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Saturday, 18 August 2018

महाराजा कंवरपाल सिंह की जीवनगाथा- कस्वांवती राज्य

कस्वांपद राज्य
आज ही के दिन 19 अगस्त 1068 को सिधमुख को अपनी राजधानी बनाई थी।

कस्वांवती राज्य
राजधानी-सिधमुख(चुरू)

सूर्यवँशी कंस्वा भगवान श्री राम के वंशज हैं।
कंसुपाल सिंह कस्वां
Maharaja Knwarpal Singh Kanwan

दयालदास, पाऊलेट, मुंशी सोहन लाल आदि इतिहासकारों ने कसवा जाटों के राज्य कस्वांजनपद के बारे में लिखा है कि कसवां जाटों का प्रमुख ठिकाना सीधमुख था और कसवां कंवारपाल यहां के राजा थे तथा 400 गाँवों पर उनकी सत्ता थी तथा सिधमुख राजधानी थी।
महाराजा कंवरपाल कंस्वा धर्मनिष्ठ व वीर यौद्धा थे।

महाराजा कंवरपाल(कंसुपाल) सिंह कंस्वा अपनी 5000 सेना के साथ तालछापर आए, जहाँ मोहिलों का राज था. कंवरपाल जी ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया.

इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आये. वहां जाट राजा रणजीत जोहिया राज करते थे जिनके अधिकार में 125 गाँव थे. लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंस्वा के 70 लोग वीरगति को प्राप्त हुए. इस लड़ाई में कंवरपाल विजयी हुए. सीधमुख पर कंवरपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए.

सीधमुख विजय के बाद महाराजा कंवरपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आये, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे. कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मरे गए.
 फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1094, के दिन कंवरपाल जी का सात्यूं पर कब्जा हो गया. फ़िर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए.

महाराजा कंवरपाल कंस्वा जी के बाद क्रमशः राजा कोहला, राजा घणसूर, राजा महसूर, राजा मला, राजा थिरमल, राजा देवसी, राजा जयसी और राजा गोवल सीधमुख के शासक हुए. गोवल के 9 लडके थे- चोखा , जगा, मलक, महन, ऊहड, रणसी, भोजा और मंगल. इन्होने अलग अलग ठिकाने कायम किए जो इनके थाम्बे कहे जाते थे.

चोखा के अधिकार में 12 गाँव यथा दूधवा, बाड़की, घांघू, लाघड़िया, सिरसली, सिरसला, बिरमी, झाड़सर, भुरड़की इत्यादि.
बरगा के अधिकार में हड़ियाल, महणसर, गांगियासर, लुटू, ठेलासर, देपालसर, कारंगा, कालेराबास (चुरू का पुराना नाम) आदि ,
रणसी के अधिकार में जसरासर, दूधवामीठा, रिड़खला, सोमावासी, झारिया, आसलखेड़ी, गिनड़ी, पीथीसर, धीरासर, ढाढर, बूंटिया इत्यादि.
जगा के अधिकार में गोंगटिया, बीगराण, मठौड़ी, थालौड़ी, भैंरूसर, इन्दरपुरा, चलकोई आदि तथा
ऊहण के अधिकार में नोपरा, जिगासरी, सेवाटादा, मुनड़िया, रुकनसर आदि. इसी प्रकार अन्य थामों के नाम और गाँवों का वर्णन है. परवाना बही राज श्रीबिकानेर से भी ज्ञात होता है की चुरू के आसपास कसवां जाटों के अनेक गाँव रहे थे यथा चुरू (एक बास), खासोली, खारिया (दो बास), सरसला, पीथुवीसींसर, आसलखेड़ी, रिड़खला (तीन बास), बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, बालरासर, भैंरुसर (एक बास), ढाढरिया (एक बास) धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई आदि.
कंवरपाल जी के एक वंशज चोखा ने संवत 1485 माघ बदी 9 शुक्रवार (31 दिसम्बर 1428) को दूधवाखारा पर अधिकार कर लिया.

विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट राज्यों के साथ कसवां जाटों के राज्य को भी राठोडों ने अधिकृत कर लिया.क्योंकि यह जाट राज्य अगली पीढ़ी तक छोटे छोटे ठिकानों में बंट गया थे।व आपसी द्वेष के कारण एकजुट नहीं हो सके। ईसलिये सबने बिका जी के साथ सन्धि कर ली व उनके राज्य में शामिल हो गए।

ठाकुर देशराज जी लिखते हैं कि ईसा की चौथी सदी से पहले जांगल-प्रदेश में आबाद हुए थे। इनके अधिकार में लगभग चार सौ गांव थे। सीधमुख राजधानी थी। राठौरों से जिस समय युद्ध हुआ, उसय समय कंवरपाल नामी सरदार इनका राजा था। इस वंश के लोग धैर्य के साथ लड़ने में बहुत प्रसिद्ध थे। कहा जाता है दो हजार ऊंट और पांच सौ सवार इनके प्रतिक्षण शत्रु से मुकाबला करने के लिए तैयार रहते थे। यह कुल सेना राजधानी में तैयार न रहती थी। वे उत्तम कृषिकार और श्रेष्ठ सैनिक समझे जाते थे। राज उनका भरा-पूरा था। प्रजा पर कोई अत्याचार न था। सत्रहवीं शताब्दी में इनका भी राज राठौंरों द्वारा अपहरण कर लिया गया।

इनका राज्य बहुत खुशहाल था। प्रमुख ठिकानों के सरदारों का चुनाव होता था। राज्य में किसानों,मजदूरों,धर्म प्रचारकों को विशेष संरक्षण प्रदान था। यहां कंस्वा जाटो का राज किसी न किसी रूप में 1068 से 16वी शताब्दि के पूर्वार्ध(1530/1550) तक रहा।

लेकिन कितने दुःख की बात है कि आज इनके वंशज ही इन्हें भुले बैठे हैं।एक आध बुजुर्ग आदमी को ही वह स्वर्णिम काल धुंधला धुंधला याद है। सिधमुख में इनकी प्रतिमा लगनी चाहिए ताकि आने वाली पीढियां इन्हें याद रख सके। और उससे भी बड़ी बात यह है कि यहां कि यहां चूरू से हर बार कस्वां ही mp बनते हैं लेकिन फिर भी कोई स्टेचू नहीं।उस समय जांगलपर्देश(बीकानेर से चुरु तक) लगभग 7 जाट राज्य थे।उनमें से किसी की भी प्रतिमा उनकी राजधानी में भी नहीं है।

जय महाराजा कंवरपाल सिंह। जय जय श्री राम।
चौधरी जयदीप सिंह नैन

Thursday, 9 August 2018

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का राजतिलक व प्रतिशोध की प्रतिज्ञा और तैयारी

जाट क्षत्रिय महाराजा
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास के समय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह फरूखनगर में थे। उनको अगले दिन इसका समाचार मिला तो वे क्रोधित व व्याकुल हो उठे। उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला उठने लगी।
उधर भरतपुर में उत्तराधिकार के लिए लड़ाई शुरू हो गयी व षड्यन्त्र रचे जाने लगे। यह पता चलते ही जवाहर सिंह ने सभी को फटकारा व घोषणा कि के जवाहर सिंह, महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या का बदला लेगा।प्रजा व राज्य के सम्मान के लिए वह ये कार्य करेगा और इसका कुछ समाधान होने के बाद ही उत्तराधिकार की बात होगी। उत्तराधिकार और राज पाट के लिए लड़ते हुए शर्म आनी चाहिए। यह सुनकर सबको अपनी गलती का अहसास हुआ व विरोधी अपनी चौकड़ी भूल गए।

उसके बाद महाराज जवाहर सिंह डीग पहुंचे और पिताजी की शोक सभा के पश्चात सबका समर्थन इकट्ठा किया अपने पिता की शोक सभा के बाद उन्होंने प्रतिशोध की बात दोहराई व अपनी रणनीति बताई।जनता ने भी उन्हें खुला समर्थन दिया।उन्होंने गोवर्धन में महाराज की छतरी बनवाई। जिसके पश्चात 30 दिसम्बर 1763 को कुलपुरोहित घमंडीराम व राजगुरु महंत रामकिशन ने ऊनका राज तिलक किया।

आस पास के पड़ोसी व अन्य शक्तिशाली हिन्दू राज्यो को पत्र लिखे व दूत भेजे के अब दिल्ली को आजाद कराना है।

उन्होंने सीखो मराठो को पत्र लिखे और कहा कि वे उन्हें कीमत देने को तैयार है और इस धर्म कार्य मे उनका सहयोग करें।
पेशवा को अपने मित्र से पत्र लिखवाया कि हम आपके हितेषी और आज की स्तिथि में जवाहर आपका सब हिन्दुओ में एकमात्र व सबसे बड़ा हितैषी है।

उन्होंने अपने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से रुहेले व अन्य मुस्लिमो को खदेड़ दिया।जब कुछ मुस्लिम नवाबो ने जटवाड़े की ओर कदम बढ़ाए तो सिख सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दूसरी तरफ आक्रमण कर दिया जिस कारण उन नवाबों को अपनी राजधानी बचाने के लिए वापिस आना पड़ा।

इससे महाराज जवाहर सिंह को समय मिल गया व उन्होंने दरबार के अपने विरोधियों को अपने पाले में कर लिया। इस काम मे महारानी किशोरी देवी,रानी हंसिया व महंत रामकिशन ने उनकी बहुत मदद की।उनकी माताओं ने उनकी आर्थिक सहायता की।

उन्होंने एक श्री हनुमान गोल सेना का भी निर्माण किया। और सेना की संख्या बढ़ाई।

यह सब देखकर दिल्ली का बादशाह नजीबुद्दौला डर गया क्योंकि जवाहर सिंह की तैयारी अकेले प्रतिशोध की ही नहीं दिल्ली के विनाश व धर्म की लड़ाई बनती जा रही ह जिस्के कारण उन्हें खुला समर्थन मिल रहा है।

उसने जवाहर सिंह को पत्र लिखा व क्षमा मांगी और खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश की। मित्रता का हाथ बढ़ाया और शांति के लिए भीख मांगी। उसने कहा कि वह पराक्रमी महाराजा सूरजमल के बेटे से युद्ध नहीं करना चाहता।इसमें बहुत नुकसान होगा मैं बर्बाद हो जाऊंगा तो क्या आपके पिता वापिस आ जाएंगे।इसमें बलूची डाकुओं की गलती है उन्होंने महाराज के साथ धोखा किया है।

नजीब ने अन्य मर्राठा व जयपुर आदि हिन्दू राजाओ को  भी जवाहर सिंह को समझाकर रोकने के लिए पत्र लिखा।

लेकिन सब व्यर्थ गया।अब जवाहर सिंह ने लगभग 90 हजार से 1 लाख की हिन्दू सेना तैयार कर ली थी।

 दिल्ली में युद्ध लड़ने की बजाय खुद को बचाने की तैयारियां हो रही थी। उन्होंने फाटक बंद कर लिए व बादशाह ने खुद को सुरक्षित करने पर ज्यादा जोर दिया।

इस युद्ध को दूसरे पानीपत के युद्ध के रूप में जाना जाता है।क्योंकि मराठा व अब्दाली के पानीपत संग्राम के बाद यह दूसरा मौका था कि एक बड़ी संख्या में व पूर्ण तैयारी के साथ हिन्दू सेना संस्क्रति व देश की रक्षा के लिए मुस्लिम सत्ता से भिड़ने जा रही थी। इस युद्ध का अब मुख्य मकसद दिल्ली से मुगल सत्ता का विनाश बन गया था।

बन्द करलयो फाटक भाई,जवाहर आवेगा,
गुस्से में है लाल सूरज का,मुगला री दिल्ली न तोड़ेगा।
कट्ठे होके छुप जाओ सारे,एक एक न कसूता फोड़ेगा।।

दिल्ली विजय अभियान-महाराजा जवाहर सिंह(1764)

जाट महाराजा
Maharaja Jawahar Singh

महाराजा जवाहर सिंह ने एक विशाल समाहरोह करके जनता को एकत्रित किया व ओजस्वी भाषण दिया कि हमें महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या व पानीपत के हर संहार का मुगलो से प्रतिशोध लेना है।और दिल्ली को आजाद करवाकर अपने धर्म व संस्कृति को आजाद करवाना है। भले ही इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े।

यह सुनकर नागरिकों में हौसला आ गया।युवक सेना में भर्ती होने लगे।उन्होंने सिखों मराठों गोहद जयपुर आदि अनेकों हिन्दू शासकों को पत्र लिखकर सहायता मांगी व कीमत देने का भी प्रलोभन दिया।गोहद, मराठो व सीखो ने सहायता देने का वादा किया।

इस तरह महाराज ने 20,000 मल्हारराव होल्कर व 15,000 सिख जाटो और गोहद की 5,000 सेना समेत लगभग 1 लाख सैनिको के विशाल दल के साथ दिल्ली पर फिर से हिन्दू संस्कृति को मजबूत करने का इरादा किया।

उन्होंने भरतपुर दुर्ग के महलों के सामने हनुमान जी की प्रतिमा लगवाई और पण्डित रूपराम कटारा को काफी आभूषण व धन दान दिया।फिर उन्होंने अपने कुलदेव भगवान लक्ष्मण व कुलदेवी माता राजश्रीदेवी की पूजा की। और गोवर्धन की तरफ से दिल्ली दरवाजे से गिरिराज महाराज का नारा लगाते हुए दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।गोवर्धन में उन्होंने अपने पूर्वज श्री कृष्ण  भगवान की पूजा की व महाराजा सूरजमल की समाधि से आशीर्वाद लिया।और फिर बल्लभगढ में जाकर अपना डेरा डाला। उधर दिल्ली के मुगल बादशाह की घिग्गी बंधी हुई थी।वह बार बार पत्र लिखकर जवाहर सिंह को युद्ध न करने के लिए गिड़गिड़ा रहा था।
मल्हारराव भी अपने 20,000 सैनिको के साथ आकर मिल गए।

बल्लभगढ में 4 अक्टूबर 1764 को दशहरे के दिन उन्होंने पूजा की व दान दक्षिण करके दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने नजीब की सेना के छक्के छुड़ा दिए।मुगल सैनिको की देह को जटवाड़ी तलवारों ने चिर दिया और दिल्ली में दाखिल हो गए। उन्होंने नजीब को खुले में आकर लड़ने को कहा ताकि दिल्ली की जनता को परेशानी न हो।परन्तु कायर नजीब नहीं निकला।

फिर सिख जाट सरदार बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह व चस्सा सिंह भी अपने 12 से 15000 सैनिको के साथ पहुंच गए। उन्हे प्रतिदिन 15,000 रुपये देने का वादा किया गया था।मल्हाराव होल्कर को भी बड़ी कीमत पर लाया गया था।

फिर महाराजा जवाहर सिंह ने पुराने किले पर आक्रमण किया व बड़ी चरुराई से  मुगलों को साफ कर दिया।
मल्हारराव इस युद्ध में दिलचस्पी नहीं दीखा रहे थे।महाराः जवाहर सिंह को तभी उन पर संदेह हो गया था लेकिन उस समय वे कर भी क्या सकते थे।मल्हारराव उन पर नजीब से बातचीत का दबाव बना रहे थे व अन्य सेनापतियों को भी गुमराह कर रहे थे।

महाराज जवाहर सिंह ने वहां लगे अष्टधातु के किवाड़ उतार लिए जो 462 साल पहले अलाउद्दीन खिलजी चितौड़ से जितकर लाया था।इस तरह उन्होंने हिन्दुओ के इस कलंक को भी धो दिया।इस युद्ध में वीर यौद्धा पाखरिया(पुष्कर सिंह) शहीद हो गए।

दिल्ली में चारो तरफ गोलाबारी चल रही थी।उमेदगिरी गोसाई बल्लभगढ के तेवतिया राजा, और होडल के बलराम सिंह नाहरवार आदि अनेकों वीर मुगलो के रक्त से धरती लाल करते जा रहे थे।

सारी दिल्ली में मुगलो में हाहाकार मची हुई थी। मुगलों के महलों में जटवाड़ी सेना ने भूसा भरवा दिया था।
दिल्ली की बहुत सी महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा हो चुका था। लेकिन मल्हारराव नजीब से पहले से ही मिलजे हुआ था। उन्होंने सेनापतियों का मनोबल तोड़ना शुरू कर दिया।
उधर से अहमदशाह दुर्रानी अपने मजहब का राज खत्म होता देखकर नजीब की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ा और हिंदुस्तान की ओर बढ़ने लगा। जिस कारण सारा माहौल ही बदल गया। सिख सरदारों ने उससे अपने किलो की सुरक्षा का हवाला देकर पंजाब की ओर पलायन कर दिया। मल्हारराव नजीब की ओर थे ही और उसकी बात का खुला समर्थन कर दिया व सन्धि के लिए कहने लगे। इस तरह हिन्दुओ की आपसी फूट के कारण जीती हुई स्तिथि में भी सब कुछ कमजोर पड़ गया।

अब भी जवाहर सिंह नजीब को बर्बाद करने लायक थे लेकिन इसमें वे भी बर्बाद हो जाते व दिल्ली पर कट्टर इस्लामिक जिहादी दुर्रानी का राज आ जाता।

इसलिए उन्होंने नजीब की सन्धि को स्वीकारने व दुर्रानी से मुकाबला करने के लिए भरतपुर दुर्ग को मजबूत करने  में ही भलाई समझी।नजीब की सांस में सांस आ गयी। उसने मल्हारराव को काफी खिललते व उपहार प्रदान किये।

अगर आपसी फूट न होती तो एक तो हिंदुस्तान मुगलों से आजाद हो जाता और न ही अंग्रेजो का शासन देश पर आता।

एक तो दुर्रानी था जो विदेश से अपने मजहब की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़ा दूसरी तरफ हिन्दू थे जो लालच व जलन के कारण एक न हो पाए। यही हमारे देश की 1000 साल की गुलामी का असली कारण रहा है।और आज भी हम सिख नहीं ले रहे।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय शिवाजी।

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक- महाराजा जवाहर सिंह

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक-महाराजा जवाहर सिंह
Jat Jawahar Singh -Hindu Veer Shiromani Warrior
महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा जवाहर सिंह महाराजा सूरजमल के बेटे थे।भगवान लक्ष्मण उनके कुलदेव हैं और भगवान श्री कृष्ण के वे वंशज थे।बजरंग बली के बहुत बड़े भक्त थे।

महाराजा जवाहर सिंह ने आगरा की जामा मस्जिद को खाली करवाकर मंडी खुलवा दी थी व घोड़ो का तबेला बना दिया था।

बचपन में ही जब दिल्ली के वजीर ने उनका हाथ चुमा तो उन्होंने भरे दरबार मे फटकार लगा दी थी के हमारा हाथ छूकर अपवित्र क्यों किया।

उन्होंने अब्दाली से भी टक्कर ली थी व अपने पिता के साथ लगभग युद्धों में वीरता दिखलाते थे।

उन्होंने ऊंची आवाज में अजान देने पर एक मौलवी की जीभ कटवा दी थी।और ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

उन्होंने दिल्ली को मुगलो से आजाद कराने के लिए भी पूरी कोशिश की थी पर कुछ गद्दारो के कारण जीत के बावजूद सन्धि करनी पड़ी थी।

इस दौरान वे दिल्ली से चितौड़ के अष्टधातु किवाड़ वापिस भरतपुर जीत लाये थे जो खिलजी उनसे 462 साल पहले चितौड़ से जीतकर ले गया था।

ईरानी मूल की एक गन्ना बेगम उन पर बहुत मरती थी।
लेकिन गन्ना का प्रेम सिरे न चढ़ सका और गन्ना ने सारी उम्र जवाहर के प्रेम में फ़नाह कर दी थी।

उन्होंने पुष्कर के धार्मिक स्नान को हर हिन्दू के लिए खुलवा दिया था व वहां लगी शाही पाबंदी हटवा दी थी।

उन्होंने मेवात क्षेत्र में धर्म वापसी करवाकर धर्म बढ़ाने के लिए भी बहुत कार्य किया था।

आगरा में अपने किले में एक उत्सव के दौरान वे सीढ़ियों से निहत्थे उतर रहे थे तो पीछे से किसी सुजात मेव नाम के मुस्लिम ने उन पर जहरीले चाकू से हमला किया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी थी।उस मेव को उसी समय सैनिको ने मार दिया। शायद वह मेवात में मुस्लिमो को हिन्दू बनाये जाने से नाराज था।

 7 अगस्त को हर साल उनकी पुण्यतिथि पर बलिदान दिवस मनाया जाता है।

जबरो जाट जवाहर सिंह
सूरजमल रो जायो हो
लाल किले रो फाटक तोड़यो
लोहागढ़ पहुंचायो हो
मुगल बेगमा रे महला म्ह
गाढो ही फुस भरायो रे बेली,
हर हर बम बम बोलो रे बेली

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

Saturday, 21 April 2018

भक्त शिरोमणि श्री धन्ना जाट

भक्त शिरोमणि धन्ना जाट
भक्त शिरोमणि धन्ना जाट
भक्त शिरोमणि श्री धन्ना जाट

धन्ना जी का जन्म 1415 ईस्वी में गांव धुंआ जिला टोंक राजस्थान में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता एक किसान थे।
वे बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। एक बार वे अपने पिता के साथ एक मन्दिर में गए तो पण्डित जी भगवान का भोग लगा रहे थे। तो धन्ना ने पण्डित जी से भगवान की मूर्ति लेने की जिद्द की। पण्डित जी के पास कोई दूसरी मूर्ति नहीं थी लेकिन बालक की जिद्द को देखकर उन्होंने बालक धन्ना को एक पत्थर देकर बोला कि ये ही भगवान की मूर्ति है।
धन्ना ने उस पत्थर को ही भगवान श्री कृष्ण समझकर पूजना शुरू कर दिया।
उन्होंने भगवान को खाना खाने के लिए बुलाया लेकिन अबोध बालक को क्या पता कि पत्थर खाना नहीं खाता।
लेकिन उन्होंने जिद्द कर ली और खुद भी खाना छोड़ दिया। अंत में स्वयं भगवान उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
भगवान ने उसके साथ खाना खाया व धन्ना ने उन्हें अपना सखा बनने की जिद्द की।
फिर रोज भगवान धन्ना के साथ खाना खाने आते थे।और धन्ना की सहायता करते थे।
फिर धन्ना बड़े होकर काशी में गुरु रामानन्द जी के पास दीक्षा ग्रहण की।

एक दिन धन्ना अपने खेत मे अनाज बोने गए तो रास्ते मे कुछ साधुओं ने उनसे भिक्षा मांगी।तो उन्होंने बोने के लिए लाए गए अनाज को भिक्षा में दे दिया।
लेकिन घरवालो के डर से धन्ना ने भगवान का नाम लेकर खाली हल ही खेत में जोत दिया।
और अंत मे फसल काटने के लिए जब गए तो उन्हें भरपयर अनाज खेत मे मिला।

इससे उनकी भक्ति की चर्चा बहुत दूर तक फैल गयी।
और उनका भजन कृतन सुनने के लिए दूर दूर से भक्त आने लगे।
उन्होंने सम्पूर्ण जीवन भक्ति में गुजर दिया।
आज उनके नाम से मन्दिर व गुरुद्वारा है और लोग उनकी भक्ति से प्रेरणा लेते हैं।

कौन कहता है कि पत्थर में भगवान नहीं बसते
एक बार नियत से पूजा साध करके तो देखो,
कौन कहता है कि श्री कृष्ण जी दर्शन नहीं देते
एक बार कोई भक्त धन्ना जाट बनकर तो देखो।।