Showing posts with label क्षत्रिय. Show all posts
Showing posts with label क्षत्रिय. Show all posts

Tuesday, 2 April 2019

जानिए: जाटों को महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है?

क्यों कहा जाता है क्षत्रिय वीर जाटों को महाक्षत्रीय


खासकर चुनिए व वामपंथी, अंग्रेजो के गुलाम जरूर पढ़ें



देव संहिता में जाट वीरों को महाक्षत्रीय लिखा गया है।इसे भले ही पौराणिक कहानी कहा जाता हो लेकिन इसमें ऐतिहासिक तथ्यों की ओर जो इशारा किया गया है उससे नकारा नहीं जा सकता। इसके अलावा अन्य गर्न्थो के बारे में आपको बताता हूँ-

कुमापालचरित- राजा कुमारपाल पृथ्वीराज चौहान की दादी का भाई था। उसकी श्रीकुमारपाल चरित में 36 क्षत्रीय कुलों का वर्णन हैं। उसमें एकमात्र सम्पूर्ण जाट जाति को ही क्षत्रिय लिखा गया है।अन्य 35 वंश/गौत्र हैं जाती नहीं।और ये सब गौत्र भी जाटो में है।और कुछ अन्य जातियों में भी हैं।इससे यह स्पष्ट है कि जाट महाक्षत्रीय हैं।


पृथ्वीराज रासो- पृथ्वीराज रासो ग्रन्थ में भी 36 कुलों का वर्णन हैं जिसमें एकमात्र सम्पूर्ण जाट जाति को ही क्षत्रिय लिखा गया है अन्य 35 वंश है।

Jat Kshatriya Kumarpal Charit
जाट क्षत्रिय(पृथ्वीराज रासो,कुमारपाल चरित)

#गुजरात_की_प्राचीन_हस्तलिखित_पुस्तकें- इन हस्तलिखित पुस्तको में भी 36 कुलों में जाट जाति का वर्णन किया गया है।

#कर्नल_टॉड- राजपूत जाती पर लिखने वाले इतिहासकार कर्नल टॉड ने भी 36 संशोधित क्षत्रीय कुलों का वर्णन किया है जिसमें जाट जाति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है।

और जहाँ भी जिन 36 कुलों का जिक्र किया गया है वे सारे कुल जाट जाति में है।
राजपूत इतिहासकार Varna
जाट क्षत्रिय(ठाकुर नेकीराम राजपूत की पुस्तक,कर्नल टॉड)

वामपंथियो व अंग्रेजो ने इत्तिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रचारित किया है। और कुछ इतिहासकार शायद इन तथ्यों तक साधनों की कमी के कारण नहीं पहुंच पाए होंगे।
परन्तु इत्तिहास छुपाए नहीं छुपता।विधर्मियो व दुश्मनों की लाख चालों के बाद भी जाटो का स्वर्णिम इत्तिहास व शौर्य एवं सोशल स्टेटस इस बात की गवाही देता रहा है कि जाट सभी क्षत्रियो में सर्वश्रेष्ठ हैं।

राम कृष्ण के वंश हैं हम महादेव के अंश हैं हम

शीश कटे पर झुके नहीं,धड़ लड़ी पर रुके नहीं

देश धर्म की खातिर जान की बाजी लगा देंगे।
या तो खुद मिट जाएंगे या दुश्मन को मिटा देंगे।।

तभी तो कहा गया है - महावीर महाबली महाक्षत्रीय जाट

जय सूरजमल,जय भवानी

Friday, 31 August 2018

सिर कटने के बाद भी दुष्टों को धूल चटाने वाले धर्मयौद्धा

सिर कटे पर झुके नहीं धड़ लड़ी पर रुके नहीं

मुस्लिमो के हिंन्दुओ पर अत्याचार, मुगलों की सजाएं
शीश कटने के बाद भी धड़ लड़ती रही

आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत की एक क्षत्रिय वीर जाट जाति के बारे में जो सिर कटने के बाद भी अपने सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये लड़ते रहे।
इन वीरो ने धर्म हेतु अनेकों शीश दान कर दिए थे। तो सुनिए अपने पूर्वजों की कुछ वीर गाथाएं

1.हिन्दू वीर बिग्गाजी जाखड़- बिग्गाजी महाराज सिर कटने के बाद भी गौरक्षा के लिए लड़ते रहे थे।और गउओ को सुरक्षित पहुंचाकर अपने प्राण त्यागे थे।इनके अनेकों मन्दिर है लोजदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।


2.हिन्दू वीर कुशाल सिंह दहिया- जब सिख गुरु तेग बहादुर सिंह का सिर कलम कर दिया गया था तब हिन्दू जाट वीर कुशाल सिंह दहिया और गुरु साहब की शक्ल मिलती थी इसलिए उन्होंने अपना सिर काटकर गुरु के सिर की जगह रख दिया था ताकि मुगलो को धोखा देकर गुरु के सिर को ले जाकर उनका अंतिम संस्कार कर सके।

फिर गुरु का सिर मुगलों के चंगुल से भाई जैता सिंह लेकर आये थे। हरियाणा के cm मनोहरलाल खट्टर जी ने इनकी प्रतिमा लगवाई है।

3.बाबा दीप सिंह- बाबा दीप सिंह सिख संधू गौत्री जाट थे।वे सिर धड़ से अलग होने पर भी लड़ते रहे थे।और आज उनके नाम पर गुरुद्वारा भी है। 


4.हिन्दू वीर तेजू सिंवर और 5. वीर रातू सिंवर- ये दोनों भाई अपनी बहन की रक्षा खातिर लंगड़खां व उसकी मुस्लिम सेना से अकेले लड़े थे सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे व मुल्लो को भगाकर ही अंतिम सांस ली। इन्हें भी सिंवर वंश के कुलदेव के रूप में पूजा जाता है।


6.हिन्दू वीर रघुराम पालियाल- गौरक्षा की खातिर अंतिम सांस तक सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे।120 मुल्लो को मार गिराया व गौमाता की रक्षा की। इनका भी इनकी स्थली कंटिया खींवसर में मन्दिर है।


7.हिन्दू वीर बख्ता बाबा- बख्ता बाबा सिर कटने के बाद भी गौरक्षा हेतु लड़े व बलिदान दिया। ये ढेरू गौत्री जाट थे।इनका मन्दिर है पूजा जाता है।


8.भाई तारु सिंह- जकारिया खान ने इन्हें इस्लाम अपनाने पर दबाव डाला।जब इन्होंने मना कर दिया तो जकरिया खान ने इनके केश समेत इनकी खोपड़ी उखड़वा दी थी।ये संधू गौत्री सिख जाट थे।


9.हिन्दू वीर गौकुला सिंह- औरँगेजेब के खिलाफ आवाज उठाने वाला पहले यौद्धा थे। इनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए लेकिन इन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा।


10.हिन्दू वीर कान्हा रावत- औरँगेजेब के अत्याचारो के खिलाफ लड़े। इन्हे जिंदा धरती में दफना दिया गया परन्तु अपना हिन्दू धर्म नहीं त्यागा।


11.हिन्दू वीर राजाराम सिंह- इन्होंने औरँगेजेब के खिलाफ लड़ाई लड़ी।अकबर की कब्र उखाड़कर उसकी अस्थियां जला दी थी।एक युद्ध धोखे से मारे गए। इनका सिर काटकर आगरा में टांग दिया गया था।ये सिनसिनवार गौत्री जाट थे।


12.हिन्दू वीर रामकी चाहर- ये राजाराम जी के साथ ही थे इनको बंदी बनाकर आगरा ले जाया गया अनेकों यातनाएं व सिर काटकर आगरा में टांग दिया गया।


13.हिन्दू वीर जोरावर सिंह- औरँगेजेब के खिलाफ लड़े। इनके शरीर के छोटे छोटे टुकड़े करके कुत्ते के सामने फेंक दिया गया था।ये सिनसिनवार गौत्री जाट थे।


14.हिन्दू वीर उदय सिंघा- ये वीर गौकुला के साथ ही थे। इनके शरीर के भी औरँगेजेब ने टुकड़े टुकड़े करवा दिए थे इस्लाम न स्वीकारने पर।


15.हिन्दू वीर सायरजी महाराज- गौरक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।नैन गौत्री जाट थे।इनके मन्दिर हैं व लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।


इसीलिए ही तो कहा जाता है कि जाट मरा तब जानिए जब तेहरवीं होज्या।सके अलावा भी हमारे इत्तिहास में अनेकों किस्से मिल जाएंगे। शर्म आनी चाहिए उन लोगो को जो हमेशा नकारात्मक चीजे फैलाकर इस देशभक्त व धर्मभक्त कौम को बदनाम करते हैं। उन्हें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि जब रक्त पिपासु इस्लामी तलवारे हिंदुस्तान की तरफ बढ़ी तो इन्होंने अपनी छाती लड़ाकर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी।
और सभी हिन्दू भाइयों से प्रार्थना है कि वामपंथियो के लिखे इत्तिहास को पढ़कर आपस मे न लड़ें हमारे पूर्वज वीर थे वीर जो सिर कटवा लेते थे लेकिन झुकाते नहीं थे।जो अकेली धड़ से लड़ते रहते थे लेकिन रुकते नहीं थे।

हर हर महादेव।
जय सूरजमल जय भवानी।

Thursday, 9 August 2018

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का राजतिलक व प्रतिशोध की प्रतिज्ञा और तैयारी

जाट क्षत्रिय महाराजा
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास के समय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह फरूखनगर में थे। उनको अगले दिन इसका समाचार मिला तो वे क्रोधित व व्याकुल हो उठे। उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला उठने लगी।
उधर भरतपुर में उत्तराधिकार के लिए लड़ाई शुरू हो गयी व षड्यन्त्र रचे जाने लगे। यह पता चलते ही जवाहर सिंह ने सभी को फटकारा व घोषणा कि के जवाहर सिंह, महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या का बदला लेगा।प्रजा व राज्य के सम्मान के लिए वह ये कार्य करेगा और इसका कुछ समाधान होने के बाद ही उत्तराधिकार की बात होगी। उत्तराधिकार और राज पाट के लिए लड़ते हुए शर्म आनी चाहिए। यह सुनकर सबको अपनी गलती का अहसास हुआ व विरोधी अपनी चौकड़ी भूल गए।

उसके बाद महाराज जवाहर सिंह डीग पहुंचे और पिताजी की शोक सभा के पश्चात सबका समर्थन इकट्ठा किया अपने पिता की शोक सभा के बाद उन्होंने प्रतिशोध की बात दोहराई व अपनी रणनीति बताई।जनता ने भी उन्हें खुला समर्थन दिया।उन्होंने गोवर्धन में महाराज की छतरी बनवाई। जिसके पश्चात 30 दिसम्बर 1763 को कुलपुरोहित घमंडीराम व राजगुरु महंत रामकिशन ने ऊनका राज तिलक किया।

आस पास के पड़ोसी व अन्य शक्तिशाली हिन्दू राज्यो को पत्र लिखे व दूत भेजे के अब दिल्ली को आजाद कराना है।

उन्होंने सीखो मराठो को पत्र लिखे और कहा कि वे उन्हें कीमत देने को तैयार है और इस धर्म कार्य मे उनका सहयोग करें।
पेशवा को अपने मित्र से पत्र लिखवाया कि हम आपके हितेषी और आज की स्तिथि में जवाहर आपका सब हिन्दुओ में एकमात्र व सबसे बड़ा हितैषी है।

उन्होंने अपने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से रुहेले व अन्य मुस्लिमो को खदेड़ दिया।जब कुछ मुस्लिम नवाबो ने जटवाड़े की ओर कदम बढ़ाए तो सिख सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दूसरी तरफ आक्रमण कर दिया जिस कारण उन नवाबों को अपनी राजधानी बचाने के लिए वापिस आना पड़ा।

इससे महाराज जवाहर सिंह को समय मिल गया व उन्होंने दरबार के अपने विरोधियों को अपने पाले में कर लिया। इस काम मे महारानी किशोरी देवी,रानी हंसिया व महंत रामकिशन ने उनकी बहुत मदद की।उनकी माताओं ने उनकी आर्थिक सहायता की।

उन्होंने एक श्री हनुमान गोल सेना का भी निर्माण किया। और सेना की संख्या बढ़ाई।

यह सब देखकर दिल्ली का बादशाह नजीबुद्दौला डर गया क्योंकि जवाहर सिंह की तैयारी अकेले प्रतिशोध की ही नहीं दिल्ली के विनाश व धर्म की लड़ाई बनती जा रही ह जिस्के कारण उन्हें खुला समर्थन मिल रहा है।

उसने जवाहर सिंह को पत्र लिखा व क्षमा मांगी और खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश की। मित्रता का हाथ बढ़ाया और शांति के लिए भीख मांगी। उसने कहा कि वह पराक्रमी महाराजा सूरजमल के बेटे से युद्ध नहीं करना चाहता।इसमें बहुत नुकसान होगा मैं बर्बाद हो जाऊंगा तो क्या आपके पिता वापिस आ जाएंगे।इसमें बलूची डाकुओं की गलती है उन्होंने महाराज के साथ धोखा किया है।

नजीब ने अन्य मर्राठा व जयपुर आदि हिन्दू राजाओ को  भी जवाहर सिंह को समझाकर रोकने के लिए पत्र लिखा।

लेकिन सब व्यर्थ गया।अब जवाहर सिंह ने लगभग 90 हजार से 1 लाख की हिन्दू सेना तैयार कर ली थी।

 दिल्ली में युद्ध लड़ने की बजाय खुद को बचाने की तैयारियां हो रही थी। उन्होंने फाटक बंद कर लिए व बादशाह ने खुद को सुरक्षित करने पर ज्यादा जोर दिया।

इस युद्ध को दूसरे पानीपत के युद्ध के रूप में जाना जाता है।क्योंकि मराठा व अब्दाली के पानीपत संग्राम के बाद यह दूसरा मौका था कि एक बड़ी संख्या में व पूर्ण तैयारी के साथ हिन्दू सेना संस्क्रति व देश की रक्षा के लिए मुस्लिम सत्ता से भिड़ने जा रही थी। इस युद्ध का अब मुख्य मकसद दिल्ली से मुगल सत्ता का विनाश बन गया था।

बन्द करलयो फाटक भाई,जवाहर आवेगा,
गुस्से में है लाल सूरज का,मुगला री दिल्ली न तोड़ेगा।
कट्ठे होके छुप जाओ सारे,एक एक न कसूता फोड़ेगा।।

दिल्ली विजय अभियान-महाराजा जवाहर सिंह(1764)

जाट महाराजा
Maharaja Jawahar Singh

महाराजा जवाहर सिंह ने एक विशाल समाहरोह करके जनता को एकत्रित किया व ओजस्वी भाषण दिया कि हमें महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या व पानीपत के हर संहार का मुगलो से प्रतिशोध लेना है।और दिल्ली को आजाद करवाकर अपने धर्म व संस्कृति को आजाद करवाना है। भले ही इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े।

यह सुनकर नागरिकों में हौसला आ गया।युवक सेना में भर्ती होने लगे।उन्होंने सिखों मराठों गोहद जयपुर आदि अनेकों हिन्दू शासकों को पत्र लिखकर सहायता मांगी व कीमत देने का भी प्रलोभन दिया।गोहद, मराठो व सीखो ने सहायता देने का वादा किया।

इस तरह महाराज ने 20,000 मल्हारराव होल्कर व 15,000 सिख जाटो और गोहद की 5,000 सेना समेत लगभग 1 लाख सैनिको के विशाल दल के साथ दिल्ली पर फिर से हिन्दू संस्कृति को मजबूत करने का इरादा किया।

उन्होंने भरतपुर दुर्ग के महलों के सामने हनुमान जी की प्रतिमा लगवाई और पण्डित रूपराम कटारा को काफी आभूषण व धन दान दिया।फिर उन्होंने अपने कुलदेव भगवान लक्ष्मण व कुलदेवी माता राजश्रीदेवी की पूजा की। और गोवर्धन की तरफ से दिल्ली दरवाजे से गिरिराज महाराज का नारा लगाते हुए दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।गोवर्धन में उन्होंने अपने पूर्वज श्री कृष्ण  भगवान की पूजा की व महाराजा सूरजमल की समाधि से आशीर्वाद लिया।और फिर बल्लभगढ में जाकर अपना डेरा डाला। उधर दिल्ली के मुगल बादशाह की घिग्गी बंधी हुई थी।वह बार बार पत्र लिखकर जवाहर सिंह को युद्ध न करने के लिए गिड़गिड़ा रहा था।
मल्हारराव भी अपने 20,000 सैनिको के साथ आकर मिल गए।

बल्लभगढ में 4 अक्टूबर 1764 को दशहरे के दिन उन्होंने पूजा की व दान दक्षिण करके दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने नजीब की सेना के छक्के छुड़ा दिए।मुगल सैनिको की देह को जटवाड़ी तलवारों ने चिर दिया और दिल्ली में दाखिल हो गए। उन्होंने नजीब को खुले में आकर लड़ने को कहा ताकि दिल्ली की जनता को परेशानी न हो।परन्तु कायर नजीब नहीं निकला।

फिर सिख जाट सरदार बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह व चस्सा सिंह भी अपने 12 से 15000 सैनिको के साथ पहुंच गए। उन्हे प्रतिदिन 15,000 रुपये देने का वादा किया गया था।मल्हाराव होल्कर को भी बड़ी कीमत पर लाया गया था।

फिर महाराजा जवाहर सिंह ने पुराने किले पर आक्रमण किया व बड़ी चरुराई से  मुगलों को साफ कर दिया।
मल्हारराव इस युद्ध में दिलचस्पी नहीं दीखा रहे थे।महाराः जवाहर सिंह को तभी उन पर संदेह हो गया था लेकिन उस समय वे कर भी क्या सकते थे।मल्हारराव उन पर नजीब से बातचीत का दबाव बना रहे थे व अन्य सेनापतियों को भी गुमराह कर रहे थे।

महाराज जवाहर सिंह ने वहां लगे अष्टधातु के किवाड़ उतार लिए जो 462 साल पहले अलाउद्दीन खिलजी चितौड़ से जितकर लाया था।इस तरह उन्होंने हिन्दुओ के इस कलंक को भी धो दिया।इस युद्ध में वीर यौद्धा पाखरिया(पुष्कर सिंह) शहीद हो गए।

दिल्ली में चारो तरफ गोलाबारी चल रही थी।उमेदगिरी गोसाई बल्लभगढ के तेवतिया राजा, और होडल के बलराम सिंह नाहरवार आदि अनेकों वीर मुगलो के रक्त से धरती लाल करते जा रहे थे।

सारी दिल्ली में मुगलो में हाहाकार मची हुई थी। मुगलों के महलों में जटवाड़ी सेना ने भूसा भरवा दिया था।
दिल्ली की बहुत सी महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा हो चुका था। लेकिन मल्हारराव नजीब से पहले से ही मिलजे हुआ था। उन्होंने सेनापतियों का मनोबल तोड़ना शुरू कर दिया।
उधर से अहमदशाह दुर्रानी अपने मजहब का राज खत्म होता देखकर नजीब की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ा और हिंदुस्तान की ओर बढ़ने लगा। जिस कारण सारा माहौल ही बदल गया। सिख सरदारों ने उससे अपने किलो की सुरक्षा का हवाला देकर पंजाब की ओर पलायन कर दिया। मल्हारराव नजीब की ओर थे ही और उसकी बात का खुला समर्थन कर दिया व सन्धि के लिए कहने लगे। इस तरह हिन्दुओ की आपसी फूट के कारण जीती हुई स्तिथि में भी सब कुछ कमजोर पड़ गया।

अब भी जवाहर सिंह नजीब को बर्बाद करने लायक थे लेकिन इसमें वे भी बर्बाद हो जाते व दिल्ली पर कट्टर इस्लामिक जिहादी दुर्रानी का राज आ जाता।

इसलिए उन्होंने नजीब की सन्धि को स्वीकारने व दुर्रानी से मुकाबला करने के लिए भरतपुर दुर्ग को मजबूत करने  में ही भलाई समझी।नजीब की सांस में सांस आ गयी। उसने मल्हारराव को काफी खिललते व उपहार प्रदान किये।

अगर आपसी फूट न होती तो एक तो हिंदुस्तान मुगलों से आजाद हो जाता और न ही अंग्रेजो का शासन देश पर आता।

एक तो दुर्रानी था जो विदेश से अपने मजहब की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़ा दूसरी तरफ हिन्दू थे जो लालच व जलन के कारण एक न हो पाए। यही हमारे देश की 1000 साल की गुलामी का असली कारण रहा है।और आज भी हम सिख नहीं ले रहे।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय शिवाजी।

Wednesday, 27 June 2018

शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का संक्षिप्त जीवन परिचय

महाराजा रणजीत सिंह

Jat warrior
शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह

रणजीत सिंह का उपनाम शेर-ए- पंजाब था महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर, 1780 गुंजारवाला ( पश्चिम पंजाब – वर्तमान समय में पाकिस्तान का हिस्सा) एक जाट परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम महा सिंह सन्धावालिया और माता का नाम राज कौर
था महाराजा रणजीत का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उन्होंने कई शादियाँ की, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी 20 शादियाँ हुई थीं।उनकी मृत्यु सन 1839 हुई थी वो वर्तमान भारत पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक जाट साम्राज्य के संस्थापक थे

ऊँका लक्ष्य पूरे हिंदुस्तान को एक ध्वज के नीचे लाना था।

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी।
महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे। अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।

वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।

काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था। उन्होंने कई मन्दिर व गुरुद्वारे स्थापित किये।

वो भारत के अंतिम राजा थे जिनके पास कोहिनूर हीरा था

पंजाब के भिन्न-भिन्न मिसलों पर जीत हासिल की
ई॰ 1803 में अकालगढ़ पर विजय।
ई॰ 1804 में डांग तथा कसूर पर विजय।
ई॰ 1805 में अमृतसर पर विजय।
ई॰ 1809 में गुजरात पर विजय।
महाराजा रणजीत सिंह नें किया सतलज पार के प्रदेशो को अपने आधीन
ई 1806 में दोलाधी गाँव पर किया कब्जा।
ई॰ 1806 में ही लुधियाना पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में जीरा बदनी और नारायणगढ़ पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में ही फिरोज़पुर पर विजय प्राप्त की।

कांगड़ा पर विजय (ई॰ 1809)
अमरसिंह थापा नें ई॰ 1809 में कांगड़ा पर आक्रमण कर दिया था। उस समय वहाँ संसारचंद्र राजगद्दी पर थे। मुसीबत के समय उस वक्त संसारचंद्र नें रणजीतसिंह से मदद मांगी, तब उन्होने फौरन उनकी मदद के लिए एक विशाल सेना की रवाना कर दी, सिख सेना को सामने आता देख कर ही अमरसिंह थापा की हिम्मत जवाब दे गयी और वह सेना सहित उल्टे पाँव वहाँ से भाग निकले। इस प्रकार कांगड़ा राज्य पर भी रणजीत सिंह का आधिपत्य हो गया।
मुल्तान पर विजय (ई॰ 1818)
उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर लिया।
कटक राज्य पर विजय (ई॰ 1813)
वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था|
कश्मीर पर विजय (ई॰ 1819)
महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का पूर्ण अधिकार हो गया था।
डेराजात की विजय (ई॰ 1820-21)
आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था।
पेशावर की विजय (ई॰ 1823-24)
पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।
लद्दाख की विजय (ई॰ 1836)
ई॰ 1836 में महाराजा रणजीत सिंह के सिक्ख सेनापति जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और लद्दाखी सेना को हरा कर के लद्दाख पर आधिपत्य हासिल कर लिया|
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु
भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली।

ऐसे महान यौद्धा को कोटि कोटि नमन

Wednesday, 20 June 2018

1857 के सिरमौर दो वीर जाट क्षत्रिय राजा

1857 के हीरो- शहीद राजा नाहर सिंह- शहीद राजा अमानी सिंह-


जाट राजा
1857 की क्रांति

राजा नाहर सिंह- बल्लभगढ(हरियाणा) के राजा।
-ये एकमात्र ऐसे राजा थे जो 1857 कि क्रांति में अपनी रियासत सुरक्षित होते हुए भी अंग्रेजो से लड़े।
इन्होंने दिल्ली को लगभग 132 दिनों तक आजाद रखा,क्रांतिकारियों की मदद की, अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व उन्हें काटा।अंत मे धोखे से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 9 जनवरी 1858 को इन्हें दिल्ली के चांदनी चौक पर फांसी हुई।

राजा अमानी सिंह- इग्लास_अलीगढ़(उत्तर प्रदेश) के राजा।
- ये दोनों हाथों से तलवार चलाना जानते थे।
इन्होंने अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व अपनी मातृभूमि की रक्षा की, इनकी घोड़ी भी देशभक्त थी और घोड़ी ने भी अंग्रेजो को टापों से कुचला जिसके कारण  कहावत प्रचलित हुई के अमानी तो अमानी पर घोड़ी ने भी हूँ न मानी।दूसरे युद्ध मे बारिश के कारण बंदूकें काम नहीं कर पाई जिसके कारण सैंकड़ो जाट वीर लड़ते हुए शहीद हुए और धोखे से गिरफ्तार कर लिए गए व इन्हें फांसी दी गयी।

दोनों वीरों को कोटि कोटि नमन।

Tuesday, 17 April 2018

इस्लामिक आतंकी तैमूर vs हिन्दू वीर राजा देवपाल राणा की सेना(भाग-1)

इस्लामिक आतंकी तैमूर vs राजा देवपाल राणा की सेना- (भाग-1)
Hindu veer Raja Devpal Rana
Raja Devpal Rana

तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों समेत ढाई लाख की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर

संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को
राजा देवपाल राणा (जिनका जन्म निरपुड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये -

(1) सब गांवों को खाली कर दो।
(2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो।
(3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये।
(4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें।
(5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो।
(6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।
पंचायती सेना - पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये।

इस सेना को एकत्र करने में चौधरी धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उन्होंने तथा उनके भाई दानवीर चौधरी करणपाल सिंह ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह  योद्धा जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। जोगराजसिंह विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) वीरांगना हरदेई जाट युवति (2) रामप्यारी गुर्जर युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति - (1)महावीर हरवीर सिंह गुलिया जाट (2) धुला भंगी (बाल्मीकि) चुने गये।

उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह न

धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था।

उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि - “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर राजा देवपाल राणा व प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से

पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से हर हर महादेव और मातृभूमि के नारे लगाये।

सेनापतियों का निर्वाचन - उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) #गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये - (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति - भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि - प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

इसके बाद राजा देवपाल राणा, चौधरी धर्मपाल देव जाट व जोगराज सिंह गुर्जर ने ओजस्वी भाषणों से वीरों में जोश भरा।
प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश -

“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”
इन भाषणों को सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर राजा साहब और सेनापति का आह्वाहन कड़ते हुए प्रण किया कि हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।

आगे के भाग में पढ़िए की किस्य प्रकार राजा देवपाल राणा की इस पंचायती सेना ने इस्लामिक आतंकी तैमूर के छक्के छुड़ा दिए।
कैसे उप सेनापति महावीर हरवीर गुलिया ने तैमूर की छाती में भाला मारा व बलिदान दिया।
कैसे प्रधान जोगराज गुर्जर ने व अन्य सेनापतियों तथा वीरांगना हरदेई जाट व अन्य वीरांगनाओं ने तैमूर की सेना  की कमर तोड़ी।

हिन्दू वीर जाट राजा देवपाल राणा व सर्वखाप पंचायत के झंडे तले सब जातियों के हिंदुओं ने इस्लामिक आतंकियों का सामना किया व अपने देश और धर्म की रक्षा की।

अभी जारी है.... भाग 2 के लिए क्लिक करें 👉http://jatwada.blogspot.in/2018/04/blog-post.html?m=1

Monday, 8 January 2018

1857 की क्रांति के सिरमौर राजा नाहर सिंह के शहीदी दिवस पर उनकी गौरवगाथा

शहीद राजा नाहर सिंह की गौरवगाथा
राजा नाहर सिंह
राजा नाहर सिंह

जन्म व बचपन
राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अप्रैल 1821 को बल्लभगढ नरेश राजा रामसिंह के घर हुआ था।वे हिन्दू धर्म रक्षक महान यौद्धा राजा बलराम सिंह की सातवीं पीढ़ी में पैदा हुए थे।उनकी माता का नाम बसन्त कौर था जो कुचेसर हिन्दू जाट रियासत की राजकुमारी थी।उनके माता पिता बहुत ही धार्मिक थे।
उनके छोटे भाई का नाम रणजीत सिंह था।जो बाद में अपने नाना की उत्तर प्रदेश में साहनपुर की कुचेसर रियासत के राजा हुए।

बालक नाहर सिंह का जन्म गोगा जी की पूजा के बाद हुआ था इसलिए प्रजा उन्हें गोगा जी का अवतार मानती थी।

दस वर्ष की अवस्था तक राजा नाहर सिंह ने शास्त्रों का काफी अध्ययन कर लिया था।उन्हे रामायण के लक्ष्मण व महाभारत के अर्जुन बहुत प्रिय पात्र लगते थे।
नाहर सिंह को राज पाठशाला में पण्डित कुलकर्णी जी द्वारा शिक्षा दी गयी थी।
15 वर्ष की उम्र पूरी करते करते नाहर सिंह शस्त्र विद्या में निपुण हो गए थे।सेनापति जोधा सिंह ने उन्हें घुड़सवारी, तीरंदाजी, तैराकी, भाला, तलवार आदि की शिक्षा दी।
राजा नाहर सिंह सुंदर व फुर्तीला नौजवान था।उनकी बड़ी बड़ी आंखे व चौड़े कंधे थे।और वह पारंपरिक भारतीय पगड़ी पहनता था जिस पर हीरे जवाहरात भी जड़े रहते थे और शानदार मूंछे रखते थे।

कैसे_पड़ा_नाहर_सिंह_नाम

राजा साहब के बचपन का नाम नर सिंह था।

एक बार जब वे अपने अंगरक्षकों के साथ शिकार खेलने गये थे तो एक शेर ने उन पर हमला कर दिया था।वह आदमखोर शेर था जिसके कारण कई दुर्घटनाएं घट चुकी है।
काफी दाव पेंच खेलने के बाद युवराज ने शेर को मार गिराया।

लेकिन इस खतरनाक प्रयास में इनके एक अंगरक्षक वीर हरचंद सिंह गुर्जर शेर से लड़ते हुए अपनी जान गंवा बैठे।

तब उनकी माता बसन्त कौर ने उनका नाम नर सिंह से नाहर सिंह रख दिया।
इस समय राजा नाहर सिंह जी की आयु मात्र 15 से 16 वर्ष थी।

और उस स्थान पर वीर हरचंद के नाम पर गांव #हरचंदपुर बसा दिया जो आज भी बल्लभगढ से सोहना जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।

राज तिलक
नाहर सिंह जी की राह आसान नहीं रही जब वे 9 साल के थे तब ही 1829 में उनके पिता राजा रामसिंह की म्रत्यु हो गयी थी।
उसके बाद उनकी उम्र कम होने के कारण उनके मामा नवल किशोर जी ने संभाला।
1835 में 15 साल की उम्र में उनकी शादी कपूरथला राजघराने की राजकुमारी रघुबीर कौर से हुई थी।(कुछ जगह कंवल कौर भी लिखा मिला है इसमें थोड़ा रिसर्च की जरूरत है)

1836 में नवल किशोर ने उनकी अल्पायु का फायदा उठाकर उनकी मोहर के साथ मनमानी शुरू कर दी।मामा के कुप्रबन्धो से बहुत सा पैसा बर्बाद हो गया था। नाहर सिंह ने पैनी नजर रखनी शुरू कर दी वह बहुत सा काम खुद सम्भालना शुरू कर दिया।
20 जनवरी 1839 को बसन्त पंचमी के दिन 18 वओर्ष की आयु में उन्होंने खुद राज्य की बागडोर सम्भाल ली। पण्डित नारायण सिंह और गुरु पण्डित कुलकर्णी ने उनका विधिपूर्वक राज तिलक किया।

बहादुर_शाह_जफर_पर_राजा_नाहर_सिंह_का_गुस्सा-

उनके खजाने में उनके मुख्य अधिकारियों ने भरस्टाचार किया व 11 लाख 25 हजार का गबन कर दिया जिसमे से अकेले हकीम अब्दुल हक ने 10 लाख रुपये हड़प लिए थे।
जब नाहर सिंह को यह पता चला तो उससे पहले ही वे अधिकारी दिल्ली भाग गए थे।

राजा नाहर सिंह के खजाने में गड़बड़ करने वालो को मुगल शासक ने शरण दी। और बल्लभगढ दिल्ली के बीच के व्यापार मार्ग को बन्द करवा दिया।

 इससे नाहर सिंह बहुत गुस्सा हुए और उन्होंने गढ़ गंगा के मेले के दिन मुगल शासक के खिलाफ विद्रोह करने का निश्चय कर लिया था।
लेकिन उनके राज पुरोहित पण्डित नारायण सिंह व अन्य अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि खजाने में पैसा कम है ऊपर से अंग्रेज भी इसी ताक में है तो उन्हें संयम रखना चाहिए।
फिर उन्होंने अपने राज्य की प्रगति पर ध्यान दिया व उसे समृद्ध बनाया।

क्रांति_की_शुरुआत व जफर का साथ

1856 में देश मे विद्रोह के हालात बनने लगे और उन्होंने भी क्रांति करने का फैसला किया।
उधर अंग्रेजो के खतरे के कारण बहादुर शाह जफर की अखड़ भी ढीली पड़ गयी थी इसलिए उसे नाहर सिंह बहुत प्यारा लगने लगा था।

नाहर सिंह ने भी सोचा कि दो दुश्मन पालना ठीक नहीं होगा इसलिए उन्होंने बहादुरशाह जफर का बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया।
1857_की_क्रांति_को_जगाने_में_नाहर_सिंह_जी_का_योगदान-
नाहर सिंह ने बल्लभगढ के शिव मंदिर में कसम खाई थी कि वे अपनी अंतिम सांस तक अपने देश के दुश्मन अंग्रेजों से लड़ेंगे।नाहर सिंह ने अपनी रियासत के सभी लोगो मे क्रांति की भावना जगा दी।

उन्होंने अपने राज्य के अलीपुर गांव में पंचायत करके अंग्रेजो के बल्लभगढ में बिना इजाजत घुसने पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

जब 1857 में क्रांतिकारियों की बैठक हुई थी तो उसमे राजा नाहर सिंह वहां मौजूद थे।

उन्होंने आस पास के राजा व नवाबो को क्रांति से जोड़ा व उन्हें अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने के लिए उकसाया।

बहादुर शाह जफर ने उन्हें दिल्ली की सुरक्षा की जिम्मेदारी देकर क्रांति का सिरमौर बनाया था।

क्रांतिकारियों_की_मदद
उन्होंने अपने राज्य में ऐलान करवा दिया था कि कोई भी अंग्रेज विरोधी सेना या क्रांतिकारी आये तो उनसे किसी भी समान के पैसे न लिए जाए उसका खर्चा वह खुद दे देंगे।

उन्होंने हर तरह की क्रांति सेना को समर्थन व हथियार से सहायता की।व भोजन का प्रबंध कराया।
मंगल पांडे के गोली चलाने के बाद तिथि पूर्व ही क्रांति शुरू हो गयी नाहर सिंह का राज्य क्रांतिकारियों व अंग्रेजो से बचने के लिए शरण का गढ़ बन गया था।

नाहर_सिंह_की_बेटी_की_शादी
नाहर सिंह की बेटी की शादी फरीदकोट रियासत के राजकुमार विक्रम सिंह से 17 मई को फिक्स की गई थी।
लेकिन इस स्तिथि में या तो शादी हो सकती थी या क्रांति।

इसलिए उन्होंने ऐसे माहौल में इस प्रोग्राम को भव्य न बनाकर उन्होंने राजकुमार विक्रम सिंह की सोने की तलवार मंगवाकर उससे राजकुमारी की शादी की रस्म को पूरा कर दिया।
उनकी एक लड़की की शादी शेर ए पंजब महाराजा रणजीत सिंह के परिवार में क्रांतिकारी ठाकुर सिंह सन्धावालिया के साथ हुई थी।

मंगल_पांडे_की_बटालियन_के_सैनिको_को_शरण

मंगल पांडे की बटालियन में ज्यादातर ब्राह्मण थे व कुछ अन्य जातियों के भी थे। उन सबने मंगल पांडे के पकड़े जाने पर विद्रोह स्वरूप अंग्रेजी सेना छोड़ दी जिससे अंग्रेज उन्हें ढूंढ ढूंढ कर मारने लगे।

तो वे सब नाहर सिंह की शरण मे आ गए नाहर सिंह ने उन्हें अलग अलग गांवों में बसाया। हर गांव में 2-2, 4-4 परिवार बसाए ताकि अंग्रेजो का हमला हो तो भी सब एक साथ उनके हाथ न लगे।
उनमे से क्रान्तिमय युवकों ने नाहर सिंह की सेना जॉइन कर ली।

अंग्रेजों_से_युद्ध_व_दिल्ली_बल्लभगढ_की_सुरक्षा

फिर दिल्ली में क्रांतिकारियों का विद्रोह हुआ जिसम नाहर सिंह अपनी सेना समेत कूद पड़े व अंग्रेजो को काट फेंका।

इसके बाद उन्होंने पलवल व  फतेहपुर से भी अंग्रेजो को खदेड़कर वहां अपना अधिकार जमा लिया।
हिंडन के युद्ध मे भी नाहर सिंह ने अपनी सेना भेजी थी।

उन्होंने पलवल फतेहपुर पाली कस्बों में थाने खोल लिए व दिल्ली से मथुरा तक गस्त करने लगे।
इस समय नाहर सिंह ने अंग्रेजो तक आने वाले गोला बारूद व युद्ध साम्रग्री आदि का मटियामेट करते रहे।

फिर अंग्रेजो ने बल्लभगढ पर आक्रमण कर दिया बल्लभगढ के समीप ही इस युद्ध मे इतने अंग्रेज मारे गये थे कि वहां स्तिथ एक तालाब का रंग अंग्रेजो के खून से लाल हो गया था। और उसका नाम लाल तालाब पड़ गया था।

फिर दिल्ली में उनकी जेरूरत महसूस हुई जफर ने उन्हें प्रार्थना करके बुलाया।इस बीच बल्लभगढ में सैनिको की कमान सेनापति गुलाब सिंह सैनी के हाथ मे रही।उन्होंने भी बड़ी वीरता से बल्लभगढ की अंग्रेजो से रक्षा करी।

उधर राजा नाहर सिंह दिल्ली को सम्भाले गए थे।जो भी अंग्रेज दिल्ली की तरफ बढ़ा उसे नाहर सिंह व उनके सैनिको ने चिर दिया।दिल्ली पुलिस की कमान भी उनके हाथ मे ही थी।

अंग्रेज अधिकारी लॉरेंस ने खुद कहा कि जब तक नाहर सिंह के हाथों में कमान है दिल्ली पर विजय असम्भव है।
अंग्रेजो ने नाहर सिंह को दिल्ली से भटकाने के लिए बहुत चालाकियां खेली उन्होंने बल्लभगढ पर आक्रमण कर दिया लेकिन नाहर सिंह हटे नहीं।उनकी गैर मौजूदगी में भी बल्लभगढ के वीरो ने अंग्रेजो को खदेड़ कर भगा दिया।

दिल्ली 134 दिन तक आजाद रही वह नाहर सिंह के बल पर ही थी।

अंग्रेज अधिकारी ने पत्र लिखा कि बल्लभगढ का नरेश iron gate of delhi बना खड़ा है जब तक चीन से हमे हथियार न मिल जाये तब तक इस लोहे की दीवार को तोड़ना नामुमकिन है।
और यही हुआ अंग्रेजो के पास निये आधुनिक हथियार व भारी गोला बारूद पहुंचा।

बहादुर_शाह_जफर_की_गिरफ्तारी

हुआ भी यही 13 सितम्बर को उन्होंने दिली पर आक्रमण किया कश्मीरी गेट के पास जबरदस्त युद्ध चला लेकिन नहर सिंह ने उन्हें घुसने न दिया दूसरी और से भी अंग्रेजो ने आक्रमण किया तो कुछ अंग्रेज सैनिक दिल्ली में आ घुसे।
बहादुर शाह जफर को अपना किला छोड़कर हुमायूं के मकबरे में शरण लेनी पड़ी।
इन परिस्थितियों में नाहर सिंह ने उसे बल्लभगढ चलने को बोला लेकिन बहादुर शाह जफर ने अपने विश्वस्त इलाही बख्श की सलाह पर मना कर दिया।
गद्दार इलाहीबख्श नीचे नीचे अंग्रेजो से मिला हुआ था।
मौका देखकर अंग्रेज सेनापति हडसन ने चुपके से जफर को गिरफ्तार कर लिए।

लेकिन नाहर सिंह थोड़े समय बाद ही अपनी सेना के साथ वहां पहुंच लिया व हडसन को घेर लिया। हडसन ने खतरा भांपकर बहादुर शाह जफर को मारने की धमकी दी।

जिसके कारण नाहर सिंह को पीछे हटना पड़ा क्योंकि बूढा जफर क्रांति का मुख्य चेहरा बना हुआ था उसके मरते ही क्रांतिकारियों के हौसले पस्त हो जाता।

बल्लभगढ_में_फिर_से_अंग्रेजों_का_रक्त_संहार

वे वापिस बल्लभगढ चले गए।यहाँ आते ही उन्होंने यहां आस पास स्तिथ अंग्रेजी सेना पर आक्रमण कर दिया व खून की नालियां बहा दी व अपना किला सुरक्षित किया।

अंग्रेजो_की_धोखेबाजी

दिल्ली को मजबूत करने के बाद अंग्रेजो ने नाहर सिंह से बदला लेनी की सोची लेकिन उन्हें पता था कि नाहर सिंह को सीधी लड़ाई में जितना बहुत मुश्किल है इसलिए उन्होंने एक चाल चली।
बहादुरशाह जफर के विश्वस्त इलाही बख्श के साथ कुछ सैनिक भेज दिए व उन्हें संदेशा दिया कि अंग्रेज बहादुरशाह जफर से सन्धि करना चाहते हैं इसलिए जफर ने कहा है कि इस महत्वपूर्ण मौके पर आपकी जेरूरत है ।जफर का विश्वस्त आदमी साथ होने के कारण उन्हें शक नहीं हुआ।
और वे अपने सिर्फ 500 सैनिकों के साथ दिल्ली चल दिये।
जब वे बदरपुर से थोड़ा आगे बढ़े थे तो रास्ते मे झाड़ियों में छिपे अंग्रेज सैनिको ने पीछे से हमला कर दिया।
भयंकर युद्ध मे नाहर सिंह के सभी सैनिक शहीद हो गए।
सब वीरता से लडजे लेकिन पीछे से अच्चानक हमले के कारण वे तैयार न थे।
उनके साथ सिर्फ भूरा वाल्मीकि,गुलाब सिंह सैनी ही बचे थे।
जिन्हें अंग्रेजो ने धोखे से बंदी बना लिया।

नाहर_सिंह_पर_दबाव_और_लालच

इसके बाद उन्हें  मटियामहल रखा गया फिर मेटकाफ हॉउस ले जाया गया।
जब उन्हें मेटकाफ हॉउस में रखा गया था तब अंग्रेजो उन्हें अपनी तरफ मिलाने का प्रयास किया था।लेकिन स्वाभिमानी राजा ने साफ कहा था  "देश के शत्रुओं के आगे झुकना मैन सीखा नहीं।"
कुछ दिन बाद हडसन ने भी 36 वर्षीय राजा की लुभावनी छवि देखकर दयाभाव से कहा था कि नाहर सिंह जी मैं आपको फांसी से बचा सकता हूँ। थोडा से झुक जाओ।

लेकिन नाहर सिंह दोबारा भी तेजस्वी स्वर में क़हा कि गौरे मेरे देश के शत्रु हैं इसलिए मेरे नही शत्रु हैं।उनसे क्षमा कदापि नहीं मांग सकता।...लाख नाहर सिंह कल फिर पैदा होंगे।

अंग्रेजो ने महाराजा फरीदकोट जो नाहर सिंह के सम्बधी थे व अंग्रेजो की तरफ से उनसे भी दबाव बनवाया लेकिन लाख प्रयत्न के बाद भी नाहर टस से मस न हुआ।

फांसी

फिर उन पर मुकदमा चला व उन्हें 2 जनवरी 1858 को फांसी की सजा सुनाई गई।

उसके बाद 9 जनवरी को दिल्ली के चांदनी चौक पर उन्हें फांसी दी गयी थी। व अपने प्रिय राजा को सुनने के लिये जनता सामने खड़ी थी।
उस समय तक नाहर सिंह का कोई पुत्र नहीं था। उनकी पत्नी गर्भवती थी।जिसने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया था।

फांसी के समय लोग एक ही नारा लगा रहे थे-
"मथुरा से दिल्ली तक नाहर सारे तेरे लाल
चढजा फांसी पर सब भली करेंगे भगवान"

नाहर सिंह से गौरों ने  अंतिम इच्छा पूछी तो उन्होंने कहा कि मैं गौरों से कुछ मांगकर अपना स्वाभिमान नहीं गिराउंगा मैं तो बस जनता से कुछ कहना चाहता हूं फिर उन्होंने जनता को कुछ सन्देश देने को कहा। दुभाषिये के ट्रांसलेट करते ही गौरों ने असमर्थता जताई। तो नाहर सिंह ने खुद ही ऊँचे स्वर में कहा "कि मेरे देशवासियों जो लौ जलाई है उसे मत बुझने देना,लाख नाहर सिंह कल फिर पैदा हो जाएंगे"

इसके बाद हर तरफ से जय नाहर सिंह जय राजा नाहर सिंह की आवाज आने लगी।
फिर उन्होंने खुशी खुशी फांसी के फंदे को चूम लिया।

उनके साथ गुलाब सिंह सैनी भूरा वाल्मीकि व खुशाल सिंह को भी फांसी दी गयी।
इस तरह हंसते हंसते देश की खातिर एक राजा व उनके वीर सैनिको ने अपना राज प्राण सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

चौधरी जयदीप सिंह नैन