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Thursday, 9 August 2018

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का राजतिलक व प्रतिशोध की प्रतिज्ञा और तैयारी

जाट क्षत्रिय महाराजा
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास के समय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह फरूखनगर में थे। उनको अगले दिन इसका समाचार मिला तो वे क्रोधित व व्याकुल हो उठे। उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला उठने लगी।
उधर भरतपुर में उत्तराधिकार के लिए लड़ाई शुरू हो गयी व षड्यन्त्र रचे जाने लगे। यह पता चलते ही जवाहर सिंह ने सभी को फटकारा व घोषणा कि के जवाहर सिंह, महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या का बदला लेगा।प्रजा व राज्य के सम्मान के लिए वह ये कार्य करेगा और इसका कुछ समाधान होने के बाद ही उत्तराधिकार की बात होगी। उत्तराधिकार और राज पाट के लिए लड़ते हुए शर्म आनी चाहिए। यह सुनकर सबको अपनी गलती का अहसास हुआ व विरोधी अपनी चौकड़ी भूल गए।

उसके बाद महाराज जवाहर सिंह डीग पहुंचे और पिताजी की शोक सभा के पश्चात सबका समर्थन इकट्ठा किया अपने पिता की शोक सभा के बाद उन्होंने प्रतिशोध की बात दोहराई व अपनी रणनीति बताई।जनता ने भी उन्हें खुला समर्थन दिया।उन्होंने गोवर्धन में महाराज की छतरी बनवाई। जिसके पश्चात 30 दिसम्बर 1763 को कुलपुरोहित घमंडीराम व राजगुरु महंत रामकिशन ने ऊनका राज तिलक किया।

आस पास के पड़ोसी व अन्य शक्तिशाली हिन्दू राज्यो को पत्र लिखे व दूत भेजे के अब दिल्ली को आजाद कराना है।

उन्होंने सीखो मराठो को पत्र लिखे और कहा कि वे उन्हें कीमत देने को तैयार है और इस धर्म कार्य मे उनका सहयोग करें।
पेशवा को अपने मित्र से पत्र लिखवाया कि हम आपके हितेषी और आज की स्तिथि में जवाहर आपका सब हिन्दुओ में एकमात्र व सबसे बड़ा हितैषी है।

उन्होंने अपने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से रुहेले व अन्य मुस्लिमो को खदेड़ दिया।जब कुछ मुस्लिम नवाबो ने जटवाड़े की ओर कदम बढ़ाए तो सिख सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दूसरी तरफ आक्रमण कर दिया जिस कारण उन नवाबों को अपनी राजधानी बचाने के लिए वापिस आना पड़ा।

इससे महाराज जवाहर सिंह को समय मिल गया व उन्होंने दरबार के अपने विरोधियों को अपने पाले में कर लिया। इस काम मे महारानी किशोरी देवी,रानी हंसिया व महंत रामकिशन ने उनकी बहुत मदद की।उनकी माताओं ने उनकी आर्थिक सहायता की।

उन्होंने एक श्री हनुमान गोल सेना का भी निर्माण किया। और सेना की संख्या बढ़ाई।

यह सब देखकर दिल्ली का बादशाह नजीबुद्दौला डर गया क्योंकि जवाहर सिंह की तैयारी अकेले प्रतिशोध की ही नहीं दिल्ली के विनाश व धर्म की लड़ाई बनती जा रही ह जिस्के कारण उन्हें खुला समर्थन मिल रहा है।

उसने जवाहर सिंह को पत्र लिखा व क्षमा मांगी और खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश की। मित्रता का हाथ बढ़ाया और शांति के लिए भीख मांगी। उसने कहा कि वह पराक्रमी महाराजा सूरजमल के बेटे से युद्ध नहीं करना चाहता।इसमें बहुत नुकसान होगा मैं बर्बाद हो जाऊंगा तो क्या आपके पिता वापिस आ जाएंगे।इसमें बलूची डाकुओं की गलती है उन्होंने महाराज के साथ धोखा किया है।

नजीब ने अन्य मर्राठा व जयपुर आदि हिन्दू राजाओ को  भी जवाहर सिंह को समझाकर रोकने के लिए पत्र लिखा।

लेकिन सब व्यर्थ गया।अब जवाहर सिंह ने लगभग 90 हजार से 1 लाख की हिन्दू सेना तैयार कर ली थी।

 दिल्ली में युद्ध लड़ने की बजाय खुद को बचाने की तैयारियां हो रही थी। उन्होंने फाटक बंद कर लिए व बादशाह ने खुद को सुरक्षित करने पर ज्यादा जोर दिया।

इस युद्ध को दूसरे पानीपत के युद्ध के रूप में जाना जाता है।क्योंकि मराठा व अब्दाली के पानीपत संग्राम के बाद यह दूसरा मौका था कि एक बड़ी संख्या में व पूर्ण तैयारी के साथ हिन्दू सेना संस्क्रति व देश की रक्षा के लिए मुस्लिम सत्ता से भिड़ने जा रही थी। इस युद्ध का अब मुख्य मकसद दिल्ली से मुगल सत्ता का विनाश बन गया था।

बन्द करलयो फाटक भाई,जवाहर आवेगा,
गुस्से में है लाल सूरज का,मुगला री दिल्ली न तोड़ेगा।
कट्ठे होके छुप जाओ सारे,एक एक न कसूता फोड़ेगा।।

दिल्ली विजय अभियान-महाराजा जवाहर सिंह(1764)

जाट महाराजा
Maharaja Jawahar Singh

महाराजा जवाहर सिंह ने एक विशाल समाहरोह करके जनता को एकत्रित किया व ओजस्वी भाषण दिया कि हमें महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या व पानीपत के हर संहार का मुगलो से प्रतिशोध लेना है।और दिल्ली को आजाद करवाकर अपने धर्म व संस्कृति को आजाद करवाना है। भले ही इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े।

यह सुनकर नागरिकों में हौसला आ गया।युवक सेना में भर्ती होने लगे।उन्होंने सिखों मराठों गोहद जयपुर आदि अनेकों हिन्दू शासकों को पत्र लिखकर सहायता मांगी व कीमत देने का भी प्रलोभन दिया।गोहद, मराठो व सीखो ने सहायता देने का वादा किया।

इस तरह महाराज ने 20,000 मल्हारराव होल्कर व 15,000 सिख जाटो और गोहद की 5,000 सेना समेत लगभग 1 लाख सैनिको के विशाल दल के साथ दिल्ली पर फिर से हिन्दू संस्कृति को मजबूत करने का इरादा किया।

उन्होंने भरतपुर दुर्ग के महलों के सामने हनुमान जी की प्रतिमा लगवाई और पण्डित रूपराम कटारा को काफी आभूषण व धन दान दिया।फिर उन्होंने अपने कुलदेव भगवान लक्ष्मण व कुलदेवी माता राजश्रीदेवी की पूजा की। और गोवर्धन की तरफ से दिल्ली दरवाजे से गिरिराज महाराज का नारा लगाते हुए दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।गोवर्धन में उन्होंने अपने पूर्वज श्री कृष्ण  भगवान की पूजा की व महाराजा सूरजमल की समाधि से आशीर्वाद लिया।और फिर बल्लभगढ में जाकर अपना डेरा डाला। उधर दिल्ली के मुगल बादशाह की घिग्गी बंधी हुई थी।वह बार बार पत्र लिखकर जवाहर सिंह को युद्ध न करने के लिए गिड़गिड़ा रहा था।
मल्हारराव भी अपने 20,000 सैनिको के साथ आकर मिल गए।

बल्लभगढ में 4 अक्टूबर 1764 को दशहरे के दिन उन्होंने पूजा की व दान दक्षिण करके दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने नजीब की सेना के छक्के छुड़ा दिए।मुगल सैनिको की देह को जटवाड़ी तलवारों ने चिर दिया और दिल्ली में दाखिल हो गए। उन्होंने नजीब को खुले में आकर लड़ने को कहा ताकि दिल्ली की जनता को परेशानी न हो।परन्तु कायर नजीब नहीं निकला।

फिर सिख जाट सरदार बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह व चस्सा सिंह भी अपने 12 से 15000 सैनिको के साथ पहुंच गए। उन्हे प्रतिदिन 15,000 रुपये देने का वादा किया गया था।मल्हाराव होल्कर को भी बड़ी कीमत पर लाया गया था।

फिर महाराजा जवाहर सिंह ने पुराने किले पर आक्रमण किया व बड़ी चरुराई से  मुगलों को साफ कर दिया।
मल्हारराव इस युद्ध में दिलचस्पी नहीं दीखा रहे थे।महाराः जवाहर सिंह को तभी उन पर संदेह हो गया था लेकिन उस समय वे कर भी क्या सकते थे।मल्हारराव उन पर नजीब से बातचीत का दबाव बना रहे थे व अन्य सेनापतियों को भी गुमराह कर रहे थे।

महाराज जवाहर सिंह ने वहां लगे अष्टधातु के किवाड़ उतार लिए जो 462 साल पहले अलाउद्दीन खिलजी चितौड़ से जितकर लाया था।इस तरह उन्होंने हिन्दुओ के इस कलंक को भी धो दिया।इस युद्ध में वीर यौद्धा पाखरिया(पुष्कर सिंह) शहीद हो गए।

दिल्ली में चारो तरफ गोलाबारी चल रही थी।उमेदगिरी गोसाई बल्लभगढ के तेवतिया राजा, और होडल के बलराम सिंह नाहरवार आदि अनेकों वीर मुगलो के रक्त से धरती लाल करते जा रहे थे।

सारी दिल्ली में मुगलो में हाहाकार मची हुई थी। मुगलों के महलों में जटवाड़ी सेना ने भूसा भरवा दिया था।
दिल्ली की बहुत सी महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा हो चुका था। लेकिन मल्हारराव नजीब से पहले से ही मिलजे हुआ था। उन्होंने सेनापतियों का मनोबल तोड़ना शुरू कर दिया।
उधर से अहमदशाह दुर्रानी अपने मजहब का राज खत्म होता देखकर नजीब की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ा और हिंदुस्तान की ओर बढ़ने लगा। जिस कारण सारा माहौल ही बदल गया। सिख सरदारों ने उससे अपने किलो की सुरक्षा का हवाला देकर पंजाब की ओर पलायन कर दिया। मल्हारराव नजीब की ओर थे ही और उसकी बात का खुला समर्थन कर दिया व सन्धि के लिए कहने लगे। इस तरह हिन्दुओ की आपसी फूट के कारण जीती हुई स्तिथि में भी सब कुछ कमजोर पड़ गया।

अब भी जवाहर सिंह नजीब को बर्बाद करने लायक थे लेकिन इसमें वे भी बर्बाद हो जाते व दिल्ली पर कट्टर इस्लामिक जिहादी दुर्रानी का राज आ जाता।

इसलिए उन्होंने नजीब की सन्धि को स्वीकारने व दुर्रानी से मुकाबला करने के लिए भरतपुर दुर्ग को मजबूत करने  में ही भलाई समझी।नजीब की सांस में सांस आ गयी। उसने मल्हारराव को काफी खिललते व उपहार प्रदान किये।

अगर आपसी फूट न होती तो एक तो हिंदुस्तान मुगलों से आजाद हो जाता और न ही अंग्रेजो का शासन देश पर आता।

एक तो दुर्रानी था जो विदेश से अपने मजहब की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़ा दूसरी तरफ हिन्दू थे जो लालच व जलन के कारण एक न हो पाए। यही हमारे देश की 1000 साल की गुलामी का असली कारण रहा है।और आज भी हम सिख नहीं ले रहे।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय शिवाजी।

462 साल बाद दिल्ली से यह हिन्दू राजा वापिस लाया चितौड़ के अष्टधातु किवाड़- खिलजी ले गया था चितौड़ से दिल्ली

महाराजा जवाहर सिंह दिल्ली से वापिस लाये चितौड़ के अष्टधातु दरवाजे-हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

जाट महाराजा
महाराजा जवाहर सिंह

बात उस समय की है जब अलाउद्दीन खिलजी ने माता पद्मावती के लिए चितौड़ पर आक्रमण किया।लेकिन वह माता पद्मिनी की परछाई को छू भी नहीं सका।तो वह गुस्से में चितौड़ दुर्ग के अष्टधातु किवाड़ लूटकर दिल्ली ले आया और यहां किले में लगा दिए। उसके बाद किसी भी अन्य शासक ने वे माता पद्मावती के सम्मान का प्रतीक किवाड़ वापिस लाने की हिम्मत न की।

फिर 462 साल बाद हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली से मुगल सत्ता उखाड़ने के लिए 1764 में आक्रमण किया।

उसके बाद महाराजा ने जब किले पर आक्रमण किया तो मुगलों ने किवाड़ बन्द कर दिए और अंदर से गोलाबारी करने लगे। केसरिया नाम के हाथी ने किवाड़ों पर 12 टक्कर मारी लेकिन दरवाजा नहीं टूट पाया क्योंकि हाथी का सिर लगने से उसमें चोट आ रही थी।सेना में निराशा छा गयी। हालात बदतर हो जा रहे थे।मुगलो की गोलाबारी के कारण सब ध्वस्त हो रहा था।

तब महाराजा की सेना में वीर सेनापति जाट पुष्कर सिंह(पाखरिया) सामने आए और उन्होंने कहा कि मुझे हाथी के सिर से बांध दीजिये और किवाड़ तोड़ दीजिये।
तो यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी। हिन्दू वीर पुष्कर से बंधे हाथी ने किवाड़ों पर टक्कर मारी। बार बार टक्कर मारी तो पुष्कर सिंह का शरीर चकनाचूर हो गया। मगर पुष्कर के प्राण निकल गए उन्होंने आह तक न करी।किवाड़ के कुंडें टूट गए व दरवाजा नीचे गिर गया।

फिर हिन्दू वीर जाट सेना ने किले में धुंआधार लड़ाई शुरू कर दी।कीले को कब्जे में ले लिया।

जब महाराजा को पता चला कि ये वे ही किवाड़ है जो खिलजी चितौड़ से लाया था। तो हिन्दुओ पर लगे इस कलंक को मिटाने का फैसला किया व किवाड़ हाथी पर लाद दिए गए। माता पद्मावती के सम्मान और वीर पुष्कर सिंह के बलिदान की ये निशानी आज भी भरतपुर के दुर्ग पर चढ़ी हुई है।

उसके बाद चितौड़ ने उन किवाड़ों को लेने की कोशिश की तो महाराजा ने उन्हें किवाड़ उपहारस्वरूप देने का फैसला कर लिया। परन्तु चितौड़ ने किवाड़ों की कीमत अदा करने को कहा तो महाराजा जवाहर सिंह ने कहा कि वे उपहार के रूप में दे सकते हैं इस तरह कीमत पर नहीं वे कोई व्यापारी नहीं है। तो चितौड़ ने कहा कि हम तो कीमत पर ही लेके जाएंगे।
इस पर महाराजा बिफर पड़े और बोले कि फिर आप उसी तरह ले जाइए जिस तरह मैं दिल्ली से लेकर आया।मतलब युद्ध करके जीत ले जाइए।

उसके बाद चितौड़ की तरफ से कोई जवाब नहीं आया और वे दरवाजे आज भी भरतपुर दुर्ग की शोभा बढ़ा रहे हैं।और माता पद्मावती,वीर पुष्कर सिंह के बलिदान व महाराजा जवाहर सिंह के शौर्य की गाथा को याद दिला रहे हैं।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

कहानी मुस्लिम विश्व सुंदरी गन्ना बेगम की जो जान लुटाती थी इस हिन्दू महाराजा पर

गन्ना बेगम की कहानी-हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह पर मरती थी गन्ना बेगम
Ganna Begum
गन्ना-जवाहर का प्रेम

ताजमहल को प्रेम की निशानी कहने वालों ये होता है प्रेम
गन्ना बेगम जो अली बेग कुली खान की बेटी थी।अली बेग ईरान के शाही वंश का था जो यहां अवध के नवाब के दरबार में रहता था।अगरा में गन्ना का परिवार रहता था।

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि गन्ना बेगम उस समय की विश्व सुंदरी थी।जब वह पान खाती थी तो उसके गले में पान की लालिमा साफ दिखाई पड़ती थी।बेगम के जन्म का नाम उसके रूप के अनुसार चांद बेगम था परंतु कोमल व सुंदर शरीर वाली बेगम गन्ने जैसी मीठी थी इसलिए वह गन्ना बेगम के नाम से मशहूर हुई। उस समय गन्ना के हुस्न पर दर्जनों राजा आह भरते थे।और उसे पाने के लिए हजारो प्रयास कर चुके थे।

एक बार गन्ना ने महाराजा जवाहर सिंह को देखा तो वह उनको पहली नजर में ही दिल दे बैठी।महाराज भी उस समय राजकुमारों में श्रेष्ठ थे और उनकी वीरता के किस्से भी गन्ना कई बार सुने थे।महाराज की भी जब नजर पड़ी तो वे भी गन्ना के हुस्न के मुरीद हो गए।

दोनो की नजरें मिली और बात आगे बढ़ती गयी। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।आखिर जिस गन्ना को लोग देखने से तरसते थे वह महाराज से प्रेम करती थी। तो गन्ना के आशिकों के दिल जलने लगे।

इसी बिच अवध के नवाब सिराउद्दौला ने गन्ना को देखा तो वह भी आशिक बन बैठा और एकतरफा प्रेम करने लगा। उसने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन गन्ना तो पहले ही जवाहर सिंह पर मर मिटी थी।परंतु नवाब व उसके पिता अली बेग खान को यह पसन्द न आया।उसके पिता उसकी शादी मुस्लिम से ही करना चाहते थे।तो धक्के से नवाब के साथ शादी तय कर दी गयी।

गन्ना ने जवाहर सिंह से मुलाकात की व सारी बात बताई।राजकुमार जवाहर सिंह अपने पिता महाराजा सूरजमल से इस मुद्दे पर बहुत खौफ खाते थे।मगर फिर भी जवाहर ने योजना बनाई के वो रास्ते मे गन्ना का अपहरण कर लेगा। जब गन्ना को अवध भेजा जा रहा था तो फरुखाबाद आगरा के बीच रास्ते मे ही जवाहर ने वहां हमला कर दिया। सब कुछ सही चल रहा था लेकिन ऐन मौके पर महाराजा सूरजमल पहुंच गए। उन्हें किसी ने खबर दी थी के युवक जवाहर सिंह किसी काफिले को लूटने के लिए निकला है। महाराज बड़ी तेजी से 2,000 की सेना लेकर आ धमके और जवाहर सिंह को खूब धमकाया कि राहगीरों को ऐसे लूटने वाले घटिया काम हमारे क्षत्रिय जाट कुल को शोभा नहीं देते। मगर बेचारे जवाहर सिंह कैसे कहें कि वे दौलत नहीं इश्क लूटने आये थे।वे चुप चाप निराशा में डूबे हुए घोड़े पर चढ़कर वापिस भरतपुर की ओर चल पड़े। गन्ना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

महाराज ने राहगीरों को सुरक्षा का इंतजाम किया और सकुशल अपने गंतव्य की ओर जाने का आदेश दिया।
गन्ना वहां पहुंची मगर उससे पहले ही नवाब का निकाह उम्दा बेगम से धक्के शाही से कर दिया जिसे अब्दाली अपनी बहन मानता था उसने नवाब को यह शर्त भी कही के वो दूसरा निकाह नहीं करेगा।इस तरह गन्ना यहां बच गयी।लेकिन नवाब ने उसे दासी बनाने की कोशिश की जो गन्ना ने स्वीकार नहीं की।

जब अब्दाली ने दिल्ली में लूट मचाई तब दिल्ली के नागरिकों को भरतपुर ने शरण दी थी।उन शरणार्थियों में ही उम्दा बेगम व गन्ना बेगम भी थी।यहां उनकी आपस में फिर मुलाकात हुई।गन्ना जवाहर सिंह को देखकर खिल उठी उसकी आँखों मे अश्रुधारा बह रही थी। दोनों ने फिर वही अपहरण की योजना बनाई पर इस बार भी पिता के सम्मान व लोकलाज के कारण जवाहर सिंह कामयाब न हो सके।और उन्होंने गन्ना को पाने का ख्वाब छिड़ दिया।

उसके बाद गन्ना एक दिन मौका अवध से भाग गई।महाराज जवाहर सिंह से फिर मिली परन्तु उस समय महाराज अपने पिता की मृत्यु के शोक में डूबे थे और दिल्ली से प्रतिशोध के लिए आक्रमण कर दिया था।तब महाराज ने गन्ना से असमर्थता जताई।गन्ना रूष्ट हो गयी और जवाहर सिंह से नाराज होकर ग्वालियर चली गयी।

वहां गन्ना सिख का भेष बनाकर रहने लगी।और गुनी सिंह नाम रख लिया।उसने महादजी सिंधिया के जासूस के रूप में काम किया। वह एक अच्छी यौद्धा भी थी उसने महादजी की एक दो युद्धों में महत्वपूर्ण सहायता भी की थी।वह एक अच्छी शायर भी थी।
एक दिन उसकी पोल खुल गयी।महादजी भी उनके हुस्न के मुरीद हो गए।परन्तु गन्ना सिर्फ जवाहर सिंह से प्रेम करती थी।इसलिए यहां भी बात न बन पाई। महादजी ने गन्ना की असली पहचान दुनिया के सामने नहीं खोली। और वह गुनी सिंह के रूप में ही काम करती रही।

एक दिन शिजाउदौला किसी मस्जिद में मीटिंग कर रहा था। तो जासूसी के लिए गन्ना वहां पहुंची परन्तु उसने उसे पहचान लिया और सैनिको को पकड़ने का आदेश दिया। गन्ना को पता था कि अब वह उसे पकड़ लेगा व अनेकों यातनाएं देगा। सलिये गन्ना ने अंगूठी में लगा हीरा चाट लिया और जवाहर सिंह के प्रेम में फनाह हो गयी।यह अंगूठी भी बताते हैं जवाहर सिंह की ही निशानी के तौर पर दी गयी थी।

महादजी ने भी अपना प्रेम निभाया और उसकी एक मजार बनवाई जो ग्वालियर से 35 km दूर नुराबाद में है।
उस पर उन्होंने गन्ना की मातृ भाषा फ़ारसी में "आह गम ए गन्ना" लिखवाया।
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराज जवाहर सिंह के प्रेम में गन्ना श्रीकृष्ण की भक्त बन गयी थी क्योंकि कृष्ण भगवान महाराज के पूर्वज थे। वह हिन्दू बनने को भी तैयार थी।

 परंतु जवाहर सिंह ने एक बेटे का फर्ज निभाया।जिस दौर में बेटा बाप को राज के लिए मार देता था उस दौर में उन्होंने पितृभक्ति दिखलाई।और वे अपने पिता की इतनी इज्जत करते थे कि उन्होंने कभी उनके सामने ये बात अपनी जुबान पर लाकर नहीं दिखलाई।महादजी ने भी अपने प्रेम का सम्मान किया व अपने राज्य में होते हुए भी गन्ना के साथ कोई धक्काशाही नहीं की। जबकि अवध के मुस्लिम नवाब ने उसे दासी की तरह रखने की कोशिश की।उसको यातनाएं भी दी। और उसके भय में उसे आत्म हत्या करनी पड़ी।उसके माता पिता ने भी उसे धक्के से दुराचारी लालची नवाब को एक तरिके से बेच दिया था।

यही फर्क हैं हमारी सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति और अरबी लुटेरों के संस्कारों में।
Jat king- Muslim Begum
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह


और आज जो बॉलीवुड के भांड लोग जोधा अकबर से फर्जी सीरियल बना रहे हैं वे इस हकीकत व इतने रॉयल राजाओ की और एक विश्व सुंदरी प्रेमकहानी पर क्यों चुप है जिसके पूरे तथ्य प्रमाण भी हैं।जिसमें रोचकता रॉयलिटी संस्कार हीरो विलेन सब हैं।
जय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह।
        जय सूरजमल।जय भवानी।

मातृभक्त महाराजा जवाहर सिंह, पुष्कर यात्रा और मांडवा मण्डोली का युद्ध

मातृभक्त महाराजा जवाहर सिंह, पुष्कर यात्रा, मांडवा मण्डोली युद्ध
पुष्कर यात्रा- मांडवा मण्डोली युद्ध
महाराजा जवाहर सिंह की पुष्कर यात्रा

महाराजा जवाहर सिंह की माता महारानी किशोरी देवी ने अपने बेटे से पुष्कर स्नान की इच्छा जाहिर की। महारानी किशोरी देवी की अपने उदर से कोई संतान न थी वे महाराजा जवाहर सिंह को अपना दत्तक पुत्र मानती थी।तो महाराज ने अपनी माता से कहा कि जल्द ही वे उनकी इच्छा पूरी करेंगे।

 संयोग से उसी समय महाराजा जवाहर सिंह के मित्र मारवाड़ के शासक विजय सिंह राठौड़ ने भी उन्हें कुछ सामरिक समझौतों व पुष्कर स्नान के लिए आमंत्रित किया।

उन्होंने जयपुर के महाराजा माधो सिंह से उनके राज्य से होते हुए जाने की अनुमति मांगी।तो माधो सिंह ने उन्हें बिना सेना के कुछ अंगरक्षकों के साथ जाने की सलाह दी।

माधो सिंह व जवाहर सिंह सम्बन्ध अच्छे नहीं थे क्योंकि महाराज सुरजमल ने ईश्वरी सिंह का पक्ष लेकर उन्हें राजा बनाया था।माधो सिंह वह कड़वाहट अब तक नहीं भुला था। दोनों में सीमा को लेकर भी विवाद था। इसलिए महाराजा जवाहर सिंह को षड्यन्त्र की बू आने लगी। तो उन्होंने अपनी सेना के साथ जाने का निश्चय किया।

इसी समय प्रताप सिंह नरुका (जिसे माधो सिंह ने जयपुर से निकाल दिया था व उसके भाई बन्धु उसे मारना चाह रहे थे तो महाराजा सुरजमल ने उसे शरण दी व उसकी रकह की थी तब से वह यहां रहकर सेवा कर रहा था) गुप्त रूप से जयपुर चला गया और जवाहर सिंह से विस्वासघात करके माधो सिंह से मिल गया उसकी अधीनता स्वीकार ली।उन्होंने नीचे नीचे जवाहर सिंह के खिलाफ षड्यन्त्र शुरू कर दिए और अन्य राजपूत सामंतों को उनके खिलाफ भड़काकर अपने साथ मिला लिया।

इस विषम परिस्तिथि में महाराज जवाहर सिंह को दुष्मनो के घर न जाने के लिए कई सलाहकारों ने कहा। परन्तु महाराजा जवाहर सिंह मातृभक्त थे उन्होंने साफ किया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी माता को पुष्कर स्नान जरूर करवाके लाएंगे।
सलाहकारों ने किसी ओर दिन जाने को कहा परन्तु जवाहर सिंह बोले अब तो कार्तिक पूर्णिमा को ही स्न्नान करेंगे अगर हम इन सबके कारण रुक गए तो इनका हौसला बढ़ेगा और भरतपुर खतरे में पड़ जायेगा।

महाराजा जवाहर सिंह पूरे गाजे बाजे के साथ पुष्कर पहुंचे।वहां महाराजा विजयसिंह राठौड़ ने ऊनका भव्य स्वागत किया।और उन दोनों ने आपस मे पगड़ी बदलकर एक दूसरे को भाई माना।विजय सिंह ने जवाहर सिंह के आने पर विशाल पुष्कर सम्मेलन भी अयोजिय किया।भव्य क्रीड़ाये प्रतियोगिताएं हुई।दान पुण्य किया गया।माता किशोरी व जवाहर सिंह ने पुष्कर स्नान के बाद खूब दान किया और वहां मन्दिर व घाटों की स्थापना की।

पुष्कर स्नान पहले सिर्फ शाही लोगो के लिए या उनके चहेतों के लिए ही था किसी भी जाति के गरीब को यहां नहाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन महाराजा जवाहर सिंह ने वह सबके लिए खोल दिया व दोनों महाराजाओं ने हर हिन्दू को वहां स्नान करवाया।उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थान धर्म के हर व्यक्ति के लिए खुला रहना चाहिए।

यह खबर जब जयपुर पहुंची तो उन्होंने इसका बहाना लेकर अन्य रूढ़िवादी राजपूतो को भड़काया की जवाहर सिंह ने पुष्कर में दलितों को भी प्रवेश दिलवाकर शाही परम्परा को तोड़ा है और सबको अपमानित किया है।
इस तरह माधो सिंह ने बड़ी सेना इकट्ठी कर ली।असल मे वह जवाहर सिंह से द्वेष रखता था।और सीमाओं पर भी जवाहर सिंह व माधोसिंह के आपसी मतभेद थे।

इधर महाराजा विजयसिंह राठौड़ व महाराजा जवाहर सिंह में सभी हिन्दू राजाओ को एक होकर अन्य देश विरोधी शक्तियों से मुकाबला करने व मराठो को उत्तर भारत में विस्तार करने से रोकने के लिए समझौता हुआ था।विजयसिंह इस सबसे अनजान थे और उन्होंने कहा था कि सभी जाट राजपूत को एक झंडे के नीचे लाकर अपने क्षेत्र में शांति कायम करेंगे।

कुछ समय पश्चात विजयसिंह राठौड़ को माधोसिंह की तैयारियों का ज्ञान हुआ तो वे बिफर पड़े। उन्होंने भटराजा सदाशिव से कहा कि अगर जवाहर सिंह के लिए कोई षड्यन्त्र रचा जा रहा है तो वह स्वयं कच्छवाहा सीमा तक उन्हें छोडने जाएगा। सदाशिव माधो सिंह की तरफ था उसने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है वे तैयारी सिर्फ जज्बे के लिए हो रही है।उसने विजयसिंह को विस्वास दिलवाया और जवाहर सिंह को दुसती के रूप में उपहार भी भेंट किये लेकिन जवाहर सिंह को संदेह हो चुका था।उन्होंने शत्रु में भय पैदा करने के लिए कहा कि वे शांति चाहते हैं बाकी उनकी हर तरह की स्तिथि से निपटने की पूरी तैयारी कर रखी है।

उसके बाद जवाहर सिंह ने विजयसिंह से विदा ली व दोनों अपने गंतव्य की ओर चल दिये।

तो रास्ते मे मांडवा मण्डोली घाटी से एक जगह दो पहाड़ियों के बीच दर्रे से गुजर रहे थे। वह दर्रा इतना संकरा था कि उसमें से सैनिको को लम्बी कतार से गुजरना था।करीब आधी सेना गुजरने गयी थी व तोप और भारी भरकम हथियार भी आधे पीछे रह गए थे। उसी समय माधो सिंह की सेना ने सूर्योदय से पूर्व आक्रमण कर दिया।अच्चानक व धोखे से हुआ इस आक्रमण का पुरोहित कृपाराम ने डटकर सामना किया और महाराज तक समाचार पहुंचाया की कच्छवाहो ने आक्रमण कर दिया और वे लड़ना चाहते हैं क्या करना है?

महाराज ने विचार विमर्श करके व शत्रु की मनोस्तिथि देखकर लड़ने को कहा और चलते चलते लड़ने को कहा ताकि जल्दी से संकरा दर्रा पार किया जा सके।
यह युद्ध चलता रहा दोपहर तक माधोसिंह की सेना का पलड़ा भारी रहा और जाटो के बहुत से सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन दोपहर तक दर्रा पर हो गया उसके पश्चात जाट सेना ने कहर ढाना शुरू कर दिया।शत्रु की संख्या दोगुनी थी।परन्तु फिर भी जवाहर की सेना ने शत्रु के हजारो सैनिको को काट दिया। और डटकर मुकाबला किया। शाम तक की सेना को तीतर बीतर कर दिया गया।
और युद्ध जीतकर अपने गंतव्य की ओर चल दिये।

इस युद्ध को रक्तपात का बहुत बड़ा युद्ध कहा जाता है। इसमें करीब 2000 जाट व 3000 माधोसिंह समर्थित राजपूत मारे हुए। राजपूतो के बड़े बड़े सेनापति व सरदार मारे गए। उस समय उनके सरदारों के ठिकानों में औरतों व बच्चों बूढों के अलावा कोई नहीं बचा था।सिर्फ 10-15 साल के बच्चे ही बचे थे।

जवाहर सिंह शांति चाहते थे परन्तु धोखे से हुए आक्रमण का जवाब देना उनकी मजबूरी बन गया।

इस युद्ध का दोनों ही राज्यो पर बुरा प्रभाव पड़ा व वे कमजोर हुए।

परन्तु एक तो पुष्कर सबके लिए खुल गया व  हिन्दुओ में रूढ़िवादिता कम हुई।साथ ही शत्रु के घर मे लड़कर शौर्य की मिशाल भी छोड़ी।
दूसरा उन्होंने ऐसी विषम परिस्थितियों में भी अपनी माता की पुष्कर स्नान की इच्छा को पूरा करके मातृभक्ति का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया।

जब महाराजा विजयसिंह राठौङ तक माधो सिंह की छलता बात पहुंची तो वे बहुत गुस्सा हुए।वे माधो सिंह का तो कुछ कर नहीं सकते थे परंतु उन्होंने भटराजा सदाशिव को खूब फटकारा व अपने डेरे से निकाल दिया क्योंकि उसी ने सच्चाई को छुपाया था।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

जय जय बृजराज।जय जय गिरिराज।