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Thursday, 9 August 2018

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान-बलिदान गाथा

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान व बलिदान गाथा-1763

महाराजा सूरजमल
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की नजरों में दिल्ली सदा खटकती रहती थी।वे दिल्ली को मुगलों से मुक्त करवाकर गुलामी का कलंक धोने की इच्छा रखते थे। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1753 में भी दिल्ली पर आक्रमण किया था व ज्यादातर जीत ली थी। पर कुछ गद्दारों के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी थी।

बात 1763 की है दिल्ली के मुगल दरबार मे एक ब्राह्मण काम करता था।उसकी बेटी चन्दनकौर बहुत सुंदर व धर्म परायण थी। बादशाह ने एक दिन उसे देख लिया और उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की।लेकिन धर्मपरायण चन्दनकौर ने शादी से मना कर दिया तो बादशाह ने उसे जेल में डाल दिया।वहां एक मेहतरानी ने चन्दनकौर को सलाह दी के पूरे हिंदुस्तान में सिर्फ एक ही हिन्दू सम्राट है जो अबलाओं व धर्म की रक्षा करने के लिए दिल्ली से भी टक्कर ले सकता है।और वह है भरतपुर में बैठे जटवाड़े के शासक महाराजा सूरजमल।
किसी तरह से चन्दनकौर ने खत लिखकर अपनी माता के माध्यम से अपना दुःख महाराजा सूरजमल के दरबार तक पहुंचाया।
महाराजा सूरजमल ने जब खत पढ़ा और उसकी माता की व्यथा सुनी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।परन्तु दिल्ली से टक्कर लेने का मतलब था पूरे हिंदुस्तान से टक्कर लेना।हर मुसलिम से व हर सेक्युलर हिन्दू से टक्कर लेना।और इसके लिए सालो मेहनत की आवश्यकता होती है।परन्तु उन्होंने कुछ भी न सोचा और अपना  वीर सैनिक हरचंद गुर्जर को दिल्ली भेजा।

वहां जाकर हरचंद ने महाराजा सूरजमल का संदेश नजीब को सुनाया व चन्दनकौर को रिहा करने का आदेश सुनाया।मगर नजीब ने कुछ न सोचा उस मूर्ख ने हरचंद के साथ साथ महाराजा सूरजमल को भी अपमानित करने के लिए कहा कि जा उस सूरजमल को कह देना की अपनी जाटनी भी साथ ले आएगा।महारानी का अपमान सुनते ही वीर हरचंद ने अपनी तलवार निकाली और कहा कि नजीब अगर महाराज दिल्ली आए तो गिड़गिड़ायेगा तू हम अपनी माता व अपने राज्य का अपमान कभी नही सहेंगे।यह कहते हुए उसने नजीब पर हमला बोल दिया लेकिन पूरा दरबार ही नजीब का था।चारों तरफ से सैनिकों ने हमला कर दिया।जिसमें कई मुल्लो को मारकर हरचंद शहीद हो गया।

यह खबर महाराजा सूरजमल तक पहुंची तो वे आग बबूला हो उठे।और अपनी सेना को दिल्ली की ओर मुख करने का आदेश दिया।चूंकि महाराजा सूरजमल दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी पहले से ही कर रहे थे परंतु सही समय नहीं आया था।इस घटना के होने के कारण उन्होंने पहले ही आक्रमण करने की ठान ली।
तैयारियां पूरी नहीं थी उनके मंत्री रूपाराम कटारा ने उन्हें समझाया भी।मगर महाराजा ने कहा कि एक दुष्ट एक हिन्दू बेटी को कैद किये हुए है  और हम सबको ललकार रहा है।हमारे दूत भेजे हुए वीर सैनिक को भी उसने नहीं बख्शा।उनके मंत्री ने कुलपुरोहित से भी कहलवाया कि यह समय ग्रहदशा के अनुसार ठीक नहीं है।परन्तु महाराजा सूरजमल ने कहा कि वीर जब चले तभी समय है।विजय या वीरगति।

आखिरकार दिल्ली पर आक्रमण कर दिया गया।हिंडन नदी तक कब्जा करके उसे पार कर लिया गया।गाजियाबाद पर भी महाराजा सूरजमल की प्रतापी सेना ने कब्जा कर लिया।जोरदार तोड़फोड़ की।नजीब का कलेजा हिल गया।उसने तत्काल महाराजा सूरजमल को खत लिखा व उनकी शर्त स्वीकार कर ली और चन्दनकौर को सुरक्षित भेज दिया।और युद्ध विराम करने का आग्रह किया।लेकिन महाराजा सूरजमल को तो वीर हरचंद के बलिदान का भी प्रतिशोध लेना था।उन्होंने उत्तर दिया कि डर क्यों रहे हो नजीब बाहर निकलो मैं इतनी दूर आ गया तुम दो कदम नहीं आ सकते क्या?आजा दम है तो छूकर दिखा चरणों की धूल को ही।महान जाट क्षत्राणी महारानी किशोरी देवी भी मेरे साथ है।

फिर दोबारा से युद्ध शुरू हो गया जाट सेना ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए।नजीब के हालात पतले हो गए थे।ज्यादातर दिल्ली पर भगवा पभुत्व कायम हो गया था।

फिर एक दिन युद्ध चल रहा था तो दोपहर को ही महाराजा सूरजमल को महारानी की चिंता हुई।वे अकेले ही अचानक से उनसे मिलने के लिए शिविर में आ गए।उनको देखकर वे युद्ध देखने लगे गये। उनका पुत्र नाहर सिंह व सेनापति मंशाराम जाट वीरता से लड़ रहे थे।उनका ध्यान उसी तरफ था।तभी एक मुगलों के लुटेरे सरदार ने उन्हें निहत्थे खड़े देख लिए।महाराजा सूरजमल का ध्यान नहीं गया और वे नदी किनारे कुछ सैनिको के साथ टहलने लगे।और युद्ध क्षेत्र से थोड़े दूर निकल गए। झाड़ियों में छिपते छिपते मुगल सैनिक भी वहां आ गए। उन्होंने अचानक से हमला कर दिया।सब वीरता से लड़े थे।परन्तु पीछे से झाड़ियों में से दो तीन गोली मुगल सैनिक की उनके शरीर में लगी।इसके बाद मुगल सैनिकों ने उन पर तलवारों से प्रहार किया।महाराजा सूरजमल शहीद हो गए।पीठ पीछे वार करके धोखे से व युद्ध नियमो का उल्लंघन करके भी मुगल सैनिक डरे हुए थे व उन्हें विस्वास नहीं हो रहा था कि सूरजमल का मरना भी सम्भव है।महाराजा सूरजमल का कोई अंग उनके परिवार को नहीं मिला।सिर्फ एक दांत से ही समाधि बनाई गई थी।

जाट सेना अगले दिन तक अनुशासन में लड़ती रही क्योंकि उन तक एक दिन तक कोई खबर नहीं पहुंची थी।युद्ध अब भी पूर्ण रुप से हिन्दू वीरो के ही हक में था।लेकिन जैसे ही यह खबर उनके बेटे नाहर सिंह तक पहुंची तो वे दुखी हो गए व सेना को वापिस भरतपुर चलने का आदेश दिया और महाराजा सूरजमल की तलाश करने को कहा क्योंकि कई दिनों तक किसी को भी इस अनहोनी पर विस्वास नहीं हुआ था।इस तरह महाराजा सूरजमल अपने जीवन काल में युद्ध के मैदान में कभी भी पराजित नहीं हुए।

उस समय उनके वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह फरुखनगर में थे व नवविजित किलो की रक्षा कर रहे थे। जब यह खबर उन तक पहुंची तो वे प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठे।
आगे आपको बताया जाएगा कि उन्होंने क्या प्रतिज्ञा ली।व किस तरह एक बार फिर दिल्ली पर चढ़ाई की।

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

जय सूरजमल। जय भवानी।

गुड़गांव के शीतला माता मंदिर निर्माण कथा- हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

माता के आशीर्वाद से हिन्दू सम्राटों ने की बढ़ई की कन्या की रक्षा व मन्दिर निर्माण कथा

महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल
शीतला माता मंदिर निर्माण कथा
महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल

गुड़गांव का शीतला माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध व भव्य मंदिर है यहां दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं।महाभारत के समय गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी माता कृपी यहां सती हुई थी।

बात 1750 के आस पास की है।गुड़गांव के पास के गांव(हरियाणा) में एक गरीब बढई रहता था।उसकी एक बहुत सुंदर कन्या थी।उसकी सुंदरता का जिक्र दिल्ली के दरबारों तक भी पहुंच गया था।कहते हैं कि दिल्ली के मुस्लिम बादशाह ने अपने कुछ दूत भेजकर बढई को संदेश भिजवाया कि बादशाह वह अपनी बेटी को 10 दिन के अंदर अंदर दरबार में पहुंचा दे वरना ठीक नहीं रहेगा। बढ़ई बेचारा क्या करता वह रोने लगा।फरियाद लेकर खाप पंचायत के पास गया।पंचायत ने कहा कि बादशाह से लड़ने के लिए बहुत ज्यादा हथियार चाहिए जिसका प्रबंध फिलहाल हमारे पास नहीं है।
इसलिए फैसला हुआ कि वह महाराजा सूरजमल से प्रार्थना जरूर करें।धर्मप्रतापी महाराज उनकी जरूर मदद करेंगे।

बढई ने वैसा ही किया वे भरतपुर दरबार में पहुंचे।और अपनी व्यथा महाराज सूरजमल को सुनाई।महाराजा सूरजमल यह सुनकर क्रोधित हो उठे व तुरंत अपने वीर प्रतापी पुत्र महाराज जवाहर सिंह को बुलाया।और बढ़ई को कहा कि वह निश्चित होकर घर जाए आपकी बेटी हमारी बेटी है।और हम अपनी छत्रछाया में हिन्दुओ की पगड़ी पर कभी भी दाग नहीं लगने देंगे।

उसके बाद उन्होंने हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह को बढई व उसकी कन्या की रक्षा हेतु भेजा।
महाराज जवाहर सिंह अपनी रुद्रांश जाट सेना के साथ चल पड़े।जब रास्ते में माता कृपी की मढ़ी आयी तो उन्होंने वहां माता से विजयश्री का आशीर्वाद मांगा व विजय के बाद ऊनका पक्का मन्दिर बनवाने की प्रतिज्ञा भी ली। कुछ लोगो का कहना है कि माता की मढ़ी के पास आकर महाराज के घोड़े रुक गए थे व आगे नहीं चले।तब ऊनका ध्यान मढ़ी की तरफ गया था।फिर आशीर्वाद प्राप्त किया।

फिर जवाहर सिंह बढ़ई के घर पहुंचे अगले दिन बादशाह के मुस्लिम सैनिक वहां आये तो जवाहर सिंह ने उन्हें बुरी तरह मारा और पिशाच बादशाह को संदेश भेजा कि यह हमारी बहन है आंख उठाकर भी देख लेना।यह तकती पर लिखकर मुस्लीक सैनिको के गले मे टांगकर उन्हें दिल्ली की तरफ भगा दिया।बादशाह ने भी शक्तिशाली महाराज सुरजमल से पंगा लेना ठीक न समझा और अपनी इच्छा त्याग दी।

इस प्रकार महाराजा जवाहर सिंह ने उस कन्या की रक्षा की व वापिस भरतपुर आकर महाराजा जवाहर सिंह ने माता शीतला(कृपी) के बारे में बताया।

 फिर महाराजा सूरजमल ने वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण किया और महाराज जवाहर सिंह ने स्वयं अपने कर कमलों से वहां सवा किलो सोने की मूर्ति स्थापित की।

एक बार फिर कईं सालों बाद किसी बादशाह ने वहां से मूर्ति हटवाकर तालाब में फिंकवा दी थी तो वहां के एक बहुत बड़े जमींदार दादा सिंघा कटारिया जाट ने उस मूर्ति को पुनः स्थापित किया था व अपना महल और बहुत सी जमीन मन्दिर के नाम कर दी थी।कहते हैं कि उस समय माता के भक्त सिंघा जाट के चरणों को छूने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।आज भी दादा सिंघा के वंशज गुड़गांव में रहते हैं।यह मंदिर 500 गज से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है।अब यह मन्दिर सरकार के अधीन है।
हिन्दू वीर शिरोमणि
Maharaja Jawahar Singh

माता शीतला की बहुत मान्यता है और उन्हें मऊ जनपद की कुलदेवी भी माना जाता है।बहुत दूर दूर से भक्त माता की पूजा करने के लिए इस मंदिर में आते हैं और यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

जय शीतला माता की

Thursday, 10 May 2018

महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान

प्रथम दिल्ली विजय अभियान(महाराजा सूरजमल)भाग-1
दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहां जाए-महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजयगाथा भाग -2
पृष्ठभूमि
महाराजा सूरजमल photos
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल ने तलवार की नोंक पर चलकर बहुत ही समझदारी से 1750 तक एक विशाल साम्राज्य बना लिया था।
उन्होंने आस पास के मेव मुस्लिम, रुहेले अफगान,छोटे मुगल परस्त फौजदार, व धर्महीन राजाओ को धीरे धीरे हटा दिया या उन्हें कमजोर कर दिया था।
अब उन्हें तलाश थी कुछ बड़ा करने की।वे मौके की तलाश में थे व दिल्ली की गतिविधियों पर नजर गड़ाए बैठे थे। उन्होंने दिल्ली दरबार के कई महत्वपूर्ण लोगो को अपनी तरफ कर लिया था।

आखिर 1752 में महाराजा सूरजमल के पास वह मौका आ ही गया जिसका इन्हें इंतजार था।दिल्ली के मुगल सुल्तान अहमद शाह व उसके वजीर सफदरजंग के बीच गृह युद्ध छिड़ गया था।
यह वही सफदरजंग था जो एक बार तो महाराजा सुरजमल को युद्ध के मैदान में बुलाकर उनके डर से खुद नहीं पहुंचा था और एक बार उनसे हार भी चुका था।तब इसने माफी मांग ली थी व वफादारी का वादा किया था।

तब यह ग्रह युद्ध जारी रहा दिल्ली के एक सुन्नी व शिया मुसलमान के बीच तनातनी को सुरजमल ने यूं ही चलने दिया और सही मौके का इंतजार करने लगे।
लोहा गर्म होते ही महाराज सूरजमल ने 30 अप्रैल 1753 को सफदरजंग में पक्ष में दिल्ली में ताल ठोक दी। उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।
महाराजा सूरजमल सिर्फ 15000 घुड़सवारों व अपनी पैदल सेना लेकर पहुंचे थे जबकि दिल्ली के मुगल बादशाह अहमद शाह के पास 1.5 लाख की फौज थी।
महाराजा सूरजमल की सेना में जाट, नागा साधू, ब्राह्मण, गुर्जर, दलित, राजपूत आदि सब हिन्दू जाती के लोग थे।
अहमद शाह की सेना में मुस्लिम व कुछ धर्म हिन हिन्दू भी शामिल हुए थे।

30 अप्रैल की रात्रि महाराजा सूरजमल ने फरीदाबाद में बिताई व सुबह गुड़गांव में शीतला माता मंदिर में पूजा की।यह भव्य मंदिर मजराजा सुरजमल ने ही बनवाया था।पहले यहां महाभारतकालीन एक छोटा सा चबूतरा था।

लेकिन महाराजा सूरजमल के पहुंचने से पहले ही सफदरजंग को उसकी सेना में से 23000 मुस्लिम सैनिक धोखा दे गए व दिल्ली के सुल्तान की तरफ जा मिले।
लेकिन महाराजा सूरजमल ने इसकी जरा भी चिंता नहीं की।क्योंकि वे दिल्ली अपने दम पर जितने आये थे सफदरजंग का तो सिर्फ नाम ही था।

आपको बता दें कि महाराजा सूरजमल ने मुख्यतया बड़े लेवल पर दो बार दिल्ली पर आक्रमण किया था व उसे जीता था। एक बार 1753 मे जिसकी हम बात कर रहे हैं और एक बार 1763 में। वैसे उन्होंने दिल्ली पर कुछ अन्य आक्रमण भी किये थे जिनका जिक्र फिर कभी किया जाएगा।

 पुरानी दिल्ली पर भगवा राज
अंतिम हिन्दू सम्राट
महाराजा सूरजमल

(महाराजा सूरजमल दिल्ली में और इस्लाम खतरे में)

सुरजमल महाराज ने युद्ध की रणनीति बनानी शुरू कर दी। महाराजा सुरजमल के हौसले को देखकर मुगल बादशाह घबरा गया उसने अपने एक वकील महबूब द्दीन को औरंगाबाद से मलहराव होल्कर को बुला लाने के लिए भेजा। लेकिन पलवल के निकट रास्ते मे ही उसे महाराजा सूरजमल के सैनिको ने पकड़ लिया व बंदी बना लिया।
फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को उकसाया कि 15000 रूहेले अफगानों के साथ आ रहे नजीब को रास्ते मे ही पकड़ ले लेकिन कायर व अय्याश सफदरजंग इसमे कामयाब न हो सका।

फिर महाराजा सूरजमल ने स्वयं ही मोर्चा संभाला और 9 मई को पुरानी दिल्ली की अनाज मंडी पर हमला कर दिया ताकि मुगलो की रसद राशन की लाइन टूट जाये।
उनके सेनापति राजेन्द्र गिरी गोंसाई के साथ नाग साधु व जाट सैनिकों ने प्रातः 10 मई को अनाज मंडी पर कब्जा कर लिया।इसी पहली जीत की खुशी में हर वर्ष दिल्ली विजय दिवस मनाया जाता है।
राजेन्द्र गिरी गोंसाई एक साधु थे उनकी नागा बाबाओं की सेना महाराजा सूरजमल के दल में शामिल हुई थी जिसका नाम महाराजा सूरजमल ने रामदल सेना रखा था।
इसके बाद महाराजा सूरजमल के वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने लाल दरवाजे के पास शहर के पूर्वी हिस्से, सैयद्द बाड़ा,पँचकुई,अब्दुल्ला नगर, तारक गंज व बिजल मस्जिद के आस पास के इलाकों,चुनरिया,वकिलपुरा पर कब्जा कर लिया। अब पुरानी दिल्ली का ज्यादातर हिस्सा जाटो के कब्जे में था भगवा हर जगह छा रहा था। महाराजा सूरजमल के वीर सिपाही गिरिराज महाराज का जयकारा लगाते हुए दिल्ली की गलियों में राजा की तरह घूम रहे थे। जहां भी मुगल समर्थित मुस्लिम व्यापारी, सैनिक दिखाई दिया वहीं उसका काम तमाम कर दिया गया।
लोगो का खून चूसकर बनाई गई बड़ी बड़ी हवेलियों को तोड़ दिया गया व उनमें जितना भी माल था वह कब्जे में करके सेना के गरीब सैनिको में बांट दिया गया।

पूरे शहर को आतंकित करके तहलका मचा दिया गया। बहुत से मुगल व्यापारी व कर्मचारी मौका देखकर दिल्ली से भाग रहे थे।उनमे से कईयो को जटवाड़ा सिपाहियों ने कब्जे में ले लिया।
उस समय दिल्ली में सफदरजंग की सेना के शिया मुस्लिमो को छोड़कर ऐसा कोई मुस्लिम नहीं था जिसका कलेजा डर के मारे जोर जोर से न धड़क रहा हो।और यह डर जरूरी है।

पुरानी दिल्ली में महाराजा सूरजमल के इस तांडव को देखकर शहंशाह कांपने लग गया था। उसने तुरंत अपने वजीर की छुट्टी कर दी व इन्तिजाम उद दौला को नया वजीर नियुक्त किया।

अहमद शाह ने नारा दिया कि "सुरजमल दिल्ली में है और इस्लाम खतरे में है"
उसने सभी सुन्नी मुस्लिमो को अपने पक्ष में कर लिया व धर्मगुरुओं को भी यह नारा लगाने को कहा कि इस्लाम खतरे में है इन निर्दयी जाटो को सबक सिखाओ।

इस तरह महाराजा सूरजमल ने पुरानी दिल्ली के बहुत से हिस्सो पर कब्जा कर लिया व इस्लाम उनकव देखकर खतरे में आ गया। इसी खौफ भरे दिन को मुगलों के इत्तिहास में में जाटगर्दी के नाम से जाना जाता है।
और इसी दिन जनता का खून चूसने वाले मुगलो की हवेलियां तोड़ने व उनके ऊपर तांडव करने और उनके धन को छीनकर गरीब सैनिको को बांटने को मुगलों की नाजयज औलाद वामपंथी इत्तिहासकर दिल्ली की लूट कहते हैं।

दिल्ली में अलग अलग जगह युद्ध,वीरों के बलिदान

पुरानी दिल्ली के महत्वपूर्ण हिस्सो पर कब्जा करने के बाद मुगल शहंशाह काफी बौखला गया था उसने इस्लाम खतरे में है क्योंकि सुरजमल दिल्ली में है यह कहकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश की।
साथ ही उसने महाराजा सूरजमल को दूत भेजकर दरबार मे भारी सम्मान जागीरें आदि का वादा करके लोभ में लाने की कोशिश की लेकिन हिन्दुआ सम्राट ने शहंशाह के लिये कहा कि कायरता को लोभ लालच से छुपाना छोड़ दो अहमद शाह,अगर बाजुओं में दम है तो मैदान में आकर सीधे लड़ो।
फिर 17 मई को महाराजा सूरजमल ने मुगलो को गाजर मूली की तरह काटकर फिरोजशाह कोटला किले पर कब्जा कर लिया।मुगल सेना ने किले पर तोपें चढ़ा दी व गोले फेंके लेकिन हिन्दू वीर जाट अपनी जगह पर अडिग खड़े रहे और धीरे धीरे मुगलिया सेना को खत्म करने लग गए और हिन्दू वीर सेना के सामने मुगल नहीं टिक सके।

इसी बीच छोटे मोटे हमले चलते रहे।12 जून को ईदगाह के ब
पास एक मुठभेड़ हुई। निहत्थे हिन्दू सैनिकों पर मुगलो ने अच्चानक हमला कर दिया।इस युद्ध मे कई हिन्दू वीर जाट सैनिक शहीद हुए।
14 जून को तालकटोरा की लड़ाई हुई जिसमें मुगलों की बक्कल सी उतार दी गयी।इस युद्ध मे महाराजा सूरजमल के एक वीर उपसेनापति राजेंद्रगिरी गौसाई शहीद हो गए जिससे बहुत बड़ा झटका जाट सेना को लगा। लेकिन मुगलों की सेना इससे भी ज्यादा हिल चुकी थी।यहां एक वीर सेनापति सुरतिराम जी भी शहीद हुए।

तालकटोरा लड़ाई को भले ही जीत लिया गया हो लेकिन यह बहुत बड़ा झटका था।सफदरजंग की सेना के बहुत से सैनिक व उसके रिश्तेदार महाराजा सूरजमल को छोड़कर शहंशाह की सेना में चले गए।

शनशाह ने राजा देवी दत्त और रामनाथ को महाराजा सूरजमल से शांति वार्ता व सन्धि के लिए भेजा लेकिन यह असफल रही। दिल्ली का मुगल बादशाह थर्रा रहा था कि यह किस मिट्टी का बना हुआ है?

इसी बीच एक जुलाई को एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें तोपखाने को बड़े स्तर पर प्रयुक्त किया गया।शहीद सुरतिराम का भाई जाट बख्शी गौकुलराम अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था और इस सेना में वह हत्यारा भी था। गौकुलराम ने क्रुद्ध होकर जाट सेना के साथ मुगलो पर हमला कर दिया। इस भयंकर युद्ध मे मुगलो के पांव उखेड़ दिए।मुगल भाग खड़े हुए लेकिन गौकुलराम को एक गोला लगा जिसमे वह बुरी तरह से घायल हो गया। महाराजा सूरजमल ने उसे सम्भाल उसके अंतिम शब्द यही थे कि महाराज जी उनका पीछा करो वे बचने नहीं चाहिए। महाराजा सूरजमल को अपने वीर बक्शी की मृत्यु का बहुत धक्का लगा उन्होंने बिजली से वेग से मुगलो का पीछा किया व दोनो वीरों की शहादत के जिम्मेदार दुष्टो व अनेकों मुगल सैनिको को काटकर फेंक दिया।

फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को कहा कि हमें शत्रु को खुले में सीधे आमने सामने भिड़ने के लिए  मजबूर किया जाए। इसलिए रणनीति के तहत महाराजा सूरजमल 16 जुलाई को वीर भूमि तिलपत पहुंच गए।
तिलपत वहीं वीर भूमि है जहां पर वीर गौकुला के नेतृत्व में धर्म रक्षा हेतु औरँगेजेब के खिलाफ लड़ते हुए हजारों जाट शहीद हुए थे।

इसी बीच मुगलों की रूहेला फौज ने दिल्ली के पास के कुछ इलाकों में रात्रि को आम नागरिकों पर हमला किया व धन दौलत लूटी और कई औरतों का अपमान किया।

इस पर हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने बेटे वीर जवाहर सिंह, बल्लभगढ के राजा बलराम सिंह व उनके साथ ही राज गुजर को रुहेलों को दंड देने के लिए भेजा।महाराजा जवाहर सिंह ने रुहेलों के किले गढ़ी मैदान पर हमला कर दिया।एक लंबी व भीषण लड़ाई छिड़ गई। रुहेले मुल्लो को गाजर मूली की तरह काट दिया गया।सिर्फ वे ही बचे जो युद्ध के बीच मे ही मौका देखकर भाग निकले थे।इस तरह महाराज जवाहर सिह ने हिन्दुओ के अपमान का बदला लिया।

मुगलिया सल्तनत हिल गयी थी लेकिन इसी बीच 2000 जेटा गुजर व 4000 मराठे मुगलो के पक्ष में आ गए। मुगलो ने उन्हें लड़ने के लिए पैसा देने का वादा किया था।

लेकिन अब भी महाराजा सूरजमल ने जरा भी चिंता नहीं की।
30 जुलाई रमजान के दिन महाराजा सूरजमल व शाही सेना के बीच झड़प हुई लेकिन अंततः मुगलो को ही भागना पड़ा।रमजान की नमाज उनके भाग में नहीं रहने दी गई।
इसी तरह कई जगह छिटपुट लड़ाई चली रही।19 जुलाई को जाट सेनापति शिवसिंह व मुगल सेना समर्थित मराठे आमने सामने हो गए।एक दिशन युद्ध हुआ बहुत से जाट व मराठे मारे गए। हिन्दू वीर शिवसिंह अपनी धर्मरक्षा पर अडिग रहे उनके पांव में एक भाला लग गया जिसके कारण वे घायल हो गए। युद्ध अनिर्णायक रहा।रात्रि होते ही युद्ध समाप्त हो गया हिन्दू वीर जाट व मुगल समर्थित मराठे अपने अपने शिविरों में चले गए।
शिवसिंह का यह घाव संक्रमित हो गया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी।

फिर 5-6 सितंबर को 5000 जटवाड़ा सिपाही फरीदाबाद में मुगलो से भिड़ गए। मुगलिया सेना को मैदान छोड़कर भागना पड़ा।मुगलो की रसद का मार्ग काट दिया गया। हालांकि इस कार्यवाही में वीर जाट सरदार मोहकम सिंह जी शहीद हो गए।

इसके बाद मुगलों का सेनापति इमाद बुरी तरह से घबरा गया था उसने होल्कर व शिंदे से सहायता मांगी व उन्हें 1 करोड़ रुपए व अवध और इलाहाबाद की सूबेदारी देने का वादा किया।इससे मुगलों की ताकत और बढ़ गयी।

तगलकाबाद के यमुना तट पर भी मराठों व जाटों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ।यह ययध लंबा चला लेकिन अंत मे मुगल समर्थित मराठों को ही पीछे हटना पड़ा।
यहां महाराजा सूरजमल के वीर पुरोहित घमंडीराम(ब्राह्मण) जी घायल हो गए थे। महाराजा सूरजमल स्वयं उन्हें अपने घोड़े पर बैठाकर शिविर में लेकर गए व वहां उपचार शुरू करवाया।

दिल्ली की तरफ से फिर समझौते के लिए निमंत्रण आया लेकिन विफल रहा।

इस समय तक महाराजा सूरजमल दिल्ली के बहुत से हिस्सों पर काबिज थे लेकिन अब मुगलों के सेनापति इमाद की शक्ति बढ़ती जा रही थी।उसकी सेना की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।जिसकी चिंता महाराजा सूरजमल को ही नहीं बल्की मुगल शंहशाह अहमद शाह को भी हो रही थी। अब मुगल बादशाह को लग रहा था कि अगर सुरजमल से पीछा छूट गया तो इमाद से कौन बचाएगा उसे डर था कि कहीं इमाद बाद में विद्रोह न कर  दे व स्वयं राजा ना बन जाये।
अब मुगल बादशाह को सुरजमल के अलावा इमाद का भी भविष्य में डर था।
महाराजा सूरजमल की सेना सशक्त थी लेकिन अब इमाद की सेना संख्या में इतनी हो गयी थी के सशक्ति से भी काम न चलना था।

कायर मुगल बादशाह ने जयपुर के महाराजा माधो सिंह कच्छवाहा को सन्धि करवने के लिए बुलाया।

अंतिम महान युद्ध
आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें- महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजयगाथा -भाग 2



Tuesday, 17 April 2018

इस्लामिक आतंकी तैमूर vs हिन्दू वीर राजा देवपाल राणा की सेना(भाग-1)

इस्लामिक आतंकी तैमूर vs राजा देवपाल राणा की सेना- (भाग-1)
Hindu veer Raja Devpal Rana
Raja Devpal Rana

तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर 92000 घुड़सवारों समेत ढाई लाख की सेना से तूफानी आक्रमण कर दिया। तैमूर के सार्वजनिक कत्लेआम, लूट खसोट और सर्वनाशी अत्याचारों की सूचना मिलने पर

संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) कार्तिक बदी 5 को
राजा देवपाल राणा (जिनका जन्म निरपुड़ा गांव जि० मेरठ में एक जाट घराने में हुआ था) की अध्यक्षता में हरयाणा सर्वखाप पंचायत का अधिवेशन जि० मेरठ के गाँव टीकरी, निरपड़ा, दोगट और दाहा के मध्य जंगलों में हुआ।

सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये -

(1) सब गांवों को खाली कर दो।
(2) बूढे पुरुष-स्त्रियों तथा बालकों को सुरक्षित स्थान पर रखो।
(3) प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति सर्वखाप पंचायत की सेना में भर्ती हो जाये।
(4) युवतियाँ भी पुरुषों की भांति शस्त्र उठायें।
(5) दिल्ली से हरद्वार की ओर बढ़ती हुई तैमूर की सेना का छापामार युद्ध शैली से मुकाबला किया जाये तथा उनके पानी में विष मिला दो।
(6) 500 घुड़सवार युवक तैमूर की सेना की गतिविधियों को देखें और पता लगाकर पंचायती सेना को सूचना देते रहें।
पंचायती सेना - पंचायती झण्डे के नीचे 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये। इन वीरांगनाओं ने युद्ध के अतिरिक्त खाद्य सामग्री का प्रबन्ध भी सम्भाला। दिल्ली के सौ-सौ कोस चारों ओर के क्षेत्र के वीर योद्धा देश रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने रणभूमि में आ गये। सारे क्षेत्र में युवा तथा युवतियां सशस्त्र हो गये।

इस सेना को एकत्र करने में चौधरी धर्मपालदेव जाट योद्धा जिसकी आयु 95 वर्ष की थी, ने बड़ा सहयोग दिया था। उसने घोड़े पर चढ़कर दिन रात दूर-दूर तक जाकर नर-नारियों को उत्साहित करके इस सेना को एकत्र किया। उन्होंने तथा उनके भाई दानवीर चौधरी करणपाल सिंह ने इस सेना के लिए अन्न, धन तथा वस्त्र आदि का प्रबन्ध किया।

प्रधान सेनापति, उप-प्रधान सेनापति तथा सेनापतियों की नियुक्ति

सर्वखाप पंचायत के इस अधिवेशन में सर्वसम्मति से वीर योद्धा जोगराजसिंह गुर्जर को प्रधान सेनापति बनाया गया। यह  योद्धा जो हरद्वार के पास एक गाँव कुंजा सुन्हटी का निवासी था। जोगराजसिंह विख्यात पहलवान था। उसका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन था। उसकी दैनिक खुराक चार सेर अन्न, 5 सेर सब्जी-फल, एक सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध।

महिलाएं वीरांगनाओं की सेनापति चुनी गईं उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) वीरांगना हरदेई जाट युवति (2) रामप्यारी गुर्जर युवति (3) देवीकौर राजपूत युवति (4) चन्द्रो ब्राह्मण युवति (5) रामदेई त्यागी युवति। इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

उपप्रधान सेनापति - (1)महावीर हरवीर सिंह गुलिया जाट (2) धुला भंगी (बाल्मीकि) चुने गये।

उपप्रधान सेनापति हरबीरसिंह जाट था जिसका गोत्र गुलिया था। यह हरयाणा के जि० रोहतक गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह न

धूला भंगी जि० हिसार के हांसी गांव (हिसार के निकट) का निवासी था। यह महाबलवान्, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी (बड़ा महान् डाकू) था जिसका वजन 53 धड़ी था।

उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि - “मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर राजा देवपाल राणा व प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर योद्धा धूला के भाषण से

पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से हर हर महादेव और मातृभूमि के नारे लगाये।

सेनापतियों का निर्वाचन - उनके नाम इस प्रकार हैं - (1) #गजेसिंह जाट गठवाला (2) तुहीराम राजपूत (3) मेदा रवा (4) सरजू ब्राह्मण (5) उमरा तगा (त्यागी) (6) दुर्जनपाल अहीर।

जो उपसेनापति चुने गये - (1) कुन्दन जाट (2) धारी गडरिया जो धाड़ी था (3) भौन्दू सैनी (4) हुल्ला नाई (5) भाना जुलाहा (हरिजन) (6) अमनसिंह पुंडीर राजपुत्र (7) नत्थू पार्डर राजपुत (8) दुल्ला (धाड़ी) जाट जो हिसार, दादरी से मुलतान तक धाड़े मारता था। (9) मामचन्द गुर्जर (10) फलवा कहार।

सहायक सेनापति - भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये।

वीर कवि - प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था।

इसके बाद राजा देवपाल राणा, चौधरी धर्मपाल देव जाट व जोगराज सिंह गुर्जर ने ओजस्वी भाषणों से वीरों में जोश भरा।
प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश -

“वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर योद्धा रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”
इन भाषणों को सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों को चूमकर राजा साहब और सेनापति का आह्वाहन कड़ते हुए प्रण किया कि हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।

आगे के भाग में पढ़िए की किस्य प्रकार राजा देवपाल राणा की इस पंचायती सेना ने इस्लामिक आतंकी तैमूर के छक्के छुड़ा दिए।
कैसे उप सेनापति महावीर हरवीर गुलिया ने तैमूर की छाती में भाला मारा व बलिदान दिया।
कैसे प्रधान जोगराज गुर्जर ने व अन्य सेनापतियों तथा वीरांगना हरदेई जाट व अन्य वीरांगनाओं ने तैमूर की सेना  की कमर तोड़ी।

हिन्दू वीर जाट राजा देवपाल राणा व सर्वखाप पंचायत के झंडे तले सब जातियों के हिंदुओं ने इस्लामिक आतंकियों का सामना किया व अपने देश और धर्म की रक्षा की।

अभी जारी है.... भाग 2 के लिए क्लिक करें 👉http://jatwada.blogspot.in/2018/04/blog-post.html?m=1

Sunday, 1 October 2017

गौरक्षक पीपल रक्षक हिन्दू सम्राट महाराजा सूरजमल

जानिए उनके एक जबरदस्त युद्ध के बारे में-


मीर बक्शी ने 30 दिसंबर 1749 को मेवात पर आक्रमण कर दिया।
और नीमराना किले पर कब्जा कर लिया।इस विजय की खुशी में मीर बक्शी की सेना ने गौमाता को काटना शुरू कर दिया हिन्दुओ को नीचा दिखाने के लिए पीपल के पेड़ व मंदिरों को हटाना शुरू कर दिया।

इसका पता चलते ही 1 जनवरी 1750 को महाराजा सूरजमल ने अपने 5000 से 6000सैनिकों के साथ
नीमराणा पर अटैक कर दिया।मध्य प्रदेश के गोहद के जाट राजा भीम सिंह राणा के 200 घुड़सवार भी सुरजमल की सेना में शामिल हुए।

इस युद्ध मे मीर बक्शी के सेनापति हकीम खान और रुस्तम खान हजारो सैनिको के साथ बुरी तरह मारे गए।
और उनकी सारी सप्लाई काट दी गयी और मेरे बक्शी की सेना बंदी बना ली गयी।

मीर बक्शी जो कहीं दूसरे शहर में भागकर छुप गया था वह बाहर नही निकला और उसने किसी को भेजकर दया की भीख मांगी।
तब एक संधि की गई जिसकी शर्ते निम्नलिखित थी-

1.मीर बक्शी का कोई भी सैनिक अपने राज्य व बाहर गौहत्या नही करेगा।
2.कोई भी सनातन संस्कृति के प्रतीक पीपल के पेड़ को नही काटेगा।
3.कोई भी हिन्दू मंदिरों को नुकसान नही पहुंचाएगा और न ही हिन्दुओ की उपासना में व्यवधान पहुंचाएगा।

इस तरह मीर बक्शी ने महाराजा सूरजमल को युद्ध का सारा खर्चा भी वापिस किया और उसने कसम खाई के वह दोबारा ऐसा कभी नही करेगा।

जय हो हिन्दू ह्रदय सम्राट सूरज सुजान की।
जय जटवाड़ा।जय भारत।जय सनातन।
Maharaja Surajmal, hindu, veer, हिन्दू ह्रदय सम्राट, युद्ध, अंतिम हिन्दू सम्राट