Showing posts with label Jat. Show all posts
Showing posts with label Jat. Show all posts

Thursday, 9 August 2018

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान-बलिदान गाथा

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान व बलिदान गाथा-1763

महाराजा सूरजमल
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की नजरों में दिल्ली सदा खटकती रहती थी।वे दिल्ली को मुगलों से मुक्त करवाकर गुलामी का कलंक धोने की इच्छा रखते थे। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1753 में भी दिल्ली पर आक्रमण किया था व ज्यादातर जीत ली थी। पर कुछ गद्दारों के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी थी।

बात 1763 की है दिल्ली के मुगल दरबार मे एक ब्राह्मण काम करता था।उसकी बेटी चन्दनकौर बहुत सुंदर व धर्म परायण थी। बादशाह ने एक दिन उसे देख लिया और उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की।लेकिन धर्मपरायण चन्दनकौर ने शादी से मना कर दिया तो बादशाह ने उसे जेल में डाल दिया।वहां एक मेहतरानी ने चन्दनकौर को सलाह दी के पूरे हिंदुस्तान में सिर्फ एक ही हिन्दू सम्राट है जो अबलाओं व धर्म की रक्षा करने के लिए दिल्ली से भी टक्कर ले सकता है।और वह है भरतपुर में बैठे जटवाड़े के शासक महाराजा सूरजमल।
किसी तरह से चन्दनकौर ने खत लिखकर अपनी माता के माध्यम से अपना दुःख महाराजा सूरजमल के दरबार तक पहुंचाया।
महाराजा सूरजमल ने जब खत पढ़ा और उसकी माता की व्यथा सुनी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।परन्तु दिल्ली से टक्कर लेने का मतलब था पूरे हिंदुस्तान से टक्कर लेना।हर मुसलिम से व हर सेक्युलर हिन्दू से टक्कर लेना।और इसके लिए सालो मेहनत की आवश्यकता होती है।परन्तु उन्होंने कुछ भी न सोचा और अपना  वीर सैनिक हरचंद गुर्जर को दिल्ली भेजा।

वहां जाकर हरचंद ने महाराजा सूरजमल का संदेश नजीब को सुनाया व चन्दनकौर को रिहा करने का आदेश सुनाया।मगर नजीब ने कुछ न सोचा उस मूर्ख ने हरचंद के साथ साथ महाराजा सूरजमल को भी अपमानित करने के लिए कहा कि जा उस सूरजमल को कह देना की अपनी जाटनी भी साथ ले आएगा।महारानी का अपमान सुनते ही वीर हरचंद ने अपनी तलवार निकाली और कहा कि नजीब अगर महाराज दिल्ली आए तो गिड़गिड़ायेगा तू हम अपनी माता व अपने राज्य का अपमान कभी नही सहेंगे।यह कहते हुए उसने नजीब पर हमला बोल दिया लेकिन पूरा दरबार ही नजीब का था।चारों तरफ से सैनिकों ने हमला कर दिया।जिसमें कई मुल्लो को मारकर हरचंद शहीद हो गया।

यह खबर महाराजा सूरजमल तक पहुंची तो वे आग बबूला हो उठे।और अपनी सेना को दिल्ली की ओर मुख करने का आदेश दिया।चूंकि महाराजा सूरजमल दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी पहले से ही कर रहे थे परंतु सही समय नहीं आया था।इस घटना के होने के कारण उन्होंने पहले ही आक्रमण करने की ठान ली।
तैयारियां पूरी नहीं थी उनके मंत्री रूपाराम कटारा ने उन्हें समझाया भी।मगर महाराजा ने कहा कि एक दुष्ट एक हिन्दू बेटी को कैद किये हुए है  और हम सबको ललकार रहा है।हमारे दूत भेजे हुए वीर सैनिक को भी उसने नहीं बख्शा।उनके मंत्री ने कुलपुरोहित से भी कहलवाया कि यह समय ग्रहदशा के अनुसार ठीक नहीं है।परन्तु महाराजा सूरजमल ने कहा कि वीर जब चले तभी समय है।विजय या वीरगति।

आखिरकार दिल्ली पर आक्रमण कर दिया गया।हिंडन नदी तक कब्जा करके उसे पार कर लिया गया।गाजियाबाद पर भी महाराजा सूरजमल की प्रतापी सेना ने कब्जा कर लिया।जोरदार तोड़फोड़ की।नजीब का कलेजा हिल गया।उसने तत्काल महाराजा सूरजमल को खत लिखा व उनकी शर्त स्वीकार कर ली और चन्दनकौर को सुरक्षित भेज दिया।और युद्ध विराम करने का आग्रह किया।लेकिन महाराजा सूरजमल को तो वीर हरचंद के बलिदान का भी प्रतिशोध लेना था।उन्होंने उत्तर दिया कि डर क्यों रहे हो नजीब बाहर निकलो मैं इतनी दूर आ गया तुम दो कदम नहीं आ सकते क्या?आजा दम है तो छूकर दिखा चरणों की धूल को ही।महान जाट क्षत्राणी महारानी किशोरी देवी भी मेरे साथ है।

फिर दोबारा से युद्ध शुरू हो गया जाट सेना ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए।नजीब के हालात पतले हो गए थे।ज्यादातर दिल्ली पर भगवा पभुत्व कायम हो गया था।

फिर एक दिन युद्ध चल रहा था तो दोपहर को ही महाराजा सूरजमल को महारानी की चिंता हुई।वे अकेले ही अचानक से उनसे मिलने के लिए शिविर में आ गए।उनको देखकर वे युद्ध देखने लगे गये। उनका पुत्र नाहर सिंह व सेनापति मंशाराम जाट वीरता से लड़ रहे थे।उनका ध्यान उसी तरफ था।तभी एक मुगलों के लुटेरे सरदार ने उन्हें निहत्थे खड़े देख लिए।महाराजा सूरजमल का ध्यान नहीं गया और वे नदी किनारे कुछ सैनिको के साथ टहलने लगे।और युद्ध क्षेत्र से थोड़े दूर निकल गए। झाड़ियों में छिपते छिपते मुगल सैनिक भी वहां आ गए। उन्होंने अचानक से हमला कर दिया।सब वीरता से लड़े थे।परन्तु पीछे से झाड़ियों में से दो तीन गोली मुगल सैनिक की उनके शरीर में लगी।इसके बाद मुगल सैनिकों ने उन पर तलवारों से प्रहार किया।महाराजा सूरजमल शहीद हो गए।पीठ पीछे वार करके धोखे से व युद्ध नियमो का उल्लंघन करके भी मुगल सैनिक डरे हुए थे व उन्हें विस्वास नहीं हो रहा था कि सूरजमल का मरना भी सम्भव है।महाराजा सूरजमल का कोई अंग उनके परिवार को नहीं मिला।सिर्फ एक दांत से ही समाधि बनाई गई थी।

जाट सेना अगले दिन तक अनुशासन में लड़ती रही क्योंकि उन तक एक दिन तक कोई खबर नहीं पहुंची थी।युद्ध अब भी पूर्ण रुप से हिन्दू वीरो के ही हक में था।लेकिन जैसे ही यह खबर उनके बेटे नाहर सिंह तक पहुंची तो वे दुखी हो गए व सेना को वापिस भरतपुर चलने का आदेश दिया और महाराजा सूरजमल की तलाश करने को कहा क्योंकि कई दिनों तक किसी को भी इस अनहोनी पर विस्वास नहीं हुआ था।इस तरह महाराजा सूरजमल अपने जीवन काल में युद्ध के मैदान में कभी भी पराजित नहीं हुए।

उस समय उनके वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह फरुखनगर में थे व नवविजित किलो की रक्षा कर रहे थे। जब यह खबर उन तक पहुंची तो वे प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठे।
आगे आपको बताया जाएगा कि उन्होंने क्या प्रतिज्ञा ली।व किस तरह एक बार फिर दिल्ली पर चढ़ाई की।

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

जय सूरजमल। जय भवानी।

गुड़गांव के शीतला माता मंदिर निर्माण कथा- हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

माता के आशीर्वाद से हिन्दू सम्राटों ने की बढ़ई की कन्या की रक्षा व मन्दिर निर्माण कथा

महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल
शीतला माता मंदिर निर्माण कथा
महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल

गुड़गांव का शीतला माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध व भव्य मंदिर है यहां दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं।महाभारत के समय गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी माता कृपी यहां सती हुई थी।

बात 1750 के आस पास की है।गुड़गांव के पास के गांव(हरियाणा) में एक गरीब बढई रहता था।उसकी एक बहुत सुंदर कन्या थी।उसकी सुंदरता का जिक्र दिल्ली के दरबारों तक भी पहुंच गया था।कहते हैं कि दिल्ली के मुस्लिम बादशाह ने अपने कुछ दूत भेजकर बढई को संदेश भिजवाया कि बादशाह वह अपनी बेटी को 10 दिन के अंदर अंदर दरबार में पहुंचा दे वरना ठीक नहीं रहेगा। बढ़ई बेचारा क्या करता वह रोने लगा।फरियाद लेकर खाप पंचायत के पास गया।पंचायत ने कहा कि बादशाह से लड़ने के लिए बहुत ज्यादा हथियार चाहिए जिसका प्रबंध फिलहाल हमारे पास नहीं है।
इसलिए फैसला हुआ कि वह महाराजा सूरजमल से प्रार्थना जरूर करें।धर्मप्रतापी महाराज उनकी जरूर मदद करेंगे।

बढई ने वैसा ही किया वे भरतपुर दरबार में पहुंचे।और अपनी व्यथा महाराज सूरजमल को सुनाई।महाराजा सूरजमल यह सुनकर क्रोधित हो उठे व तुरंत अपने वीर प्रतापी पुत्र महाराज जवाहर सिंह को बुलाया।और बढ़ई को कहा कि वह निश्चित होकर घर जाए आपकी बेटी हमारी बेटी है।और हम अपनी छत्रछाया में हिन्दुओ की पगड़ी पर कभी भी दाग नहीं लगने देंगे।

उसके बाद उन्होंने हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह को बढई व उसकी कन्या की रक्षा हेतु भेजा।
महाराज जवाहर सिंह अपनी रुद्रांश जाट सेना के साथ चल पड़े।जब रास्ते में माता कृपी की मढ़ी आयी तो उन्होंने वहां माता से विजयश्री का आशीर्वाद मांगा व विजय के बाद ऊनका पक्का मन्दिर बनवाने की प्रतिज्ञा भी ली। कुछ लोगो का कहना है कि माता की मढ़ी के पास आकर महाराज के घोड़े रुक गए थे व आगे नहीं चले।तब ऊनका ध्यान मढ़ी की तरफ गया था।फिर आशीर्वाद प्राप्त किया।

फिर जवाहर सिंह बढ़ई के घर पहुंचे अगले दिन बादशाह के मुस्लिम सैनिक वहां आये तो जवाहर सिंह ने उन्हें बुरी तरह मारा और पिशाच बादशाह को संदेश भेजा कि यह हमारी बहन है आंख उठाकर भी देख लेना।यह तकती पर लिखकर मुस्लीक सैनिको के गले मे टांगकर उन्हें दिल्ली की तरफ भगा दिया।बादशाह ने भी शक्तिशाली महाराज सुरजमल से पंगा लेना ठीक न समझा और अपनी इच्छा त्याग दी।

इस प्रकार महाराजा जवाहर सिंह ने उस कन्या की रक्षा की व वापिस भरतपुर आकर महाराजा जवाहर सिंह ने माता शीतला(कृपी) के बारे में बताया।

 फिर महाराजा सूरजमल ने वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण किया और महाराज जवाहर सिंह ने स्वयं अपने कर कमलों से वहां सवा किलो सोने की मूर्ति स्थापित की।

एक बार फिर कईं सालों बाद किसी बादशाह ने वहां से मूर्ति हटवाकर तालाब में फिंकवा दी थी तो वहां के एक बहुत बड़े जमींदार दादा सिंघा कटारिया जाट ने उस मूर्ति को पुनः स्थापित किया था व अपना महल और बहुत सी जमीन मन्दिर के नाम कर दी थी।कहते हैं कि उस समय माता के भक्त सिंघा जाट के चरणों को छूने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।आज भी दादा सिंघा के वंशज गुड़गांव में रहते हैं।यह मंदिर 500 गज से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है।अब यह मन्दिर सरकार के अधीन है।
हिन्दू वीर शिरोमणि
Maharaja Jawahar Singh

माता शीतला की बहुत मान्यता है और उन्हें मऊ जनपद की कुलदेवी भी माना जाता है।बहुत दूर दूर से भक्त माता की पूजा करने के लिए इस मंदिर में आते हैं और यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

जय शीतला माता की

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का दिल्ली पर आक्रमण

महाराजा जवाहर सिंह का राजतिलक व प्रतिशोध की प्रतिज्ञा और तैयारी

जाट क्षत्रिय महाराजा
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास के समय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह फरूखनगर में थे। उनको अगले दिन इसका समाचार मिला तो वे क्रोधित व व्याकुल हो उठे। उनके मन में प्रतिशोध की ज्वाला उठने लगी।
उधर भरतपुर में उत्तराधिकार के लिए लड़ाई शुरू हो गयी व षड्यन्त्र रचे जाने लगे। यह पता चलते ही जवाहर सिंह ने सभी को फटकारा व घोषणा कि के जवाहर सिंह, महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या का बदला लेगा।प्रजा व राज्य के सम्मान के लिए वह ये कार्य करेगा और इसका कुछ समाधान होने के बाद ही उत्तराधिकार की बात होगी। उत्तराधिकार और राज पाट के लिए लड़ते हुए शर्म आनी चाहिए। यह सुनकर सबको अपनी गलती का अहसास हुआ व विरोधी अपनी चौकड़ी भूल गए।

उसके बाद महाराज जवाहर सिंह डीग पहुंचे और पिताजी की शोक सभा के पश्चात सबका समर्थन इकट्ठा किया अपने पिता की शोक सभा के बाद उन्होंने प्रतिशोध की बात दोहराई व अपनी रणनीति बताई।जनता ने भी उन्हें खुला समर्थन दिया।उन्होंने गोवर्धन में महाराज की छतरी बनवाई। जिसके पश्चात 30 दिसम्बर 1763 को कुलपुरोहित घमंडीराम व राजगुरु महंत रामकिशन ने ऊनका राज तिलक किया।

आस पास के पड़ोसी व अन्य शक्तिशाली हिन्दू राज्यो को पत्र लिखे व दूत भेजे के अब दिल्ली को आजाद कराना है।

उन्होंने सीखो मराठो को पत्र लिखे और कहा कि वे उन्हें कीमत देने को तैयार है और इस धर्म कार्य मे उनका सहयोग करें।
पेशवा को अपने मित्र से पत्र लिखवाया कि हम आपके हितेषी और आज की स्तिथि में जवाहर आपका सब हिन्दुओ में एकमात्र व सबसे बड़ा हितैषी है।

उन्होंने अपने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से रुहेले व अन्य मुस्लिमो को खदेड़ दिया।जब कुछ मुस्लिम नवाबो ने जटवाड़े की ओर कदम बढ़ाए तो सिख सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने दूसरी तरफ आक्रमण कर दिया जिस कारण उन नवाबों को अपनी राजधानी बचाने के लिए वापिस आना पड़ा।

इससे महाराज जवाहर सिंह को समय मिल गया व उन्होंने दरबार के अपने विरोधियों को अपने पाले में कर लिया। इस काम मे महारानी किशोरी देवी,रानी हंसिया व महंत रामकिशन ने उनकी बहुत मदद की।उनकी माताओं ने उनकी आर्थिक सहायता की।

उन्होंने एक श्री हनुमान गोल सेना का भी निर्माण किया। और सेना की संख्या बढ़ाई।

यह सब देखकर दिल्ली का बादशाह नजीबुद्दौला डर गया क्योंकि जवाहर सिंह की तैयारी अकेले प्रतिशोध की ही नहीं दिल्ली के विनाश व धर्म की लड़ाई बनती जा रही ह जिस्के कारण उन्हें खुला समर्थन मिल रहा है।

उसने जवाहर सिंह को पत्र लिखा व क्षमा मांगी और खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश की। मित्रता का हाथ बढ़ाया और शांति के लिए भीख मांगी। उसने कहा कि वह पराक्रमी महाराजा सूरजमल के बेटे से युद्ध नहीं करना चाहता।इसमें बहुत नुकसान होगा मैं बर्बाद हो जाऊंगा तो क्या आपके पिता वापिस आ जाएंगे।इसमें बलूची डाकुओं की गलती है उन्होंने महाराज के साथ धोखा किया है।

नजीब ने अन्य मर्राठा व जयपुर आदि हिन्दू राजाओ को  भी जवाहर सिंह को समझाकर रोकने के लिए पत्र लिखा।

लेकिन सब व्यर्थ गया।अब जवाहर सिंह ने लगभग 90 हजार से 1 लाख की हिन्दू सेना तैयार कर ली थी।

 दिल्ली में युद्ध लड़ने की बजाय खुद को बचाने की तैयारियां हो रही थी। उन्होंने फाटक बंद कर लिए व बादशाह ने खुद को सुरक्षित करने पर ज्यादा जोर दिया।

इस युद्ध को दूसरे पानीपत के युद्ध के रूप में जाना जाता है।क्योंकि मराठा व अब्दाली के पानीपत संग्राम के बाद यह दूसरा मौका था कि एक बड़ी संख्या में व पूर्ण तैयारी के साथ हिन्दू सेना संस्क्रति व देश की रक्षा के लिए मुस्लिम सत्ता से भिड़ने जा रही थी। इस युद्ध का अब मुख्य मकसद दिल्ली से मुगल सत्ता का विनाश बन गया था।

बन्द करलयो फाटक भाई,जवाहर आवेगा,
गुस्से में है लाल सूरज का,मुगला री दिल्ली न तोड़ेगा।
कट्ठे होके छुप जाओ सारे,एक एक न कसूता फोड़ेगा।।

दिल्ली विजय अभियान-महाराजा जवाहर सिंह(1764)

जाट महाराजा
Maharaja Jawahar Singh

महाराजा जवाहर सिंह ने एक विशाल समाहरोह करके जनता को एकत्रित किया व ओजस्वी भाषण दिया कि हमें महाराज के साथ हुए धोखे व उनकी हत्या व पानीपत के हर संहार का मुगलो से प्रतिशोध लेना है।और दिल्ली को आजाद करवाकर अपने धर्म व संस्कृति को आजाद करवाना है। भले ही इसके लिए कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े।

यह सुनकर नागरिकों में हौसला आ गया।युवक सेना में भर्ती होने लगे।उन्होंने सिखों मराठों गोहद जयपुर आदि अनेकों हिन्दू शासकों को पत्र लिखकर सहायता मांगी व कीमत देने का भी प्रलोभन दिया।गोहद, मराठो व सीखो ने सहायता देने का वादा किया।

इस तरह महाराज ने 20,000 मल्हारराव होल्कर व 15,000 सिख जाटो और गोहद की 5,000 सेना समेत लगभग 1 लाख सैनिको के विशाल दल के साथ दिल्ली पर फिर से हिन्दू संस्कृति को मजबूत करने का इरादा किया।

उन्होंने भरतपुर दुर्ग के महलों के सामने हनुमान जी की प्रतिमा लगवाई और पण्डित रूपराम कटारा को काफी आभूषण व धन दान दिया।फिर उन्होंने अपने कुलदेव भगवान लक्ष्मण व कुलदेवी माता राजश्रीदेवी की पूजा की। और गोवर्धन की तरफ से दिल्ली दरवाजे से गिरिराज महाराज का नारा लगाते हुए दिल्ली के लिए प्रस्थान किया।गोवर्धन में उन्होंने अपने पूर्वज श्री कृष्ण  भगवान की पूजा की व महाराजा सूरजमल की समाधि से आशीर्वाद लिया।और फिर बल्लभगढ में जाकर अपना डेरा डाला। उधर दिल्ली के मुगल बादशाह की घिग्गी बंधी हुई थी।वह बार बार पत्र लिखकर जवाहर सिंह को युद्ध न करने के लिए गिड़गिड़ा रहा था।
मल्हारराव भी अपने 20,000 सैनिको के साथ आकर मिल गए।

बल्लभगढ में 4 अक्टूबर 1764 को दशहरे के दिन उन्होंने पूजा की व दान दक्षिण करके दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने नजीब की सेना के छक्के छुड़ा दिए।मुगल सैनिको की देह को जटवाड़ी तलवारों ने चिर दिया और दिल्ली में दाखिल हो गए। उन्होंने नजीब को खुले में आकर लड़ने को कहा ताकि दिल्ली की जनता को परेशानी न हो।परन्तु कायर नजीब नहीं निकला।

फिर सिख जाट सरदार बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह व चस्सा सिंह भी अपने 12 से 15000 सैनिको के साथ पहुंच गए। उन्हे प्रतिदिन 15,000 रुपये देने का वादा किया गया था।मल्हाराव होल्कर को भी बड़ी कीमत पर लाया गया था।

फिर महाराजा जवाहर सिंह ने पुराने किले पर आक्रमण किया व बड़ी चरुराई से  मुगलों को साफ कर दिया।
मल्हारराव इस युद्ध में दिलचस्पी नहीं दीखा रहे थे।महाराः जवाहर सिंह को तभी उन पर संदेह हो गया था लेकिन उस समय वे कर भी क्या सकते थे।मल्हारराव उन पर नजीब से बातचीत का दबाव बना रहे थे व अन्य सेनापतियों को भी गुमराह कर रहे थे।

महाराज जवाहर सिंह ने वहां लगे अष्टधातु के किवाड़ उतार लिए जो 462 साल पहले अलाउद्दीन खिलजी चितौड़ से जितकर लाया था।इस तरह उन्होंने हिन्दुओ के इस कलंक को भी धो दिया।इस युद्ध में वीर यौद्धा पाखरिया(पुष्कर सिंह) शहीद हो गए।

दिल्ली में चारो तरफ गोलाबारी चल रही थी।उमेदगिरी गोसाई बल्लभगढ के तेवतिया राजा, और होडल के बलराम सिंह नाहरवार आदि अनेकों वीर मुगलो के रक्त से धरती लाल करते जा रहे थे।

सारी दिल्ली में मुगलो में हाहाकार मची हुई थी। मुगलों के महलों में जटवाड़ी सेना ने भूसा भरवा दिया था।
दिल्ली की बहुत सी महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा हो चुका था। लेकिन मल्हारराव नजीब से पहले से ही मिलजे हुआ था। उन्होंने सेनापतियों का मनोबल तोड़ना शुरू कर दिया।
उधर से अहमदशाह दुर्रानी अपने मजहब का राज खत्म होता देखकर नजीब की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ा और हिंदुस्तान की ओर बढ़ने लगा। जिस कारण सारा माहौल ही बदल गया। सिख सरदारों ने उससे अपने किलो की सुरक्षा का हवाला देकर पंजाब की ओर पलायन कर दिया। मल्हारराव नजीब की ओर थे ही और उसकी बात का खुला समर्थन कर दिया व सन्धि के लिए कहने लगे। इस तरह हिन्दुओ की आपसी फूट के कारण जीती हुई स्तिथि में भी सब कुछ कमजोर पड़ गया।

अब भी जवाहर सिंह नजीब को बर्बाद करने लायक थे लेकिन इसमें वे भी बर्बाद हो जाते व दिल्ली पर कट्टर इस्लामिक जिहादी दुर्रानी का राज आ जाता।

इसलिए उन्होंने नजीब की सन्धि को स्वीकारने व दुर्रानी से मुकाबला करने के लिए भरतपुर दुर्ग को मजबूत करने  में ही भलाई समझी।नजीब की सांस में सांस आ गयी। उसने मल्हारराव को काफी खिललते व उपहार प्रदान किये।

अगर आपसी फूट न होती तो एक तो हिंदुस्तान मुगलों से आजाद हो जाता और न ही अंग्रेजो का शासन देश पर आता।

एक तो दुर्रानी था जो विदेश से अपने मजहब की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़ा दूसरी तरफ हिन्दू थे जो लालच व जलन के कारण एक न हो पाए। यही हमारे देश की 1000 साल की गुलामी का असली कारण रहा है।और आज भी हम सिख नहीं ले रहे।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय शिवाजी।

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक- महाराजा जवाहर सिंह

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक-महाराजा जवाहर सिंह
Jat Jawahar Singh -Hindu Veer Shiromani Warrior
महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा जवाहर सिंह महाराजा सूरजमल के बेटे थे।भगवान लक्ष्मण उनके कुलदेव हैं और भगवान श्री कृष्ण के वे वंशज थे।बजरंग बली के बहुत बड़े भक्त थे।

महाराजा जवाहर सिंह ने आगरा की जामा मस्जिद को खाली करवाकर मंडी खुलवा दी थी व घोड़ो का तबेला बना दिया था।

बचपन में ही जब दिल्ली के वजीर ने उनका हाथ चुमा तो उन्होंने भरे दरबार मे फटकार लगा दी थी के हमारा हाथ छूकर अपवित्र क्यों किया।

उन्होंने अब्दाली से भी टक्कर ली थी व अपने पिता के साथ लगभग युद्धों में वीरता दिखलाते थे।

उन्होंने ऊंची आवाज में अजान देने पर एक मौलवी की जीभ कटवा दी थी।और ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

उन्होंने दिल्ली को मुगलो से आजाद कराने के लिए भी पूरी कोशिश की थी पर कुछ गद्दारो के कारण जीत के बावजूद सन्धि करनी पड़ी थी।

इस दौरान वे दिल्ली से चितौड़ के अष्टधातु किवाड़ वापिस भरतपुर जीत लाये थे जो खिलजी उनसे 462 साल पहले चितौड़ से जीतकर ले गया था।

ईरानी मूल की एक गन्ना बेगम उन पर बहुत मरती थी।
लेकिन गन्ना का प्रेम सिरे न चढ़ सका और गन्ना ने सारी उम्र जवाहर के प्रेम में फ़नाह कर दी थी।

उन्होंने पुष्कर के धार्मिक स्नान को हर हिन्दू के लिए खुलवा दिया था व वहां लगी शाही पाबंदी हटवा दी थी।

उन्होंने मेवात क्षेत्र में धर्म वापसी करवाकर धर्म बढ़ाने के लिए भी बहुत कार्य किया था।

आगरा में अपने किले में एक उत्सव के दौरान वे सीढ़ियों से निहत्थे उतर रहे थे तो पीछे से किसी सुजात मेव नाम के मुस्लिम ने उन पर जहरीले चाकू से हमला किया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी थी।उस मेव को उसी समय सैनिको ने मार दिया। शायद वह मेवात में मुस्लिमो को हिन्दू बनाये जाने से नाराज था।

 7 अगस्त को हर साल उनकी पुण्यतिथि पर बलिदान दिवस मनाया जाता है।

जबरो जाट जवाहर सिंह
सूरजमल रो जायो हो
लाल किले रो फाटक तोड़यो
लोहागढ़ पहुंचायो हो
मुगल बेगमा रे महला म्ह
गाढो ही फुस भरायो रे बेली,
हर हर बम बम बोलो रे बेली

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

Sunday, 24 June 2018

जाटों की उत्पत्ति(origin of Jats)

जाट जाति की उतपत्ति-


अलग अलग विद्वानों ने जाटो के बारे में
राजपूत गुर्जर अहीर आदि जातियों की
तरह अलग अलग मत दिये है जो इस प्रकार है-

महादेव से उतपत्ति-
महाऋषि गोरख सिन्हा ने देव संहिता व खाप
इत्तिहास में जाटो की उतपति भगवान शिव से
बताई गई है। महाभारत में भगवान शिव को
महाजट कहकर पुकारा गया है।देव संहिता
के श्लोक खाप इत्तिहास में भी अंकित है।
उनमें जाट को महाक्षत्रिय महावीर कहा
गया है।महादेव की जटाओं से उतपन्न होने
का अर्थ है कि जाट जाति शीर्ष प्रधान
राजा है। जट का अर्थ भी
राजा,प्रधान,शीर्ष होता है।

भगवान श्रीकृष्ण से उतपति-
जाटों को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बनाया गए
ज्ञाति संघ से भी जोड़ा जाता है।
जाटो में यदुवंशी गौत्र यानी भगवान के
बहुत से वंशज हैं।हिन्दू ह्रदय सम्राट
महाराजा सूरजमल भी कृष्णवंशी जाट ही
थे।

सूर्यवंश नागवंश से उतपति-
 कई इतिहासकारों ने जाटो को नागवंशी
सूर्यवँशी क्षत्रिय लिखा है। जाटों में
नागवंशी सूर्यवँशी क्षत्रियों की एक
बड़ी संख्या हैं भगवान राम के वमशज
रघुवंशी भी जाटो में है और जाट सम्राट
महाराजा हर्षवर्धन बैंस भी नागवंशी
सूर्यवँशी क्षत्रिय ही थे।व महादेव के भक्त
थे।नागवंशी जाट आज भी सांपों को
मारना उचित नहीं समझते।

युद्धिष्ठिर(पांडवो) से उतपत्ति-
युद्धिष्ठिर को ज्येष्ठ होने के कारण
ज्येष्ठ या जेठर कहा गया है जिस कारण
जाटो की उतपति को उनसे जोड़ा
जाता हैं। हालांकि जाटो में एक बड़ी
संख्या में चन्दरवंशी क्षत्रिय गौत्र हैं
पांडवो व कौरवों के वंशज तोमर पांडु व
अन्य बहुत से गौत्र हैं।
#विदेशी_मूल- बहुत से विदेशी विद्वानों
ने आर्यों को विदेशी लिखा है जिस
कारण वे जाट राजपूत गुर्जर अहीर को
विदेशी शक सीथियन आदि से लिखते हैं।
हालांकि आर्य के आक्रमण की थ्योरी
अब नष्ट हो चुकी है आर्य भारतीय ही थे।
यह भी सत्य है कि गुर्जर राजपूत अहीर
जाट आदि बहुत सी जातियों में कुछ
आधा 1% विदेशी भी आकर मिश्रित हुए
हैं।

निष्कर्ष
इन सब मतों के आधार पर यह सर्वविदित है
कि जाट महाक्षत्रिय आर्य व मूल
भारतीय हैं।जाटो में सूर्यवंश व नागवंश
(जो सूर्यवंश का ही भाग है),चन्द्रवंश व
यदुवंश (जो चन्दरवंश का ही भाग है) ये
दोनो वंश बराबर संख्या में विद्धमान है।
अत्रि,कश्यप जैसे बहुत से ऋषिकुल के गौत्र
भी जाटो में विद्यमान है।
ज्यादातर मुख्य जाट गौत्रों का जिक्र
वेद,महाभारत,पुराण आदि प्राचीन
गर्न्थो में है।
जट का अर्थ राजा शीर्ष प्रधान होता
है और यह उपाधि सर्वप्रथम भगवान शिव ने
धारण की थी।
जाट भगवान शिव,उनके रुद्रांश भगवान
बजरंग बली,भगवान श्री कृष्ण,भगवान
राम,माता शक्ति पार्वती व शेरांवाली
माता को सबसे ज्यादा पूजते हैं।इसके
अलावा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रीय व
कुलदेवता कुलदेवी को पूजते हैं।कुलदेवी के
मंदिर पर बच्चे होने पर उनका झुबला
उतरवाने व पूजा करने जरूर जाते हैं।हर साल
क्षेत्रीय या कुलदेवता का मेला लगाते हैं।
दशहरा पर शस्त्रपूजा करते हैं।
आज के समय मे मुखयतः जाट मराठा
राजपूत गुर्जर यादव खेती करते हैं आर्यों
का मुख्य व्यवसाय खेती ही था।जाटों ने
शुरू से ही सनातन वैदिक हिन्दू धर्म का
कट्टरता से पालन किया है।सबसे ज्यादा
शाकाहारी,सनातनी,गौभक्त जाती के
रूप में अपनी पहचान बनाई है। जब सनातन
धर्म पर आंच आई तो सिख पन्थ बनाया
गया था।उस समय जब गुरुओ ने सिरों की
मांग की तो सबसे ज्यादा जाटो ने ही
अपने बड़े बेटे दान किये थे। ज्यादातर जाट
गुरु अर्जुन देव जी गुरु गोविंद सिंह जी व
बन्दा सिंह बहादुर जी के साथ ही लड़ने के
लिए भर्ती हुए थे जिनमें से कई सिख बन गए।
उत्तर भारत मे हिन्दू धर्म को व भारतीय
सीमाओं को सुरक्षित करने में जाटो का
सबसे ज्यादा योगदान रहा है।
चंद्रव्याकरण में भी जट झट संघाते, अजेय
जट्टो हुनान(अर्थत जाटों ने हूणों को
हराया) लिखा है।
महाराजा शैलेन्द्र जाट का राज्य 409 ई0
के आस पास स्यालकोट से लेकर
राजस्थान तक रहा है।
अतः जाटों की प्राचीनता भी
सर्वविदित है।जाट राजक्षेत्र को
जटवाड़ा नाम से सम्बोधित किया
जाता है।
निष्कर्ष यही है कि जाट सर्वश्रेष्ठ व
प्राचीनतम क्षत्रिय हैं।

जय जय जटवाड़ा
जय महाराजा सूरजमल
ॐ।हर हर महादेव।ॐ
जय भारतभूमि

संदर्भ-इतिहासकार ठाकुर
देशराज,दिलीप सिंह अहलावत,उपेंद्रनाथ
शर्मा,कालिके रंजन,मोहनलाल गुप्ता,vs
अग्रवाल,जदुनाथ सरकार,महाऋषि
गोरख सिंह,खाप इत्तिहास आदि सबका निष्कर्ष

Wednesday, 20 June 2018

गुप्तांग काटने के बाद भी पाकिस्तान के आगे झुका नहीं यह वीर सैनिक

शहीद भीखाराम मूंड- एक महान वीरगाथा
जाट
शहीद भीखाराम

भारतीय सेना का अनन्य वीर सैनिक.
कठोर एवं पाशविक यातनाएं, अमानवीय, बर्बरतापूर्वक व्यवहार के पश्चात पाकिस्तानी सैनिकों ने नृशंसतापूर्वक इनके आँख, कान, नाक और गुप्तांग भी काट लिए फिर भी नहीं हारा था ये जवान.

जन्म - 16 जनवरी सन 1977 ई. पातासर ग्राम परपदरा तहसील बाड़मेर, राजस्थान.
बलिदान पर्व - पाकिस्तान की कैद में मृत्यु होने के पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं. 14 मई सन 1999 से 9 जून सन् 1999 के बीच अवधि के दौरान किसी दिन.

भारत-पाक के बीच हुए कारगिल युद्ध में सैकड़ों भारतीय जवानों ने शहीद होकर वीरता की इबारत लिखी थी। इनमें से कई देशभक्तों ने देश की वि़जय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ऐसे जवानों में से ही एक जवान भीखाराम मूंढ भी थे।

 भीखाराम मूंढ राजस्थान के बाड़मेर जिले के रहने वाले थे। इनका जन्म बाड़मेर की परपदरा तहसील के पातासर गांव में 16 जनवरी 1977 को को हुआ था। सन् 1994 में भीखाराम की शादी भंवरी देवी के साथ हुई। 26 अप्रैल 1995 को भीखाराम का चयन भारतीय सेना में 4 जाट रेजिमेंट में बतौर सिपाही किया गया।

भीखाराम मूंढ को युद्ध के समय जम्मू कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में सीमा पर सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। उस समय युद्ध अपने चरम पर चल रहा था। भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के सैनिक कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे और दोनों देशों की तरफ से कूटनीतिक चालें भी चली जा रहीं थीं।

युद्ध के समय मई 1999 में लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने साथियों के साथ सीमा पर गश्त लगा रहे थे। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के समूह में भीखाराम मूंढ भी शामिल थे। उसी समय पाकिस्तान के घुसपैठियों ने उनके गश्ती समूह पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों ने पाक हमले का जमकर मुकाबला किया लेकिन 14 मई 1999 को 6 भारतीय सैनिकों को पाकिस्तान के गुप्तचर विभाग ने पकड़ लिया। इन सैनिकों पर भारत के लिए पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी करने का आरोप लगाया गया। इन सैनिकों में भीखाराम मूंढ भी थे। पाकिस्तानी सेना द्वारा इन सैनिकों के साथ बड़ा ही अमानवीय तथा बर्बरतापूर्वक व्यवहार किया गया।

पाक सैनिकों ने नृशंसतापूर्वक इनके आँख, कान, नाक और गुप्तांग काट लिए। इसके बाद उन्होंने इस सभी को एक सप्ताह तक कठोर एवं पाशविक यातनाएं दी। इन सबके बावजूद जब वे कुछ भी हासिल कर पाने में नाकाम रहे तो उन्होंने सभी की हत्या कर दी।
भीखाराम मूंढ भी इस हादसे के भुक्तभोगी थे। जब इस घटना के बारे में भारत सरकार और अन्य देशों को पता चला तो अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान को इन सैनिकों के शव भारत को सौंपने पड़े। 9 जून सन् 1999 को इन सैनिकों के क्षत-विक्षत शव भारत को प्राप्त हुए।

कोटि कोटि नमन

स्वामी इंद्रवेश जी ढाका- महान समाज सुधारक, गौरक्षक, आर्य समाजी

आर्य समाज के महान पुरोधा स्वामी इंद्रवेश ढाका जी

जाट
स्वामी इंद्रवेश जी

स्वामी इंद्रवेश जी का जन्म रोहतक के sudana गांव के एक हिन्दू जाट(ढाका गौत्र) परिवार में हुआ था।
वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे और स्वामी दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं से प्रभावित थे।
वे हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने आर्य समाज का प्रचार किया व बहुत से गुरुकुलों में अपनी सेवा प्रदान की।पदयात्राओं, शिविरों, व्यायाम-प्रदर्शनों व जनचेतना यात्राओं के माध्यम से आर्य समाज का प्रचार करने की परम्परा उन्होंने ही प्रारम्भ की ।
आर्य समाज के मूल्यों को फैलाने में ऊनका विशेष योगदान रहा।

1966 में उन्होंने गौरक्षा वांडोलन के द्वारा गौहत्या निषेध कानून बनाने के लिए भी पुरजोर आवाज उठाई।

1967 में उन्होंने आर्य युवक परिषद का गठन किया और युवाओ को वैदिक शिक्षा के प्रति जागरूक किया।

1967 में कुरुक्षेत्र से दिल्ली तक की पदयात्रा का ऐतिहासिक आयोजन किया । यह यात्रा सैंकड़ों गांवों, कस्बों व नगरों से होती हुई पन्द्रह दिन बाद दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले के समक्ष जलती मशाल हाथों में लेकर आर्य राष्ट्र की स्थापना के संकल्प के साथ सम्पन्न हुई । 

1968 में उन्होंने राजधर्म पत्रिका की शुरुआत की जो emergency के वक्त उस समय के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा बन्द कर दी गयी थी व बाद में शुरू हुई थी

1969 में उन्होंने कुंडली बूचड़खाना बन्द करवाने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1969 में हरयाणा की जनता के द्वारा छेड़े गए चण्डीगढ़ आन्दोलन में युवावर्ग का नेतृत्व करते हुये स्वामी इन्द्रवेश व उनके साथी जेल गये । रोहतक सेन्ट्रल जेल में ही उन्होंने सन्यास लेने का संकल्प लिया ।

7 अप्रैल 1970 को दयानन्द मठ रोहतक में स्वामी इन्द्रवेश जी ने स्वामी अग्निवेश एवं स्वामी सत्यपति के साथ वेदों के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी ब्रह्ममुनि जी से सन्यास की दीक्षा ली । उसी दिन स्वामीद्वय ने आर्य राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेते हुए आर्यसभा नाम से राजनैतिक पार्टी की भी स्थापना कर ली तथा सक्रिय राजनीति में उतर गये ।

1972 में विधानसभा के चुनावों में आर्यसभा के दो विधायक चुने गये तथा आर्यसभा हरयाणा की सर्वाधिक वोट प्राप्त करने वाली विपक्षी पार्टी बन गई ।

 फिर गेंहू के मूल्य बढ़वाने के लिए किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।

सन् 1974 में आर्यसमाज की सर्वाधिक सशक्त सभा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब जिसमें दिल्ली, हरयाणा, पंजाब की आर्य समाजें, शिक्षण संस्थायें व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, कन्या गुरुकुल देहरादून, गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी आदि सम्मिलित थीं, के चुनाव में प्रधान चुने गये तथा गुरुकुल कांगड़ी के कुलाधिपति बने । यह चुनाव हाईकोर्ट की देखरेख में संपन्न हुआ था ।

1975 में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया जिसके कारण उन्हें लम्बे समय तक जेल भी जाना पड़ा।

सन् 1975 में आपातकाल के दौरान मीसा के अन्तर्गत नजरबंद किये गये । इमरजेंसी के बाद आर्यसभा का अन्य सभी पार्टियों की तरह जनता पार्टी में विलय कर दिया गया तथा सन् 1980 के लोकसभा चुनाव में आप रोहतक से लोकदल के टिकट पर सांसद चुने गये ।

1986 में पंजाब हरयाणा की boundry व जलीय बंटवारे से सम्बंधित राजीव - लोंगोवाल समझौते का विरोध किया व पंजाब में बढ़ रहे उग्रवाद के खिलाफ 21 दिन तक भूख हड़ताल की।

स्वामी जी की अध्यक्षता में गठित वेदप्रचार आयोजन समिति के तत्वाधान में वर्ष 1986 में कुम्भमेला हरद्वार में चालीस दिन का वेदप्रचार शिविर लगाया गया जिसमें गाय के घी से चतुर्वेद पारायण यज्ञ, विभिन्न सम्मेलन, योग शिविर, ऐतिहासिक शोभायात्रा एवं शास्त्रार्थ की चुनौति देकर पौराणिक जगत् में हलचल पैदा की, 1986 के वेदप्रचार शिविर से पूर्व कुम्भ मेले में आर्य समाज का शिविर लगभग 60 साल पहले लगा था । स्वामी जी द्वारा प्रारम्भ किये गये उक्त क्रान्तिकारी कार्यक्रम को अभी तक प्रत्येक कुम्भ मेले में चलाया जा रहा है । सन् 1986 के कुम्भ मेले पर स्वामी प्रकाशानन्द व स्वामी योगानन्द सहित दस सन्यासी बने थे।

1987 में उन्होंने एक राजपूत विधवा रूप कंवर को धक्के से सती करने के खिलाफ दिल्ली-देवराला(देवराला राजस्थान जहां एक राजपूत स्त्री को जिंदा जलाने की कोशिश की गई)पदयात्रा निकाली व अपराधियो पर कार्यवाही और सती प्रथा बन्द के लिए आवाज उठाई।जिसके कारण सरकार को संसद के तहत कानून बनाना पड़ा।

न् 1987 में ही दिल्ली से पुरा महादेव (मेरठ) तक आयोजित पदयात्रा का संरक्षण स्वामी इन्द्रवेश जी ने किया । यह यात्रा भी पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ को सती के सवाल पर शास्त्रार्थ की चुनौति देने के लिए आयोजित की गई थी । इस कार्य में पूरे आर्य जगत में नई ऊर्जा पैदा हुई थी ।

1993 में उन्होंने दिल्ली से हिसार तक शराब बंदी के लिए यात्रा निकाली व शराब के बुरे प्रभावों के बारे में लोगो को जागृत किया।

बागपत में मायात्यागी काण्ड के बाद ग्यारह सौ सत्याग्रहियों के साथ सत्याग्रह करके एक महीने तक बरेली जेल में रहे तथा बाद में हरयाणा लोक संघर्ष समिति के माध्यम से हरयाणा में जोरदार जेल भरो आन्दोलन चलाया । विदित हो कि मायात्यागी को पुलिस ने भरे बाजार में नंगा करके घुमाया तथा अपमानित किया था जो महिलाओं पर किये जाने वाले अत्याचार का ज्वलन्त उदाहरण था ।

उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी लोगो को जागृत किया और शिक्षा के प्रसार प्रचार में बहुत बड़ा योगदाब दिया।

1998 में bjp join की और रोहतक से चुनाव लड़ा।

सन् 2001 में आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा के प्रधान निर्वाचित हुये । वर्तमान में आप आर्य विद्यासभा गुरुकुल कांगड़ी के प्रधान पद को सुशोभित कर रहे थे ।

ब्रह्मचर्य, व्यायाम प्रशिक्षण एवं युवानिर्माण शिविरों के माध्यम से पूरे देश में युवक क्रान्ति अभियान चलाया त्था आर्यसमाज में नया जीवन फूँका । शिविरों के माध्यम से लाखों युवकों को आर्यसमाज से जोड़ा ।और सैंकड़ो को सन्यास व ब्रह्मचर्य की दीक्षा भी दी।

स्वामी इन्द्रवेश जी ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समाज परिवर्तन के लिए लगाया । उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपना जीवन समाज सेवा में अर्पित किया । उनकी पुण्यतिथि पर हमें एक ही संकल्प लेना चाहिये कि जिस पवित्र निष्ठा के साथ स्वामी जी ने महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष किया उसी प्रकार हम सब सप्तक्रान्ति अर्थात् जातिमुक्त, साम्प्रदायिकतामुक्त, नशामुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त, नारी उत्पीड़नमुक्त एवं शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कृतसंकल्प रहेंगे । हम आपस के सभी भेदभाव मिटाकर इस मिशन में जुटें, यही स्वामी जी की अन्तिम इच्छा थी ।

12 जून 2006 को उनका देहांत हो गया वे अन्य कई आर्य संस्थानो एवं सँगठनो के अध्यक्ष रहे।कई किताबें व आंदोलन किया।भयत से गुरुकलों को उन्होंने अपनी सेवा से जीवंत कर दिया।

इस महान आत्मा को कोटि कोटि नमन।