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Thursday, 10 January 2019

धर्मपरिवर्तन करके मुस्लिम बने हुए हिंन्दुओ को वापिस हिन्दू बनाते थे चौधरी छोटूराम

चौधरी छोटूराम एवं शुद्धि आन्दोलन*

*#निर्वाण_दिवस 9 जनवरी पर विशेष:-*

दीनबंधु चौधरी छोटूराम जैसा किसान हितैषी आज तक नहीं हुआ। चौधरी साहब ने अपना जीवन किसानों के हित के लिए जिया। किसान चाहे किसी भी मजहब या जाति का रहा हो, उनके लिए वह अपना था। उन्होंने अपने प्रेरणास्रोत ऋषि दयानंद के वाक्य ‘किसान राजाओं का राजा होता है।’ को चरितार्थ कर के दिखाया व अंग्रेजो की गलत नीतियों के कारण खस्ताहाल हुए पंजाब के किसान को के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। चौधरी छोटूराम राजनीति में मजहब घुसाने के सख्त खिलाफ थे। वे राजनीति को आर्थिक आधार पर करने की वकालत करते थे। वे मजहब के आधार पर राजनीति करने वाले दलों के कट्टर विरोधी थे, जिस कारण कुछ सांप्रदायिक लोगों ने उन्हें धर्म विरोधी कहना शुरू कर दिया था ताकि कुछ धार्मिक सहानुभूति बटोर कर चौधरी साहब को राजनीति में हराया जा सके। पर जनता जानती थी कि चौधरी साहब सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के प्रबल शुभचिंतक हैं। अतः उनकी न चलने दी।

*#वैदिक सिद्धान्तों के अनुयायीः-*

    आज भी कुछ लोग इस बात पर यकीन रखते हैं कि छोटू राम जी धर्म आदि से दूर ही रहते थे, जबकि सत्य तो यह है कि वे केवल राजनीति में धर्म घुसाने के विरोधी थे। व्यक्तिगत जीवन में वे बड़े धार्मिक थे-आचरण में भी व संगठनात्मक रूप से भी। वैदिक सिद्धांतों में उनका पूरा विश्वास था। मांस-मदिरा, फिजूल-खर्च (सिनेमा-सांग आदि पर) व नशों के सख्त विरोद्दी थे। गौ दुग्ध को प्राथमिकता देते थे व यज्ञ आदि के भी समर्थक थे। आर्यसमाज के सिद्धांत, इकबाल का साहित्य व योगीराज श्रीकृष्ण की शिक्षाएं उनके लिए प्रेरणा स्रोत थे।क
        1 मार्च 1942 को रोहतक के जाट स्कूल में भाषण में उन्होंने स्वयं कहा था कि- ‘मैं अपने जीवन का एक रहस्य खोल दँू। जिस मार्ग पर चलना मैं अपना कर्तव्य कर्म मानता हूं, उस मार्ग का दृढ़ता पूर्वक अनुसरण करने में मुझे मुख्यतया उस दैवी विचार से शक्ति और प्रेरणा मिलती रही है जिसको यहाँ रोहतक से थोड़ी ही दूर कुरुक्षेत्र में 5000 साल पहले भगवान कृष्ण ने प्रकट किया था।’ख

*#शुद्धि_आंदोलन के प्रबल समर्थक:-*

  चौधरी छोटूराम ‘घर-वापसी’ के बहुत बड़े समर्थक थे। अपने मुखपत्र ‘जाट गजट’ अखबार में कई लेख इस मुद्दे पर लिखते रहते थे। मुसलमानों को पुनः वैदिक धर्म में लाते थे। जाट गजट 5 दिसंबर 1925 पेज नंबर 4 में चौधरी छोटूराम ने ‘एंब्रेस योर फाॅलन ब्रदर्स’ नाम से लेख लिखा था। जिसका अर्थ था भटके हुए भाइयों को वापिस राह पर लाना। इसमें हर जाति के धर्म परिवर्तित मुसलमान को पुनः सनातन वैदिक धर्मी बनाने के लिए कई जाट पंचायतों में रेजोल्यूशन पास करवाए। 12 नवंबर 1925 को पुष्कर की जाट महारैली में भरतपुर जाटनरेश विजेंद्र की अध्यक्षता में मुसलमानों की घर वापसी करवाने व उनको अपनाने का रिजोल्यूशन चौधरी छोटूराम ने पास करवाया जिसके बाद पूरे भारत में हर जाति के हिन्दू जो मुसलमान बन चुके थे उन्हें वापिस हिन्दू बनाने की आर्य समाजी मुहिम को फिर से बल मिला। चौधरी साहब से प्रेरित जाट महासभाओं ने भी शुद्धि आंदोलन तीव्र गति से चलाया। चौधरी साहब व कुछ अन्य आर्य लीडरों ने मिलकर एक शुद्धि कमेटी की भी स्थापना की, जिसके प्रधान चौधरी घासीराम आर्य बने वहीं ज्वाइंट सेक्रेट्री चौधरी छोटूराम बने।
जाट क्षत्रीय महासभाओं का उपयोग वे हर जाति के लोगो के लिए करते थे और अपने किसान हितेषी आंदोलनों व धर्म कार्यो में इनकी शक्ति का बहुत फायदा उठाते थे।

    इधर मुसलमानों ने भी तबलीग आंदोलन चलाया हुआ था, जिस पर छोटूराम के विचार थे कि हमें भी (वैदिक धर्मियों को) शुद्धि आंदोलन तेज रफ्तार से चलाना चाहिए ताकि इन तबलीग जैसे इस्लामिक मतान्तरण के खतरों से बचा जा सके। क्या कोई गैर धर्म-प्रेमी ऐसी बात कह सकता है?

*#दलितों की घर वापसीः-*

    सन 1932 में रोहतक के कुछ हिंदू दलित भाइयों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया। इस बात की सूचना लगते ही चौधरी छोटूराम आर्य लाहौर से रोहतक पहुंचे। उन दलितों की पुनः सनातन वैदिक धर्म में वापसी करवाई व दलितों को धर्म न छोड़ने के लिए प्रेरित किया। यह घर वापसी रोहतक रेलवे रोड़ के किसी मन्दिर में हुई थी। प्रसिद्ध इतिहासकार कैप्टन दलीपसिंह अहलावत उस शुद्धि कार्यक्रम में मौजूद थे। उन्होंने इसका पूरा ब्यौरा अपनी पुस्तक ‘जाट वीरों का इतिहास’ के दसवें अध्याय में पेज नंबर 929-30 पर दिया है। कौन है? जो इस सत्य को झुठला सके! कौन है, जो अब भी चैधरी छोटूराम आर्य के धर्म रक्षक होने पर विश्वास नहीं करेगा? ऐ मेरे भाइयो! कब तक सच को झुठलाओगे? सत्यमेव जयते।

*#धर्म_रक्षकः-*

    एक आर्यसमाजी ही अपने धर्म का कट्टर और गैर सांप्रदायिक रह सकता है। दयानन्द से लेकर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, चैधरी चरणसिंह आर्य, चौधरी छोटूराम आर्य इसके साक्षात् उदाहरण हैं। ये सभी महापुरुष हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक व अपने वैदिक धर्म के पक्के थे। पाकिस्तान बनने की संभावनाएँ पंजाब में फैलने से उनको पंजाब के हिंदुओं की चिंता होने लगी थी। चौधरी साहब कहते थे कि अगर पाकिस्तान किसी तरह बन भी गया तो पंजाब के मुस्लिम बहुल इलाकों के हिंदू सिखों को बचाने व हक दिलाने का कर्त्तव्य उनका है। एक बार अंबाला डिवीजन को मेरठ डिवीजन में मिलाने के प्रस्ताव का उन्होंने शक्ति से विरोध किया था, क्योंकि इससे अंबाला डिवीजन (हरियाणा) जो कि हिंदू बहुल है, पंजाब से अलग हो जाता व बाकी पंजाब फिर मुस्लिम राज जैसा रह जाता, जहाँ पर अल्पसंख्यक हिंदुओं की बुरी हालात होती।

*#हिंदुइज्मः-*

    हिंदू हित के लिए उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि In any matter related to Hinduism, if anyone will attempt to Devour the Hindus,  I would not allow him to do so before I was myself devoured first....

अर्थात् - हिंदुत्व से जुड़े किसी भी मुद्दे पर मुझे हिंदू धर्म की वफादारी के अलावा कुछ नहीं चाहिए। अगर कोई हिंदुत्व को खत्म करने की कोशिश करेगा तो मैं जब तक खुद नहीं मिट जाऊं तब तक हिंदुत्व खत्म नहीं होने दूंगा। भरी सभा में मुस्लिम लीडरों के बीच निडरतापूर्वक ऐसी बातें स्वामी स्वतंत्रतानंद जी का शिष्य ही कह सकता है। जब नेताजी सुभाष बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज आगे बढ़ रही थी, तब छोटूराम ने ही अपने गुरु स्वामी स्वतंत्रानंद जी व पण्डित जगदेव सिंह सिद्धांती आदि को हरियाणा में फौजियों को बगावत की तैयारी करने और बोस से मिल जाने के लिए भेजा था।

*#हरियाणवियों का बाबा दयानंदः-*

    सोनीपत में जमींदार लीग की बड़ी रैली चल रही थी। पंजाब के बड़े मुसलमान व सिख नेता वहाँ पधारे थे। एक सिख नेता ने अपने भाषण में किसानों की बात से हटकर हरियाणवियों को सिख बनने का न्योता दे डाला। जगदेव सिंह सिद्धांती व अन्य आर्य विद्वानों के कुछ कहने से पहले ही चौधरी छोटूराम आए व कहा कि किसान रैली में किसान हित की ही बात करो। रही गुरु की बात- तो हरियाणवियों का बाबा (गुरु) तो महृषि दयानंद सरस्वती ही है।आपको जो भी सन्त गुरु मानना है माने हम तो सनातनी ही रहेंगे।

*यह थी चौधरी छोटूराम की ऋषि-भक्ति।*

    मैंने चौधरी छोटूराम के धर्मपरायण होने की कुछ बातों का ही विवरण व तथ्य प्रस्तुत किए, ताकि आमजन को पता लगे कि चौधरी छोटूराम जी भी वैदिक धर्मी थे व अपने धर्म के शुभचिंतक थे। अपने को वे आर्यों का वंशज मानते थे। उम्मीद है कि आज का युवा वर्ग व नेतागण उनकी ही भाँति धर्म-रक्षक, गैर-सांप्रदायिक व किसान हितैषी बनने का प्रयास करेंगे।

संदर्भ:
(क) दीनबंधु का सफरनामा, लेखक: नारायण तेहलान पेज 185
(ख) दीनबंधु का सफरनामा पेज नंबर 178
(ग) देखें जाट गजट 30 नवंबर 1927
(घ) देखो जाट गजट 30 नवम्बर 1927
(ङ्)Sir Chhoturam : Life and times By Ch. Deepchand Verma पेज नंबर 145
(च) अतः वेदना: बिचारा कृषक अनुवादक व संपादक राजेंद्र जिज्ञासु, पेज नंबर 16 व चै0 छोटूराम ने ‘जाट गजट’ 28 अक्टूबर 1925 में भी एक लेख छापा था इसमें हरियाणवियों को सिखी की बजाय वैदिक धर्म में रहने को कहा गया था। काॅलेज की मैगजीन में सन 1901 में लिखा लेख।

साभार लेखक गुरप्रीत चहल जी॥

Thursday, 9 August 2018

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान-बलिदान गाथा

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान व बलिदान गाथा-1763

महाराजा सूरजमल
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की नजरों में दिल्ली सदा खटकती रहती थी।वे दिल्ली को मुगलों से मुक्त करवाकर गुलामी का कलंक धोने की इच्छा रखते थे। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1753 में भी दिल्ली पर आक्रमण किया था व ज्यादातर जीत ली थी। पर कुछ गद्दारों के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी थी।

बात 1763 की है दिल्ली के मुगल दरबार मे एक ब्राह्मण काम करता था।उसकी बेटी चन्दनकौर बहुत सुंदर व धर्म परायण थी। बादशाह ने एक दिन उसे देख लिया और उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की।लेकिन धर्मपरायण चन्दनकौर ने शादी से मना कर दिया तो बादशाह ने उसे जेल में डाल दिया।वहां एक मेहतरानी ने चन्दनकौर को सलाह दी के पूरे हिंदुस्तान में सिर्फ एक ही हिन्दू सम्राट है जो अबलाओं व धर्म की रक्षा करने के लिए दिल्ली से भी टक्कर ले सकता है।और वह है भरतपुर में बैठे जटवाड़े के शासक महाराजा सूरजमल।
किसी तरह से चन्दनकौर ने खत लिखकर अपनी माता के माध्यम से अपना दुःख महाराजा सूरजमल के दरबार तक पहुंचाया।
महाराजा सूरजमल ने जब खत पढ़ा और उसकी माता की व्यथा सुनी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।परन्तु दिल्ली से टक्कर लेने का मतलब था पूरे हिंदुस्तान से टक्कर लेना।हर मुसलिम से व हर सेक्युलर हिन्दू से टक्कर लेना।और इसके लिए सालो मेहनत की आवश्यकता होती है।परन्तु उन्होंने कुछ भी न सोचा और अपना  वीर सैनिक हरचंद गुर्जर को दिल्ली भेजा।

वहां जाकर हरचंद ने महाराजा सूरजमल का संदेश नजीब को सुनाया व चन्दनकौर को रिहा करने का आदेश सुनाया।मगर नजीब ने कुछ न सोचा उस मूर्ख ने हरचंद के साथ साथ महाराजा सूरजमल को भी अपमानित करने के लिए कहा कि जा उस सूरजमल को कह देना की अपनी जाटनी भी साथ ले आएगा।महारानी का अपमान सुनते ही वीर हरचंद ने अपनी तलवार निकाली और कहा कि नजीब अगर महाराज दिल्ली आए तो गिड़गिड़ायेगा तू हम अपनी माता व अपने राज्य का अपमान कभी नही सहेंगे।यह कहते हुए उसने नजीब पर हमला बोल दिया लेकिन पूरा दरबार ही नजीब का था।चारों तरफ से सैनिकों ने हमला कर दिया।जिसमें कई मुल्लो को मारकर हरचंद शहीद हो गया।

यह खबर महाराजा सूरजमल तक पहुंची तो वे आग बबूला हो उठे।और अपनी सेना को दिल्ली की ओर मुख करने का आदेश दिया।चूंकि महाराजा सूरजमल दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी पहले से ही कर रहे थे परंतु सही समय नहीं आया था।इस घटना के होने के कारण उन्होंने पहले ही आक्रमण करने की ठान ली।
तैयारियां पूरी नहीं थी उनके मंत्री रूपाराम कटारा ने उन्हें समझाया भी।मगर महाराजा ने कहा कि एक दुष्ट एक हिन्दू बेटी को कैद किये हुए है  और हम सबको ललकार रहा है।हमारे दूत भेजे हुए वीर सैनिक को भी उसने नहीं बख्शा।उनके मंत्री ने कुलपुरोहित से भी कहलवाया कि यह समय ग्रहदशा के अनुसार ठीक नहीं है।परन्तु महाराजा सूरजमल ने कहा कि वीर जब चले तभी समय है।विजय या वीरगति।

आखिरकार दिल्ली पर आक्रमण कर दिया गया।हिंडन नदी तक कब्जा करके उसे पार कर लिया गया।गाजियाबाद पर भी महाराजा सूरजमल की प्रतापी सेना ने कब्जा कर लिया।जोरदार तोड़फोड़ की।नजीब का कलेजा हिल गया।उसने तत्काल महाराजा सूरजमल को खत लिखा व उनकी शर्त स्वीकार कर ली और चन्दनकौर को सुरक्षित भेज दिया।और युद्ध विराम करने का आग्रह किया।लेकिन महाराजा सूरजमल को तो वीर हरचंद के बलिदान का भी प्रतिशोध लेना था।उन्होंने उत्तर दिया कि डर क्यों रहे हो नजीब बाहर निकलो मैं इतनी दूर आ गया तुम दो कदम नहीं आ सकते क्या?आजा दम है तो छूकर दिखा चरणों की धूल को ही।महान जाट क्षत्राणी महारानी किशोरी देवी भी मेरे साथ है।

फिर दोबारा से युद्ध शुरू हो गया जाट सेना ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए।नजीब के हालात पतले हो गए थे।ज्यादातर दिल्ली पर भगवा पभुत्व कायम हो गया था।

फिर एक दिन युद्ध चल रहा था तो दोपहर को ही महाराजा सूरजमल को महारानी की चिंता हुई।वे अकेले ही अचानक से उनसे मिलने के लिए शिविर में आ गए।उनको देखकर वे युद्ध देखने लगे गये। उनका पुत्र नाहर सिंह व सेनापति मंशाराम जाट वीरता से लड़ रहे थे।उनका ध्यान उसी तरफ था।तभी एक मुगलों के लुटेरे सरदार ने उन्हें निहत्थे खड़े देख लिए।महाराजा सूरजमल का ध्यान नहीं गया और वे नदी किनारे कुछ सैनिको के साथ टहलने लगे।और युद्ध क्षेत्र से थोड़े दूर निकल गए। झाड़ियों में छिपते छिपते मुगल सैनिक भी वहां आ गए। उन्होंने अचानक से हमला कर दिया।सब वीरता से लड़े थे।परन्तु पीछे से झाड़ियों में से दो तीन गोली मुगल सैनिक की उनके शरीर में लगी।इसके बाद मुगल सैनिकों ने उन पर तलवारों से प्रहार किया।महाराजा सूरजमल शहीद हो गए।पीठ पीछे वार करके धोखे से व युद्ध नियमो का उल्लंघन करके भी मुगल सैनिक डरे हुए थे व उन्हें विस्वास नहीं हो रहा था कि सूरजमल का मरना भी सम्भव है।महाराजा सूरजमल का कोई अंग उनके परिवार को नहीं मिला।सिर्फ एक दांत से ही समाधि बनाई गई थी।

जाट सेना अगले दिन तक अनुशासन में लड़ती रही क्योंकि उन तक एक दिन तक कोई खबर नहीं पहुंची थी।युद्ध अब भी पूर्ण रुप से हिन्दू वीरो के ही हक में था।लेकिन जैसे ही यह खबर उनके बेटे नाहर सिंह तक पहुंची तो वे दुखी हो गए व सेना को वापिस भरतपुर चलने का आदेश दिया और महाराजा सूरजमल की तलाश करने को कहा क्योंकि कई दिनों तक किसी को भी इस अनहोनी पर विस्वास नहीं हुआ था।इस तरह महाराजा सूरजमल अपने जीवन काल में युद्ध के मैदान में कभी भी पराजित नहीं हुए।

उस समय उनके वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह फरुखनगर में थे व नवविजित किलो की रक्षा कर रहे थे। जब यह खबर उन तक पहुंची तो वे प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठे।
आगे आपको बताया जाएगा कि उन्होंने क्या प्रतिज्ञा ली।व किस तरह एक बार फिर दिल्ली पर चढ़ाई की।

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

जय सूरजमल। जय भवानी।

462 साल बाद दिल्ली से यह हिन्दू राजा वापिस लाया चितौड़ के अष्टधातु किवाड़- खिलजी ले गया था चितौड़ से दिल्ली

महाराजा जवाहर सिंह दिल्ली से वापिस लाये चितौड़ के अष्टधातु दरवाजे-हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

जाट महाराजा
महाराजा जवाहर सिंह

बात उस समय की है जब अलाउद्दीन खिलजी ने माता पद्मावती के लिए चितौड़ पर आक्रमण किया।लेकिन वह माता पद्मिनी की परछाई को छू भी नहीं सका।तो वह गुस्से में चितौड़ दुर्ग के अष्टधातु किवाड़ लूटकर दिल्ली ले आया और यहां किले में लगा दिए। उसके बाद किसी भी अन्य शासक ने वे माता पद्मावती के सम्मान का प्रतीक किवाड़ वापिस लाने की हिम्मत न की।

फिर 462 साल बाद हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली से मुगल सत्ता उखाड़ने के लिए 1764 में आक्रमण किया।

उसके बाद महाराजा ने जब किले पर आक्रमण किया तो मुगलों ने किवाड़ बन्द कर दिए और अंदर से गोलाबारी करने लगे। केसरिया नाम के हाथी ने किवाड़ों पर 12 टक्कर मारी लेकिन दरवाजा नहीं टूट पाया क्योंकि हाथी का सिर लगने से उसमें चोट आ रही थी।सेना में निराशा छा गयी। हालात बदतर हो जा रहे थे।मुगलो की गोलाबारी के कारण सब ध्वस्त हो रहा था।

तब महाराजा की सेना में वीर सेनापति जाट पुष्कर सिंह(पाखरिया) सामने आए और उन्होंने कहा कि मुझे हाथी के सिर से बांध दीजिये और किवाड़ तोड़ दीजिये।
तो यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी। हिन्दू वीर पुष्कर से बंधे हाथी ने किवाड़ों पर टक्कर मारी। बार बार टक्कर मारी तो पुष्कर सिंह का शरीर चकनाचूर हो गया। मगर पुष्कर के प्राण निकल गए उन्होंने आह तक न करी।किवाड़ के कुंडें टूट गए व दरवाजा नीचे गिर गया।

फिर हिन्दू वीर जाट सेना ने किले में धुंआधार लड़ाई शुरू कर दी।कीले को कब्जे में ले लिया।

जब महाराजा को पता चला कि ये वे ही किवाड़ है जो खिलजी चितौड़ से लाया था। तो हिन्दुओ पर लगे इस कलंक को मिटाने का फैसला किया व किवाड़ हाथी पर लाद दिए गए। माता पद्मावती के सम्मान और वीर पुष्कर सिंह के बलिदान की ये निशानी आज भी भरतपुर के दुर्ग पर चढ़ी हुई है।

उसके बाद चितौड़ ने उन किवाड़ों को लेने की कोशिश की तो महाराजा ने उन्हें किवाड़ उपहारस्वरूप देने का फैसला कर लिया। परन्तु चितौड़ ने किवाड़ों की कीमत अदा करने को कहा तो महाराजा जवाहर सिंह ने कहा कि वे उपहार के रूप में दे सकते हैं इस तरह कीमत पर नहीं वे कोई व्यापारी नहीं है। तो चितौड़ ने कहा कि हम तो कीमत पर ही लेके जाएंगे।
इस पर महाराजा बिफर पड़े और बोले कि फिर आप उसी तरह ले जाइए जिस तरह मैं दिल्ली से लेकर आया।मतलब युद्ध करके जीत ले जाइए।

उसके बाद चितौड़ की तरफ से कोई जवाब नहीं आया और वे दरवाजे आज भी भरतपुर दुर्ग की शोभा बढ़ा रहे हैं।और माता पद्मावती,वीर पुष्कर सिंह के बलिदान व महाराजा जवाहर सिंह के शौर्य की गाथा को याद दिला रहे हैं।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

कहानी मुस्लिम विश्व सुंदरी गन्ना बेगम की जो जान लुटाती थी इस हिन्दू महाराजा पर

गन्ना बेगम की कहानी-हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह पर मरती थी गन्ना बेगम
Ganna Begum
गन्ना-जवाहर का प्रेम

ताजमहल को प्रेम की निशानी कहने वालों ये होता है प्रेम
गन्ना बेगम जो अली बेग कुली खान की बेटी थी।अली बेग ईरान के शाही वंश का था जो यहां अवध के नवाब के दरबार में रहता था।अगरा में गन्ना का परिवार रहता था।

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि गन्ना बेगम उस समय की विश्व सुंदरी थी।जब वह पान खाती थी तो उसके गले में पान की लालिमा साफ दिखाई पड़ती थी।बेगम के जन्म का नाम उसके रूप के अनुसार चांद बेगम था परंतु कोमल व सुंदर शरीर वाली बेगम गन्ने जैसी मीठी थी इसलिए वह गन्ना बेगम के नाम से मशहूर हुई। उस समय गन्ना के हुस्न पर दर्जनों राजा आह भरते थे।और उसे पाने के लिए हजारो प्रयास कर चुके थे।

एक बार गन्ना ने महाराजा जवाहर सिंह को देखा तो वह उनको पहली नजर में ही दिल दे बैठी।महाराज भी उस समय राजकुमारों में श्रेष्ठ थे और उनकी वीरता के किस्से भी गन्ना कई बार सुने थे।महाराज की भी जब नजर पड़ी तो वे भी गन्ना के हुस्न के मुरीद हो गए।

दोनो की नजरें मिली और बात आगे बढ़ती गयी। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।आखिर जिस गन्ना को लोग देखने से तरसते थे वह महाराज से प्रेम करती थी। तो गन्ना के आशिकों के दिल जलने लगे।

इसी बिच अवध के नवाब सिराउद्दौला ने गन्ना को देखा तो वह भी आशिक बन बैठा और एकतरफा प्रेम करने लगा। उसने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन गन्ना तो पहले ही जवाहर सिंह पर मर मिटी थी।परंतु नवाब व उसके पिता अली बेग खान को यह पसन्द न आया।उसके पिता उसकी शादी मुस्लिम से ही करना चाहते थे।तो धक्के से नवाब के साथ शादी तय कर दी गयी।

गन्ना ने जवाहर सिंह से मुलाकात की व सारी बात बताई।राजकुमार जवाहर सिंह अपने पिता महाराजा सूरजमल से इस मुद्दे पर बहुत खौफ खाते थे।मगर फिर भी जवाहर ने योजना बनाई के वो रास्ते मे गन्ना का अपहरण कर लेगा। जब गन्ना को अवध भेजा जा रहा था तो फरुखाबाद आगरा के बीच रास्ते मे ही जवाहर ने वहां हमला कर दिया। सब कुछ सही चल रहा था लेकिन ऐन मौके पर महाराजा सूरजमल पहुंच गए। उन्हें किसी ने खबर दी थी के युवक जवाहर सिंह किसी काफिले को लूटने के लिए निकला है। महाराज बड़ी तेजी से 2,000 की सेना लेकर आ धमके और जवाहर सिंह को खूब धमकाया कि राहगीरों को ऐसे लूटने वाले घटिया काम हमारे क्षत्रिय जाट कुल को शोभा नहीं देते। मगर बेचारे जवाहर सिंह कैसे कहें कि वे दौलत नहीं इश्क लूटने आये थे।वे चुप चाप निराशा में डूबे हुए घोड़े पर चढ़कर वापिस भरतपुर की ओर चल पड़े। गन्ना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

महाराज ने राहगीरों को सुरक्षा का इंतजाम किया और सकुशल अपने गंतव्य की ओर जाने का आदेश दिया।
गन्ना वहां पहुंची मगर उससे पहले ही नवाब का निकाह उम्दा बेगम से धक्के शाही से कर दिया जिसे अब्दाली अपनी बहन मानता था उसने नवाब को यह शर्त भी कही के वो दूसरा निकाह नहीं करेगा।इस तरह गन्ना यहां बच गयी।लेकिन नवाब ने उसे दासी बनाने की कोशिश की जो गन्ना ने स्वीकार नहीं की।

जब अब्दाली ने दिल्ली में लूट मचाई तब दिल्ली के नागरिकों को भरतपुर ने शरण दी थी।उन शरणार्थियों में ही उम्दा बेगम व गन्ना बेगम भी थी।यहां उनकी आपस में फिर मुलाकात हुई।गन्ना जवाहर सिंह को देखकर खिल उठी उसकी आँखों मे अश्रुधारा बह रही थी। दोनों ने फिर वही अपहरण की योजना बनाई पर इस बार भी पिता के सम्मान व लोकलाज के कारण जवाहर सिंह कामयाब न हो सके।और उन्होंने गन्ना को पाने का ख्वाब छिड़ दिया।

उसके बाद गन्ना एक दिन मौका अवध से भाग गई।महाराज जवाहर सिंह से फिर मिली परन्तु उस समय महाराज अपने पिता की मृत्यु के शोक में डूबे थे और दिल्ली से प्रतिशोध के लिए आक्रमण कर दिया था।तब महाराज ने गन्ना से असमर्थता जताई।गन्ना रूष्ट हो गयी और जवाहर सिंह से नाराज होकर ग्वालियर चली गयी।

वहां गन्ना सिख का भेष बनाकर रहने लगी।और गुनी सिंह नाम रख लिया।उसने महादजी सिंधिया के जासूस के रूप में काम किया। वह एक अच्छी यौद्धा भी थी उसने महादजी की एक दो युद्धों में महत्वपूर्ण सहायता भी की थी।वह एक अच्छी शायर भी थी।
एक दिन उसकी पोल खुल गयी।महादजी भी उनके हुस्न के मुरीद हो गए।परन्तु गन्ना सिर्फ जवाहर सिंह से प्रेम करती थी।इसलिए यहां भी बात न बन पाई। महादजी ने गन्ना की असली पहचान दुनिया के सामने नहीं खोली। और वह गुनी सिंह के रूप में ही काम करती रही।

एक दिन शिजाउदौला किसी मस्जिद में मीटिंग कर रहा था। तो जासूसी के लिए गन्ना वहां पहुंची परन्तु उसने उसे पहचान लिया और सैनिको को पकड़ने का आदेश दिया। गन्ना को पता था कि अब वह उसे पकड़ लेगा व अनेकों यातनाएं देगा। सलिये गन्ना ने अंगूठी में लगा हीरा चाट लिया और जवाहर सिंह के प्रेम में फनाह हो गयी।यह अंगूठी भी बताते हैं जवाहर सिंह की ही निशानी के तौर पर दी गयी थी।

महादजी ने भी अपना प्रेम निभाया और उसकी एक मजार बनवाई जो ग्वालियर से 35 km दूर नुराबाद में है।
उस पर उन्होंने गन्ना की मातृ भाषा फ़ारसी में "आह गम ए गन्ना" लिखवाया।
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराज जवाहर सिंह के प्रेम में गन्ना श्रीकृष्ण की भक्त बन गयी थी क्योंकि कृष्ण भगवान महाराज के पूर्वज थे। वह हिन्दू बनने को भी तैयार थी।

 परंतु जवाहर सिंह ने एक बेटे का फर्ज निभाया।जिस दौर में बेटा बाप को राज के लिए मार देता था उस दौर में उन्होंने पितृभक्ति दिखलाई।और वे अपने पिता की इतनी इज्जत करते थे कि उन्होंने कभी उनके सामने ये बात अपनी जुबान पर लाकर नहीं दिखलाई।महादजी ने भी अपने प्रेम का सम्मान किया व अपने राज्य में होते हुए भी गन्ना के साथ कोई धक्काशाही नहीं की। जबकि अवध के मुस्लिम नवाब ने उसे दासी की तरह रखने की कोशिश की।उसको यातनाएं भी दी। और उसके भय में उसे आत्म हत्या करनी पड़ी।उसके माता पिता ने भी उसे धक्के से दुराचारी लालची नवाब को एक तरिके से बेच दिया था।

यही फर्क हैं हमारी सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति और अरबी लुटेरों के संस्कारों में।
Jat king- Muslim Begum
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह


और आज जो बॉलीवुड के भांड लोग जोधा अकबर से फर्जी सीरियल बना रहे हैं वे इस हकीकत व इतने रॉयल राजाओ की और एक विश्व सुंदरी प्रेमकहानी पर क्यों चुप है जिसके पूरे तथ्य प्रमाण भी हैं।जिसमें रोचकता रॉयलिटी संस्कार हीरो विलेन सब हैं।
जय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह।
        जय सूरजमल।जय भवानी।

Wednesday, 20 June 2018

स्वामी इंद्रवेश जी ढाका- महान समाज सुधारक, गौरक्षक, आर्य समाजी

आर्य समाज के महान पुरोधा स्वामी इंद्रवेश ढाका जी

जाट
स्वामी इंद्रवेश जी

स्वामी इंद्रवेश जी का जन्म रोहतक के sudana गांव के एक हिन्दू जाट(ढाका गौत्र) परिवार में हुआ था।
वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे और स्वामी दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं से प्रभावित थे।
वे हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने आर्य समाज का प्रचार किया व बहुत से गुरुकुलों में अपनी सेवा प्रदान की।पदयात्राओं, शिविरों, व्यायाम-प्रदर्शनों व जनचेतना यात्राओं के माध्यम से आर्य समाज का प्रचार करने की परम्परा उन्होंने ही प्रारम्भ की ।
आर्य समाज के मूल्यों को फैलाने में ऊनका विशेष योगदान रहा।

1966 में उन्होंने गौरक्षा वांडोलन के द्वारा गौहत्या निषेध कानून बनाने के लिए भी पुरजोर आवाज उठाई।

1967 में उन्होंने आर्य युवक परिषद का गठन किया और युवाओ को वैदिक शिक्षा के प्रति जागरूक किया।

1967 में कुरुक्षेत्र से दिल्ली तक की पदयात्रा का ऐतिहासिक आयोजन किया । यह यात्रा सैंकड़ों गांवों, कस्बों व नगरों से होती हुई पन्द्रह दिन बाद दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले के समक्ष जलती मशाल हाथों में लेकर आर्य राष्ट्र की स्थापना के संकल्प के साथ सम्पन्न हुई । 

1968 में उन्होंने राजधर्म पत्रिका की शुरुआत की जो emergency के वक्त उस समय के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा बन्द कर दी गयी थी व बाद में शुरू हुई थी

1969 में उन्होंने कुंडली बूचड़खाना बन्द करवाने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1969 में हरयाणा की जनता के द्वारा छेड़े गए चण्डीगढ़ आन्दोलन में युवावर्ग का नेतृत्व करते हुये स्वामी इन्द्रवेश व उनके साथी जेल गये । रोहतक सेन्ट्रल जेल में ही उन्होंने सन्यास लेने का संकल्प लिया ।

7 अप्रैल 1970 को दयानन्द मठ रोहतक में स्वामी इन्द्रवेश जी ने स्वामी अग्निवेश एवं स्वामी सत्यपति के साथ वेदों के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी ब्रह्ममुनि जी से सन्यास की दीक्षा ली । उसी दिन स्वामीद्वय ने आर्य राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेते हुए आर्यसभा नाम से राजनैतिक पार्टी की भी स्थापना कर ली तथा सक्रिय राजनीति में उतर गये ।

1972 में विधानसभा के चुनावों में आर्यसभा के दो विधायक चुने गये तथा आर्यसभा हरयाणा की सर्वाधिक वोट प्राप्त करने वाली विपक्षी पार्टी बन गई ।

 फिर गेंहू के मूल्य बढ़वाने के लिए किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।

सन् 1974 में आर्यसमाज की सर्वाधिक सशक्त सभा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब जिसमें दिल्ली, हरयाणा, पंजाब की आर्य समाजें, शिक्षण संस्थायें व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, कन्या गुरुकुल देहरादून, गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी आदि सम्मिलित थीं, के चुनाव में प्रधान चुने गये तथा गुरुकुल कांगड़ी के कुलाधिपति बने । यह चुनाव हाईकोर्ट की देखरेख में संपन्न हुआ था ।

1975 में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया जिसके कारण उन्हें लम्बे समय तक जेल भी जाना पड़ा।

सन् 1975 में आपातकाल के दौरान मीसा के अन्तर्गत नजरबंद किये गये । इमरजेंसी के बाद आर्यसभा का अन्य सभी पार्टियों की तरह जनता पार्टी में विलय कर दिया गया तथा सन् 1980 के लोकसभा चुनाव में आप रोहतक से लोकदल के टिकट पर सांसद चुने गये ।

1986 में पंजाब हरयाणा की boundry व जलीय बंटवारे से सम्बंधित राजीव - लोंगोवाल समझौते का विरोध किया व पंजाब में बढ़ रहे उग्रवाद के खिलाफ 21 दिन तक भूख हड़ताल की।

स्वामी जी की अध्यक्षता में गठित वेदप्रचार आयोजन समिति के तत्वाधान में वर्ष 1986 में कुम्भमेला हरद्वार में चालीस दिन का वेदप्रचार शिविर लगाया गया जिसमें गाय के घी से चतुर्वेद पारायण यज्ञ, विभिन्न सम्मेलन, योग शिविर, ऐतिहासिक शोभायात्रा एवं शास्त्रार्थ की चुनौति देकर पौराणिक जगत् में हलचल पैदा की, 1986 के वेदप्रचार शिविर से पूर्व कुम्भ मेले में आर्य समाज का शिविर लगभग 60 साल पहले लगा था । स्वामी जी द्वारा प्रारम्भ किये गये उक्त क्रान्तिकारी कार्यक्रम को अभी तक प्रत्येक कुम्भ मेले में चलाया जा रहा है । सन् 1986 के कुम्भ मेले पर स्वामी प्रकाशानन्द व स्वामी योगानन्द सहित दस सन्यासी बने थे।

1987 में उन्होंने एक राजपूत विधवा रूप कंवर को धक्के से सती करने के खिलाफ दिल्ली-देवराला(देवराला राजस्थान जहां एक राजपूत स्त्री को जिंदा जलाने की कोशिश की गई)पदयात्रा निकाली व अपराधियो पर कार्यवाही और सती प्रथा बन्द के लिए आवाज उठाई।जिसके कारण सरकार को संसद के तहत कानून बनाना पड़ा।

न् 1987 में ही दिल्ली से पुरा महादेव (मेरठ) तक आयोजित पदयात्रा का संरक्षण स्वामी इन्द्रवेश जी ने किया । यह यात्रा भी पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ को सती के सवाल पर शास्त्रार्थ की चुनौति देने के लिए आयोजित की गई थी । इस कार्य में पूरे आर्य जगत में नई ऊर्जा पैदा हुई थी ।

1993 में उन्होंने दिल्ली से हिसार तक शराब बंदी के लिए यात्रा निकाली व शराब के बुरे प्रभावों के बारे में लोगो को जागृत किया।

बागपत में मायात्यागी काण्ड के बाद ग्यारह सौ सत्याग्रहियों के साथ सत्याग्रह करके एक महीने तक बरेली जेल में रहे तथा बाद में हरयाणा लोक संघर्ष समिति के माध्यम से हरयाणा में जोरदार जेल भरो आन्दोलन चलाया । विदित हो कि मायात्यागी को पुलिस ने भरे बाजार में नंगा करके घुमाया तथा अपमानित किया था जो महिलाओं पर किये जाने वाले अत्याचार का ज्वलन्त उदाहरण था ।

उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी लोगो को जागृत किया और शिक्षा के प्रसार प्रचार में बहुत बड़ा योगदाब दिया।

1998 में bjp join की और रोहतक से चुनाव लड़ा।

सन् 2001 में आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा के प्रधान निर्वाचित हुये । वर्तमान में आप आर्य विद्यासभा गुरुकुल कांगड़ी के प्रधान पद को सुशोभित कर रहे थे ।

ब्रह्मचर्य, व्यायाम प्रशिक्षण एवं युवानिर्माण शिविरों के माध्यम से पूरे देश में युवक क्रान्ति अभियान चलाया त्था आर्यसमाज में नया जीवन फूँका । शिविरों के माध्यम से लाखों युवकों को आर्यसमाज से जोड़ा ।और सैंकड़ो को सन्यास व ब्रह्मचर्य की दीक्षा भी दी।

स्वामी इन्द्रवेश जी ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समाज परिवर्तन के लिए लगाया । उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपना जीवन समाज सेवा में अर्पित किया । उनकी पुण्यतिथि पर हमें एक ही संकल्प लेना चाहिये कि जिस पवित्र निष्ठा के साथ स्वामी जी ने महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष किया उसी प्रकार हम सब सप्तक्रान्ति अर्थात् जातिमुक्त, साम्प्रदायिकतामुक्त, नशामुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त, नारी उत्पीड़नमुक्त एवं शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कृतसंकल्प रहेंगे । हम आपस के सभी भेदभाव मिटाकर इस मिशन में जुटें, यही स्वामी जी की अन्तिम इच्छा थी ।

12 जून 2006 को उनका देहांत हो गया वे अन्य कई आर्य संस्थानो एवं सँगठनो के अध्यक्ष रहे।कई किताबें व आंदोलन किया।भयत से गुरुकलों को उन्होंने अपनी सेवा से जीवंत कर दिया।

इस महान आत्मा को कोटि कोटि नमन।

Wednesday, 13 December 2017

वीर गौकुला जी की बहन हिन्दू वीरांगना भंवरी कौर जी की वीर गाथा


भँवर कौर, हिन्दू, वीरांगना, जाट, क्षत्राणी, औरंगजेब, युद्ध क्षत्राणी शहीद भंवरी कौर जी बृज बाला शहीद क्षत्राणी भंवरी कौर अमर शहीद गोकुल सिंह की बहिन थी. 

भंवर कौर का मुग़ल सैनिकों से मुकाबला पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अंसार १६६९ के श्रावण मास की हरयाली तीज के दिन शिखन खां ने घुड़सवारों तथा अंगरक्षकों के साथ तिलपत से बाहर गाँव के पास बाग़ को घेर लिया. भंवर कौर अपनी पूर्ण यौवनावस्था में थी, दायित्व और वीरत्व के संस्कार उसे विरासत में मिले थे. अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण वह अन्य सहेलियों से सर्वोपरि लग रही थी. गाँव से बाहर बाग़ में झूले पड़े हुए थे और मीठी सुरीली आवाज में सखियाँ मल्हार गाने लगी. वे झोटा दे रही थी और मस्ती में ठिठोली और अठखेलियाँ कर रही थी. शिखन खान, कल्पना और वासना से बेहद पीड़ित हो रहा था. वह बेकाबू मन को न रोक सका और अनायास ही लड़कियों के झुंड के पास पहुँचा. उसके साथियों ने लड़कियों पर झपट्टा मरकर उन्हें हतास करना चाह परन्तु वीर बालाएँ इन अजूबे वेशधारियों से न तो भयभीत हुई और न भागी. शिखन खान ने जैसे ही भंवर कौर की और कुदृष्टि से हाथ बढ़ाना चाहा तो

उस बृज बाला ने कहा - "ठहर जा, गीदड़, कुत्ते, हरामी, तेरी शामत तुझे यहाँ ले आई है. मेरी और हाथ बढ़ने का मतलब बर्रों के छाते में हाथ डालना होगा". भंवर कौर की दहाड़ से शिखन खां बेहयाई से हंसा और कहा कि "ऐ जाने मन, तू जितनी ऊपर से सुंदर दिखती है उतनी ही अन्दर से गर्म मिजाज मालूम पड़ती है. तू यहाँ इन गवारों के बीच रहने लायक नही है तुझे तो महलों में होना चाहिए". "बेहूदे, बदतमीज़ तेरी बहन बेटी नहीं है क्या? यदि तेरी बहन बेटी है तो उसे ले आ उसे मैं अपनी भाभी रानी बना लूंगी." भंवर कौर की गर्जना से शिखन खां और चिढ़ गया. वह आगे कुछ कर पाता इससे पहले ही भंवर कौर ने झूला उतारकर उसकी रस्सी में पटली बाँध कर गोफन की तरह घुमाते हुए शिखन खां की और फेंकी जो कि उसके सर में लगी- इसके लगते ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया. उसने अपनी अन्य सखियों को इन घुड़सवारों से मुकाबला करने को ललकारा.

 भंवर कौर और सखियाँ आनन-फानन में पटली और झूले वाली रस्सियों से सुसज्जित हो गयी. मुग़ल सैनिक इन वीरांगनाओं के निश्चय को नहीं जान पाए. भंवर कौर ने दाहिने हाथ से रस्सी घुमाकर एक सैनिक के गले पर फैंक दी. रस्सी गले के चारों और लिपट गयी. भंवर कौर ने जोर से झटका मारा और सैनिक घोड़े से नीचे धड़ाम से आ गिरा. भंवर कौर की दूसरी सखी ने पटली से वार किया. सिपाही अर्धम्रत निढाल हो गया. भंवर कौर ने बिजली जैसी चपलता से सैनिक की तलवार अपने काबू में की और एक ही वार से मुग़ल सैनिक का धड़ और सिर अलग हो गए. यही क्रम चलता रहा. इस तरह कई सिपाही मौत के शिकार हुई.

वीरांगनाओं का यह रणचातुर्य देख शिखन खां पहले तो दहल गया किंतु अविलम्ब क्रोधित हो भंवर कौर की और झपटा. भंवर कौर पहले से तैयार थी. शिफन खां ने तलवार से वार किया. भंवर कौर ने पटली आगे कर उसे ढाल का काम लिया. वार बेकार हो गया. भंवर कौर ने विद्युत-वेग से पलट कर वार किया. चालाक शिखन खां स्वयं तो बच गया किंतु उसका घोडा घायल हो गया. बाग़ के मध्य घमासान होने लगा. वीरांगनाओं ने अबतक कई घुड़सवारों को रस्सी से निचे गिराया और मौत के घाट उतार दिया. खिसियाए सैनिक इन अबलाओं पर करारे प्रहार करने लगे. वीरांगनाएं भी कट-कट कर धरासाई होने लगी. चतुर भंवर कौर ने शिखन खां के घायल घोडे पर एक और वार किया. घोडा चित्कार कर उठा और घायल घोड़ा शिखन खां को लेकर भाग खड़ा हुआ.

शिखन खां को भागते देख अन्य सैनिकों के पैर भी उखड गए. भागते सैनिकों पर उत्साहित वीरांगनाओं ने तेज और लंबे प्रहार किए. किसी कवि ने ठीक ही कहा है: अबलाएं करती थी श्रृंगार, वे बनी सिंहनी क्षत्राणी सुझा केवल श्रृंगार नहीं, तलवार धार में था पानी, कितने ही यवनों को काटा, जैसे हो फसल को काट रहीं, रण चंडी बनकर देखो वैरी रक्त को चाट रहीं भंवर कौर ने भागते हुई दो सैनिकों को धराशाई कर दिया. भंवर कौर अतिउत्साह में थी. अपनी सुरक्षा का ध्यान कम हो गया. तभी एक भागते सैनिक ने बंदूक दागी जो भंवर कौर का सीना चीरती हुई पार कर गयी. बृज वीरांगना भंवर कौर शहीद हो गयी. इस लड़ाई में 17 मुग़ल सैनिक मारे गए. भंवर कौर सहित 11 बहनें शहीद हुई. 

गढ़ी तिलपत में समाचार पहुँचा और गाँववासी बाग़ में पहुँच गए. बाग में आतताई मुग़ल सैनिकों और वीरांगनाओं की लाशें छितरी पड़ी थी. हरयाली तीज का त्यौहार शोक में बदल गया. दिवंगत वीरांगनाओं का दाह संस्कार सामूहिक रूप से बाग़ के मध्य में कर दिया गया. प्रति वर्ष हरयाली तीज पर इन शहीद वीरांगनाओं की स्मृति में शहीद मेला लगाने का गाँव-गाँव में निश्चय हुआ. यह परम्परा आज भी बृज क्षेत्र के गांवों में चल रही है।
अमर शहीद वीर गौकुलावीर, गौकुला, जाट, युद्ध, ब्रज, हिन्दू,  तिलपत की लड़ाई, क्षत्रिय

Monday, 11 December 2017

इस हिन्दूवीर यौद्धा ने अकबर की अस्थियों को जलाकर राख कर दिया था।

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वीरवर राजाराम का जन्म सिनसिनी राजस्थान के एक जाट क्षत्रिय वीर भज्जाराम के घर में हुआ था।उस समय देश मे औरंगजेब का आतंक था। इन्होंने क्रांति का झंडा उठाते ही धर्म की रक्षा के लिए ब्रज के क्रांतिकारियों को एक करना शुरू किया।इन्होंने धर्म वीर सरदार रामकी चाहर (राम चेहरा सोघरिया) सोघरिया को भी अपने साथ लिया और औरंगजेब की धर्म विरोधी नीति के खिलाफ बिगुल बजा दिया। उनके गांव के पास ही अउ गढी थी जिसका सरदार लालबेग खान था जो स्त्रियों पर बुरी नजर रखता था।एक बार उसने कुए से एक स्त्री को उठा लिया तो यर खबर राजाराम के पास पहुंची तो उन्होंने हिन्दू सतीत्व की रक्षा के लिए अउ गढी पर आक्रमण कर दिया। इस तरह उस स्त्री और अउ गढ़ी को उन्होंने मुगलो से स्वतंत्र करवाया ।उसके बाद वो ब्रज क्षेत्र की ओर बढ़े। और वहां उन्होंने कूटनीति से जाटौली थून की 575 गांवो की जमीदारी सम्भाली और धर्मसेना को मजबूत किया। इस तरह कुन्तल,आगरा,फतेहपुर सीकरी और धौलपुर के जाट सरदारों को भी धर्म रक्षा ले लिए उन्होंने एकता के सूत्र में पिरोया।सैनिको को गुरिल्ला युद्ध और शाही सेना से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया। एक बार आगरा के समीप के गांवों में फसल खराब होने के कारण औरंगजेब को लगान देने से मना कर दिया तो उसने मीर अब्दुल्लाह दी असालत खां को भेजा।तो ग्रामीणों ने उसको धूल चटा दी और मुअल्लत खां को पकड़कर राजाराम के पास ले गए।तो राजाराम ने उसकी छित्तरपरेड की और उसे सैनिक न समझकर हिजड़ा कहकर छोड़ दिया।जब यह समाचार औरंगजेब के पास पहुंचा तो उसने मुअल्लत खां को जहर की पुड़िया भेजी।उसने दरबार में औरंगजेब के हाथों मरने की अपेक्षा जहर खा लिया। राजाराम ने राजाराम की अध्यक्षता में मुगलों को दण्ड देने के लिए आगरे पर हमला कर दिया। आस-पास का सारा प्रदेश उनके अधिकार में हो गया। आगरे जिले से मुगल-शासन का अन्त कर दिया। सड़कें बन्द हो गई। मुगल-हाकिम क्रूर शफीखां को किले में घेर लिया और सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। इसके थोड़े ही दिन पश्चात् धौलपुर के करीब अगरखां तूरानी को जा घेरा। अगरखां और उसका दामाद इस लड़ाई में मारे गए इसी तरह कट्टर इस्लामिक महावत खां मीर इब्राहिम हैदराबादी पर भी उन्होंने आक्रमण किया और वीरो ने तलवारो से तोपो का मुकाबला किया इसमे 400 हिन्दू वीर जाट शहीद हुए और 250 मुगल मारे गए। मई सन् 1686 ई. में सफदरजंग ने राजाराम का मुकाबला किया, किन्तु बेचारे को भागना पड़ा और अपने पुत्र आजमखां को मुकाबले के लिए भेजा। आजमखां के आने से पहले ही राजाराम ने सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। मुगलों के 400 आदमियों को जहन्नुमरशीद कर दिया और शाइस्ताखां जो कि आगरे का सूबेदार था । उसके आने से पहले ही राजाराम ने मार्च 1688 में सिकन्दरा के मकबरे पर आक्रमण कर दिया और 400 मुगल सैनिको को काट दिया।सिकन्दरा का रक्षक मीर अहमद पहले से ही राजाराम से अपनी जान बचाकर भाग रहा था।उसने कुछ नही किया वो देखता रहा और राजराम ने मकबरे में तोड़ फोड़ की।वो अकबर से हिन्दू बेटियों के डोलो से नाराज थे।ये बाते उन्होंने अपने बुजर्गो से सुनी थी।इसलिए उसने अकबर और जहांगीर की कब्र को उखाड़ा व उनकी अस्थियां निकालकर अग्नि में स्वाहा कर दी।> ढाई मसती बसती करी,खोद कब्र करी खड्ड। अकबर अरु जहांगीर के गाढ़े कढ़ी हड्ड।।
आज अकबर का मकबरा तो है लेकिन उसमे अस्थियां नहीं है खोखली है।अगर यह वीर ऐसा न करता तो आज भी कई सेक्युलर हिन्दू उस निर्दयी अकबर की मजार पर माथा टेक रहे होते। इससे औरंगजेब बहुत गुस्सा हुआ उस समय वो दक्षिण में मराठों से लड़ने में व्यस्त था।इसलिए उसने तेजी से ब्रज क्षेत्र के सूबेदारों को बदलना चालू किया और उसके वफादार आमेर(जयपुर) के राजाओं,कुछ हाड़ा राजपूत व कुछ शेखावतों को (जो उसके फौजदार थे) राजाराम के विद्रोह को कुचलने का आदेश दिया।इन्होंने सिनसिनी गढ़ी पर भी हमला किया पर राजाराम की धार युद्धनीति कामयाब रही। इसके बाद राजाराम एक महीने तक इनसे ही लड़ता रहा। इसी बीच चौहानो और शेखावतों के बीच बीजल गांव में जमीनी परगने को लेकर युद्ध शुरू हो गया।शेखावतों की तरफ आमेर के राजा,हाड़ा राजपूत और मेव मुगल थे।शेखावतों व आमेर के राजाओ की मुगल परस्ती के कारण किचौहानो ने राजाराम से सहायता मांगी तो वो अपनी सेना लेकर पहुंच गए। चौहान और राजाराम वीरता से लड़ रहे थे।राजाराम ने मुगलो की टुकड़ी पर घेरा डाला और उस पर टूट पड़े। तो धोखे से उन पर कीसी मुगल सैनिक ने पीछे से वार किया और वो शहीद हो गए और वो दिन था 4 जुलाई 1688 का।इस युद्ध मे शेखावतों की विजय हूई।उसके बाद राजाराम का सिर काटकर दरबार मे पेश किया गया और रामकी चाहर सोघरिया को जिंदा पकड़कर दरबार मे ले जाया गया जहां आगरा में उनका भी सिर कलम कर दिया गया।

एक ब्राह्मण बहन और जाट भाई की अमर प्रेमकथा


ढलमचंद बालियान
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वीर ढमलचन्द का जन्म संवत् 1550 (सन् 1493 ई०) में ग्राम सिसौली जिला मुजफ्फरनगर के एक रघुवंशी बालियान वंश के एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम चौधरी मेहरचन्द तथा माता का नाम श्यामो देवी था जो कि दहिया गोत्र की थी। इस वीर का वजन 52 धड़ी (6½ मन) था। यह जंगली भैंसे के सींगों को पकड़ कर उसे चक्कर कटा देता था। इसके कोई बहिन नहीं थी। अतः इसने जसवन्तनगर के हरिराम ब्राह्मण की पुत्री हरकौर को अपनी धर्मबहिन बनाया। हरकौर के कोई भाई नहीं था सो उसने इसको धर्मभाई बना लिया। हरकौर ने ही ढमलचन्द का उपनाम ढलैत रखा। ढलैत की शक्ति व योग्यता को जानकर रीवा के राजा वीरसिंह बघेला ने इसको अपनी सेना में भरती कर लिया और 200 घुड़सवारों और 300 पैदल सैनिकों का सरदार बना दिया। एक बार राजा वीरसिंह ढलैत को साथ लेकर किसी जंगल में से जा रहे थे। वहां पर एक शेर ने राजा पर अकस्मात् आक्रमण करके, उसके घोड़े को एक ही थाप में मार दिया। राजा पर वार करने से पहले ही ढलैत ने शेर की थाप को अपनी ढाल पर रोक लिया और अपनी 15 सेर वजन की तलवार से एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिये। इससे प्रसन्न होकर राजा ने ढलैत को 2000 सवारों का मनसबदार नियुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ढलैत ने अपने पुराने साथियों कीर्तिमल और भीमपाल उपकरण को महाराज की सेना में ऊँचे पदों पर लगवा दिया। राजा वीरसिंह का एक राजपूत भीमपाल नामक 7 गांव का जागीरदार था। उसकी पुत्री राजकली थी। यह 28 धड़ी वजन के पत्थर के मुदगर को दोनों हाथों से कई-कई बार ऊपर-नीचे कर देती थी। एक बार राजा वीरसिंह बघेला अपने साथ ढलैत वीर योद्धा को लेकर जागीरदार भीमपाल के निवास-स्थान पर आये थे। वहां पर मल्लों की युद्धकला का प्रदर्शन हुआ। राजकली भी प्रदर्शन देख रही थी। महाराजा की आज्ञा से ढलैत ने राजकली के उस 28 धड़ी के मुदगर को कभी दायें हाथ और कभी बायें हाथ से ऊपर नीचे और चारों ओर घुमाकर भूमि पर दूर फेंक दिया। तीन बार ऊपर फेंककर अपने कन्धों पर रोककर नीचे गिरा दिया। इससे भी भारी मुदगरों को उठाने की कला दिखलाकर दर्शकों को चकित कर दिया। उसी अवसर पर एक मरखना हाथी बिगड़कर इस प्रदर्शन स्थल पर आ गया। उसे देखकर लोग भागने लगे। इतने में ढलैत ने बड़ी तेजी से आगे बढ़कर 19 धड़ी की मोगरी उस हाथी के माथे पर जोर से मारी जिसके लगते ही हाथी पीछे को भाग गया। इस अद्भुत मल्ल युद्ध की कला को देखकर उपस्थित जनसमूह ने जोर-जोर से जयकारे लगाये “ढलैत की जय हो । ढलैत की जय हो।” उसी समय उस राजपूत लड़की राजकली ने ढलैत को मन से अपना पति मान लिया और उससे स्वयंवर विवाह कर लिया। ढलैत की धर्मबहिन ब्राह्मण लड़की हरकौर का विवाह पण्डित प्रेमनाथ के पुत्र अध्यापक देवव्रत के साथ हुआ। देवव्रत हरद्वार में अध्यापक थे और वहां के निकट गांव बाहपुर के निवासी थे। एक दिन हरकौर अपने देवर जयभगवान के साथ बहली में बैठकर अपने गांव जसवन्तनगर से अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते के जंगल में हैदरगढ़ के नवाब के बेटे हसनखां ने अपने शस्त्रधारियों सहित बहली पर आक्रमण कर दिया और हरकौर को हैदरगढ़ के किले में ले गया। यह घटना संवत् 1580 (सन् 1523 ई०) की है। उस समय इब्राहीम लोधी दिल्ली का बादशाह था। , हसनरज़ाखान हरकौर से निकाह (विवाह) करने के प्रयत्न करता रहा। परन्तु वह इन्कार करती रही। हरकौर ने अपनी अंगरक्षक एक मुस्लिम फकीरनी के माध्यम से उसके पोते रमजान को पत्र देकर अपने धर्मभाई ढलैत के पास भेजा। रमजान ने यह पत्र ढलैत को मथुरा के राजा के कैम्प में दिया।


ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के सतीत्व को बचाने के लिये राजा वीरसिंह से आज्ञा लेकर अपने साथ कीर्तिमल, भीमपाल उपकरण तथा 200 घुड़सवार लिए और हैदरगढ को चल दिया। इनके साथ राजकली भी ऊँटनी पर सवार होकर चली। वहां पहुंचकर इन वीर योद्धाओं ने हैदरगढ़ किले को घेर लिया और बड़ी युक्ति से धावा करके नवाब के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजकली ने हसनरजा के उन 5 सैनिकों का अपनी तलवार से सिर उतार दिया जो कि हरकौर को जबरदस्ती ले जाकर हसनरजाखान के साथ निकाह करवाना चाहते थे।
वीर योद्धा ढलैत ने अपनी तलवार से हसनरज़ाखान का सिर काट दिया। इस तरह से ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के प्राण एवं सम्मान को बचा लिया। ढलैत की वीरता तथा हरकौर के सतीत्व की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह है ढलैत की वीरगाथा। , ढलैत की पत्नी राजकली की 48 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् वीर ढलैत साथु बन गया। एक बार ढलैत अपनी धर्मबहिन हरकौर, मित्र कीर्तिमल एवं भीमपाल उपकरण के साथ शुक्रताल (जि० मुजफ्फरनगर) गंगा के तट पर स्नान करने गया। ये सब तीन दिन तक साधु सन्तों से धर्मकथा सुनते रहे। चौथे दिन ढलैत योद्धा का अकसमात् देहान्त हो गया। उसका दाह संस्कार वहीं गंगा तट पर किया गया। सतीदेवी हरकौर को अपने धर्म-भाई ढलैत की मृत्यु का भारी आघात पहुंचा। वह ढलैत की चिता के पास बैठकर “मेरा भाई ढलैत, मेरा भाई ढलैत” कहने लगी और तीन घण्टे पश्चात् अपने प्राण त्याग दिये। यह है भाई-बहिन के सच्चे प्यार का उदाहरण।

Wednesday, 18 October 2017

हिन्दू वीर जाटवान सिंह मलिक- हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

बात 1192 की है जब देश पर मुस्लिम सत्ता की शुरुआत हुई थी।और गौरी का गुलामी में कुतुबुद्दीन ऐबक देश पर अघोषित राज कर रहा था।
➡ये वही कुतुबुद्दीन है जिसने 700 मंदिर तोड़कर मस्जिदे बनाई,जिसने 1लाख 33000 लोगो का धर्म के नाम पर कत्ल किया,जिसने 80000 जीवो की हत्या की।

➡जाटो को ये अत्याचारी अधर्मी राजा सहन नही हुआ और उन्होंने हिन्दू वीर यौद्धा 💪 जाटवान मालिक के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
और मूसल सैनिकों को काटना शुरू कर दिया।रोहतक हरियाणा में जन्मे जाटवान ने युही ऐबक से लोहा लिया और फिर एक दिन  हाँसी में मुस्लिम बादशाह के किलेदार नसरुद्दीन को घेर लिया।और हाँसी को इस अत्याचारी शासक से स्वतंत्र कर लिया।
तभी कुतुबुद्दीन खबर मिलते ही अपनी सेना के साथ रातों रात भागा।

हांसी पहुंचते ही जाटवान और मुस्लिम शासक के बीच घमाशान युद्ध शुरू हुआ।🏇⚔🏇
➡खुद मुस्लिम लेखक लिखते हैं कि जैसे दो पहाड़ आपस में टकरा गए हों।धरती रक्त से #लाल हो गई थी।जाट थोड़े थे पर उन्होंने मुस्लिम बादशाह को नको चने चबवा दिए।
बाद में जाटवान ने अपने 💪20 मजबूत सैनिकों को चुना और सीधा कतुबुद्दीन के सुरक्षा घेरे में घुस गया।
उसने तलवार से हजारों का रक्त बहा दिया और कतुबुद्दीन को हाथी से नीचे उतरकर लड़ने के लिए ललकारा।

➡पर वो कायर उतरा नही और उसने मना कर दिया।

➡ये युद्ध तीन दिन और तीन रात चला।
आखिर कब तक दिल्ली के बादशाह की बड़ी सेना के आगे ये छोटी सी यौद्धाओं की सेना टिक पाती।
अंत में महान हिन्दू वीर चौधरी जाटवान सिंह मलिक शहीद हो गए।

लेखक आगे लिखते है जाटवान भले ही शहीद हो गए हो पर गुलाम वंश मुस्लिम बादशाह को इतना नुकसान हुआ कि वो दहाड़े मार मार कर रोया
और बोला कि अगर मैं इस यौद्धा से संधि करके बहला लेता तो अपने साम्राज्य का बहुत विस्तार कर सकता था।

इस तरह इस हिन्दू वीर यौद्धा ने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।ॐ🚩ॐ
पर कितने शर्म की बात है कि इस अत्याचारी कुतुबुद्दीन को #स्कूली किताबो में #महान बताया गया है

और धर्म व देश की खातिर तीन दिन तीन रात छोटी सी सेना के साथ इस गुलाम मुस्लिम बादशाह से लड़कर अपना बलिदान देने के बाद भी आज देश और हरियाणा के इतिहास में इस वीर को उचित जगह नही दी गई।

याद रखो इन बलिदानों को जिन्होंने अपना सिर कटा लिया पर कभी देश और धर्म का सिर नही झुकने दिया
               🚩🚩🚩🚩🇮🇳🚩🚩🚩🚩
           जय जाटवान।जय हिन्दुत्व।जय भारत।

Sunday, 24 September 2017

वीरांगना राजकुमारी सोमादेवी और राजा मालदेव चाहर


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संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पटाने के लिए पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी।और बलबन पहले से ही जाटो पर खुश था क्योंकि जब देश पर क्रूर विदेशी मंगोलों ने आक्रमण किया था तो खाप सेना ने ही उसके साथ मिलकर मंगोलों को हराया था।

इसलिए बादशाह ने उनकी इच्छा अनुसार कांजण (बीकानेर के पास) और सिद्धमुख(चुरू) का राज्य दे दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवन ने राज्य किया।(1268 से 1416 तक यहां जाट क्षत्रियो का राज रहा।)

बात उस समय की है जब वहां 1416 में राजा मालदेव चाहर शक्तिशाली स्तिथि में राज कर रहे थे।और इन्होंने अपना राज्य भी विस्तार कर लिया था।

वहां के आस पास दिल्ली के मुस्लिम बादशाह टैक्स लेते थे।और अपने कुछ लम्बरदार बना रखे थे।
तो 7 जाट लम्बरदारो ने टैक्स देने से मना कर दिया।

उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शासक खिज्र खां का शासन था।उसने बाजखां पठान के नेतृत्व में एक सेना उन 7 लम्बरदारो को पकड़ने के लिए भेजी।जब बाजखां उन्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा था तो राजा मालदेव ने उसे रोका।और उसे उन लम्बरदारो को छोड़ने के लिए कहा परन्तु उसने मना कर दिया।

फिर वहां भीषण युद्ध हुआ।और उस युद्ध में मुस्लिम सेनापति की सेना मारी गई।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात गोत के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।और इन्होंने खिज्र खां को टैक्स के लिए मना करके वीरता का काम किया क्योंकि उस समय ऐसा करना मौत के मुह में हाथ डालने के समान था।क्योंकि दिल्ली पर क्रूर शासकों का कब्जा था।

गुस्से में लाल होकर स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या राजकुमारी सोमादेवी थी। 
उसी समय दो सांड आपस में लड़ने लगे तो कुछ मुस्लिम सैनिक डरकर भागने लगे।
तब राजकुमारी सोमादेवी ने आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर दिया था।ये देखकर बादशाह के एक खास सेनापति की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा।

 स्वाभिमानी मालदेव ये सुनते ही गुस्से में हो गया और कहा कि हम अपनी कन्या एक मुसलमान को नही दे सकते।
महाराजा मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। 

चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में घोड़े पर तलवार लेकर वीरता से लड़ी।सोमादेवी ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को काट दिया।

परन्तु इतनी विशाल सेना के आगे कब तक टिकते अंत में अपने धर्म पथ पर चलते हुए युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं लगभग सेना रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

चाहर जाट गोत्र(एक नजर)
ऋषि-भृगु
वंश-अग्नि
कुलदेव-भगवान सोमनाथ
कुलदेवी-ज्वालामुखी

जय जटवाडा जय हिन्दुत्व जय भारत।