हिन्दू वीर जोरावर सिंह
दुष्ट औरँगेजेब से लोहा लेने वाले महान यौद्धा
टुकड़े टुकड़े हुआ शरीर धर्म न छोड़ा मिट गया वीर।
कुत्तो के आगे फेंक दिया बोटी बोटी नोच लिया,
झुकूं नहीं दुष्टों के आगे उसने भी था सोच लिया।।
वीर जोरावर सिंह अकबर की कब्र उखाड़कर उसकी हड्डियां जालान वाले महान धर्म यौद्धा राजाराम जाट के ज्येष्ठ पुत्र थे।
अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने दादा सरदार भज्जा सिंह की देख रेख में वीर जोरावर सिंह ने सिनसिनी गढ़ी का प्रभार संभाला।
वीर जोरावर सिंह ने राजाराम के बाद बृज क्षेत्र में कमजोर होती हिन्दू शक्ति को संगठित करने का प्रयास किया व औरँगेजेब के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई।
उनके पिता ने अकबर की हड्डिया जला दी थी व औरँगेजेब से लोहा लिया था और ऊपर सेउसने औरँगेजेब के क्षेत्र में गश्त करना शुरू कर दिया था जिससे धर्मांध व क्रूर औरगजेब बहुत चिड़ गया। लेकिन उसमे स्वयं में जाटो से एक बार फिर पंगा लेने की हिम्मत न थी। इसलिए उसने अजेमर के राजा बिशनसिंह कछवाह का साथ लिया व अपने पोते बेदारबख्त सिंह के नेतृत्व में गद्दार बिशन सिंह को भेजा। इन दोनों की सेना ने मिलकर 1688 को सिनसिनी गढ़ी पर आक्रमण किया।
सिनसिनी दुर्ग पर घेरा
सिनसिनी से पहले उन्होंने सोंख व महावन की जक्त गढियो(छोटे किले) पर आक्रमण किया वहां भी धर्म वीरों ने डटकर मुकाबला किया।उस युध के बारे में विस्तार से बाद में जिक्र करेंगे।
बिशन सिंह व बेदारबख्त ने सिनसिनी गढ़ी तक जैसे तैसे अपनी पहुंच बनाई व वहां पर घेरा डाल दिया।लेकिन उन दोनों का सिनसिनी पर आक्रमण करने का दुस्साहस न हो रहा था।
क्योंकि कुछ क्रान्तिकारियो ने उनकी छवनी पर धावा बोला व सब कुछ तहस नहस कर डीएम बहुत से सैनिको को काट दिया गया व उनकी रसद उठाकर उनके वहां पहुंचने से पहले ही गढ़ी में चले गए।वीरता के उस मंजर को देखकर उनकी हिम्मत न हो रही थी।
फिर उन्होंने और रसद मंगवाई तो रास्ते में ही उस पर कुछ जाटवीरों ने हमला कर दिया लेकिन संख्या कम होने के कारण वे शहीद हो गए।बेदारबख्त ने शहीदों के शवों को जंगली रास्ते पर टँगवा दिया ताकि आने जाने वाले उससे भय खाये।गढ़ी का घेरा 24 महीने यानी 2 साल तक चला था। बार बार क्रांतिकारी हिन्दू वीर जाट उन्हें मात दे रहे थे।
घेरा डाले हुए जब 8 महीने बीत चुके थे लेकिन मुगल व राजोपुत सेनाएं आगे नहीं बढ़ रही थी।उनमें इतना भी भय हो गया था कि वे छवनी छोड़कर बाहर भी न निकल सकते थे।स्वयं औरँगेजेब लिखता है कि सेना में जाटो का इतना भी व्याप्त हो गया था कि वे कुछ क्षण भी याराम नहिज फरमा सकते थे।
यह क्षेत्र जाटो का प्रमुख गढ़ था यहाँ के अन्य जातियों के सरदार भी जाटो का ही साथ दे रहे थे।वहां की जनता पूर्ण रुव से जाटो के साथ थी। जिस कारण रसद पहुंचाने में दिक्कतें आ रही थी।
उसके बाद बाहर कामां परगने में सिनसिनी की सहायता के लिए हिन्दू पंचायत हुई उसकी खबर बिशन सिंह के सेनापति हरिसिंह खनग्रोत को मिल गयी उसने वहां उसने व बेदारबख्त ने रात को धावा बोल दिया व बहुत से वीर क्रान्तिकारियो को काट दिया। उसने वहां अस पास के गांवों पर अधिकार ही न किया बल्कि बरबाद भी कर डीएम यहां तक कि उसने स्वजातीय राजपूत नागरिकों को भी नहीं बख्शा।
आस पास के जो कुछ अन्य जाट व राजपुत सरदार जोरावर सिंह के साथ थे उन्हें एक एक करके शक्ति से दबा दिया व एक राजपूत प्रताप सिंह नरुका जो जाटो के साथ था उसे लालच देकर अपनी और मिला लिया गया।
प्रथम युद्ध
11 महीने तक मुगल सेना सिनसिनी से 10 मिल दूर बैठी रही एक इच भी आगे नहीं बढ़ी। गढ़ी के अंदर हालात खराब होते जा रहे थे।
अंत मे हालात देखकर मुगलो ने हिन्दू दुर्ग सिनसिनी पर आक्रमण कर दिया। वीर जोरावर सिंह अपनी तलवार के साथ गढ़ी की सुरक्षा के लिए ततपर हो गया।
इस प्रथम आक्रमण में बिशन युद्ध हुआ मुगल सैनिकों के छके छुड़ा दिए गए। रात को मुगलों ने गढ़ी के दरवाजे को बारूद की सुरंग से उड़ाने का फैसला किया तो यहबख़बर जोरावर सिंह जी तक पहुंच गई। उन्होजे गढ़ी का पिछला दरवाजा बड़े बड़े मजबूत पत्थरो से ढक दिया जिस कारण धमाका करने पर गढ़ी में नुकसान कम हुआ गढ़ी की छत उड़ गई व उसकी धमक उल्टी पडने से मुगल सेना के अनेक तोपची व राजपूत सेनापति व कई योग्य सैनिक झुलस कर मारे गए व घायल भी हो गए।
मुगल सेना में हलचल मच गई जिस कारण उसे पीछे हटना पड़ा।
द्वितीय युद्ध
उसके बाद जनवरी 1690 में औरँगेजेब के पोते व गद्दार बिशनसिंह की सेना ने गढ़ी पर आक्रमण किया। उन्होंने एक महीने में गुप्त रूप से जाट दुर्ग के चारों ओर बारूदी सुरंग बिछा दी। जिसके कारण एक जोरदार धमाका हुआ। दुर्ग के रखा बारूद भी आग पकड़ गया बहुत से वीर क्रांतिकारी शहीद हो गए।
लेकिन बचे खुचे सैनिको के साथ जोरवर सिंह ने दुष्टों से लोहा लिया व 200 मुगल सैनिको और 700 बिशनसिंह के सैनिको को काट दिया।
लेकिन विशाल सेना व मजबूत हथियारों के आगे वीरों में अंतिम सांस तक यह लड़ाई लड़ी। सब सैनिक शहीद हो गए वीर जोरावर सिंह , उनकी पत्नी व बच्चो को बंदी बना लिया गया।
बलिदान
उन्हे मथुरा छावनी में रखा गया उसके बाद दक्षिण में औरँगेजेब के सामने पेश किया गया।
औरँगेजेब ने उन्हें झुकने व इस्लाम स्वीकार के लिए कहा लेकिन धर्मवीर जोरावर सिंह ने झुकने से इनकार कर दिया।
औरँगेजेब ने उनकी पत्नी व बच्चो को उनके सामने ही काट दिया पर वीर अपने धर्म पर अडिग रहा। उसके बाद औरँगेजेब ने गुस्से में भरकर उसके शरीर को अंगहीन करके जंगली कुत्तो के आगे फेंक दिया। कुत्ते उनके शरीर को नोचते रहे।जोरावर सिंह दरडी सहते रहे। लेकिन औरँगेजेब उनकी आंखों में चमक को देखकर जल जा रहा था।सिनसिनी दुर्ग पर इस अधिकार पर अपने पोते बेदारबख्त को शाबाशी दी व इस तरह जश्न मनाया जैसे उसने दूसरी काबुल फतेह की हो।
इस तरह एक धर्म यौद्धा ने अपने परिवार,अपने राज को इसलिए कुर्बान कर दिया कि हिंदुत्व जिंदा रहे।
दुष्ट औरँगेजेब से लोहा लेने वाले महान यौद्धा
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| वीर जोरावर सिंह |
टुकड़े टुकड़े हुआ शरीर धर्म न छोड़ा मिट गया वीर।
कुत्तो के आगे फेंक दिया बोटी बोटी नोच लिया,
झुकूं नहीं दुष्टों के आगे उसने भी था सोच लिया।।
वीर जोरावर सिंह अकबर की कब्र उखाड़कर उसकी हड्डियां जालान वाले महान धर्म यौद्धा राजाराम जाट के ज्येष्ठ पुत्र थे।
अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने दादा सरदार भज्जा सिंह की देख रेख में वीर जोरावर सिंह ने सिनसिनी गढ़ी का प्रभार संभाला।
वीर जोरावर सिंह ने राजाराम के बाद बृज क्षेत्र में कमजोर होती हिन्दू शक्ति को संगठित करने का प्रयास किया व औरँगेजेब के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई।
उनके पिता ने अकबर की हड्डिया जला दी थी व औरँगेजेब से लोहा लिया था और ऊपर सेउसने औरँगेजेब के क्षेत्र में गश्त करना शुरू कर दिया था जिससे धर्मांध व क्रूर औरगजेब बहुत चिड़ गया। लेकिन उसमे स्वयं में जाटो से एक बार फिर पंगा लेने की हिम्मत न थी। इसलिए उसने अजेमर के राजा बिशनसिंह कछवाह का साथ लिया व अपने पोते बेदारबख्त सिंह के नेतृत्व में गद्दार बिशन सिंह को भेजा। इन दोनों की सेना ने मिलकर 1688 को सिनसिनी गढ़ी पर आक्रमण किया।
सिनसिनी दुर्ग पर घेरा
सिनसिनी से पहले उन्होंने सोंख व महावन की जक्त गढियो(छोटे किले) पर आक्रमण किया वहां भी धर्म वीरों ने डटकर मुकाबला किया।उस युध के बारे में विस्तार से बाद में जिक्र करेंगे।
बिशन सिंह व बेदारबख्त ने सिनसिनी गढ़ी तक जैसे तैसे अपनी पहुंच बनाई व वहां पर घेरा डाल दिया।लेकिन उन दोनों का सिनसिनी पर आक्रमण करने का दुस्साहस न हो रहा था।
क्योंकि कुछ क्रान्तिकारियो ने उनकी छवनी पर धावा बोला व सब कुछ तहस नहस कर डीएम बहुत से सैनिको को काट दिया गया व उनकी रसद उठाकर उनके वहां पहुंचने से पहले ही गढ़ी में चले गए।वीरता के उस मंजर को देखकर उनकी हिम्मत न हो रही थी।
फिर उन्होंने और रसद मंगवाई तो रास्ते में ही उस पर कुछ जाटवीरों ने हमला कर दिया लेकिन संख्या कम होने के कारण वे शहीद हो गए।बेदारबख्त ने शहीदों के शवों को जंगली रास्ते पर टँगवा दिया ताकि आने जाने वाले उससे भय खाये।गढ़ी का घेरा 24 महीने यानी 2 साल तक चला था। बार बार क्रांतिकारी हिन्दू वीर जाट उन्हें मात दे रहे थे।
घेरा डाले हुए जब 8 महीने बीत चुके थे लेकिन मुगल व राजोपुत सेनाएं आगे नहीं बढ़ रही थी।उनमें इतना भी भय हो गया था कि वे छवनी छोड़कर बाहर भी न निकल सकते थे।स्वयं औरँगेजेब लिखता है कि सेना में जाटो का इतना भी व्याप्त हो गया था कि वे कुछ क्षण भी याराम नहिज फरमा सकते थे।
यह क्षेत्र जाटो का प्रमुख गढ़ था यहाँ के अन्य जातियों के सरदार भी जाटो का ही साथ दे रहे थे।वहां की जनता पूर्ण रुव से जाटो के साथ थी। जिस कारण रसद पहुंचाने में दिक्कतें आ रही थी।
उसके बाद बाहर कामां परगने में सिनसिनी की सहायता के लिए हिन्दू पंचायत हुई उसकी खबर बिशन सिंह के सेनापति हरिसिंह खनग्रोत को मिल गयी उसने वहां उसने व बेदारबख्त ने रात को धावा बोल दिया व बहुत से वीर क्रान्तिकारियो को काट दिया। उसने वहां अस पास के गांवों पर अधिकार ही न किया बल्कि बरबाद भी कर डीएम यहां तक कि उसने स्वजातीय राजपूत नागरिकों को भी नहीं बख्शा।
आस पास के जो कुछ अन्य जाट व राजपुत सरदार जोरावर सिंह के साथ थे उन्हें एक एक करके शक्ति से दबा दिया व एक राजपूत प्रताप सिंह नरुका जो जाटो के साथ था उसे लालच देकर अपनी और मिला लिया गया।
प्रथम युद्ध
11 महीने तक मुगल सेना सिनसिनी से 10 मिल दूर बैठी रही एक इच भी आगे नहीं बढ़ी। गढ़ी के अंदर हालात खराब होते जा रहे थे।
अंत मे हालात देखकर मुगलो ने हिन्दू दुर्ग सिनसिनी पर आक्रमण कर दिया। वीर जोरावर सिंह अपनी तलवार के साथ गढ़ी की सुरक्षा के लिए ततपर हो गया।
इस प्रथम आक्रमण में बिशन युद्ध हुआ मुगल सैनिकों के छके छुड़ा दिए गए। रात को मुगलों ने गढ़ी के दरवाजे को बारूद की सुरंग से उड़ाने का फैसला किया तो यहबख़बर जोरावर सिंह जी तक पहुंच गई। उन्होजे गढ़ी का पिछला दरवाजा बड़े बड़े मजबूत पत्थरो से ढक दिया जिस कारण धमाका करने पर गढ़ी में नुकसान कम हुआ गढ़ी की छत उड़ गई व उसकी धमक उल्टी पडने से मुगल सेना के अनेक तोपची व राजपूत सेनापति व कई योग्य सैनिक झुलस कर मारे गए व घायल भी हो गए।
मुगल सेना में हलचल मच गई जिस कारण उसे पीछे हटना पड़ा।
द्वितीय युद्ध
उसके बाद जनवरी 1690 में औरँगेजेब के पोते व गद्दार बिशनसिंह की सेना ने गढ़ी पर आक्रमण किया। उन्होंने एक महीने में गुप्त रूप से जाट दुर्ग के चारों ओर बारूदी सुरंग बिछा दी। जिसके कारण एक जोरदार धमाका हुआ। दुर्ग के रखा बारूद भी आग पकड़ गया बहुत से वीर क्रांतिकारी शहीद हो गए।
लेकिन बचे खुचे सैनिको के साथ जोरवर सिंह ने दुष्टों से लोहा लिया व 200 मुगल सैनिको और 700 बिशनसिंह के सैनिको को काट दिया।
लेकिन विशाल सेना व मजबूत हथियारों के आगे वीरों में अंतिम सांस तक यह लड़ाई लड़ी। सब सैनिक शहीद हो गए वीर जोरावर सिंह , उनकी पत्नी व बच्चो को बंदी बना लिया गया।
बलिदान
उन्हे मथुरा छावनी में रखा गया उसके बाद दक्षिण में औरँगेजेब के सामने पेश किया गया।
औरँगेजेब ने उन्हें झुकने व इस्लाम स्वीकार के लिए कहा लेकिन धर्मवीर जोरावर सिंह ने झुकने से इनकार कर दिया।
औरँगेजेब ने उनकी पत्नी व बच्चो को उनके सामने ही काट दिया पर वीर अपने धर्म पर अडिग रहा। उसके बाद औरँगेजेब ने गुस्से में भरकर उसके शरीर को अंगहीन करके जंगली कुत्तो के आगे फेंक दिया। कुत्ते उनके शरीर को नोचते रहे।जोरावर सिंह दरडी सहते रहे। लेकिन औरँगेजेब उनकी आंखों में चमक को देखकर जल जा रहा था।सिनसिनी दुर्ग पर इस अधिकार पर अपने पोते बेदारबख्त को शाबाशी दी व इस तरह जश्न मनाया जैसे उसने दूसरी काबुल फतेह की हो।
इस तरह एक धर्म यौद्धा ने अपने परिवार,अपने राज को इसलिए कुर्बान कर दिया कि हिंदुत्व जिंदा रहे।

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