन कृतन सुनने के लिए दूर दूर से भक्त आने लगे।
उन्होंने सम्पूर्ण जीवन भक्ति में गुजर दिया।
आज उनके नाम से मन्दिर व गुरुद्वारा है और लोग उनकी भक्ति से प्रेरणा लेते हैं।
कौन कहता है कि पत्थर में भगवान नहीं बसते
एक बार नियत से पूजा साध करके तो देखो,
कौन कहता है कि श्री कृष्ण जी दर्शन नहीं देते
एक बार कोई भक्त धन्ना जाट बनकर तो देखो।।
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| भक्त शिरोमणि श्री धन्ना जाट |
धन्ना जी का जन्म 1415 ईस्वी में गांव धुंआ जिला टोंक राजस्थान में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता एक किसान थे।
वे बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। एक बार वे अपने पिता के साथ एक मन्दिर में गए तो पण्डित जी भगवान का भोग लगा रहे थे। तो धन्ना ने पण्डित जी से भगवान की मूर्ति लेने की जिद्द की। पण्डित जी के पास कोई दूसरी मूर्ति नहीं थी लेकिन बालक की जिद्द को देखकर उन्होंने बालक धन्ना को एक पत्थर देकर बोला कि ये ही भगवान की मूर्ति है।
धन्ना ने उस पत्थर को ही भगवान श्री कृष्ण समझकर पूजना शुरू कर दिया।
उन्होंने भगवान को खाना खाने के लिए बुलाया लेकिन अबोध बालक को क्या पता कि पत्थर खाना नहीं खाता।
लेकिन उन्होंने जिद्द कर ली और खुद भी खाना छोड़ दिया। अंत में स्वयं भगवान उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
भगवान ने उसके साथ खाना खाया व धन्ना ने उन्हें अपना सखा बनने की जिद्द की।
फिर रोज भगवान धन्ना के साथ खाना खाने आते थे।और धन्ना की सहायता करते थे।
फिर धन्ना बड़े होकर काशी में गुरु रामानन्द जी के पास दीक्षा ग्रहण की।
एक दिन धन्ना अपने खेत मे अनाज बोने गए तो रास्ते मे कुछ साधुओं ने उनसे भिक्षा मांगी।तो उन्होंने बोने के लिए लाए गए अनाज को भिक्षा में दे दिया।
लेकिन घरवालो के डर से धन्ना ने भगवान का नाम लेकर खाली हल ही खेत में जोत दिया।
और अंत मे फसल काटने के लिए जब गए तो उन्हें भरपयर अनाज खेत मे मिला।
इससे उनकी भक्ति की चर्चा बहुत दूर तक फैल गयी।
और उनका भजन कृतन सुनने के लिए दूर दूर से भक्त आने लगे।
उन्होंने सम्पूर्ण जीवन भक्ति में गुजर दिया।
आज उनके नाम से मन्दिर व गुरुद्वारा है और लोग उनकी भक्ति से प्रेरणा लेते हैं।
कौन कहता है कि पत्थर में भगवान नहीं बसते
एक बार नियत से पूजा साध करके तो देखो,
कौन कहता है कि श्री कृष्ण जी दर्शन नहीं देते
एक बार कोई भक्त धन्ना जाट बनकर तो देखो।।

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