Thursday, 10 May 2018

महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान2

प्रथम दिल्ली विजय अभियान (महाराजा सूरजमल)भाग-2

प्रथम भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें-महाराजा सूरजमल दिल्ली विजयगाथा भाग-1
अंतिम महान युद्ध
अंतिम हिन्दू सम्राट
हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल

अब तक हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल के अधिकार में दिल्ली के ज्यादातर महत्वपूर्ण हिस्से आ चुके थे।लेकिन मुगल सैनिकों ने रात को धोखे से हमला करके कुछ क्षेत्रों से चौकियां हटवा दी थी।
साथ ही अगले दिन महाराजा सूरजमल को खबर मिली के मुगलो के लिए कुछ अवसरवादी मुस्लिम सरदार पहुंच रहे हैं।
मुगल सेना ने अपनी मोर्चेबन्दी तैयार कर ली व उन्होंने अपनी ज्यादातर सेना इस युद्ध मे एक साथ लगा दी।

महाराजा सूरजमल ने भी रात्रि को ही अपनी सेना व्यवस्थित की। महाराजा जवाहर सिंह भी ससैन्य पहुंचे व जायजा लिया। उन्होंने 29 सितंबर प्रातःकाल मुगल सेना के आक्रमण करने से पहले ही मुगलों पर एक जोरदार आक्रमण कर दिया।एक भीषण लड़ाई छिड़ गई।महाराजा सूरजमल स्वयं इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे।हिन्दू वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने छोटी बड़ी तोप,गजनाल से सुसज्जित होकर पूर्ण वेग से मुगलई सेना पर प्रहार शुरू कर दिए।सामने खड़े मुगल समर्थित मराठा दलों पर भयंकर आक्रमण किया गया। बहुत से मुगल मराठा सैनिक मारे गए।तभी अबू तुराब खां, हमीदुद्दौला, हाफिज खां व जमिलुद्दीन बड़ी तोपें लेकर आये व मुगल सेना में मिल गए।भयंकर तीपो के प्रहार चल रहे थे। बराबर का युद्ध जारी था।सगदरजंग का मीर बक्शी थोड़ा सा घायल हो गया और व भाग खड़ा हुआ।महाराजा सूरजमल ने उसे इस कायरता के लिये बहुत धिक्कारा।फिर उन्होंने वीर जाट यौद्धा पखरमल को रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए भेजा।मुगल सेनापति इमाद के हाथी को एक गोलग लगा व हाथी मर गया। इमाद हाथी से कूदकर सुरक्षा घेरे में भाग गया। शाम तक युद्ध चलता रहा।
फिर सेना छावनी में आ गयी।
अगली सुबह 30 सितंबर को मुगल सेनापति इमाद व नजीब खां ने अचानक मन्जेसर सीही ग्राम पर आक्रमण कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया।
लेकिन कुछ समय बाद ही महान यौद्धा राजा बल्लू सिंह(बल्लभगढ) व जाट यौद्धाओ छत्रसाल,रामबल,जोधसिंह और और पाखरमल ने इमाद का सामना किया और भयंकर संघर्ष के बाद मुगल सैनिक को खदेड़ दिया व वह दिल्ली की ओर भाग निकला।

इसके कुछ समय बाद जयपुर नरेश माधोसिंह कच्छवाहा वहां पहुंच गए।इमाद व मुगल सम्राट ने उनकी आवभगत की और उनसे आग्रह किया कि वे महाराजा सूरजमल को समझाये व सन्धि का रास्ता इख्तियार करें।
फिर राजा माधोसिंह हरसौली गढ़ी पहुंचे और वहां महाराजा सूरजमल के साले कृपाराम व दानिराम जी से मिले और सन्धि का प्रस्ताव दिया। चौधरी दानिराम व कृपाराम ने उनका संदेश महाराजा तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।

इसके बाद महाराजा सूरजमल,उनके मंत्री,सेनापति ने इस पर मन्त्रणा की। सबने विचार किया कि बहुत से मुगल सरदार इस्लाम के नाम पर दिल्ली सेना में आ चुके हैं।दक्षिण से कई मराठा सरदार और पहुंच रहे हैं। अगर हामने आगे युद्ध किया तो हम हो सकता है कि सिंहासन उखाड़ फेंके लेकिन इतना रक्तपात होगा कि कुछ नहीं बचेगा।जनता का बुरा हाल हो जाएगा।
साथ ही महाराजा माधोसिंह की बात न स्वीकारी गयी तो यह उनका अपमान होगा और वे सीधे तौर पर नहीं तो पीछे से मुगल सत्ता का साथ देंगे।

इस तरह हिंदुत्व एकता में कमी रहने के कारण महाराजा सूरजमल ने विचार किया और सन्धि की शर्तें रखी के
1.जितना भी क्षेत्र उनके कब्जे में आ चुका है वह उनके ढ़ूं ही रहेगा।
2.सफदरजंग को अवध व इलाहाबाद का वापिस वजीर नियुक्त किया जाए।(इससे सुरजमल महाराज की पीठ दिल्ली दरबार में बनी रहेगी व वे वहां के निर्णयों को प्रभावित्त कर सकेंगे)

जब तक उनकी ये बाते नहीं मानी जायेगी तब तक जाट अपनी तलवार म्यान में नहीं डालेंगे।भले ही कुछ भी परिणाम हो।
मुगल बादशाह सोच रहा था कि वह सुरजमल को झुकायेगा लेकिन यहां तो सब उल्टा हो गया। उसने लाख कोशिश की के वह इन शर्तों को माने बिना ही युद्ध विराम करवा दे लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

इसके बाद दिल्ली के ज्यादातर जीते हुए क्षेत्रों पर हिन्दू सम्राट का अधिकार हो गया।मुगलों को एक हिन्दू सम्राट के आगे झुकना पड़ा।
और आपसी हिन्दू एकता न होने के कारण दिल्ली के सिंहासन पर भगवा झंडा लहराते लहराते रह गया।महाराजा सूरजमल दिल्ली जीतकर भी दिल्ली के सम्राट न बन पाए। हिन्दुओ इत्तिहास से सबक लो आज भी वही स्तिथि है दिल्ली पर हर बार हिन्दू प्रधानमंत्री ही हइट है लेकिन हमारी एकता में कमी के कारण आज भी मुस्लिम तुष्टिकरण की ही राजनीति चलती है।

 ईतिहासकार वेंदेल के अनुसार 'मुगल अहंकार की इतनी कठोर और इतनी सटीक पराजय इससे पहले कभी नहीं हुई थी'। वस्तुतः मुगल सत्ता का गर्वीला और भयावह दैत्य धराशायी हो चुका था।

इस युद्ध के परिणाम यह रहे कि पूरे भारत व अस यर्स के देशों मे महाराजा सुरजमल की ख्याति फैल गयी।दिल्ली के बहुत से हिस्सो को आजाद करवा लिया गया व मुगल सत्ता के अहंकार व शासन को बहुत अधिक कमजोर कर दिया गया।

आपको बता दें कि इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने एक बार और व उनके बेटे महाराजा जवाहर सिंह ने भी एक बार दिल्ली पर आक्रमण किया व मुगल सत्ता को न के बराबर कर दिया।

यूं ही आजादी नहीं मिली वीरों ने प्राण गवाएं थे।
कभी दुष्टों सिर काटे, कभी अपने शीश कटवाए थे।।

जय हिन्दू ह्र्दय सम्राट महाराजा सूरजमल की

हिन्दू वीर photos
महाराजा सूरजमल
पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें-महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा भाग -1

2 comments:


  1. महाराजा सूरजमल की महानता हमें बहुत कुछ सिखाती है। उनके साहस को नमन है। मैंने भी महाराज सूरजमल के बारे में कुछ लिखा है। आप मेरी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।
    https://historypandit.com/maharaja-surajmal/

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  2. Shame on Indian cbse syllabus which does not include such heroes on the name of secularism

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