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Wednesday, 20 June 2018

अगर आप जाट हैं तो यह जरूर पढ़ें

जाट समाज के लिए एक जरूरी संदेश-

इसे पढ़ें और समझने की कोशिश करें-
महाक्षत्रिय
जाट क्षत्रिय स्वाभिमान

1.खुद को पहचानों- जाट का अर्थ होता है प्रधान, शीर्ष,राजा और राजा व राजाओ के अंश ही एकमात्र क्षत्रिय कहें गये है। और देव संहिता में तो जाटो को महाक्षत्रिय लिखा गया है जिसके श्लोक खाप इत्तिहास में अंकित है।
जाट वही प्राचीन सनातनी क्षत्रिय हैं जिनमें भगवान राम, पांडव-कौरव, भगवान श्री कृष्ण जैसे यौद्धा हुए हैं।
महाजट महादेव से लेकर महाराजा सूरजमल तक और आज तक भी हम कभी भी अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख नहीं हुए।आज हमें वही महाक्षत्रिय संस्कार बचाने की जरूरत है क्योंकि आधुनिकता व गंदी राजनीति की दौड़ में संस्कारों को बचाये रखना बहुत कठिन है।

2.वामपंथी व बेतुके इतिहासकारों से सावधान- अंग्रेजों मुगलों से हमारे जाट पूर्वजों ने खूब लोहा लिया था इसलिए कुछ नकली लोग व उनके समर्थक हमसे जलते थे और आज भी कुछ ऐसे ही लोग हैं और कुछ राजनेताओ के चमचे हमारी जाति में भी हैं उनसे सावधान रहें वे आपके महाक्षत्रिय जाट संस्कारों को मिटाने की कोशिश करेंगे। जो संस्कार हमें भगवान श्रीकृष्ण,वीर गौकुला,महाराजा सूरजमल,वीर हरफूल जैसे पूर्वजों से विरासत में मिले हैं उन पर ही भरोसा रखें किसी की बनावटी बातों पर नहीं।

3.सब से भाईचारा- हम हिन्दू हैं और हमारे पूर्वजों ने अपने सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के लिए बलिदान दिया है। इसलिए सभी हिन्दू जातियों से मिलकर रहना हमारा कर्तव्य है। शुरुआत में हम सब एक ही थे समयानुसार व कर्मानुसार वर्णों में बंटे फिर जातियों में सिख भी हमारा ही हिस्सा है।और एक क्षत्रिय होने के नाते किसान जवान देश धर्म गौ की रक्षा करना हमारा धर्म है।

4.अपने इत्तिहास को जानो- इत्तिहास हमारी पूंजी है और जो कौम इत्तिहास को भूल जाती है वह मिट जाती है। अगर वहम हो तो यूनान मिश्र को देख लो।
इसलिए अपना इत्तिहास जानो और सबको बताओ। और हर जाति के महापुरुषों का सम्मान करों। क्योंकि महापुरुष किसी भी जाति का हो उसने कभी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि सबके लिए संघर्ष किया था। और हमारे पूर्वजों ने भी सबका सम्मान करने की ही शिक्षा दी है।

5.आदर्श वीरो को बनाओ न कि राजनेताओ को- जैसे आदर्श होंगे वैसे ही उनको फॉलो करने वाले होंगे। इसलिए हमेशा से अपना अपनी कौम व अपने बच्चों का आदर्श सोच समझकर ही बनाना चाहिए। जिन लोगों ने स्वार्थ की जिंदगी जी हो या जिन्होंने राजनीति की हो उन्है कभी भी आप अपना आदर्श न बनाएं क्योंकि उन्होंने अपने स्वार्थ या राजनीति के लिए बहुत से गलत कदम भी समयानुसार उठाये होंगे जिस कारण कभी भी उनकी असली सोच हम नहीं जान पाते।आप एक अच्छे राजनेता का सम्मान कर सकते हैं पर उसे आदर्श नहीं बना सकते।
इसलिए अपना आदर्श राजा नाहर सिंह,महाराजा सुरजमल, वीर हरफूल, कान्हा रावत, भगत सिंह, वीर गौकुला,महाराजा रणजीत सिंह, बाबा दीप सिंह,वीर तेजाजी,वीर बिग्गाजी जैसे शेरों में से बनाएं।

6.नेताओं के चमचे न बनों- इन नेताओं के चमचे बनकर कभी भी जाति या धर्म को नुकसान न पहुंचाए। न ही इनके लिए किसी से लड़ें। एक राजनेता कभी भी किसी जाति का न हो सकता।आप खुद सोचिए अगर चौटाला हुड्डा जाती की सोचते तो क्या खाजकुमार की इतनी हिम्मत थी के वो कुछ बोल सके और पूरे हरियाणा में हरफूल,राजा नाहर सिंह,महाराजा सूरजमल की मूर्ति होती,अगर अजित सिंह जाती की सोचता तो मुजफरनगर से न भागता, अगर हनुमान बेनीवाल सोचता तो गोगामेड़ी की इतनी हिम्मत न होती।
आप इन्हें वोट दो या ओर को मगर इन्हें जाती से न जोड़ो।क्योंकि अगर ऐसा करोगे तो इनके गलत काम का फल भी हमारी जाती पर ही जायेगा।

7.आपस मे लड़ाने वालों से सावधान- कुछ राजनैतिक,देशद्रोही व अन्य हमें बदनाम करके अन्य जातियों से लड़ाना चाहते हैं अपनी जाति व दूसरों सबमें ऐसे लोग हैं। ये एक दूसरे को गाली देते हैं फिर उसी के स्क्रीनशॉट,वीडियो फैलाकर लोगो को भड़काते हैं।

8.आरक्षण- यह हमारे देश को खा रहा है हर जाट इसके खिलाफ है लेकिन अभी हमारे समाज के कुछ राजनैतिक लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं।हालांकि यह भी गलत नहीं लेकिन वे लोग सिर्फ इस पर राजनीति कर रहे हैं हम सब इस बात को जान चुके हैं पिछली बार भी इन तथाकथित जाट नेताओं ने व सरकार के कुछ लोगों ने आंदोलन को भड़का दिया इसमें दोनो तरफ की भूमिका थी।आपको ठीक लगे तो आन्दोलनों में जाइये लेकिन जिन लोगो ने भड़काया वही नेतृत्व करें या राजनेताओ के चमचे नेतृत्व करें तो कभी भी ऊँका सहयोग न करें।वे हल नहीं चाहते बस अपनी राजनीति चाहते हैं।

9.समाज मे बहुत से नए हिन्दूवादी नेता, जाट नेता, इत्तिहास पर काम करने वाले युवक आदि निकल रहे हैं ऊँका सहयोग करें। किसी सन्गठन या किसी पार्टी से न तो हद से ज्यादा प्रेम करें न हु नफरत।हर जगह ऐसे लोग पहुंचाए जो भारत भर में हमारा नाम कर सकें।

अगर इन बातों को समाज समझ गया तो मेरे हिसाब से हम हर जगह आगे रहेंगे अपने पूर्वजों की तरह।
कोई गलती हो गयी हो तो अपना शुभचिंतक समझकर क्षमा करना।पोस्ट अछि लगे तो कॉपी पेस्ट शेयर करके आगे बढ़ाना।
जाट राजा
महाजट महादेव

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल
By-चौधरी जयदीप सिंह नैन

राजा दयाराम सिंह- जिसने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे

भारत माता के स्वाभिमानी लाल हाथरस नरेश राजा दयाराम सिंह ठेनुआ

Jat King
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम सिंह हाथरस(उत्तर प्रदेश) के राजा थे।इनके पूर्वजो ने हिन्दू धर्म रक्षा का अनोखा इत्तिहास रचा था।और इनके वंशज राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने आजाद हिंद फौज व सरकार का निर्माण किया था।

राजा दयाराम सिंह अपने पिता राजा भूरी सिंह की मृत्यु के बाद राजा बने। उन्होंने अपने राज्य को सुदृढ किया व हाथरस किले को मजबूत बनाया। प्रजा में रोजगार के साधन बढाने के लिए बाहर से कारीगर बुलाकर प्रशिक्षित किया व किसानों की भी बहुत सहायता की।
वे भगवान दाऊ जी(बलराम) के भक्त थे उनके दरबार में दाऊ जी की नित्य पूजा होती थी। उनके पिता द्वारा निर्मित किये गये दाऊ जी मन्दिर पर मेला लगता था।

उस समय देश पर अंग्रेजो का राज था अंग्रेज सभी देशी रियासतों को छल व बल से अपने अधीन करना चाहते थे। ऐसे समय में हाथरस व मुरसान रियासत स्वतंत्र थी।

इसलिए कई सालों से वे राजा दयाराम जी पर दबाव बनाए हुए थे कि वे अंग्रेजो की अधीनता स्वीकार करें। लेकिन राजा साहब स्वाभिमानी व देशभक्त थे उन्होंने झुकना स्वीकार न किया जिस कारण अंग्रेजों और राजा साहब में कई बार तनातनी हो चुकी थी।

सामरिक रूप से राजा साहब अंग्रेजो के मुकाबले बहुत कमजोर थे लेकिन फिर भी उनके स्वाभिमानी हौसले ने दम नहीं तोड़ा।

अंत मे एक दिन 4 क्रांतिकारी युवक दयाराम जी की शरण में आ पहुँचे और बोले कि राजा साहब हमें बचाइए अंग्रेज हमें झूठे हत्या के आरोप में फंसा रहे हैं।तब राजा साहब ने उन्हें निश्चिंत रहने को कहा व किले में ही अपने साथ ठहरने का प्रबंध कर दिया।

जब यह बात अंग्रेजो को पता चली तो उन्होंने राजा साहब को चारों तथाकथित आरोपियों को अंग्रेजो के हवाले करने के लिए कहा। राजा साहब ने साफ कहा कि वे निर्दोष है और मेरे देश के नागरिकों पर मैं अत्याचार नहीं होने दूँगा।

यह सुनकर अंग्रेज घबरा गए।उन्होंने देख लिया कि हाथरस आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन सकता है।
इसलिए 1817 में अंग्रेजों ने हाथरस व मुरसान पर आक्रमण कर दिया।(मुरसान पर उन्ही के परिवार का राज था।वहां के राजा उनके चचेरे भाई भगवंत सिंह थे) मुरसान को अंग्रेजों ने फतेह कर लिया।(मुरसान व उससे कुछ साल पहले के सासनी युद्ध के बारे में फिर कभी विस्तार से लिखेंगे)

जब अंग्रेज जनरल मार्शल के नेतृत्व में हाथरस की ओर बढ़े तो राजा साहब पूर्णतः तैयार हो गए। अंग्रेजों ने किले के चारों ओर घेरा डाल दिया। हाथरस का किला मजबूत था(जो उनके पूर्वज राजा भोज सिंह ने बनवाया था और बाद में राजा सारदल सिंह, पहुप सिंह और दयाराम ने भी इसे मजबूत किया)

मुरसान पर विजय प्राप्त करते ही अंग्रेजी सेना हाथरस पहुंची। इस बीच में हाथरस वाले संभल चुके थे। वैसे हाथरस का किला मुरसान के किले से अधिक मजबूत था। अलीगढ़ और मथुरा की ओर का हिस्सा तो और भी अधिक मजबूत था। हाथरस में रणचंडी का विकट तांडव हुआ। अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे हो गए।
यह युद्ध संवत 1874 विक्रम तदनुसार 1817 ई. में हुआ था। लड़ाई कई दिन तक होती रही। राजा दयाराम ने अपने वीर सैनिकों के साथ दांत पीस-पीस कर अंग्रेजों पर हमले किए। प्राणों की बाजी लगा दी।
यह देखकर अंग्रेजों ने राजा दयाराम से सन्धि की भी बात चलाई लेकिन राजा दयाराम व उनके पुत्र नेकराम सिंह ने विचार विमर्श करके मना कर दिया।

जब अंग्रेजों ने देखा अब सन्धि नहीं होगी तो पूर्ण बल के साथ हाथरस-दुर्ग के ऊपर हमला किया। जाट भी वन-केसरी की भांति छाती फुलाकर अड़ गये। श्री दयारामसिंहजी बड़ी संलग्नता से दुर्ग की देखभाल में व्यस्त थे। राजा से लेकर सैनिक तक सभी बड़े चाव से युद्ध कर रहे थे। वे आज अपना या शत्रु का फैसला कर लेना चाहते थे। वे थोड़े थे फिर भी बड़े उत्साह से लड़ रहे थे। किले पर से शत्रु के ऊपर वे अग्नि-वर्षा कर रहे थे। उन्हें पूरी आशा थी कि मैदान उनके हाथ रहेगा, किन्तु अचानक ही सब बदल गया। बारूद की मैगजीन में अकस्मात् आग लग गई। बड़े जोर का घमाका हुआ, उनके असंख्य सैनिक भस्म हो गए। अब क्या था, शत्रु को पता लगने की देर थी, और फिर हाथरस स्वयं विजित हो गया।
Hathras
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम ने अपने सैनिको के परिवार व खुद के परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल दिया व फिर वे वहां से निकल कर इधर उधर दूसरे राज्य में शरण लेने के लिए दौड़े। उनके पीछे अंग्रेज लगे हुए थे और वे अंग्रेजो के आगे आगे थे झुकने को तैयार न थे। वे भरतपुर पहुंचे लेकिन भरतपुर भी उस समय अंग्रेजों से युद्ध लड़कर कमजोर हो चुका था और वहां पर अंग्रेजी एजेंट भी कार्यरत थे। सुरक्षा की दृष्टि को देखते हुये वे जयपुर पहुंचे पर वहां भी अंग्रेजों के डर से उन्हें शरण न मिली कई दिनों तक वे इधर उधर भटकते रहे।
उनके परिवार को भी रोज रोज सताया जा रहा था।
यह देखकर उनके बेटे गोविंदसिंह ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली।
जिसके बाद राजासाहब वापिस हाथरस पहुंचे और उन्होंने अलीगढ़ में अपनी एक अलग छावनी बना ली।जहाँ वे क्रांतिकारी सैनिक तैयार कर रहे थे। वे फिर से मजबूत होकर अंग्रेजो से टक्कर लेने चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों ने उनके राज को कभी नहीं उभरने दिया व राजा दयाराम के नजदीकियों को अंग्रेजों ने तंग करके दूर कर दिया।
आज भी हाथरस के तथा आस-पास के लोग दयाराम का नाम बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ याद करते हैं। वे बड़े उदार और दानी राजा थे। अभी तक उनकी दान की हुई जमीन कितने ही मनुष्य वंश परम्परागत से भोग रहे

इस तरह वे अपने अधूरे सपने के साथ 1841 में स्वर्ग सिधार गये। बाद में उनके इस सपने को उनके प्रपोते राजा महेंद्र सिंह प्रताप ने पूरा किया व जीवनभर अंग्रेजो से लड़कर देश को आजाद करवाया।

वन्दे मातरम।देश पर मर मिटने वाले शहीदों को कोटि कोटि नमन।जय भारत माता।

1857 के सिरमौर दो वीर जाट क्षत्रिय राजा

1857 के हीरो- शहीद राजा नाहर सिंह- शहीद राजा अमानी सिंह-


जाट राजा
1857 की क्रांति

राजा नाहर सिंह- बल्लभगढ(हरियाणा) के राजा।
-ये एकमात्र ऐसे राजा थे जो 1857 कि क्रांति में अपनी रियासत सुरक्षित होते हुए भी अंग्रेजो से लड़े।
इन्होंने दिल्ली को लगभग 132 दिनों तक आजाद रखा,क्रांतिकारियों की मदद की, अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व उन्हें काटा।अंत मे धोखे से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 9 जनवरी 1858 को इन्हें दिल्ली के चांदनी चौक पर फांसी हुई।

राजा अमानी सिंह- इग्लास_अलीगढ़(उत्तर प्रदेश) के राजा।
- ये दोनों हाथों से तलवार चलाना जानते थे।
इन्होंने अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व अपनी मातृभूमि की रक्षा की, इनकी घोड़ी भी देशभक्त थी और घोड़ी ने भी अंग्रेजो को टापों से कुचला जिसके कारण  कहावत प्रचलित हुई के अमानी तो अमानी पर घोड़ी ने भी हूँ न मानी।दूसरे युद्ध मे बारिश के कारण बंदूकें काम नहीं कर पाई जिसके कारण सैंकड़ो जाट वीर लड़ते हुए शहीद हुए और धोखे से गिरफ्तार कर लिए गए व इन्हें फांसी दी गयी।

दोनों वीरों को कोटि कोटि नमन।

Sunday, 24 September 2017

वीरांगना राजकुमारी सोमादेवी और राजा मालदेव चाहर


वीरांगना, सोमादेवी, हिन्दू, राजा मालदेव चाहर, जाट
संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पटाने के लिए पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी।और बलबन पहले से ही जाटो पर खुश था क्योंकि जब देश पर क्रूर विदेशी मंगोलों ने आक्रमण किया था तो खाप सेना ने ही उसके साथ मिलकर मंगोलों को हराया था।

इसलिए बादशाह ने उनकी इच्छा अनुसार कांजण (बीकानेर के पास) और सिद्धमुख(चुरू) का राज्य दे दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवन ने राज्य किया।(1268 से 1416 तक यहां जाट क्षत्रियो का राज रहा।)

बात उस समय की है जब वहां 1416 में राजा मालदेव चाहर शक्तिशाली स्तिथि में राज कर रहे थे।और इन्होंने अपना राज्य भी विस्तार कर लिया था।

वहां के आस पास दिल्ली के मुस्लिम बादशाह टैक्स लेते थे।और अपने कुछ लम्बरदार बना रखे थे।
तो 7 जाट लम्बरदारो ने टैक्स देने से मना कर दिया।

उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शासक खिज्र खां का शासन था।उसने बाजखां पठान के नेतृत्व में एक सेना उन 7 लम्बरदारो को पकड़ने के लिए भेजी।जब बाजखां उन्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा था तो राजा मालदेव ने उसे रोका।और उसे उन लम्बरदारो को छोड़ने के लिए कहा परन्तु उसने मना कर दिया।

फिर वहां भीषण युद्ध हुआ।और उस युद्ध में मुस्लिम सेनापति की सेना मारी गई।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात गोत के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।और इन्होंने खिज्र खां को टैक्स के लिए मना करके वीरता का काम किया क्योंकि उस समय ऐसा करना मौत के मुह में हाथ डालने के समान था।क्योंकि दिल्ली पर क्रूर शासकों का कब्जा था।

गुस्से में लाल होकर स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या राजकुमारी सोमादेवी थी। 
उसी समय दो सांड आपस में लड़ने लगे तो कुछ मुस्लिम सैनिक डरकर भागने लगे।
तब राजकुमारी सोमादेवी ने आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर दिया था।ये देखकर बादशाह के एक खास सेनापति की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा।

 स्वाभिमानी मालदेव ये सुनते ही गुस्से में हो गया और कहा कि हम अपनी कन्या एक मुसलमान को नही दे सकते।
महाराजा मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। 

चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में घोड़े पर तलवार लेकर वीरता से लड़ी।सोमादेवी ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को काट दिया।

परन्तु इतनी विशाल सेना के आगे कब तक टिकते अंत में अपने धर्म पथ पर चलते हुए युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं लगभग सेना रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

चाहर जाट गोत्र(एक नजर)
ऋषि-भृगु
वंश-अग्नि
कुलदेव-भगवान सोमनाथ
कुलदेवी-ज्वालामुखी

जय जटवाडा जय हिन्दुत्व जय भारत।