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Saturday, 14 December 2019

जीवन परिचय- हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल जी का जीवन परिचय
Biography of maharaja surajmal
महाराजा सूरजमल

नाम:- महाराजा सूरजमल सिंह
बचपन का नाम:- सुजान सिंह
जन्म:- 13 फरवरी 1707
मृत्यु:- 25 दिसम्बर 1763

पुरा नाम:- श्री महाराज विराजमान बृजेन्द्र महाराज सूजान सिंह जी बहादुर
अन्य नाम:- भूपाल पालक भूमिपति बदनेश नँद सुजान, सिंह सूरज कुमार, सिंह सूरज सुजान, रविमल्ल आदि

पिताश्री का नाम:- राजा बदन सिंह
पितामह का नाम:- श्री भाव सिंह सिनसिनिवार(सिनसिनी के राव चूड़ामन जी के भ्राता)
माता का नाम:- रानी देवकी जी
नानाश्री का नाम:-कॉमर के चौधरी अखेराम सिंह
प्रमुख शिक्षक- आचार्य सोमनाथ जी

कद- 7 फुट 2 इंच
वजन- लगभग 150 किलोग्राम
शरीर की बनावट- सुडौल, मजबूत, गठीली,शाही तेवर वाली मोटी आंखे, चौड़ा ललाट, लम्बी रौबदार मूंछे,लंबे तगड़े और वजनदार आवाज दबंग छवि,सुंदर नैन नक्श।

राज्य:- जटवाड़ा
राजधानी:- भरतपुर(लोहागढ़), डीग(सर्दी के मौसम में)
ध्वज- महल पर पीताम्बर ध्वज, किले पर भगवा कपिध्वज, युद्ध में भगवा और केसरिया ध्वज।
कुलदेवता- श्रीकृष्ण भगवान
कुलदेवी- राज राजेश्वरी कैला देवी
वंश प्रवर्तक- शूरसेन(सिनसिना) बाबा

पत्नी:- महारानी किशोरी बाई,महारानी खेतकौर, महारानी गंगिया, रानी हंसिया, रानी गौरी, रानी कल्याणी आदि
पुत्र:- जवाहर सिंह, रत्नसिंह, नाहर सिंह, रणजीत सिंह, नवल सिंह
भ्राता- महाराजा सूरजमल जी के 25 अन्य भ्राता थे जिनमें से वैर राजा प्रताप सिंह उनके सहोदर(अर्थात रानी देवकी से ही) भ्राता थे।

उपाधि:- कुंवर ब्रजराज बृजेन्द्र बहादुर भूमिपति भूपाल
युवराज:-1748
शासनकाल:-1755-1763
शासन अवधि:- 8 वर्ष, वैसे कुंवर पद ग्रहण करते ही उन्होंने राज्य सम्भालना शुरू कर दिया था। 1748 में सूरजमल युवराज बनाये गए तब तो बदन सिंह नाम मात्र के ही राजा थे उन्होंने सब कार्य उन्हें सम्भलवा दिया था क्योंकि उनकी आंखों में समस्या हो गयी थी लेकिन जाटो में पिता के जीवित रहते बेटा चौधर ग्रहण नहीं करता इसलिए मोहर उनके नाम की चलती थी। इसलिए उनके शासन को 1748 से गणना की जाए तो 15 वर्ष होता है।

पूर्वाधिकारी:- राजा बदन सिंह
उत्तराधिकारी:- महाराजा जवाहर सिंह
राजघराना:- जाट राजवंश
वंश:- कृष्ण वंशी शुरसेनिवार/वृष्णि(सिनसिनिवार)

प्रमुख युद्ध=

दस वर्ष की आयु में ही महाराजा सूरजमल जी ने सेना व दरबार के कार्यो में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था।
उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 80 युद्धों में भाग लिया जिनमें वे कभी भी नहीं हारे। इसी कारण उन्हें अजेय महायौद्धा कहा जाता है। उनके कुछ प्रमुख युद्ध इस प्रकार है-

★1726 में उन्होंने सोगर गढ़ी पर अधिकार किया
★1730 में मेण्डु पर अधिकार किया।

★उन्होंने 1731 में छोटी सी उम्र में #मेवात_पर_अधिकार कर  लिया था।

★टप्पा डाहरा युद्ध में मिर्जा दावर जंग ने उनकी तलवार के आगे आत्म समर्पण कर दिया था।
★उनकी तलवार ने खोहरी में भी दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर ली थी
*1738 में मथुरा आगरा के फरह, ओल अछनेरा व कुछ अन्य क्षेत्रों को आजाद करवाया।

★फरीदाबाद में #मूर्तिजा_खां_को_हराया।

★1739 में नादिरशाह के विरुद्ध दिल्ली की सहायता की और नागरिकों को शरण देकर उनकी सुरक्षा भी की।

★1740,41,44 में गंगवाना युद्ध में, जोधपुर व कोटा के विरुद्ध आदि कई बार जयपुर राज्य की मदद की।

★1745 में अली मुहम्मद रुहेले को हराया।
★1745/46 में उन्होने दिल्ली नवाब के सेनानायक अफगानी नवाब #असद_खां_को_धूल_चटाई थी।#असद_खां युद्ध में #मारा गया था।

★1748 में उन्होंने #जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह के पक्ष में लड़ाई लड़ी और उनकी विरोधी #7_सेनाओं_को_एक_साथ बुरी तरह से #हरा_दिया था व ईश्वरी सिंह राजपूत को जयपुर का ताज दिलाया था।

★1749 में #दिल्ली_के_वजीर_सफदरजंग को हराया। वजीर उनके #खौफ से लड़ने ही न पहुंचा था।

★1750 में मीर बक्शी #सलावत_खां_को_हराया और दुष्ट #हाकिम_खा_मार_डाला।

★1750 में वजीर #सफदरजंग को #फिर से मैदान में #हराया।

★1750 में #रुस्तम_खां_मार_गिराया और #अहमद_खां_बंगश को धूल चटाई।

★1751 में #बहादुर_खां_मार_गिराया।

★1752 में नवाब #जावेद_खां_को_धूल_चटाई

★1752 में #फकीर_अली व #मुगलो_खदेड़कर सिकंदराबाद व दनकौर पर शाही अधिकार खत्म कर दिया।

★1753 में ही पलवल में #इमाद_को_हराकर वहां काजी को भी पकड़ लिया था।

★1753 में घासेड़ा के बहादुर सिंह पर विजय- बहादुर सिंह घासेड़ा का जागीरदार था जो बार बार महाराजा सूरजमल के विरुद्ध अभियानों में हिस्सा लेता था। महाराज के बार बार समझाने पर भी नहीं मानने पर व सीमा में घुसपैठ करने पर महाराज ने उस पर आक्रमण की ठानी। इसी बीच जब वे दिल्ली पर आक्रमण करने जा रहे थे उसी समय बहादुर सिंह के कुछ लोगो ने महाराजा सूरजमल जी के राज्य में लूटपाट की व ऊंट चुरा लिए। महाराज ने बहादुर सिंह को कार्यवाही करने व ऊंट लौटाने को कहा। न मानने पर उन्होंने आक्रमण कर दिया। बहादुर सिंह हार की कगार पर था। युद्ध के बीच में भी सन्धि की कोशिश महाराज द्वारा की गई सन्धि हुई लेकिन कुछ ही देर में बहादुर सिंह का मन पलट गया और उसने अपनी दोनो पत्नियों को जौहर करवा दिया व बाहर निकलकर महाराजा सूरजमल की सेना पर टूट पड़ा। जिसमें उसकी हार हुई व वह युद्ध में मारा गया। इस तरह घासेड़ा पर उन्होंने विजय प्राप्त की।

★1753 में उन्होंने दिल्ली के वजीर सफदरजंग को उकसाकर उसके साथ मिलकर #दिल्ली_पर_आक्रमण कर लिया था व दिल्ली का एक बड़ा क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिया था। और मुगल बादशाह बार पत्र लिखकर गिड़गिड़ा रहा था रहम की भीख मांग रहा था। अंत में सफदरजंग की निष्क्रियता व जयपुर के राजा के बीच में आने के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी।सन्धि उन्ही की शर्तों पर हुई।

★1754 में कुम्हेर में मराठा एवं मुगल सेना ने कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध में खांडेराव होलकर मारा गया। बाद में सन्धि हो गयी थी।महाराज ने खांडेराव की छतरी बनवाई भले ही वे उनके साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए हो।

★1757 में उन्होंने मथुरा वृन्दावन व भरतपुर में से #अब्दाली को अकेले ही निकाल फेंका था।अबदाली से बल्लभगढ़, भरतपुर,कुम्हेर, चौमुंहा, गौकुल में एक साथ युद्ध लड़ा धर्मनगरी की अकेले ही रक्षा की। अबदाली ने बहुत नरसंहार किया और उन्होंने उसका निडर होकर सामना किया।हजारों जाटो ने धर्मनगरी की रक्षा हेतु बलिदान दिया। अंत में अब्दाली कुम्हेर के किले पर घेरा डालकर बहुत दिन बैठा रहा और लोहागढ़ की तरफ बढ़ने की उसकी हिम्मत न हुई। अंत में सूरजमल का रणनीतिक व धमकी भरा पत्र पढ़कर वह समझ गया कि ये शासक उससे रत्ती भर भी न डरने वाला और जाटो की तलवारों की नोको से डरकर वह वापिस लौट गया था।

★ 1757 में फरुखनगर के नवाब अफगानी #मूसा_खान को हराया।

★ उन्होंने मुगलो व अफगानों बलूचों से रोहतक झज्जर गुड़गांव पलबल फरीदाबाद रेवाड़ी आदि हरियाणा के बहुत से क्षेत्र जीत लिए थे, उत्तर प्रदेश में पूरा ब्रिज क्षेत्र और वेस्ट यूपी, राजस्थान में भरतपुर धोलपुर अलवर आदि,अलीगढ़,एटा, मेनपुरी,आगरा, मेरठ,मुजफरनगर,मथुरा आदि। दिल्ली में पालम व गाजियाबाद तक उनका राज हो गया था। मुगल कुछ ही हिस्से में सिमट गई थे जिसके कारण मुगलो की लोग खिल्ली उड़ाने लग गए थे। मुगलो को कमजोर करने व उनका शासन अंत करके भारत को आजाद करवाने में उनका मुख्य योगदान रहा है। अगर ये कहें कि मुगलो का खौफ भारत से मिटाने वाले महाराजा सूरजमल जी थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

★1761 में जब अब्दाली को मराठो से लड़ने के लिए बुलाया गया तब मराठो का किसी भी हिन्दू राजा ने साथ न दिया केवल महाराजा सूरजमल ने साथ दिया जिस कारण पेशवा ने उन्हें हिंदुस्तान का एकमात्र मर्द मानस कहा था।जबकि 1757 में यही अबदाली जब मथुरा वृन्दावन लूट रहा था तो महाराजा सूरजमल इससे अकेले लड़े थे मराठे भी उनका साथ देने नही आए थे। फिर भी वे सब भूलकर उनके साथ आये। उन्होंने मराठो का दिल्ली विजय तक साथ दिया और 1 महीने तक का पूरा खर्च अपने खजाने से दिया। दिल्ली विजय तक उन्होंने मराठो का तन मन धन से हर युद्ध में साथ दिया।
बाद में भाउ से उनके रणनीतिक मतभेद हो गए।
★उन्होंने कहा कि
ठंड में आप लड़ न पाओगे और अब्दाली ठंड में लड़ने का आदि है इसलिएहम गुरिल्ला युद्ध करे और उसे पंजाब के दूसरी तरफ ही उलझाकर रखें थोड़े दिन में मौसम बदल जायेगा अब्दाली से गर्मी सहन न होगी मौसम हमारे पक्ष में होगा।
औरतों व भारी सामान को साथ न रखें वरना आधी फौज उनकी सुरक्षा में लगेगी और लड़ने वाले निश्चिंत होकर न लड़ पाएंगे। इसलिये उन्हें ग्वालियर भेज दें या मेरे किसी किले में रखे उनकी सुरक्षा व उनका खर्च मैं वहन करूँगा।
दिल्ली मुझे दें व गाजीउद्दीन को वजीर बनाएं जिससे मुस्लिमो का भावनात्मक साथ मिल सके व अबदाली कमजोर हो।और रसद न रुके।
मुगल दरबार की छत को लालच में मत तोड़ें इससे लोगो की भावनाएं जुड़ी है अब्दाली इसे इस्लाम से जोड़कर यहां के मुस्लिमो को साथ ले जाएगा।जब न माना गया तो यह तक कहा कि इसे न तोड़ने के बदले मेरे खजाने से 5 लाख रुपये मैं दे दूंगा।
जब जब उन्होंने ये सब सुझाव दिए तो उनके इनमें से किसी भी सुझाव को न माना गया और भाउ से उनके आपसी मतभेद हुए। आपस में हर बार गरमा गर्मी वाली बहस हो गयी। भाउ ने उनका शाब्दिक रूप से अपमान भी किया व कहा कि तुम्हारे सहारे उत्तर में न आया मेरी मर्जी होगी वह करूँगा।
इस तरह की बार बार बहस होने से भाउ चिढ़ गए जबकि के सब सुझाव मराठो के हित में ही थे और उन्होंने उन्हें #बन्दी_बनाने_की_गुप्त_योजना बना ली। होलकर व सिंधिया ने यह बन्दी बनाने बात महाराज को बता दी व उन्हें आगामी झगड़ा न हो इसलिए वापिस लौटने का आग्रह किया। तब महाराजा सूरजमल जी को मजबूरन वापिस लौटना पड़ा।बता दे कि उन्होंने साथ छोड़ा नहीं था बल्कि उन्हें मजबूरन जाना पड़ा था।

★मराठो को #शरण व उनकी सहायता- युद्ध के पश्चात उन्होने भाउ की पत्नी पार्वतीबाई और व उनके परिवार और हजारों मराठा सैनिकों को घायल व भूख की अवस्था में शरण दी और उनकी सेवा की, उनका इलाज करवाया, खाना, रहना और कपड़े सबका प्रबंध किया। उस समय लगभग 10 लाख रुपये खर्च किये। और मराठो को सुरक्षित महाराष्ट्र तक पहुंचाया। मराठो को छोड़ने गए कुछ जाट सैनिक वहीं रह गए थे उनके वंशजो के आज भी महाराष्ट्र के नासिक में उन जाट सैनिकों 22 गांव मौजूद हैं। मराठो ने इस अहसान के कारण जाटो को सच्चा यार कहा था व महारानी किशोरी देवी को अपनी बहन माना था। क्योंकि इतने मतभेद के बाद व भाउ के द्वारा #बन्दी बनाने के षड्यंत्र के बाद भी उन्होंने मन में मैल न रखा और उनकी मदद की।

★1761 में आगरा में मुगल सेनापति काजील खां को हराकर वहां के लाल किले पर कब्जा जमाया। मुगल फौजदार उनके आक्रमण से पहले ही उनसे डरकर भाग गया था और ताजमहल की कब्रो पर घोड़े बांध दिए थे।
★ फरुखनगर के मसावी खां बलूच को हराया और उसे कैद करके जेल में डाल दिया।
★1763 में एक बार फिर उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया था व एक ब्राह्मण कन्या की रक्षा की थी।24 दिसम्बर तक उन्होने दिल्ली जीत ली थी। ज्यादातर हिस्सो पर उनका कब्जा था बस कुछ युद्ध ही शेष था।

★25 दिसम्बर 1763 के युद्ध के दौरान वे अपने पुत्र नाहर सिंह को कमान देकर अकेले ही हिंडौन नदी पर घूमने निकल गए थे तो पीछे से कुछ मुगल सैनिकों ने झाड़ियों से उन पर गोलियों की बौछार कर दी थी। फिर भी वे घायल अवस्था में अकेले ही उनसे वीरता से लड़े और एक लंबे संघर्ष के पश्चात वीरगति की प्राप्त हुए थे।

●निर्माण कला:- महाराजा सूरजमल भवज निर्माण कला के बहुत बड़े ज्ञाता एवं जानकार थे। उन्होंने डीग, भरतपुर, कुम्हेर आदि समेत ब्रिज में कई भव्य किलों का निर्माण किया। भरतपुर के लोहागढ़ किला तो ऐसी सामरिक बनावट में बना के उसे कभी कोई नहीं जीत सका। उन्होंने अनेकों महल बनवाएं जिनमें डीग के जलमहल, भरतपुर के महल प्रसिद्ध है।
उन्होंने गोवर्धन में भव्य सरोवर व मन्दिर बनवाये, मथुरा वृन्दावन,नन्दगाँव आदि में उन्होंने अनेको मन्दिर बनवाएं व अनेको मन्दिरो का जीर्णोद्धार किया। अब्दाली व मिगलो द्वारा तोड़े गए सभी मन्दिर व घाट फिर से बनवाएं। मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर भी आधी मस्जिद तोड़कर उन्होंने बनवाया था।
बयाना की उषा मस्जिद हटाकर फिर से उसे उषा मन्दिर बनाया था। गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर भी उन्होंने बनवाया था।दिल्ली में पहाड़ी धीरज पर शिव मंदिर बनवाया था।मथुरा के ज्यादातर घाटों की सुंदरता उनके कारण ही है।भरतपुर में बांके बिहारी मंदिर, कैला देवी मंदिर, लक्ष्मण मन्दिर आदि भव्य निर्माण कला के नमूने हैं।

★राज्य विस्तार:- भरतपुर धौलपुर समेत राजस्थान के कुछ हिस्से, आधा हरियाणा, वेस्ट यूपी, ब्रिज प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्से उनके राज्य का हिस्सा था।

★कुछ महत्वपूर्ण बातें-

महाराजा सूरजमल जी को उनके धर्म हेतु किये गए कार्यों के लिए हिंदुआ सूरज व हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम से जाना जाता है।

एक तत्कालीन मुस्लिम यात्री ने उन्हें भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट लिखा है।

उनके राज्य में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध था बताते हैं कि उनके खौफ से अवध के नवाब ने भी गौहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उनके राज्य में ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध था। उन्होने बहुत से धर्मपरिवर्तित हिन्दुओ को वापिस हिन्दू बनाया था। दलितों को भी पूरा सम्मान दिया था उनका खजांची दलित चर्मकार जाति से था।

जब भी देश के किसी भी हिस्से पर किसी विदेशी आक्रांता ने आक्रमण किया तो उन्होंने दिल खोलकर उससे पीड़ितों को शरण दी व उन्हें सुरक्षा दी।

उन्होने हमेशा गौ, ब्राह्मण, अबला, मन्दिर और साधु संतों की रक्षा की। दूर दूर से बहुत से साधु व विद्वान और कलाप्रेमी उनके राज्य में आते थे और फलते फूलते थे।

वे दोनों हाथों से तलवार चलाने में माहिर थे, उन्हें धनुष बाण भाला बन्दूक तोप आदि सब अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान था।

उनकी एक लाखा तोप तो इतनी शक्तिशाली थी कि वह भरतपुर से ही आगरा के लाल किले पर निशाना साधने में सक्षम थी।

महाराज सूरजमल जी श्रीकृष्ण भगवान, लक्ष्मण और हनुमान जी बहुत बड़े भक्त थे। उनके किले पर भगवा कपिध्वज लहराता था।
उन्होंने दिल्ली को आजाद करवाने के लिए  दो बार आक्रमण किये व दिल्ली को जीत लिया। ज्यादातर हिस्सो पर कब्जा कर लिया था परंतु अंत में कुछ गद्दारो के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी,हालांकि सन्धि उनकी शर्तो पर ही हुई। दूसरी बार उन्हें धोखे से पीछे से गोली चलाकर मार दिया था।

उनकी मृत्यु के बाद भी कई दिनों तक मुगलो को विसवास न हुआ यह सबूत मिलने पर भी खौफ से उन्होंने कई दिनों तक इस बात को छुपाए रखा था।

उनका लोहागढ़ किला देश का एकमात्र अजेय किला है जिसे अफगान मुगल रुहेले कोई नहीं जीत पाया। उनके बेटे रणजीत सिंह के कार्यकाल में आंग्रेजो ने 13 बार इस किले पर आक्रमण किया परन्तु अंग्रेजो को हर बार मुंह की खानी पड़ी।

वे जब भी कोई मुगल अफगान रुहेला आदि कोई युद्ध में उनके आगे #नतमस्तक होता था तो वे उसके आगे ये #शर्ते अवश्य रखते थे कि- =वह किसी भी हिन्दू मन्दिर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, =#गौहत्या न करेगा न होने देगा, =न ही किसी का #धर्मपरिवर्तन करवाएगा, =किसी भी साधु संत अबला व गरीब को तंग नहीं करेगा, =#पीपल के पेड़ को कभी नहीं काटेगा।

★महाराजा सूरजमल देश के ऐसे एकमात्र राजा थे जिन्होंने मुगलो से दिल्ली को आजाद करवाने के लिए दो बार आक्रमण किये और मुगलो के बुरी तरह से  छक्के छुड़ाए।

★ अब्दाली जब 1757 में मथुरा वृन्दावन लुटने आया और यमुना का पानी लोगो के खून से लाल कर दिया था तो उससे लोहा लेने वाले वे एकमात्र राजा थे और उसे धर्मनगरी से निकालकर ही दम लिया था।

इसके अलावा भी महाराजा सूरजमल जी की अनेको विरताएँ हैं जिन्हें किसी एक किताब या एक पोस्ट में समेटे जाना असम्भव है।

तभी तो कहा जाता है कि
नहीं सही जाटनी ने व्यर्थ प्रसव की पीर
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर

जिसने बार बार दिल्ली में घुसकर मुगलों को फोड़ा था,
जिसके खौफ से अब्दाली ने मथुरा वृन्दावन छोड़ा था,

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था,
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था,

जिसके भालों की नौकों से सलावत खां घबराया था
होकर पराजित दुष्ट ने हिन्दुओ के आगे शीश नवाया था

आगरा के लाल किले पर जिसने भगवा फहराया था
ताजमहल की कब्रो पर जिसने घोड़ा बन्धवाया था

पठान रुहेला अफगान जिसके नाम से ही घबराता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

उषा मस्जिद को जिसने फिर से मन्दिर बनवाया था
मथुरा वृन्दावन के घाटों को फिर से जिसने सजवाया था

बगरू के महलों में जिसकी धाक गूंजती थी
विजयश्री जिसके रण में सदा चरण चूमती थी

दिल्ली का वजीर भी जिसके आगे नतमस्तक रहता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

आतंक भरे मेवात ने पहली बार सांस चैन की ली थी
भारतभूमि ने अब बहुत ज्यादती सहन कर ली थी

जिसके भालों के वार से असद खां दर्द से कहराता था
जिसके शासन में अलीगढ़ शहर रामगढ़ कहलाता था।

क्षत्रेपन की शान था वो,रण केसरिया हो जाता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था

जिसका लोहागढ़ सदा अजेय रहा शान से इतराने को
कितने ही किले महल बने है ऐश्वर्य उनका बतलाने को

न जाने उसने रणभूमि में कितनो को धूल चटाई थी
उत्तर भारत में फिर से सनातन की धाक जमाई थी

राम कृष्णवंशी यौद्धा था वो बृजराज कहलाता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

वह अबला, गौ, ब्राह्मण-संतो का ही तो रक्षक था
उसका भाला धर्मविरोधी दुष्टों का ही तो भक्षक था

मुसीबत में जो फंसा हुआ उसकी छाया में ही तो आता था
उसकी शरण में आया हुआ तो ठूंठ भी हरा हो जाता था

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।
हिंदुआ सूरज sketch
हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

महाराजा सूरजमल सिंहासन पर
हिदू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

Brave warrior Jat
अजेय महायौद्धा महाराजा सूरजमल

Descendant of krishana
ब्रजराज महाराजा सूरजमल

उत्तर भारत का भगवान
उत्तर भारत का भगवान महाराजा सूरजमल

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल जी की।

Thursday, 9 August 2018

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान-बलिदान गाथा

महाराजा सूरजमल का द्वितीय दिल्ली अभियान व बलिदान गाथा-1763

महाराजा सूरजमल
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की नजरों में दिल्ली सदा खटकती रहती थी।वे दिल्ली को मुगलों से मुक्त करवाकर गुलामी का कलंक धोने की इच्छा रखते थे। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1753 में भी दिल्ली पर आक्रमण किया था व ज्यादातर जीत ली थी। पर कुछ गद्दारों के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी थी।

बात 1763 की है दिल्ली के मुगल दरबार मे एक ब्राह्मण काम करता था।उसकी बेटी चन्दनकौर बहुत सुंदर व धर्म परायण थी। बादशाह ने एक दिन उसे देख लिया और उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की।लेकिन धर्मपरायण चन्दनकौर ने शादी से मना कर दिया तो बादशाह ने उसे जेल में डाल दिया।वहां एक मेहतरानी ने चन्दनकौर को सलाह दी के पूरे हिंदुस्तान में सिर्फ एक ही हिन्दू सम्राट है जो अबलाओं व धर्म की रक्षा करने के लिए दिल्ली से भी टक्कर ले सकता है।और वह है भरतपुर में बैठे जटवाड़े के शासक महाराजा सूरजमल।
किसी तरह से चन्दनकौर ने खत लिखकर अपनी माता के माध्यम से अपना दुःख महाराजा सूरजमल के दरबार तक पहुंचाया।
महाराजा सूरजमल ने जब खत पढ़ा और उसकी माता की व्यथा सुनी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।परन्तु दिल्ली से टक्कर लेने का मतलब था पूरे हिंदुस्तान से टक्कर लेना।हर मुसलिम से व हर सेक्युलर हिन्दू से टक्कर लेना।और इसके लिए सालो मेहनत की आवश्यकता होती है।परन्तु उन्होंने कुछ भी न सोचा और अपना  वीर सैनिक हरचंद गुर्जर को दिल्ली भेजा।

वहां जाकर हरचंद ने महाराजा सूरजमल का संदेश नजीब को सुनाया व चन्दनकौर को रिहा करने का आदेश सुनाया।मगर नजीब ने कुछ न सोचा उस मूर्ख ने हरचंद के साथ साथ महाराजा सूरजमल को भी अपमानित करने के लिए कहा कि जा उस सूरजमल को कह देना की अपनी जाटनी भी साथ ले आएगा।महारानी का अपमान सुनते ही वीर हरचंद ने अपनी तलवार निकाली और कहा कि नजीब अगर महाराज दिल्ली आए तो गिड़गिड़ायेगा तू हम अपनी माता व अपने राज्य का अपमान कभी नही सहेंगे।यह कहते हुए उसने नजीब पर हमला बोल दिया लेकिन पूरा दरबार ही नजीब का था।चारों तरफ से सैनिकों ने हमला कर दिया।जिसमें कई मुल्लो को मारकर हरचंद शहीद हो गया।

यह खबर महाराजा सूरजमल तक पहुंची तो वे आग बबूला हो उठे।और अपनी सेना को दिल्ली की ओर मुख करने का आदेश दिया।चूंकि महाराजा सूरजमल दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी पहले से ही कर रहे थे परंतु सही समय नहीं आया था।इस घटना के होने के कारण उन्होंने पहले ही आक्रमण करने की ठान ली।
तैयारियां पूरी नहीं थी उनके मंत्री रूपाराम कटारा ने उन्हें समझाया भी।मगर महाराजा ने कहा कि एक दुष्ट एक हिन्दू बेटी को कैद किये हुए है  और हम सबको ललकार रहा है।हमारे दूत भेजे हुए वीर सैनिक को भी उसने नहीं बख्शा।उनके मंत्री ने कुलपुरोहित से भी कहलवाया कि यह समय ग्रहदशा के अनुसार ठीक नहीं है।परन्तु महाराजा सूरजमल ने कहा कि वीर जब चले तभी समय है।विजय या वीरगति।

आखिरकार दिल्ली पर आक्रमण कर दिया गया।हिंडन नदी तक कब्जा करके उसे पार कर लिया गया।गाजियाबाद पर भी महाराजा सूरजमल की प्रतापी सेना ने कब्जा कर लिया।जोरदार तोड़फोड़ की।नजीब का कलेजा हिल गया।उसने तत्काल महाराजा सूरजमल को खत लिखा व उनकी शर्त स्वीकार कर ली और चन्दनकौर को सुरक्षित भेज दिया।और युद्ध विराम करने का आग्रह किया।लेकिन महाराजा सूरजमल को तो वीर हरचंद के बलिदान का भी प्रतिशोध लेना था।उन्होंने उत्तर दिया कि डर क्यों रहे हो नजीब बाहर निकलो मैं इतनी दूर आ गया तुम दो कदम नहीं आ सकते क्या?आजा दम है तो छूकर दिखा चरणों की धूल को ही।महान जाट क्षत्राणी महारानी किशोरी देवी भी मेरे साथ है।

फिर दोबारा से युद्ध शुरू हो गया जाट सेना ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए।नजीब के हालात पतले हो गए थे।ज्यादातर दिल्ली पर भगवा पभुत्व कायम हो गया था।

फिर एक दिन युद्ध चल रहा था तो दोपहर को ही महाराजा सूरजमल को महारानी की चिंता हुई।वे अकेले ही अचानक से उनसे मिलने के लिए शिविर में आ गए।उनको देखकर वे युद्ध देखने लगे गये। उनका पुत्र नाहर सिंह व सेनापति मंशाराम जाट वीरता से लड़ रहे थे।उनका ध्यान उसी तरफ था।तभी एक मुगलों के लुटेरे सरदार ने उन्हें निहत्थे खड़े देख लिए।महाराजा सूरजमल का ध्यान नहीं गया और वे नदी किनारे कुछ सैनिको के साथ टहलने लगे।और युद्ध क्षेत्र से थोड़े दूर निकल गए। झाड़ियों में छिपते छिपते मुगल सैनिक भी वहां आ गए। उन्होंने अचानक से हमला कर दिया।सब वीरता से लड़े थे।परन्तु पीछे से झाड़ियों में से दो तीन गोली मुगल सैनिक की उनके शरीर में लगी।इसके बाद मुगल सैनिकों ने उन पर तलवारों से प्रहार किया।महाराजा सूरजमल शहीद हो गए।पीठ पीछे वार करके धोखे से व युद्ध नियमो का उल्लंघन करके भी मुगल सैनिक डरे हुए थे व उन्हें विस्वास नहीं हो रहा था कि सूरजमल का मरना भी सम्भव है।महाराजा सूरजमल का कोई अंग उनके परिवार को नहीं मिला।सिर्फ एक दांत से ही समाधि बनाई गई थी।

जाट सेना अगले दिन तक अनुशासन में लड़ती रही क्योंकि उन तक एक दिन तक कोई खबर नहीं पहुंची थी।युद्ध अब भी पूर्ण रुप से हिन्दू वीरो के ही हक में था।लेकिन जैसे ही यह खबर उनके बेटे नाहर सिंह तक पहुंची तो वे दुखी हो गए व सेना को वापिस भरतपुर चलने का आदेश दिया और महाराजा सूरजमल की तलाश करने को कहा क्योंकि कई दिनों तक किसी को भी इस अनहोनी पर विस्वास नहीं हुआ था।इस तरह महाराजा सूरजमल अपने जीवन काल में युद्ध के मैदान में कभी भी पराजित नहीं हुए।

उस समय उनके वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह फरुखनगर में थे व नवविजित किलो की रक्षा कर रहे थे। जब यह खबर उन तक पहुंची तो वे प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठे।
आगे आपको बताया जाएगा कि उन्होंने क्या प्रतिज्ञा ली।व किस तरह एक बार फिर दिल्ली पर चढ़ाई की।

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

जय सूरजमल। जय भवानी।

गुड़गांव के शीतला माता मंदिर निर्माण कथा- हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

माता के आशीर्वाद से हिन्दू सम्राटों ने की बढ़ई की कन्या की रक्षा व मन्दिर निर्माण कथा

महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल
शीतला माता मंदिर निर्माण कथा
महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा सूरजमल

गुड़गांव का शीतला माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध व भव्य मंदिर है यहां दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं।महाभारत के समय गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी माता कृपी यहां सती हुई थी।

बात 1750 के आस पास की है।गुड़गांव के पास के गांव(हरियाणा) में एक गरीब बढई रहता था।उसकी एक बहुत सुंदर कन्या थी।उसकी सुंदरता का जिक्र दिल्ली के दरबारों तक भी पहुंच गया था।कहते हैं कि दिल्ली के मुस्लिम बादशाह ने अपने कुछ दूत भेजकर बढई को संदेश भिजवाया कि बादशाह वह अपनी बेटी को 10 दिन के अंदर अंदर दरबार में पहुंचा दे वरना ठीक नहीं रहेगा। बढ़ई बेचारा क्या करता वह रोने लगा।फरियाद लेकर खाप पंचायत के पास गया।पंचायत ने कहा कि बादशाह से लड़ने के लिए बहुत ज्यादा हथियार चाहिए जिसका प्रबंध फिलहाल हमारे पास नहीं है।
इसलिए फैसला हुआ कि वह महाराजा सूरजमल से प्रार्थना जरूर करें।धर्मप्रतापी महाराज उनकी जरूर मदद करेंगे।

बढई ने वैसा ही किया वे भरतपुर दरबार में पहुंचे।और अपनी व्यथा महाराज सूरजमल को सुनाई।महाराजा सूरजमल यह सुनकर क्रोधित हो उठे व तुरंत अपने वीर प्रतापी पुत्र महाराज जवाहर सिंह को बुलाया।और बढ़ई को कहा कि वह निश्चित होकर घर जाए आपकी बेटी हमारी बेटी है।और हम अपनी छत्रछाया में हिन्दुओ की पगड़ी पर कभी भी दाग नहीं लगने देंगे।

उसके बाद उन्होंने हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह को बढई व उसकी कन्या की रक्षा हेतु भेजा।
महाराज जवाहर सिंह अपनी रुद्रांश जाट सेना के साथ चल पड़े।जब रास्ते में माता कृपी की मढ़ी आयी तो उन्होंने वहां माता से विजयश्री का आशीर्वाद मांगा व विजय के बाद ऊनका पक्का मन्दिर बनवाने की प्रतिज्ञा भी ली। कुछ लोगो का कहना है कि माता की मढ़ी के पास आकर महाराज के घोड़े रुक गए थे व आगे नहीं चले।तब ऊनका ध्यान मढ़ी की तरफ गया था।फिर आशीर्वाद प्राप्त किया।

फिर जवाहर सिंह बढ़ई के घर पहुंचे अगले दिन बादशाह के मुस्लिम सैनिक वहां आये तो जवाहर सिंह ने उन्हें बुरी तरह मारा और पिशाच बादशाह को संदेश भेजा कि यह हमारी बहन है आंख उठाकर भी देख लेना।यह तकती पर लिखकर मुस्लीक सैनिको के गले मे टांगकर उन्हें दिल्ली की तरफ भगा दिया।बादशाह ने भी शक्तिशाली महाराज सुरजमल से पंगा लेना ठीक न समझा और अपनी इच्छा त्याग दी।

इस प्रकार महाराजा जवाहर सिंह ने उस कन्या की रक्षा की व वापिस भरतपुर आकर महाराजा जवाहर सिंह ने माता शीतला(कृपी) के बारे में बताया।

 फिर महाराजा सूरजमल ने वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण किया और महाराज जवाहर सिंह ने स्वयं अपने कर कमलों से वहां सवा किलो सोने की मूर्ति स्थापित की।

एक बार फिर कईं सालों बाद किसी बादशाह ने वहां से मूर्ति हटवाकर तालाब में फिंकवा दी थी तो वहां के एक बहुत बड़े जमींदार दादा सिंघा कटारिया जाट ने उस मूर्ति को पुनः स्थापित किया था व अपना महल और बहुत सी जमीन मन्दिर के नाम कर दी थी।कहते हैं कि उस समय माता के भक्त सिंघा जाट के चरणों को छूने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।आज भी दादा सिंघा के वंशज गुड़गांव में रहते हैं।यह मंदिर 500 गज से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है।अब यह मन्दिर सरकार के अधीन है।
हिन्दू वीर शिरोमणि
Maharaja Jawahar Singh

माता शीतला की बहुत मान्यता है और उन्हें मऊ जनपद की कुलदेवी भी माना जाता है।बहुत दूर दूर से भक्त माता की पूजा करने के लिए इस मंदिर में आते हैं और यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

जय शीतला माता की

Thursday, 10 May 2018

महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान2

प्रथम दिल्ली विजय अभियान (महाराजा सूरजमल)भाग-2

प्रथम भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें-महाराजा सूरजमल दिल्ली विजयगाथा भाग-1
अंतिम महान युद्ध
अंतिम हिन्दू सम्राट
हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल

अब तक हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल के अधिकार में दिल्ली के ज्यादातर महत्वपूर्ण हिस्से आ चुके थे।लेकिन मुगल सैनिकों ने रात को धोखे से हमला करके कुछ क्षेत्रों से चौकियां हटवा दी थी।
साथ ही अगले दिन महाराजा सूरजमल को खबर मिली के मुगलो के लिए कुछ अवसरवादी मुस्लिम सरदार पहुंच रहे हैं।
मुगल सेना ने अपनी मोर्चेबन्दी तैयार कर ली व उन्होंने अपनी ज्यादातर सेना इस युद्ध मे एक साथ लगा दी।

महाराजा सूरजमल ने भी रात्रि को ही अपनी सेना व्यवस्थित की। महाराजा जवाहर सिंह भी ससैन्य पहुंचे व जायजा लिया। उन्होंने 29 सितंबर प्रातःकाल मुगल सेना के आक्रमण करने से पहले ही मुगलों पर एक जोरदार आक्रमण कर दिया।एक भीषण लड़ाई छिड़ गई।महाराजा सूरजमल स्वयं इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे।हिन्दू वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने छोटी बड़ी तोप,गजनाल से सुसज्जित होकर पूर्ण वेग से मुगलई सेना पर प्रहार शुरू कर दिए।सामने खड़े मुगल समर्थित मराठा दलों पर भयंकर आक्रमण किया गया। बहुत से मुगल मराठा सैनिक मारे गए।तभी अबू तुराब खां, हमीदुद्दौला, हाफिज खां व जमिलुद्दीन बड़ी तोपें लेकर आये व मुगल सेना में मिल गए।भयंकर तीपो के प्रहार चल रहे थे। बराबर का युद्ध जारी था।सगदरजंग का मीर बक्शी थोड़ा सा घायल हो गया और व भाग खड़ा हुआ।महाराजा सूरजमल ने उसे इस कायरता के लिये बहुत धिक्कारा।फिर उन्होंने वीर जाट यौद्धा पखरमल को रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए भेजा।मुगल सेनापति इमाद के हाथी को एक गोलग लगा व हाथी मर गया। इमाद हाथी से कूदकर सुरक्षा घेरे में भाग गया। शाम तक युद्ध चलता रहा।
फिर सेना छावनी में आ गयी।
अगली सुबह 30 सितंबर को मुगल सेनापति इमाद व नजीब खां ने अचानक मन्जेसर सीही ग्राम पर आक्रमण कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया।
लेकिन कुछ समय बाद ही महान यौद्धा राजा बल्लू सिंह(बल्लभगढ) व जाट यौद्धाओ छत्रसाल,रामबल,जोधसिंह और और पाखरमल ने इमाद का सामना किया और भयंकर संघर्ष के बाद मुगल सैनिक को खदेड़ दिया व वह दिल्ली की ओर भाग निकला।

इसके कुछ समय बाद जयपुर नरेश माधोसिंह कच्छवाहा वहां पहुंच गए।इमाद व मुगल सम्राट ने उनकी आवभगत की और उनसे आग्रह किया कि वे महाराजा सूरजमल को समझाये व सन्धि का रास्ता इख्तियार करें।
फिर राजा माधोसिंह हरसौली गढ़ी पहुंचे और वहां महाराजा सूरजमल के साले कृपाराम व दानिराम जी से मिले और सन्धि का प्रस्ताव दिया। चौधरी दानिराम व कृपाराम ने उनका संदेश महाराजा तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।

इसके बाद महाराजा सूरजमल,उनके मंत्री,सेनापति ने इस पर मन्त्रणा की। सबने विचार किया कि बहुत से मुगल सरदार इस्लाम के नाम पर दिल्ली सेना में आ चुके हैं।दक्षिण से कई मराठा सरदार और पहुंच रहे हैं। अगर हामने आगे युद्ध किया तो हम हो सकता है कि सिंहासन उखाड़ फेंके लेकिन इतना रक्तपात होगा कि कुछ नहीं बचेगा।जनता का बुरा हाल हो जाएगा।
साथ ही महाराजा माधोसिंह की बात न स्वीकारी गयी तो यह उनका अपमान होगा और वे सीधे तौर पर नहीं तो पीछे से मुगल सत्ता का साथ देंगे।

इस तरह हिंदुत्व एकता में कमी रहने के कारण महाराजा सूरजमल ने विचार किया और सन्धि की शर्तें रखी के
1.जितना भी क्षेत्र उनके कब्जे में आ चुका है वह उनके ढ़ूं ही रहेगा।
2.सफदरजंग को अवध व इलाहाबाद का वापिस वजीर नियुक्त किया जाए।(इससे सुरजमल महाराज की पीठ दिल्ली दरबार में बनी रहेगी व वे वहां के निर्णयों को प्रभावित्त कर सकेंगे)

जब तक उनकी ये बाते नहीं मानी जायेगी तब तक जाट अपनी तलवार म्यान में नहीं डालेंगे।भले ही कुछ भी परिणाम हो।
मुगल बादशाह सोच रहा था कि वह सुरजमल को झुकायेगा लेकिन यहां तो सब उल्टा हो गया। उसने लाख कोशिश की के वह इन शर्तों को माने बिना ही युद्ध विराम करवा दे लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

इसके बाद दिल्ली के ज्यादातर जीते हुए क्षेत्रों पर हिन्दू सम्राट का अधिकार हो गया।मुगलों को एक हिन्दू सम्राट के आगे झुकना पड़ा।
और आपसी हिन्दू एकता न होने के कारण दिल्ली के सिंहासन पर भगवा झंडा लहराते लहराते रह गया।महाराजा सूरजमल दिल्ली जीतकर भी दिल्ली के सम्राट न बन पाए। हिन्दुओ इत्तिहास से सबक लो आज भी वही स्तिथि है दिल्ली पर हर बार हिन्दू प्रधानमंत्री ही हइट है लेकिन हमारी एकता में कमी के कारण आज भी मुस्लिम तुष्टिकरण की ही राजनीति चलती है।

 ईतिहासकार वेंदेल के अनुसार 'मुगल अहंकार की इतनी कठोर और इतनी सटीक पराजय इससे पहले कभी नहीं हुई थी'। वस्तुतः मुगल सत्ता का गर्वीला और भयावह दैत्य धराशायी हो चुका था।

इस युद्ध के परिणाम यह रहे कि पूरे भारत व अस यर्स के देशों मे महाराजा सुरजमल की ख्याति फैल गयी।दिल्ली के बहुत से हिस्सो को आजाद करवा लिया गया व मुगल सत्ता के अहंकार व शासन को बहुत अधिक कमजोर कर दिया गया।

आपको बता दें कि इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने एक बार और व उनके बेटे महाराजा जवाहर सिंह ने भी एक बार दिल्ली पर आक्रमण किया व मुगल सत्ता को न के बराबर कर दिया।

यूं ही आजादी नहीं मिली वीरों ने प्राण गवाएं थे।
कभी दुष्टों सिर काटे, कभी अपने शीश कटवाए थे।।

जय हिन्दू ह्र्दय सम्राट महाराजा सूरजमल की

हिन्दू वीर photos
महाराजा सूरजमल
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महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान

प्रथम दिल्ली विजय अभियान(महाराजा सूरजमल)भाग-1
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पृष्ठभूमि
महाराजा सूरजमल photos
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल ने तलवार की नोंक पर चलकर बहुत ही समझदारी से 1750 तक एक विशाल साम्राज्य बना लिया था।
उन्होंने आस पास के मेव मुस्लिम, रुहेले अफगान,छोटे मुगल परस्त फौजदार, व धर्महीन राजाओ को धीरे धीरे हटा दिया या उन्हें कमजोर कर दिया था।
अब उन्हें तलाश थी कुछ बड़ा करने की।वे मौके की तलाश में थे व दिल्ली की गतिविधियों पर नजर गड़ाए बैठे थे। उन्होंने दिल्ली दरबार के कई महत्वपूर्ण लोगो को अपनी तरफ कर लिया था।

आखिर 1752 में महाराजा सूरजमल के पास वह मौका आ ही गया जिसका इन्हें इंतजार था।दिल्ली के मुगल सुल्तान अहमद शाह व उसके वजीर सफदरजंग के बीच गृह युद्ध छिड़ गया था।
यह वही सफदरजंग था जो एक बार तो महाराजा सुरजमल को युद्ध के मैदान में बुलाकर उनके डर से खुद नहीं पहुंचा था और एक बार उनसे हार भी चुका था।तब इसने माफी मांग ली थी व वफादारी का वादा किया था।

तब यह ग्रह युद्ध जारी रहा दिल्ली के एक सुन्नी व शिया मुसलमान के बीच तनातनी को सुरजमल ने यूं ही चलने दिया और सही मौके का इंतजार करने लगे।
लोहा गर्म होते ही महाराज सूरजमल ने 30 अप्रैल 1753 को सफदरजंग में पक्ष में दिल्ली में ताल ठोक दी। उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।
महाराजा सूरजमल सिर्फ 15000 घुड़सवारों व अपनी पैदल सेना लेकर पहुंचे थे जबकि दिल्ली के मुगल बादशाह अहमद शाह के पास 1.5 लाख की फौज थी।
महाराजा सूरजमल की सेना में जाट, नागा साधू, ब्राह्मण, गुर्जर, दलित, राजपूत आदि सब हिन्दू जाती के लोग थे।
अहमद शाह की सेना में मुस्लिम व कुछ धर्म हिन हिन्दू भी शामिल हुए थे।

30 अप्रैल की रात्रि महाराजा सूरजमल ने फरीदाबाद में बिताई व सुबह गुड़गांव में शीतला माता मंदिर में पूजा की।यह भव्य मंदिर मजराजा सुरजमल ने ही बनवाया था।पहले यहां महाभारतकालीन एक छोटा सा चबूतरा था।

लेकिन महाराजा सूरजमल के पहुंचने से पहले ही सफदरजंग को उसकी सेना में से 23000 मुस्लिम सैनिक धोखा दे गए व दिल्ली के सुल्तान की तरफ जा मिले।
लेकिन महाराजा सूरजमल ने इसकी जरा भी चिंता नहीं की।क्योंकि वे दिल्ली अपने दम पर जितने आये थे सफदरजंग का तो सिर्फ नाम ही था।

आपको बता दें कि महाराजा सूरजमल ने मुख्यतया बड़े लेवल पर दो बार दिल्ली पर आक्रमण किया था व उसे जीता था। एक बार 1753 मे जिसकी हम बात कर रहे हैं और एक बार 1763 में। वैसे उन्होंने दिल्ली पर कुछ अन्य आक्रमण भी किये थे जिनका जिक्र फिर कभी किया जाएगा।

 पुरानी दिल्ली पर भगवा राज
अंतिम हिन्दू सम्राट
महाराजा सूरजमल

(महाराजा सूरजमल दिल्ली में और इस्लाम खतरे में)

सुरजमल महाराज ने युद्ध की रणनीति बनानी शुरू कर दी। महाराजा सुरजमल के हौसले को देखकर मुगल बादशाह घबरा गया उसने अपने एक वकील महबूब द्दीन को औरंगाबाद से मलहराव होल्कर को बुला लाने के लिए भेजा। लेकिन पलवल के निकट रास्ते मे ही उसे महाराजा सूरजमल के सैनिको ने पकड़ लिया व बंदी बना लिया।
फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को उकसाया कि 15000 रूहेले अफगानों के साथ आ रहे नजीब को रास्ते मे ही पकड़ ले लेकिन कायर व अय्याश सफदरजंग इसमे कामयाब न हो सका।

फिर महाराजा सूरजमल ने स्वयं ही मोर्चा संभाला और 9 मई को पुरानी दिल्ली की अनाज मंडी पर हमला कर दिया ताकि मुगलो की रसद राशन की लाइन टूट जाये।
उनके सेनापति राजेन्द्र गिरी गोंसाई के साथ नाग साधु व जाट सैनिकों ने प्रातः 10 मई को अनाज मंडी पर कब्जा कर लिया।इसी पहली जीत की खुशी में हर वर्ष दिल्ली विजय दिवस मनाया जाता है।
राजेन्द्र गिरी गोंसाई एक साधु थे उनकी नागा बाबाओं की सेना महाराजा सूरजमल के दल में शामिल हुई थी जिसका नाम महाराजा सूरजमल ने रामदल सेना रखा था।
इसके बाद महाराजा सूरजमल के वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने लाल दरवाजे के पास शहर के पूर्वी हिस्से, सैयद्द बाड़ा,पँचकुई,अब्दुल्ला नगर, तारक गंज व बिजल मस्जिद के आस पास के इलाकों,चुनरिया,वकिलपुरा पर कब्जा कर लिया। अब पुरानी दिल्ली का ज्यादातर हिस्सा जाटो के कब्जे में था भगवा हर जगह छा रहा था। महाराजा सूरजमल के वीर सिपाही गिरिराज महाराज का जयकारा लगाते हुए दिल्ली की गलियों में राजा की तरह घूम रहे थे। जहां भी मुगल समर्थित मुस्लिम व्यापारी, सैनिक दिखाई दिया वहीं उसका काम तमाम कर दिया गया।
लोगो का खून चूसकर बनाई गई बड़ी बड़ी हवेलियों को तोड़ दिया गया व उनमें जितना भी माल था वह कब्जे में करके सेना के गरीब सैनिको में बांट दिया गया।

पूरे शहर को आतंकित करके तहलका मचा दिया गया। बहुत से मुगल व्यापारी व कर्मचारी मौका देखकर दिल्ली से भाग रहे थे।उनमे से कईयो को जटवाड़ा सिपाहियों ने कब्जे में ले लिया।
उस समय दिल्ली में सफदरजंग की सेना के शिया मुस्लिमो को छोड़कर ऐसा कोई मुस्लिम नहीं था जिसका कलेजा डर के मारे जोर जोर से न धड़क रहा हो।और यह डर जरूरी है।

पुरानी दिल्ली में महाराजा सूरजमल के इस तांडव को देखकर शहंशाह कांपने लग गया था। उसने तुरंत अपने वजीर की छुट्टी कर दी व इन्तिजाम उद दौला को नया वजीर नियुक्त किया।

अहमद शाह ने नारा दिया कि "सुरजमल दिल्ली में है और इस्लाम खतरे में है"
उसने सभी सुन्नी मुस्लिमो को अपने पक्ष में कर लिया व धर्मगुरुओं को भी यह नारा लगाने को कहा कि इस्लाम खतरे में है इन निर्दयी जाटो को सबक सिखाओ।

इस तरह महाराजा सूरजमल ने पुरानी दिल्ली के बहुत से हिस्सो पर कब्जा कर लिया व इस्लाम उनकव देखकर खतरे में आ गया। इसी खौफ भरे दिन को मुगलों के इत्तिहास में में जाटगर्दी के नाम से जाना जाता है।
और इसी दिन जनता का खून चूसने वाले मुगलो की हवेलियां तोड़ने व उनके ऊपर तांडव करने और उनके धन को छीनकर गरीब सैनिको को बांटने को मुगलों की नाजयज औलाद वामपंथी इत्तिहासकर दिल्ली की लूट कहते हैं।

दिल्ली में अलग अलग जगह युद्ध,वीरों के बलिदान

पुरानी दिल्ली के महत्वपूर्ण हिस्सो पर कब्जा करने के बाद मुगल शहंशाह काफी बौखला गया था उसने इस्लाम खतरे में है क्योंकि सुरजमल दिल्ली में है यह कहकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश की।
साथ ही उसने महाराजा सूरजमल को दूत भेजकर दरबार मे भारी सम्मान जागीरें आदि का वादा करके लोभ में लाने की कोशिश की लेकिन हिन्दुआ सम्राट ने शहंशाह के लिये कहा कि कायरता को लोभ लालच से छुपाना छोड़ दो अहमद शाह,अगर बाजुओं में दम है तो मैदान में आकर सीधे लड़ो।
फिर 17 मई को महाराजा सूरजमल ने मुगलो को गाजर मूली की तरह काटकर फिरोजशाह कोटला किले पर कब्जा कर लिया।मुगल सेना ने किले पर तोपें चढ़ा दी व गोले फेंके लेकिन हिन्दू वीर जाट अपनी जगह पर अडिग खड़े रहे और धीरे धीरे मुगलिया सेना को खत्म करने लग गए और हिन्दू वीर सेना के सामने मुगल नहीं टिक सके।

इसी बीच छोटे मोटे हमले चलते रहे।12 जून को ईदगाह के ब
पास एक मुठभेड़ हुई। निहत्थे हिन्दू सैनिकों पर मुगलो ने अच्चानक हमला कर दिया।इस युद्ध मे कई हिन्दू वीर जाट सैनिक शहीद हुए।
14 जून को तालकटोरा की लड़ाई हुई जिसमें मुगलों की बक्कल सी उतार दी गयी।इस युद्ध मे महाराजा सूरजमल के एक वीर उपसेनापति राजेंद्रगिरी गौसाई शहीद हो गए जिससे बहुत बड़ा झटका जाट सेना को लगा। लेकिन मुगलों की सेना इससे भी ज्यादा हिल चुकी थी।यहां एक वीर सेनापति सुरतिराम जी भी शहीद हुए।

तालकटोरा लड़ाई को भले ही जीत लिया गया हो लेकिन यह बहुत बड़ा झटका था।सफदरजंग की सेना के बहुत से सैनिक व उसके रिश्तेदार महाराजा सूरजमल को छोड़कर शहंशाह की सेना में चले गए।

शनशाह ने राजा देवी दत्त और रामनाथ को महाराजा सूरजमल से शांति वार्ता व सन्धि के लिए भेजा लेकिन यह असफल रही। दिल्ली का मुगल बादशाह थर्रा रहा था कि यह किस मिट्टी का बना हुआ है?

इसी बीच एक जुलाई को एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें तोपखाने को बड़े स्तर पर प्रयुक्त किया गया।शहीद सुरतिराम का भाई जाट बख्शी गौकुलराम अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था और इस सेना में वह हत्यारा भी था। गौकुलराम ने क्रुद्ध होकर जाट सेना के साथ मुगलो पर हमला कर दिया। इस भयंकर युद्ध मे मुगलो के पांव उखेड़ दिए।मुगल भाग खड़े हुए लेकिन गौकुलराम को एक गोला लगा जिसमे वह बुरी तरह से घायल हो गया। महाराजा सूरजमल ने उसे सम्भाल उसके अंतिम शब्द यही थे कि महाराज जी उनका पीछा करो वे बचने नहीं चाहिए। महाराजा सूरजमल को अपने वीर बक्शी की मृत्यु का बहुत धक्का लगा उन्होंने बिजली से वेग से मुगलो का पीछा किया व दोनो वीरों की शहादत के जिम्मेदार दुष्टो व अनेकों मुगल सैनिको को काटकर फेंक दिया।

फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को कहा कि हमें शत्रु को खुले में सीधे आमने सामने भिड़ने के लिए  मजबूर किया जाए। इसलिए रणनीति के तहत महाराजा सूरजमल 16 जुलाई को वीर भूमि तिलपत पहुंच गए।
तिलपत वहीं वीर भूमि है जहां पर वीर गौकुला के नेतृत्व में धर्म रक्षा हेतु औरँगेजेब के खिलाफ लड़ते हुए हजारों जाट शहीद हुए थे।

इसी बीच मुगलों की रूहेला फौज ने दिल्ली के पास के कुछ इलाकों में रात्रि को आम नागरिकों पर हमला किया व धन दौलत लूटी और कई औरतों का अपमान किया।

इस पर हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने बेटे वीर जवाहर सिंह, बल्लभगढ के राजा बलराम सिंह व उनके साथ ही राज गुजर को रुहेलों को दंड देने के लिए भेजा।महाराजा जवाहर सिंह ने रुहेलों के किले गढ़ी मैदान पर हमला कर दिया।एक लंबी व भीषण लड़ाई छिड़ गई। रुहेले मुल्लो को गाजर मूली की तरह काट दिया गया।सिर्फ वे ही बचे जो युद्ध के बीच मे ही मौका देखकर भाग निकले थे।इस तरह महाराज जवाहर सिह ने हिन्दुओ के अपमान का बदला लिया।

मुगलिया सल्तनत हिल गयी थी लेकिन इसी बीच 2000 जेटा गुजर व 4000 मराठे मुगलो के पक्ष में आ गए। मुगलो ने उन्हें लड़ने के लिए पैसा देने का वादा किया था।

लेकिन अब भी महाराजा सूरजमल ने जरा भी चिंता नहीं की।
30 जुलाई रमजान के दिन महाराजा सूरजमल व शाही सेना के बीच झड़प हुई लेकिन अंततः मुगलो को ही भागना पड़ा।रमजान की नमाज उनके भाग में नहीं रहने दी गई।
इसी तरह कई जगह छिटपुट लड़ाई चली रही।19 जुलाई को जाट सेनापति शिवसिंह व मुगल सेना समर्थित मराठे आमने सामने हो गए।एक दिशन युद्ध हुआ बहुत से जाट व मराठे मारे गए। हिन्दू वीर शिवसिंह अपनी धर्मरक्षा पर अडिग रहे उनके पांव में एक भाला लग गया जिसके कारण वे घायल हो गए। युद्ध अनिर्णायक रहा।रात्रि होते ही युद्ध समाप्त हो गया हिन्दू वीर जाट व मुगल समर्थित मराठे अपने अपने शिविरों में चले गए।
शिवसिंह का यह घाव संक्रमित हो गया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी।

फिर 5-6 सितंबर को 5000 जटवाड़ा सिपाही फरीदाबाद में मुगलो से भिड़ गए। मुगलिया सेना को मैदान छोड़कर भागना पड़ा।मुगलो की रसद का मार्ग काट दिया गया। हालांकि इस कार्यवाही में वीर जाट सरदार मोहकम सिंह जी शहीद हो गए।

इसके बाद मुगलों का सेनापति इमाद बुरी तरह से घबरा गया था उसने होल्कर व शिंदे से सहायता मांगी व उन्हें 1 करोड़ रुपए व अवध और इलाहाबाद की सूबेदारी देने का वादा किया।इससे मुगलों की ताकत और बढ़ गयी।

तगलकाबाद के यमुना तट पर भी मराठों व जाटों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ।यह ययध लंबा चला लेकिन अंत मे मुगल समर्थित मराठों को ही पीछे हटना पड़ा।
यहां महाराजा सूरजमल के वीर पुरोहित घमंडीराम(ब्राह्मण) जी घायल हो गए थे। महाराजा सूरजमल स्वयं उन्हें अपने घोड़े पर बैठाकर शिविर में लेकर गए व वहां उपचार शुरू करवाया।

दिल्ली की तरफ से फिर समझौते के लिए निमंत्रण आया लेकिन विफल रहा।

इस समय तक महाराजा सूरजमल दिल्ली के बहुत से हिस्सों पर काबिज थे लेकिन अब मुगलों के सेनापति इमाद की शक्ति बढ़ती जा रही थी।उसकी सेना की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।जिसकी चिंता महाराजा सूरजमल को ही नहीं बल्की मुगल शंहशाह अहमद शाह को भी हो रही थी। अब मुगल बादशाह को लग रहा था कि अगर सुरजमल से पीछा छूट गया तो इमाद से कौन बचाएगा उसे डर था कि कहीं इमाद बाद में विद्रोह न कर  दे व स्वयं राजा ना बन जाये।
अब मुगल बादशाह को सुरजमल के अलावा इमाद का भी भविष्य में डर था।
महाराजा सूरजमल की सेना सशक्त थी लेकिन अब इमाद की सेना संख्या में इतनी हो गयी थी के सशक्ति से भी काम न चलना था।

कायर मुगल बादशाह ने जयपुर के महाराजा माधो सिंह कच्छवाहा को सन्धि करवने के लिए बुलाया।

अंतिम महान युद्ध
आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें- महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजयगाथा -भाग 2



Monday, 30 April 2018

महाराजा सूरजमल ने इस मस्जिद को तोड़कर मन्दिर बना दिया था

जब महाराजा सूरजमल ने उषा मस्जिद को तोड़कर वापिस उषा मन्दिर बनाया-
महाराजा सूरजमल - भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट
अंतिम हिन्दू सम्राट जाट
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल
बयाना की उषा मस्जिद को तोड़कर उषा मन्दिर बना दिया

आज हम देख रहे हैं कि हिंदूवादी सरकार व इतनी जागृति होते हुए भी अयोध्या में हमारे आराध्य श्री राम का मंदिर नहीं बन पा रहा है।

लेकिन एक समय ऐसा भी था कि एक हिन्दू सम्राट ने मस्जिद को हटाकर वापिस मन्दिर बना दिया था।
राजस्थान के बयाना शहर में एक उषा मन्दिर है जो 965 इशवी में कन्नौज के राजा महिपाल की रानी चित्रलेखा ने भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी माता उषा देवी के नाम से बनवाया था।

फिर समय के साथ बदलाव आया और इस क्षेत्र पर मुस्लिमो का शासन हो गया। गुलामवंशी शासक दुष्ट अल्तमश ने 1224 में इस मंदिर को तोड़कर यहां उषा मस्जिद बना दी।
लेकिन समय सदा एक सा नहीं रहता जल्द ही पास ही एक महान हिन्दू शेर महाराजा सुरजमल का जन्म हुआ और 1715 में महाराजा सूरजमल के पिता महाराजा बदन सिंह ने इस जगह से मुस्लिमो को हटाकर हिंदुआ शासन स्थापित किया।हालांकि महाराजा बदन सिंह का जीवन संघर्षमय था उनका ध्यान आंतरिक व बाहरी दुश्मनों से लड़ने में ही रहा।

फिर कुछ वर्षों बाद जब महाराजा सूरजमल को अपनी पूर्वज उषा माता(महाराजा सूरजमल भगवान श्री कृष्ण के वंशज थे) के मंदिर के हालात पता चले तो वे क्रुद्ध हो उठे।

बयाना
उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि मस्जिद को वहां से हटाया जाए, ऐसा सुनते ही उनकी हिन्दू वीर जाट क्षत्रिय सेना ने कुछ ही समय मे मस्जिद उस जगह से हटा दी उसके बाद सम्राट ने हवन यज्ञ आदि करके विधि विधानपूर्वक वहां मन्दिर की दोबारा से स्थापना की।यह मंदिर आज भी है और बयाना की शान ऊंची कर रहा है।वहां एक उषा मस्जिद भी है जो इसी के आस पास है जो मुस्लिमो ने बाद में बचे हुए ढांचे से बनाई थी।
Bayana

आज फिर हमे महाराजा सूरजमल जैसे शासकों की जरूरत है जो हमारे धर्म के साथ न्याय कर सके और हमारी संस्कृति व स्वाभिमान की रक्षा कर सकें
                     महाराजा सूरजमल

जय हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल की।जय जटवाड़ा स्वाभिमान।

Sunday, 1 October 2017

गौरक्षक पीपल रक्षक हिन्दू सम्राट महाराजा सूरजमल

जानिए उनके एक जबरदस्त युद्ध के बारे में-


मीर बक्शी ने 30 दिसंबर 1749 को मेवात पर आक्रमण कर दिया।
और नीमराना किले पर कब्जा कर लिया।इस विजय की खुशी में मीर बक्शी की सेना ने गौमाता को काटना शुरू कर दिया हिन्दुओ को नीचा दिखाने के लिए पीपल के पेड़ व मंदिरों को हटाना शुरू कर दिया।

इसका पता चलते ही 1 जनवरी 1750 को महाराजा सूरजमल ने अपने 5000 से 6000सैनिकों के साथ
नीमराणा पर अटैक कर दिया।मध्य प्रदेश के गोहद के जाट राजा भीम सिंह राणा के 200 घुड़सवार भी सुरजमल की सेना में शामिल हुए।

इस युद्ध मे मीर बक्शी के सेनापति हकीम खान और रुस्तम खान हजारो सैनिको के साथ बुरी तरह मारे गए।
और उनकी सारी सप्लाई काट दी गयी और मेरे बक्शी की सेना बंदी बना ली गयी।

मीर बक्शी जो कहीं दूसरे शहर में भागकर छुप गया था वह बाहर नही निकला और उसने किसी को भेजकर दया की भीख मांगी।
तब एक संधि की गई जिसकी शर्ते निम्नलिखित थी-

1.मीर बक्शी का कोई भी सैनिक अपने राज्य व बाहर गौहत्या नही करेगा।
2.कोई भी सनातन संस्कृति के प्रतीक पीपल के पेड़ को नही काटेगा।
3.कोई भी हिन्दू मंदिरों को नुकसान नही पहुंचाएगा और न ही हिन्दुओ की उपासना में व्यवधान पहुंचाएगा।

इस तरह मीर बक्शी ने महाराजा सूरजमल को युद्ध का सारा खर्चा भी वापिस किया और उसने कसम खाई के वह दोबारा ऐसा कभी नही करेगा।

जय हो हिन्दू ह्रदय सम्राट सूरज सुजान की।
जय जटवाड़ा।जय भारत।जय सनातन।
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