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Saturday, 14 December 2019

जीवन परिचय- हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल जी का जीवन परिचय
Biography of maharaja surajmal
महाराजा सूरजमल

नाम:- महाराजा सूरजमल सिंह
बचपन का नाम:- सुजान सिंह
जन्म:- 13 फरवरी 1707
मृत्यु:- 25 दिसम्बर 1763

पुरा नाम:- श्री महाराज विराजमान बृजेन्द्र महाराज सूजान सिंह जी बहादुर
अन्य नाम:- भूपाल पालक भूमिपति बदनेश नँद सुजान, सिंह सूरज कुमार, सिंह सूरज सुजान, रविमल्ल आदि

पिताश्री का नाम:- राजा बदन सिंह
पितामह का नाम:- श्री भाव सिंह सिनसिनिवार(सिनसिनी के राव चूड़ामन जी के भ्राता)
माता का नाम:- रानी देवकी जी
नानाश्री का नाम:-कॉमर के चौधरी अखेराम सिंह
प्रमुख शिक्षक- आचार्य सोमनाथ जी

कद- 7 फुट 2 इंच
वजन- लगभग 150 किलोग्राम
शरीर की बनावट- सुडौल, मजबूत, गठीली,शाही तेवर वाली मोटी आंखे, चौड़ा ललाट, लम्बी रौबदार मूंछे,लंबे तगड़े और वजनदार आवाज दबंग छवि,सुंदर नैन नक्श।

राज्य:- जटवाड़ा
राजधानी:- भरतपुर(लोहागढ़), डीग(सर्दी के मौसम में)
ध्वज- महल पर पीताम्बर ध्वज, किले पर भगवा कपिध्वज, युद्ध में भगवा और केसरिया ध्वज।
कुलदेवता- श्रीकृष्ण भगवान
कुलदेवी- राज राजेश्वरी कैला देवी
वंश प्रवर्तक- शूरसेन(सिनसिना) बाबा

पत्नी:- महारानी किशोरी बाई,महारानी खेतकौर, महारानी गंगिया, रानी हंसिया, रानी गौरी, रानी कल्याणी आदि
पुत्र:- जवाहर सिंह, रत्नसिंह, नाहर सिंह, रणजीत सिंह, नवल सिंह
भ्राता- महाराजा सूरजमल जी के 25 अन्य भ्राता थे जिनमें से वैर राजा प्रताप सिंह उनके सहोदर(अर्थात रानी देवकी से ही) भ्राता थे।

उपाधि:- कुंवर ब्रजराज बृजेन्द्र बहादुर भूमिपति भूपाल
युवराज:-1748
शासनकाल:-1755-1763
शासन अवधि:- 8 वर्ष, वैसे कुंवर पद ग्रहण करते ही उन्होंने राज्य सम्भालना शुरू कर दिया था। 1748 में सूरजमल युवराज बनाये गए तब तो बदन सिंह नाम मात्र के ही राजा थे उन्होंने सब कार्य उन्हें सम्भलवा दिया था क्योंकि उनकी आंखों में समस्या हो गयी थी लेकिन जाटो में पिता के जीवित रहते बेटा चौधर ग्रहण नहीं करता इसलिए मोहर उनके नाम की चलती थी। इसलिए उनके शासन को 1748 से गणना की जाए तो 15 वर्ष होता है।

पूर्वाधिकारी:- राजा बदन सिंह
उत्तराधिकारी:- महाराजा जवाहर सिंह
राजघराना:- जाट राजवंश
वंश:- कृष्ण वंशी शुरसेनिवार/वृष्णि(सिनसिनिवार)

प्रमुख युद्ध=

दस वर्ष की आयु में ही महाराजा सूरजमल जी ने सेना व दरबार के कार्यो में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था।
उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 80 युद्धों में भाग लिया जिनमें वे कभी भी नहीं हारे। इसी कारण उन्हें अजेय महायौद्धा कहा जाता है। उनके कुछ प्रमुख युद्ध इस प्रकार है-

★1726 में उन्होंने सोगर गढ़ी पर अधिकार किया
★1730 में मेण्डु पर अधिकार किया।

★उन्होंने 1731 में छोटी सी उम्र में #मेवात_पर_अधिकार कर  लिया था।

★टप्पा डाहरा युद्ध में मिर्जा दावर जंग ने उनकी तलवार के आगे आत्म समर्पण कर दिया था।
★उनकी तलवार ने खोहरी में भी दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर ली थी
*1738 में मथुरा आगरा के फरह, ओल अछनेरा व कुछ अन्य क्षेत्रों को आजाद करवाया।

★फरीदाबाद में #मूर्तिजा_खां_को_हराया।

★1739 में नादिरशाह के विरुद्ध दिल्ली की सहायता की और नागरिकों को शरण देकर उनकी सुरक्षा भी की।

★1740,41,44 में गंगवाना युद्ध में, जोधपुर व कोटा के विरुद्ध आदि कई बार जयपुर राज्य की मदद की।

★1745 में अली मुहम्मद रुहेले को हराया।
★1745/46 में उन्होने दिल्ली नवाब के सेनानायक अफगानी नवाब #असद_खां_को_धूल_चटाई थी।#असद_खां युद्ध में #मारा गया था।

★1748 में उन्होंने #जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह के पक्ष में लड़ाई लड़ी और उनकी विरोधी #7_सेनाओं_को_एक_साथ बुरी तरह से #हरा_दिया था व ईश्वरी सिंह राजपूत को जयपुर का ताज दिलाया था।

★1749 में #दिल्ली_के_वजीर_सफदरजंग को हराया। वजीर उनके #खौफ से लड़ने ही न पहुंचा था।

★1750 में मीर बक्शी #सलावत_खां_को_हराया और दुष्ट #हाकिम_खा_मार_डाला।

★1750 में वजीर #सफदरजंग को #फिर से मैदान में #हराया।

★1750 में #रुस्तम_खां_मार_गिराया और #अहमद_खां_बंगश को धूल चटाई।

★1751 में #बहादुर_खां_मार_गिराया।

★1752 में नवाब #जावेद_खां_को_धूल_चटाई

★1752 में #फकीर_अली व #मुगलो_खदेड़कर सिकंदराबाद व दनकौर पर शाही अधिकार खत्म कर दिया।

★1753 में ही पलवल में #इमाद_को_हराकर वहां काजी को भी पकड़ लिया था।

★1753 में घासेड़ा के बहादुर सिंह पर विजय- बहादुर सिंह घासेड़ा का जागीरदार था जो बार बार महाराजा सूरजमल के विरुद्ध अभियानों में हिस्सा लेता था। महाराज के बार बार समझाने पर भी नहीं मानने पर व सीमा में घुसपैठ करने पर महाराज ने उस पर आक्रमण की ठानी। इसी बीच जब वे दिल्ली पर आक्रमण करने जा रहे थे उसी समय बहादुर सिंह के कुछ लोगो ने महाराजा सूरजमल जी के राज्य में लूटपाट की व ऊंट चुरा लिए। महाराज ने बहादुर सिंह को कार्यवाही करने व ऊंट लौटाने को कहा। न मानने पर उन्होंने आक्रमण कर दिया। बहादुर सिंह हार की कगार पर था। युद्ध के बीच में भी सन्धि की कोशिश महाराज द्वारा की गई सन्धि हुई लेकिन कुछ ही देर में बहादुर सिंह का मन पलट गया और उसने अपनी दोनो पत्नियों को जौहर करवा दिया व बाहर निकलकर महाराजा सूरजमल की सेना पर टूट पड़ा। जिसमें उसकी हार हुई व वह युद्ध में मारा गया। इस तरह घासेड़ा पर उन्होंने विजय प्राप्त की।

★1753 में उन्होंने दिल्ली के वजीर सफदरजंग को उकसाकर उसके साथ मिलकर #दिल्ली_पर_आक्रमण कर लिया था व दिल्ली का एक बड़ा क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिया था। और मुगल बादशाह बार पत्र लिखकर गिड़गिड़ा रहा था रहम की भीख मांग रहा था। अंत में सफदरजंग की निष्क्रियता व जयपुर के राजा के बीच में आने के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी।सन्धि उन्ही की शर्तों पर हुई।

★1754 में कुम्हेर में मराठा एवं मुगल सेना ने कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध में खांडेराव होलकर मारा गया। बाद में सन्धि हो गयी थी।महाराज ने खांडेराव की छतरी बनवाई भले ही वे उनके साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए हो।

★1757 में उन्होंने मथुरा वृन्दावन व भरतपुर में से #अब्दाली को अकेले ही निकाल फेंका था।अबदाली से बल्लभगढ़, भरतपुर,कुम्हेर, चौमुंहा, गौकुल में एक साथ युद्ध लड़ा धर्मनगरी की अकेले ही रक्षा की। अबदाली ने बहुत नरसंहार किया और उन्होंने उसका निडर होकर सामना किया।हजारों जाटो ने धर्मनगरी की रक्षा हेतु बलिदान दिया। अंत में अब्दाली कुम्हेर के किले पर घेरा डालकर बहुत दिन बैठा रहा और लोहागढ़ की तरफ बढ़ने की उसकी हिम्मत न हुई। अंत में सूरजमल का रणनीतिक व धमकी भरा पत्र पढ़कर वह समझ गया कि ये शासक उससे रत्ती भर भी न डरने वाला और जाटो की तलवारों की नोको से डरकर वह वापिस लौट गया था।

★ 1757 में फरुखनगर के नवाब अफगानी #मूसा_खान को हराया।

★ उन्होंने मुगलो व अफगानों बलूचों से रोहतक झज्जर गुड़गांव पलबल फरीदाबाद रेवाड़ी आदि हरियाणा के बहुत से क्षेत्र जीत लिए थे, उत्तर प्रदेश में पूरा ब्रिज क्षेत्र और वेस्ट यूपी, राजस्थान में भरतपुर धोलपुर अलवर आदि,अलीगढ़,एटा, मेनपुरी,आगरा, मेरठ,मुजफरनगर,मथुरा आदि। दिल्ली में पालम व गाजियाबाद तक उनका राज हो गया था। मुगल कुछ ही हिस्से में सिमट गई थे जिसके कारण मुगलो की लोग खिल्ली उड़ाने लग गए थे। मुगलो को कमजोर करने व उनका शासन अंत करके भारत को आजाद करवाने में उनका मुख्य योगदान रहा है। अगर ये कहें कि मुगलो का खौफ भारत से मिटाने वाले महाराजा सूरजमल जी थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

★1761 में जब अब्दाली को मराठो से लड़ने के लिए बुलाया गया तब मराठो का किसी भी हिन्दू राजा ने साथ न दिया केवल महाराजा सूरजमल ने साथ दिया जिस कारण पेशवा ने उन्हें हिंदुस्तान का एकमात्र मर्द मानस कहा था।जबकि 1757 में यही अबदाली जब मथुरा वृन्दावन लूट रहा था तो महाराजा सूरजमल इससे अकेले लड़े थे मराठे भी उनका साथ देने नही आए थे। फिर भी वे सब भूलकर उनके साथ आये। उन्होंने मराठो का दिल्ली विजय तक साथ दिया और 1 महीने तक का पूरा खर्च अपने खजाने से दिया। दिल्ली विजय तक उन्होंने मराठो का तन मन धन से हर युद्ध में साथ दिया।
बाद में भाउ से उनके रणनीतिक मतभेद हो गए।
★उन्होंने कहा कि
ठंड में आप लड़ न पाओगे और अब्दाली ठंड में लड़ने का आदि है इसलिएहम गुरिल्ला युद्ध करे और उसे पंजाब के दूसरी तरफ ही उलझाकर रखें थोड़े दिन में मौसम बदल जायेगा अब्दाली से गर्मी सहन न होगी मौसम हमारे पक्ष में होगा।
औरतों व भारी सामान को साथ न रखें वरना आधी फौज उनकी सुरक्षा में लगेगी और लड़ने वाले निश्चिंत होकर न लड़ पाएंगे। इसलिये उन्हें ग्वालियर भेज दें या मेरे किसी किले में रखे उनकी सुरक्षा व उनका खर्च मैं वहन करूँगा।
दिल्ली मुझे दें व गाजीउद्दीन को वजीर बनाएं जिससे मुस्लिमो का भावनात्मक साथ मिल सके व अबदाली कमजोर हो।और रसद न रुके।
मुगल दरबार की छत को लालच में मत तोड़ें इससे लोगो की भावनाएं जुड़ी है अब्दाली इसे इस्लाम से जोड़कर यहां के मुस्लिमो को साथ ले जाएगा।जब न माना गया तो यह तक कहा कि इसे न तोड़ने के बदले मेरे खजाने से 5 लाख रुपये मैं दे दूंगा।
जब जब उन्होंने ये सब सुझाव दिए तो उनके इनमें से किसी भी सुझाव को न माना गया और भाउ से उनके आपसी मतभेद हुए। आपस में हर बार गरमा गर्मी वाली बहस हो गयी। भाउ ने उनका शाब्दिक रूप से अपमान भी किया व कहा कि तुम्हारे सहारे उत्तर में न आया मेरी मर्जी होगी वह करूँगा।
इस तरह की बार बार बहस होने से भाउ चिढ़ गए जबकि के सब सुझाव मराठो के हित में ही थे और उन्होंने उन्हें #बन्दी_बनाने_की_गुप्त_योजना बना ली। होलकर व सिंधिया ने यह बन्दी बनाने बात महाराज को बता दी व उन्हें आगामी झगड़ा न हो इसलिए वापिस लौटने का आग्रह किया। तब महाराजा सूरजमल जी को मजबूरन वापिस लौटना पड़ा।बता दे कि उन्होंने साथ छोड़ा नहीं था बल्कि उन्हें मजबूरन जाना पड़ा था।

★मराठो को #शरण व उनकी सहायता- युद्ध के पश्चात उन्होने भाउ की पत्नी पार्वतीबाई और व उनके परिवार और हजारों मराठा सैनिकों को घायल व भूख की अवस्था में शरण दी और उनकी सेवा की, उनका इलाज करवाया, खाना, रहना और कपड़े सबका प्रबंध किया। उस समय लगभग 10 लाख रुपये खर्च किये। और मराठो को सुरक्षित महाराष्ट्र तक पहुंचाया। मराठो को छोड़ने गए कुछ जाट सैनिक वहीं रह गए थे उनके वंशजो के आज भी महाराष्ट्र के नासिक में उन जाट सैनिकों 22 गांव मौजूद हैं। मराठो ने इस अहसान के कारण जाटो को सच्चा यार कहा था व महारानी किशोरी देवी को अपनी बहन माना था। क्योंकि इतने मतभेद के बाद व भाउ के द्वारा #बन्दी बनाने के षड्यंत्र के बाद भी उन्होंने मन में मैल न रखा और उनकी मदद की।

★1761 में आगरा में मुगल सेनापति काजील खां को हराकर वहां के लाल किले पर कब्जा जमाया। मुगल फौजदार उनके आक्रमण से पहले ही उनसे डरकर भाग गया था और ताजमहल की कब्रो पर घोड़े बांध दिए थे।
★ फरुखनगर के मसावी खां बलूच को हराया और उसे कैद करके जेल में डाल दिया।
★1763 में एक बार फिर उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया था व एक ब्राह्मण कन्या की रक्षा की थी।24 दिसम्बर तक उन्होने दिल्ली जीत ली थी। ज्यादातर हिस्सो पर उनका कब्जा था बस कुछ युद्ध ही शेष था।

★25 दिसम्बर 1763 के युद्ध के दौरान वे अपने पुत्र नाहर सिंह को कमान देकर अकेले ही हिंडौन नदी पर घूमने निकल गए थे तो पीछे से कुछ मुगल सैनिकों ने झाड़ियों से उन पर गोलियों की बौछार कर दी थी। फिर भी वे घायल अवस्था में अकेले ही उनसे वीरता से लड़े और एक लंबे संघर्ष के पश्चात वीरगति की प्राप्त हुए थे।

●निर्माण कला:- महाराजा सूरजमल भवज निर्माण कला के बहुत बड़े ज्ञाता एवं जानकार थे। उन्होंने डीग, भरतपुर, कुम्हेर आदि समेत ब्रिज में कई भव्य किलों का निर्माण किया। भरतपुर के लोहागढ़ किला तो ऐसी सामरिक बनावट में बना के उसे कभी कोई नहीं जीत सका। उन्होंने अनेकों महल बनवाएं जिनमें डीग के जलमहल, भरतपुर के महल प्रसिद्ध है।
उन्होंने गोवर्धन में भव्य सरोवर व मन्दिर बनवाये, मथुरा वृन्दावन,नन्दगाँव आदि में उन्होंने अनेको मन्दिर बनवाएं व अनेको मन्दिरो का जीर्णोद्धार किया। अब्दाली व मिगलो द्वारा तोड़े गए सभी मन्दिर व घाट फिर से बनवाएं। मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर भी आधी मस्जिद तोड़कर उन्होंने बनवाया था।
बयाना की उषा मस्जिद हटाकर फिर से उसे उषा मन्दिर बनाया था। गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर भी उन्होंने बनवाया था।दिल्ली में पहाड़ी धीरज पर शिव मंदिर बनवाया था।मथुरा के ज्यादातर घाटों की सुंदरता उनके कारण ही है।भरतपुर में बांके बिहारी मंदिर, कैला देवी मंदिर, लक्ष्मण मन्दिर आदि भव्य निर्माण कला के नमूने हैं।

★राज्य विस्तार:- भरतपुर धौलपुर समेत राजस्थान के कुछ हिस्से, आधा हरियाणा, वेस्ट यूपी, ब्रिज प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्से उनके राज्य का हिस्सा था।

★कुछ महत्वपूर्ण बातें-

महाराजा सूरजमल जी को उनके धर्म हेतु किये गए कार्यों के लिए हिंदुआ सूरज व हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम से जाना जाता है।

एक तत्कालीन मुस्लिम यात्री ने उन्हें भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट लिखा है।

उनके राज्य में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध था बताते हैं कि उनके खौफ से अवध के नवाब ने भी गौहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उनके राज्य में ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध था। उन्होने बहुत से धर्मपरिवर्तित हिन्दुओ को वापिस हिन्दू बनाया था। दलितों को भी पूरा सम्मान दिया था उनका खजांची दलित चर्मकार जाति से था।

जब भी देश के किसी भी हिस्से पर किसी विदेशी आक्रांता ने आक्रमण किया तो उन्होंने दिल खोलकर उससे पीड़ितों को शरण दी व उन्हें सुरक्षा दी।

उन्होने हमेशा गौ, ब्राह्मण, अबला, मन्दिर और साधु संतों की रक्षा की। दूर दूर से बहुत से साधु व विद्वान और कलाप्रेमी उनके राज्य में आते थे और फलते फूलते थे।

वे दोनों हाथों से तलवार चलाने में माहिर थे, उन्हें धनुष बाण भाला बन्दूक तोप आदि सब अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान था।

उनकी एक लाखा तोप तो इतनी शक्तिशाली थी कि वह भरतपुर से ही आगरा के लाल किले पर निशाना साधने में सक्षम थी।

महाराज सूरजमल जी श्रीकृष्ण भगवान, लक्ष्मण और हनुमान जी बहुत बड़े भक्त थे। उनके किले पर भगवा कपिध्वज लहराता था।
उन्होंने दिल्ली को आजाद करवाने के लिए  दो बार आक्रमण किये व दिल्ली को जीत लिया। ज्यादातर हिस्सो पर कब्जा कर लिया था परंतु अंत में कुछ गद्दारो के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी,हालांकि सन्धि उनकी शर्तो पर ही हुई। दूसरी बार उन्हें धोखे से पीछे से गोली चलाकर मार दिया था।

उनकी मृत्यु के बाद भी कई दिनों तक मुगलो को विसवास न हुआ यह सबूत मिलने पर भी खौफ से उन्होंने कई दिनों तक इस बात को छुपाए रखा था।

उनका लोहागढ़ किला देश का एकमात्र अजेय किला है जिसे अफगान मुगल रुहेले कोई नहीं जीत पाया। उनके बेटे रणजीत सिंह के कार्यकाल में आंग्रेजो ने 13 बार इस किले पर आक्रमण किया परन्तु अंग्रेजो को हर बार मुंह की खानी पड़ी।

वे जब भी कोई मुगल अफगान रुहेला आदि कोई युद्ध में उनके आगे #नतमस्तक होता था तो वे उसके आगे ये #शर्ते अवश्य रखते थे कि- =वह किसी भी हिन्दू मन्दिर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, =#गौहत्या न करेगा न होने देगा, =न ही किसी का #धर्मपरिवर्तन करवाएगा, =किसी भी साधु संत अबला व गरीब को तंग नहीं करेगा, =#पीपल के पेड़ को कभी नहीं काटेगा।

★महाराजा सूरजमल देश के ऐसे एकमात्र राजा थे जिन्होंने मुगलो से दिल्ली को आजाद करवाने के लिए दो बार आक्रमण किये और मुगलो के बुरी तरह से  छक्के छुड़ाए।

★ अब्दाली जब 1757 में मथुरा वृन्दावन लुटने आया और यमुना का पानी लोगो के खून से लाल कर दिया था तो उससे लोहा लेने वाले वे एकमात्र राजा थे और उसे धर्मनगरी से निकालकर ही दम लिया था।

इसके अलावा भी महाराजा सूरजमल जी की अनेको विरताएँ हैं जिन्हें किसी एक किताब या एक पोस्ट में समेटे जाना असम्भव है।

तभी तो कहा जाता है कि
नहीं सही जाटनी ने व्यर्थ प्रसव की पीर
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर

जिसने बार बार दिल्ली में घुसकर मुगलों को फोड़ा था,
जिसके खौफ से अब्दाली ने मथुरा वृन्दावन छोड़ा था,

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था,
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था,

जिसके भालों की नौकों से सलावत खां घबराया था
होकर पराजित दुष्ट ने हिन्दुओ के आगे शीश नवाया था

आगरा के लाल किले पर जिसने भगवा फहराया था
ताजमहल की कब्रो पर जिसने घोड़ा बन्धवाया था

पठान रुहेला अफगान जिसके नाम से ही घबराता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

उषा मस्जिद को जिसने फिर से मन्दिर बनवाया था
मथुरा वृन्दावन के घाटों को फिर से जिसने सजवाया था

बगरू के महलों में जिसकी धाक गूंजती थी
विजयश्री जिसके रण में सदा चरण चूमती थी

दिल्ली का वजीर भी जिसके आगे नतमस्तक रहता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

आतंक भरे मेवात ने पहली बार सांस चैन की ली थी
भारतभूमि ने अब बहुत ज्यादती सहन कर ली थी

जिसके भालों के वार से असद खां दर्द से कहराता था
जिसके शासन में अलीगढ़ शहर रामगढ़ कहलाता था।

क्षत्रेपन की शान था वो,रण केसरिया हो जाता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था

जिसका लोहागढ़ सदा अजेय रहा शान से इतराने को
कितने ही किले महल बने है ऐश्वर्य उनका बतलाने को

न जाने उसने रणभूमि में कितनो को धूल चटाई थी
उत्तर भारत में फिर से सनातन की धाक जमाई थी

राम कृष्णवंशी यौद्धा था वो बृजराज कहलाता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

वह अबला, गौ, ब्राह्मण-संतो का ही तो रक्षक था
उसका भाला धर्मविरोधी दुष्टों का ही तो भक्षक था

मुसीबत में जो फंसा हुआ उसकी छाया में ही तो आता था
उसकी शरण में आया हुआ तो ठूंठ भी हरा हो जाता था

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।
हिंदुआ सूरज sketch
हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

महाराजा सूरजमल सिंहासन पर
हिदू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

Brave warrior Jat
अजेय महायौद्धा महाराजा सूरजमल

Descendant of krishana
ब्रजराज महाराजा सूरजमल

उत्तर भारत का भगवान
उत्तर भारत का भगवान महाराजा सूरजमल

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल जी की।

Tuesday, 2 April 2019

जानिए: जाटों को महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है?

क्यों कहा जाता है क्षत्रिय वीर जाटों को महाक्षत्रीय


खासकर चुनिए व वामपंथी, अंग्रेजो के गुलाम जरूर पढ़ें



देव संहिता में जाट वीरों को महाक्षत्रीय लिखा गया है।इसे भले ही पौराणिक कहानी कहा जाता हो लेकिन इसमें ऐतिहासिक तथ्यों की ओर जो इशारा किया गया है उससे नकारा नहीं जा सकता। इसके अलावा अन्य गर्न्थो के बारे में आपको बताता हूँ-

कुमापालचरित- राजा कुमारपाल पृथ्वीराज चौहान की दादी का भाई था। उसकी श्रीकुमारपाल चरित में 36 क्षत्रीय कुलों का वर्णन हैं। उसमें एकमात्र सम्पूर्ण जाट जाति को ही क्षत्रिय लिखा गया है।अन्य 35 वंश/गौत्र हैं जाती नहीं।और ये सब गौत्र भी जाटो में है।और कुछ अन्य जातियों में भी हैं।इससे यह स्पष्ट है कि जाट महाक्षत्रीय हैं।


पृथ्वीराज रासो- पृथ्वीराज रासो ग्रन्थ में भी 36 कुलों का वर्णन हैं जिसमें एकमात्र सम्पूर्ण जाट जाति को ही क्षत्रिय लिखा गया है अन्य 35 वंश है।

Jat Kshatriya Kumarpal Charit
जाट क्षत्रिय(पृथ्वीराज रासो,कुमारपाल चरित)

#गुजरात_की_प्राचीन_हस्तलिखित_पुस्तकें- इन हस्तलिखित पुस्तको में भी 36 कुलों में जाट जाति का वर्णन किया गया है।

#कर्नल_टॉड- राजपूत जाती पर लिखने वाले इतिहासकार कर्नल टॉड ने भी 36 संशोधित क्षत्रीय कुलों का वर्णन किया है जिसमें जाट जाति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है।

और जहाँ भी जिन 36 कुलों का जिक्र किया गया है वे सारे कुल जाट जाति में है।
राजपूत इतिहासकार Varna
जाट क्षत्रिय(ठाकुर नेकीराम राजपूत की पुस्तक,कर्नल टॉड)

वामपंथियो व अंग्रेजो ने इत्तिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रचारित किया है। और कुछ इतिहासकार शायद इन तथ्यों तक साधनों की कमी के कारण नहीं पहुंच पाए होंगे।
परन्तु इत्तिहास छुपाए नहीं छुपता।विधर्मियो व दुश्मनों की लाख चालों के बाद भी जाटो का स्वर्णिम इत्तिहास व शौर्य एवं सोशल स्टेटस इस बात की गवाही देता रहा है कि जाट सभी क्षत्रियो में सर्वश्रेष्ठ हैं।

राम कृष्ण के वंश हैं हम महादेव के अंश हैं हम

शीश कटे पर झुके नहीं,धड़ लड़ी पर रुके नहीं

देश धर्म की खातिर जान की बाजी लगा देंगे।
या तो खुद मिट जाएंगे या दुश्मन को मिटा देंगे।।

तभी तो कहा गया है - महावीर महाबली महाक्षत्रीय जाट

जय सूरजमल,जय भवानी

Friday, 31 August 2018

सिर कटने के बाद भी दुष्टों को धूल चटाने वाले धर्मयौद्धा

सिर कटे पर झुके नहीं धड़ लड़ी पर रुके नहीं

मुस्लिमो के हिंन्दुओ पर अत्याचार, मुगलों की सजाएं
शीश कटने के बाद भी धड़ लड़ती रही

आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत की एक क्षत्रिय वीर जाट जाति के बारे में जो सिर कटने के बाद भी अपने सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये लड़ते रहे।
इन वीरो ने धर्म हेतु अनेकों शीश दान कर दिए थे। तो सुनिए अपने पूर्वजों की कुछ वीर गाथाएं

1.हिन्दू वीर बिग्गाजी जाखड़- बिग्गाजी महाराज सिर कटने के बाद भी गौरक्षा के लिए लड़ते रहे थे।और गउओ को सुरक्षित पहुंचाकर अपने प्राण त्यागे थे।इनके अनेकों मन्दिर है लोजदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।


2.हिन्दू वीर कुशाल सिंह दहिया- जब सिख गुरु तेग बहादुर सिंह का सिर कलम कर दिया गया था तब हिन्दू जाट वीर कुशाल सिंह दहिया और गुरु साहब की शक्ल मिलती थी इसलिए उन्होंने अपना सिर काटकर गुरु के सिर की जगह रख दिया था ताकि मुगलो को धोखा देकर गुरु के सिर को ले जाकर उनका अंतिम संस्कार कर सके।

फिर गुरु का सिर मुगलों के चंगुल से भाई जैता सिंह लेकर आये थे। हरियाणा के cm मनोहरलाल खट्टर जी ने इनकी प्रतिमा लगवाई है।

3.बाबा दीप सिंह- बाबा दीप सिंह सिख संधू गौत्री जाट थे।वे सिर धड़ से अलग होने पर भी लड़ते रहे थे।और आज उनके नाम पर गुरुद्वारा भी है। 


4.हिन्दू वीर तेजू सिंवर और 5. वीर रातू सिंवर- ये दोनों भाई अपनी बहन की रक्षा खातिर लंगड़खां व उसकी मुस्लिम सेना से अकेले लड़े थे सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे व मुल्लो को भगाकर ही अंतिम सांस ली। इन्हें भी सिंवर वंश के कुलदेव के रूप में पूजा जाता है।


6.हिन्दू वीर रघुराम पालियाल- गौरक्षा की खातिर अंतिम सांस तक सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे।120 मुल्लो को मार गिराया व गौमाता की रक्षा की। इनका भी इनकी स्थली कंटिया खींवसर में मन्दिर है।


7.हिन्दू वीर बख्ता बाबा- बख्ता बाबा सिर कटने के बाद भी गौरक्षा हेतु लड़े व बलिदान दिया। ये ढेरू गौत्री जाट थे।इनका मन्दिर है पूजा जाता है।


8.भाई तारु सिंह- जकारिया खान ने इन्हें इस्लाम अपनाने पर दबाव डाला।जब इन्होंने मना कर दिया तो जकरिया खान ने इनके केश समेत इनकी खोपड़ी उखड़वा दी थी।ये संधू गौत्री सिख जाट थे।


9.हिन्दू वीर गौकुला सिंह- औरँगेजेब के खिलाफ आवाज उठाने वाला पहले यौद्धा थे। इनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए लेकिन इन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा।


10.हिन्दू वीर कान्हा रावत- औरँगेजेब के अत्याचारो के खिलाफ लड़े। इन्हे जिंदा धरती में दफना दिया गया परन्तु अपना हिन्दू धर्म नहीं त्यागा।


11.हिन्दू वीर राजाराम सिंह- इन्होंने औरँगेजेब के खिलाफ लड़ाई लड़ी।अकबर की कब्र उखाड़कर उसकी अस्थियां जला दी थी।एक युद्ध धोखे से मारे गए। इनका सिर काटकर आगरा में टांग दिया गया था।ये सिनसिनवार गौत्री जाट थे।


12.हिन्दू वीर रामकी चाहर- ये राजाराम जी के साथ ही थे इनको बंदी बनाकर आगरा ले जाया गया अनेकों यातनाएं व सिर काटकर आगरा में टांग दिया गया।


13.हिन्दू वीर जोरावर सिंह- औरँगेजेब के खिलाफ लड़े। इनके शरीर के छोटे छोटे टुकड़े करके कुत्ते के सामने फेंक दिया गया था।ये सिनसिनवार गौत्री जाट थे।


14.हिन्दू वीर उदय सिंघा- ये वीर गौकुला के साथ ही थे। इनके शरीर के भी औरँगेजेब ने टुकड़े टुकड़े करवा दिए थे इस्लाम न स्वीकारने पर।


15.हिन्दू वीर सायरजी महाराज- गौरक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।नैन गौत्री जाट थे।इनके मन्दिर हैं व लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।


इसीलिए ही तो कहा जाता है कि जाट मरा तब जानिए जब तेहरवीं होज्या।सके अलावा भी हमारे इत्तिहास में अनेकों किस्से मिल जाएंगे। शर्म आनी चाहिए उन लोगो को जो हमेशा नकारात्मक चीजे फैलाकर इस देशभक्त व धर्मभक्त कौम को बदनाम करते हैं। उन्हें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि जब रक्त पिपासु इस्लामी तलवारे हिंदुस्तान की तरफ बढ़ी तो इन्होंने अपनी छाती लड़ाकर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी।
और सभी हिन्दू भाइयों से प्रार्थना है कि वामपंथियो के लिखे इत्तिहास को पढ़कर आपस मे न लड़ें हमारे पूर्वज वीर थे वीर जो सिर कटवा लेते थे लेकिन झुकाते नहीं थे।जो अकेली धड़ से लड़ते रहते थे लेकिन रुकते नहीं थे।

हर हर महादेव।
जय सूरजमल जय भवानी।

Saturday, 18 August 2018

महाराजा कंवरपाल सिंह की जीवनगाथा- कस्वांवती राज्य

कस्वांपद राज्य
आज ही के दिन 19 अगस्त 1068 को सिधमुख को अपनी राजधानी बनाई थी।

कस्वांवती राज्य
राजधानी-सिधमुख(चुरू)

सूर्यवँशी कंस्वा भगवान श्री राम के वंशज हैं।
कंसुपाल सिंह कस्वां
Maharaja Knwarpal Singh Kanwan

दयालदास, पाऊलेट, मुंशी सोहन लाल आदि इतिहासकारों ने कसवा जाटों के राज्य कस्वांजनपद के बारे में लिखा है कि कसवां जाटों का प्रमुख ठिकाना सीधमुख था और कसवां कंवारपाल यहां के राजा थे तथा 400 गाँवों पर उनकी सत्ता थी तथा सिधमुख राजधानी थी।
महाराजा कंवरपाल कंस्वा धर्मनिष्ठ व वीर यौद्धा थे।

महाराजा कंवरपाल(कंसुपाल) सिंह कंस्वा अपनी 5000 सेना के साथ तालछापर आए, जहाँ मोहिलों का राज था. कंवरपाल जी ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया.

इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आये. वहां जाट राजा रणजीत जोहिया राज करते थे जिनके अधिकार में 125 गाँव थे. लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंस्वा के 70 लोग वीरगति को प्राप्त हुए. इस लड़ाई में कंवरपाल विजयी हुए. सीधमुख पर कंवरपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए.

सीधमुख विजय के बाद महाराजा कंवरपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आये, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे. कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मरे गए.
 फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1094, के दिन कंवरपाल जी का सात्यूं पर कब्जा हो गया. फ़िर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए.

महाराजा कंवरपाल कंस्वा जी के बाद क्रमशः राजा कोहला, राजा घणसूर, राजा महसूर, राजा मला, राजा थिरमल, राजा देवसी, राजा जयसी और राजा गोवल सीधमुख के शासक हुए. गोवल के 9 लडके थे- चोखा , जगा, मलक, महन, ऊहड, रणसी, भोजा और मंगल. इन्होने अलग अलग ठिकाने कायम किए जो इनके थाम्बे कहे जाते थे.

चोखा के अधिकार में 12 गाँव यथा दूधवा, बाड़की, घांघू, लाघड़िया, सिरसली, सिरसला, बिरमी, झाड़सर, भुरड़की इत्यादि.
बरगा के अधिकार में हड़ियाल, महणसर, गांगियासर, लुटू, ठेलासर, देपालसर, कारंगा, कालेराबास (चुरू का पुराना नाम) आदि ,
रणसी के अधिकार में जसरासर, दूधवामीठा, रिड़खला, सोमावासी, झारिया, आसलखेड़ी, गिनड़ी, पीथीसर, धीरासर, ढाढर, बूंटिया इत्यादि.
जगा के अधिकार में गोंगटिया, बीगराण, मठौड़ी, थालौड़ी, भैंरूसर, इन्दरपुरा, चलकोई आदि तथा
ऊहण के अधिकार में नोपरा, जिगासरी, सेवाटादा, मुनड़िया, रुकनसर आदि. इसी प्रकार अन्य थामों के नाम और गाँवों का वर्णन है. परवाना बही राज श्रीबिकानेर से भी ज्ञात होता है की चुरू के आसपास कसवां जाटों के अनेक गाँव रहे थे यथा चुरू (एक बास), खासोली, खारिया (दो बास), सरसला, पीथुवीसींसर, आसलखेड़ी, रिड़खला (तीन बास), बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, बालरासर, भैंरुसर (एक बास), ढाढरिया (एक बास) धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई आदि.
कंवरपाल जी के एक वंशज चोखा ने संवत 1485 माघ बदी 9 शुक्रवार (31 दिसम्बर 1428) को दूधवाखारा पर अधिकार कर लिया.

विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट राज्यों के साथ कसवां जाटों के राज्य को भी राठोडों ने अधिकृत कर लिया.क्योंकि यह जाट राज्य अगली पीढ़ी तक छोटे छोटे ठिकानों में बंट गया थे।व आपसी द्वेष के कारण एकजुट नहीं हो सके। ईसलिये सबने बिका जी के साथ सन्धि कर ली व उनके राज्य में शामिल हो गए।

ठाकुर देशराज जी लिखते हैं कि ईसा की चौथी सदी से पहले जांगल-प्रदेश में आबाद हुए थे। इनके अधिकार में लगभग चार सौ गांव थे। सीधमुख राजधानी थी। राठौरों से जिस समय युद्ध हुआ, उसय समय कंवरपाल नामी सरदार इनका राजा था। इस वंश के लोग धैर्य के साथ लड़ने में बहुत प्रसिद्ध थे। कहा जाता है दो हजार ऊंट और पांच सौ सवार इनके प्रतिक्षण शत्रु से मुकाबला करने के लिए तैयार रहते थे। यह कुल सेना राजधानी में तैयार न रहती थी। वे उत्तम कृषिकार और श्रेष्ठ सैनिक समझे जाते थे। राज उनका भरा-पूरा था। प्रजा पर कोई अत्याचार न था। सत्रहवीं शताब्दी में इनका भी राज राठौंरों द्वारा अपहरण कर लिया गया।

इनका राज्य बहुत खुशहाल था। प्रमुख ठिकानों के सरदारों का चुनाव होता था। राज्य में किसानों,मजदूरों,धर्म प्रचारकों को विशेष संरक्षण प्रदान था। यहां कंस्वा जाटो का राज किसी न किसी रूप में 1068 से 16वी शताब्दि के पूर्वार्ध(1530/1550) तक रहा।

लेकिन कितने दुःख की बात है कि आज इनके वंशज ही इन्हें भुले बैठे हैं।एक आध बुजुर्ग आदमी को ही वह स्वर्णिम काल धुंधला धुंधला याद है। सिधमुख में इनकी प्रतिमा लगनी चाहिए ताकि आने वाली पीढियां इन्हें याद रख सके। और उससे भी बड़ी बात यह है कि यहां कि यहां चूरू से हर बार कस्वां ही mp बनते हैं लेकिन फिर भी कोई स्टेचू नहीं।उस समय जांगलपर्देश(बीकानेर से चुरु तक) लगभग 7 जाट राज्य थे।उनमें से किसी की भी प्रतिमा उनकी राजधानी में भी नहीं है।

जय महाराजा कंवरपाल सिंह। जय जय श्री राम।
चौधरी जयदीप सिंह नैन

Thursday, 9 August 2018

1857 के अमर शहीद यौद्धा बाबा शाहमल तोमर

1857 के अमर क्रांतिकारी शहीद बाबा शाहमल तोमर

शहीद क्रांतिकारी शाहमल जाट
अमर शहीद क्रांतिकारी बाबा शाहमल

बाबा शाहमल सिंह तोमर बागपत जिले में #बिजरौल गांव के एक साधारण परन्तु आजादी के दिवाने क्रांतिकारी #किसान थे।उनका जन्म 17 फरवरी 1797 के दिन एक साधारण #जाट_क्षत्री परिवार में हुआ थाIइनके पिता का नाम चौधरी अमीचन्द तोमर था व माता धनवंती देवी थी। वे मेरठ और दिल्ली समेत आसपास के इलाके में बेहद लोकप्रिय थे। मेरठ जिले के समस्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में अंग्रेजों के लिए भारी खतरा उत्पन्न करने वाले बाबा शाहमल ऐसे ही क्रांतिदूत थे। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए इस महान व्यक्ति ने लम्बे अरसे तक #अंग्रेजों को चैन से नहीं सोने दिया था।

अंग्रेज हकुमत से पहले यहाँ #बेगम समरू राज्य करती थी. बेगम के राजस्व मंत्री ने यहाँ के किसानों के साथ बड़ा अन्याय किया. यह क्षेत्र १८३६ में अंग्रेजों के #अधीन आ गया. अंग्रेज अदिकारी प्लाउड ने जमीन का #बंदोबस्त करते समय किसानों के साथ हुए अत्याचार को कुछ सुधारा परन्तु #मालगुजारी देना बढा दिया. पैदावार अच्छी थी. किसान मेहनती थे सो बढ़ी हुई मालगुजारी भी देकर खेती करते रहे थे। खेती के बंदोबस्त और बढ़ी मालगुजारी से किसानों में भारी असंतोष था जिसने १८५७ की क्रांति के समय आग में घी का काम किया.

शाहमल का गाँव बिजरौल काफी बड़ा गाँव था . 1857 की क्रान्ति के समय इस गाँव में दो पट्टियाँ थी. उस समय शाहमल एक पट्टी का नेतृत्व करते थे.

इसी बीच बाबा शाहमल ने आजादी के लिए क्रांति का बिगुल बज दिया।शाहमल की क्रान्ति प्रारंभ में स्थानीय स्तर की थी परन्तु समय पाकर विस्तार पकड़ती गई. आस-पास के लम्बरदार विशेष तौर पर बडौत के लम्बरदार शौन सिंह और बुध सिंह और जौहरी, जफर्वाद और जोट के लम्बरदार बदन और गुलाम भी विद्रोही सेना में अपनी-अपनी जगह पर आ जमे. शाहमल के मुख्य सिपहसलार बगुता और सज्जा थे और जाटों के दो बड़े गाँव बाबली और बडौत अपनी जनसँख्या और रसद की तादाद के सहारे शाहमल के केंद्र बन गए.

१० मई को मेरठ से शुरू विद्रोह की लपटें इलाके में फ़ैल गई. शाहमल ने जाटो के साथ जहानपुर कर अन्य किसान गुर्जर आदि को भी साथ लेकर बडौत तहसील पर चढाई करदी. उन्होंने तहसील के खजाने को लूट कर उसकी अमानत को बरबाद कर दिया. बंजारा सौदागरों की लूट से खेती की उपज की कमी को पूरा कर लिया. मई और जून में आस पास के गांवों में उनकी धाक जम गई. फिर मेरठ से छूटे हुये #कैदियों ने उनकी की फौज को और बढा दिया. उनके प्रभुत्व और नेतृत्व को देख कर दिल्ली दरबार में उसे सूबेदारी दी.

12 व 13 मई 1857 को बाबा शाहमल ने सर्वप्रथम साथियों समेत अंग्रेज #समर्थित बंजारा व्यापारियों पर आक्रमण कर काफी संपत्ति कब्जे में ले ली और बड़ौत तहसील और पुलिस चौकी पर हमला बोल की तोड़फोड़ व लूटपाट की। दिल्ली के क्रांतिकारियों को उन्होंने बड़ी मदद की। क्रांति के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण की भावना ने जल्दी ही उनको #क्रांतिवीरों का सूबेदार बना दिया। बाबा शाहमल तलवारबाजी में निपुण व बहुत बड़े करतबबाज थे।
शाहमल ने बिलोचपुरा के ए व्यक्ति को अपना दूत बनाकर दिल्ली भेजा ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए मदद व सैनिक मिल सकें। बागपत के आस पास के सभी क्रान्तिकारियो से शाहमल से अच्छे सम्बन्ध थे। इन सभी ने शाहमल को बादशाह के सामने पेश करते हुए कहा कि वह क्रांतिकारियो के लिए बहुत सहायक हो सकते है और ऐसा ही हुआ शाहमल ने न केवल अंग्रेजों के संचार साधनों को ठप किया बल्कि अपने इलाके को दिल्ली के क्रांतिवीरों के लिए आपूर्ति क्षेत्र में बदल दिया।

अपनी बढ़ती #फौज की ताकत से उन्होंने बागपत के नजदीक जमुना पर बने पुल को नष्ट कर दिया. उनकी इन सफलताओं से उन्हें 84 गांवों का आधिपत्य मिल गया. उसे आज तक देश खाप की #चौरासी कह कर पुकारा जाता है. वह एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में संगठित कर लिया गया और इस प्रकार वह जमुना के बाएं किनारे का #राजा बन बैठा, जिससे कि दिल्ली की उभरती फौजों को रसद जाना कतई बंद हो गया और मेरठ के क्रांतिकारियों को मदद पहुंचती रही. इस प्रकार वह एक छोटे किसान से बड़े क्षेत्र के अधिपति बन गए.

कुछ अंग्रेजों जिनमें हैवेट, फारेस्ट ग्राम्हीर, वॉटसन कोर्रेट, गफ और थॉमस प्रमुख थे को यूरोपियन फ्रासू जो बेगम समरू का दरबारी कवि भी था, ने अपने गांव #हरचंदपुर में शरण दे दी। इसका पता चलते ही शाहमल ने #निरपत सिंह व #लाजराम जाट के साथ #फ्रासू के हाथ पैर बांधकर काफी पिटाई की और बतौर सजा उसके घर को लूट लिया। बनाली के महाजन ने काफी रुपया देकर उसकी जान बचायी। मेरठ से दिल्ली जाते हुए डनलप, विलियम्स और ट्रम्बल ने भी फ्रासू की रक्षा की। फ्रासू को उसके पड़ौस के गांव सुन्हैड़ा के लोगों ने बताया कि इस्माइल, रामभाई और जासूदी के नेतृत्व में अनेक गांव अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए है। शाहमल के प्रयत्‍‌नों से हर वर्ग से सब भारतीय एक साथ मिलकर लड़े और हरचंदपुर, ननवा काजिम, नानूहन, सरखलान, बिजरौल, जौहड़ी, बिजवाड़ा, पूठ, धनौरा, बुढ़ैरा, पोईस, गुराना, नंगला, गुलाब बड़ौली, बलि बनाली (निम्बाली), बागू, सन्तोखपुर, हिलवाड़ी, बड़ौत, औसख, नादिर असलत और असलत खर्मास गांव के लोगों ने उनके नेतृत्व में संगठित होकर क्रांति का #बिगुल बजाया।

कुछ बेदखल हुये जमींदारों ने जब शाहमल का साथ छोड़कर अंग्रेज अफसर डनलप की फौज का साथ दिया तो शाहमल ने ३०० सिपाही लेकर बसौड़ गाँव पर कब्जा कर लिया. जब अंग्रेजी फौज ने गाँव का घेरा डाला तो शाहमल उससे पहले गाँव छोड़ चुका था. #अंग्रेज_फौज ने बचे सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया और ८००० मन गेहूं जब्त कर लिया. इलाके में शाहमल के दबदबे का इस बात से पता लगता है कि अंग्रेजों को इस अनाज को मोल लेने के लिए किसान नहीं मिले और न ही किसी व्यापारी ने बोली बोली. गांव वालों को सेना ने बाहर निकाल दिया।

 शाहमल ने यमुना नहर पर सिंचाई #विभाग के बंगले को मुख्यालय बना लिया था और अपनी गुप्तचर सेना कायम कर ली थी। हमले की पूर्व सूचना मिलने पर एक बार उन्होंने 129 अंग्रेजी सैनिकों की हालत खराब कर दी थी।

इलियट ने १८३० में लिखा है कि पगड़ी बांधने की प्रथा व्यक्ति को आदर देने की प्रथा ही नहीं थी, बल्कि उन्हें नेतृत्व प्रदान करने की संज्ञा भी थी. शाहमल ने इस प्रथा का पूरा उपयोग किया. शाहमल बसौड़ गाँव से भाग कर निकलने के बाद वह गांवों में गया और करीब ५० गावों की नई फौज बनाकर मैदान में उतर पड़ा.

दिल्ली दरबार और शाहमल की आपस में उल्लेखित संधि थी. अंग्रेजों ने समझ लिया कि दिल्ली की मुग़ल सता को बर्बाद करना है तो शाहमल की शक्ति को दुरुस्त करना आवश्यक है. उन्होंने शाहमल को जिन्दा या मुर्दा उसका सर काटकर लाने वाले के लिए १०००० रुपये #इनाम घोषित किया.

#डनलप जो कि अंग्रेजी फौज का नेतृत्व कर रहा था, को शाहमल की फौजों के सामने से भागना पड़ा. इसने अपनी डायरी में लिखा है -

"चारों तरफ से उभरते हुये जाट नगाड़े बजाते हुये चले जा रहे थे और उस आंधी के सामने अंग्रेजी फौजों का जिसे '#खाकी रिसाला' कहा जाता था, का टिकना नामुमकिन था."
एक सैन्य अधिकारी ने उनके बारे में लिखा है कि

एक जाट (शाहमल) ने जो बड़ौत परगने का गवर्नर हो गया था और जिसने #राजा_की_पदवी धारण कर ली थी, उसने तीन-चार अन्य परगनों पर नियंत्रण कर लिया था। दिल्ली के घेरे के समय जनता और दिल्ली इसी व्यक्ति के कारण जीवित रह सकी।
छपरा गांव के त्यागियों, बसोद के जादूगर और बिचपुरी के गूर्जरों ने भी शाहमल के नेतृत्व में क्रांति में पूरी शिरकत की। अम्हेड़ा के किसानों ने बड़ौत व बागपत की लूट व एक महत्वपूर्ण पुल को नष्ट करने में हिस्सा लिया। सिसरौली के जाटों ने शाहमल के सहयोगी सूरजमल की मदद की जबकि दाढ़ी वाले सिख ने क्रांतिकारी किसानों का नेतृत्व किया।

जुलाई 1857 में क्रांतिकारी नेता शाहमल को पकड़ने के लिए अंग्रेजी सेना संकल्पबद्ध हुई पर लगभग 7 हजार सैनिकों सशस्त्र किसानों व जमींदारों ने डटकर मुकाबला किया। शाहमल के भतीजे भगत के हमले से बाल-बाल बचकर सेना का नेतृत्व कर रहा डनलप #भाग खड़ा हुआ और भगत ने उसे बड़ौत तक खदेड़ा। इस समय शाहमल के साथ 2000 शक्तिशाली किसान मौजूद थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में विशेष महारत हासिल करने वाले शाहमल और उनके अनुयायियों का बड़ौत के दक्षिण के एक बाग में खाकी रिसाला से आमने सामने घमासान #युद्ध हुआ.

डनलप शाहमल के भतीजे भगता के हाथों से बाल-बाल बचकर भागा. परन्तु शाहमल जो अपने घोडे पर एक अंग रक्षक के साथ लड़ रहा था, #फिरंगियों के बीच घिर गया. उसने अपनी तलवार के वो #करतब दिखाए कि फिरंगी दंग रह गए. तलवार के गिर जाने पर शाहमल अपने भाले से दुश्मनों पर वार करता रहा. इस दौर में उसकी पगड़ी खुल गई और घोडे के पैरों में फंस गई. जिसका फायदा उठाकर एक फिरंगी सवार ने उसे घोड़े से गिरा दिया. अंग्रेज अफसर पारकर, जो शाहमल को पहचानता था, ने शाहमल के शरीर के टुकडे-टुकडे करवा दिए।यह 18 जुलाई का दिन था और 21 जुलाई उनका सर काट कर एक भाले के ऊपर टंगवा दिया.

फिरंगियों के लिए यह सबसे बड़ी विजय पताका थी. डनलप ने अपने कागजात पर लिखा है कि अंग्रेजों के खाखी रिशाले के एक भाले पर अंग्रेजी झंडा था और दूसरे भाले पर शाहमल का सर टांगकर पूरे इलाके में परेड करवाई गई. चौरासी गांवों के 'देश' की किसान सेना ने फिर भी हार नहीं मानी. और शाहमल के सर को वापिस लेने के लिए सूरज मल और भगता स्थान-स्थान पर फिरंगियों पर हमला करते रहे. इसमें सब वर्गों के किसानों ने बढ़-चढ़ कर साथ दिया. शाहमल के गाँव सालों तक युद्ध चलाते रहे.

21 जुलाई 1857 को तार द्वारा अंग्रेज उच्चाधिकारियों को सूचना दी गई कि मेरठ से आयी फौजों के विरुद्ध लड़ते हुए शाहमल अपने 6000 साथियों सहित मारा गया। शाहमल का #सिर_काट लिया गया और सार्वजनिक रूप से इसकी प्रदर्शनी लगाई गई।

पर इस शहादत ने क्रांति को और मजबूत किया तथा 23 अगस्त 1857 को शाहमल के पौत्र लिज्जामल जाट ने बड़ौत क्षेत्र में पुन: जंग की शुरुआत कर दी। अंग्रेजों ने इसे कुचलने के लिए खाकी रिसाला भेजा जिसने पांचली बुजुर्ग, नंगला और फुपरा में कार्रवाई कर क्रांतिकारियों का दमन कर दिया। लिज्जामल को बंदी बना कर साथियों जिनकी संख्या 32 बताई जाती है, को #फांसी दे दी गई।

शाहमल मैदान में काम आया, परन्तु उसकी जगाई #क्रांति के बीज बडौत के आस पास प्रस्फुटित होते रहे. बिजरौल गाँव में शाहमल का एक छोटा सा #स्मारक बना है जो गाँव को उसकी याद दिलाता रहता है.

आज इन अमर क्रान्तिकारियो देशभक्तों के विचारों व प्रयास को फिर से युवा पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है।

भक्त शिरोमणि माता कर्माबाई का जीवन परिचय

भक्त शिरोमणि माता करमा बाई का जीवन परिचय
पुण्यतिथि

Karma Bai Jat
भक्त शिरोमणी माता कर्माबाई


जन्म : 

करमा बाई का जन्म कालवा(आनन्दपुर) गाँव के क्षत्रिय जाट जमीदार जीवनराम #डूडी के घर माता रतनी देवी की कोख से भादवा बदी एकं अर्थात 20 अगस्त 1615 ई. को हुआ।उसके जन्म पर मूसला धार बरसात हुई थी। जिससे गाँव में खुशियाँ फ़ैल गयी थी। करमा बाई पैदा होते ही हंसी थी जो एक चमत्कार था। एक बूढी दाई ने तो कहा कि यह बालिका ईश्वर का अवतार है.

 कर्मा बाई के पिता चौधरी जीवणराम डूडी ईश्वर में बहुत आस्था रखने वाले व्यक्ति थे। उनका नित-नियम था कि जब तक भगवान कृष्ण की मूर्ति को जलपान नहीं कराते तब तक स्वयं भी जलपान नहीं ग्रहण करते थे। उन्होने ईश्वर प्राप्ति के लिए अनेक तीर्थों का भ्रमण किया था।

करमा बाई का विवाह: 

करमा बाई का विवाह सोऊ गोत्र में गाँव मोरेड़ वाया बिदियाद (नागौर) कर दिया गया था।परन्तु थोड़े ही समय में वह विधवा हो गयी और आजीवन बाल विधवा के रूप में ही अपना जीवन भगवान की भक्ति में व्यतीत किया।

मनसुख रणवा के अनुसार करमा बाई का विवाह छोटी उम्र में ही अलवर जिले के गढ़ी मामोड गाँव में साहू गोत्र के लिखमा राम के साथ कर दिया। कुछ ही समय बाद पति की मृत्यु हो गयी। करम बाई उस समय कालवा में ही थी। उनका अंतिम संस्कार करने के लिए वह ससुराल गाढ़ी मामोड चली गयी। वह घर और खेत का सारा काम करती थी। अतिथियों की खूब आवभगत करती थी। कालवा ही नहीं आस-पड़ौस के गाँवों में उसकी प्रसंसा होने लगी।

करमा बाई का भगवान को खिचड़ी खिलाना : 

इनके पिता भगवान के बड़े भक्त थे और उनको भोग लगा कर ही भोजन ग्रहण करते थे। एक दिन इनके पिता तीर्थ-यात्रा पर गए और भगवान की पूजा अर्चना व भोग लगाने की जिम्मेदारी बाई कर्मा को सौंप गए। दूसरे दिन भोली करमाँ ने खिचड़ी बनाकर भगवान् को भोग लगाया तो भगवान ने ग्रहण नहीं किया। तब करमा बाई ने सोचा कि शायद परदा न होने के कारण भगवान भोग नहीं लगा रहे हैं। उसने अपने का परदा किया और मूंह दूसरी तरफ फेर लिया, ताकि भगवान् भोग लगा सके। फिर भी नतीजा कुछ न निकला। उसने भगवान से फिर कहा, "भगवान् आप भोजन नहीं करते तो मैं भी नहीं खाऊँगी।" करमा उस दिन भूखी रह गयी। उसने दूसरे दिन फिर खिचड़ी बनाई और परदा करके भगवान के फिर से भोग लगाया। दूसरे दिन भी कोई नतीजा नहीं निकला। तब उसने कहा कि यदि आप नहीं खायेंगे तो मैं न तो खिचड़ी खाऊँगी और न भोग लगाऊंगी। भूखी रहकर प्राण त्याग दूँगी। इस तरह तीन दिन बीत गए। तीसरे दिन भगवान् ने करमाँ को स्वप्न में कहा , "उठ ! जल्दी से खिचड़ी बना, मुझे बड़ी भूख लगी है। "

करमा बाई हडबड़ा कर उठी, जल्दी से खिचड़ी पकाई और परदा कर के भगवान के भोग लगाया। थोड़ी देर में देखा कि भगवान सारी खिचड़ी खा गए हैं। करमा बाई का खुसी का ठिकाना न रहा। अब वह नित्य प्रति भगवान को खिचडी का भोग लगाने लगी और बालरूप में भगवान आकर उसकी खिचडी खाने लगे। यह करमा बाई के भक्ति की चरम सीमा थी।

करमा बाई के घर भगवान द्वारा स्वयं आकर भोजन करने की बात दिन दूनी रात चौगुनी चारों तरफ फ़ैल गयी।नाभादास कृत भक्तमाल में करमा बाई के सम्बन्ध में इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है। चारण ब्रह्मदास दादूपंथी विरचित 'भगत माल' में भी इसका उल्लेख इस प्रकार है-

जिमिया खीच करमां घिरे ज्वार का
बडम धिन द्वारिका तणा वासी
काफी दिनों बाद जब करमा बाई के पिता तीर्थ यात्रा पूरी करके वापिस लौटे तो उन्हें यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि प्रभु रोज करमा बाई की खिचड़ी खाने आते हैं। वह भी अपनी आँखों से भगवान के दर्शन कर धन्य हुए।

जगन्नाथपुरी धाम में भगवान को सर्वप्रथम माता कर्मा का भोग

करमा बाई की प्रसिद्धी: इस तरह करमा बाई के प्रेम में बंधे भगवान जगन्नाथ को भी प्रतिदिन सुबह खिचड़ी खाने जाना पड़ता था। अत: प्रभु जगन्नाथ के पण्डितों ने इस समस्या के समाधान के लिए राजभोग से पहले करमा बाई के नाम से खिचड़े का भोग प्रतिदिन #जगन्नाथपुरी के मंदिर में लगाने लगे ताकि भगवान को जाना न पड़े। आज भी जगन्नाथपुरी के मंदिर में करमा बाई की प्रीत का यह ज्वलंत उदहारण देखने को मिलता है जहाँ भगवान के मंदिर में करमा बाई का भी मंदिर है और उसके खीचड़े का भोग प्रतिदिन भगवान को लगता है। परचीकार ने लिखा है -

करमां के घर जीमता, जो न पतीजो लोक।
देखो जगन्नाथ में, अज हूँ भोग।
मलुक को टुकरो बंटे, वटे कबीर की पाण।
करमांबाई रो खीचड़ो, भोग लगे भगवान।।
करमांबाई की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। करमांबाई ने अपनी पूरी जिंदगी भगवान की भक्ति में व्यतीत कर दी। करमांबाई की भक्ति का परिणाम है कि आज भी राजस्थान में उनकी वात्सल्य भक्ति के किस्से लोगों की जुबान पर हैं। महिलायें कृष्ण मंदिरों में करमांबाई के खीचड़ले से सम्बंधित भजन भक्ति भाव से गाती हैं। इस तरह करमांबाई अपनी अनूठी वात्सल्य भक्ति के कारण इस संसार में प्रसिद्धि प्राप्त कर संवत 1691 (25.7.1634 ई.) में एक दिन परमात्मा में विलीन हो गयी। वह भगवान में आस्था रखने वालों के लिए एक सन्देश छोड़ गयी कि बाह्य शुद्धता के स्थान पर आत्मा की शुद्धता तथा भगवान से सच्ची प्रीत से प्रभु की प्राप्ति सम्भव है।

करमांबाई अपने भोलेपन की भक्ति के बल वह आज भी ऐसी औरतों के लिए उदाहरण बनी हुई है जो आचार-विचार के बिना भगवान में सच्ची प्रीति रखती हैं। करमांबाई वास्तव में सच्ची प्रीति का प्रतीक थी, जैसे कि परचीकार ने लिखा है -

करमां कुल में जाटणी, नरतन को अवतार।
प्रेम प्रीत की पूतली, सिरजी सिरजणहार।।
करमांबाई मंदिर

करमांबाई मंदिर कालवा
 आनन्दपुर यानी कालवा गांव में आज भी उनका मन्दिर है और दूर दूर से भक्त उनकी पूजा करने आते हैं।माता कर्मा देवी का हर साल मेला भी लगता है।

करमा बाई का लोक गीत

थाली भर कर लाई रे खीचड़ो, ऊपर घी की बाटकी।
जीमो म्हारा श्यामधणी, जीमावे बेटी जाट की।।
बाबो म्हारो गाँव गयो है, कुण जाणै कद आवैलो।
बाबा कै भरोसे सावरा, भूखो ही रह ज्यावैलो।।
आज जीमावूं तन खीचड़ो, काल राबड़ी छाछ की। जीमो म्हारा.....
बार बार मंदिर ने जड़ती, बार-बार पट खोलती।
जीमै कैयां कोनी सांवरा, करड़ी करड़ी बोलती।।
तू जीमै जद मैं जीमू, मानूं न कोई लाट की ।। जीमो म्हारा.....
परदो भूल गयी रे सांवरिया, परदो फेर लगायो जी।
धाबलिया कै ओले, श्याम खीचड़ो खायोजी।।
भोला भक्ता सूं सांवरा, अतरी काँई आंट जी। जीमो म्हारा.....
भक्त हो तो करमा जैसी, सांवरियो घर आयोजी।।
भाई लोहाकर, हरख-हरख जस गायोजी।
सांचो प्रेम प्रभु में हो तो, मूर्ती बोलै काठ की ।। जीमो म्हारा.....

जय माता कर्मा देवी की
जय श्रीकृष्ण भगवान की।

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक- महाराजा जवाहर सिंह

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक-महाराजा जवाहर सिंह
Jat Jawahar Singh -Hindu Veer Shiromani Warrior
महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा जवाहर सिंह महाराजा सूरजमल के बेटे थे।भगवान लक्ष्मण उनके कुलदेव हैं और भगवान श्री कृष्ण के वे वंशज थे।बजरंग बली के बहुत बड़े भक्त थे।

महाराजा जवाहर सिंह ने आगरा की जामा मस्जिद को खाली करवाकर मंडी खुलवा दी थी व घोड़ो का तबेला बना दिया था।

बचपन में ही जब दिल्ली के वजीर ने उनका हाथ चुमा तो उन्होंने भरे दरबार मे फटकार लगा दी थी के हमारा हाथ छूकर अपवित्र क्यों किया।

उन्होंने अब्दाली से भी टक्कर ली थी व अपने पिता के साथ लगभग युद्धों में वीरता दिखलाते थे।

उन्होंने ऊंची आवाज में अजान देने पर एक मौलवी की जीभ कटवा दी थी।और ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

उन्होंने दिल्ली को मुगलो से आजाद कराने के लिए भी पूरी कोशिश की थी पर कुछ गद्दारो के कारण जीत के बावजूद सन्धि करनी पड़ी थी।

इस दौरान वे दिल्ली से चितौड़ के अष्टधातु किवाड़ वापिस भरतपुर जीत लाये थे जो खिलजी उनसे 462 साल पहले चितौड़ से जीतकर ले गया था।

ईरानी मूल की एक गन्ना बेगम उन पर बहुत मरती थी।
लेकिन गन्ना का प्रेम सिरे न चढ़ सका और गन्ना ने सारी उम्र जवाहर के प्रेम में फ़नाह कर दी थी।

उन्होंने पुष्कर के धार्मिक स्नान को हर हिन्दू के लिए खुलवा दिया था व वहां लगी शाही पाबंदी हटवा दी थी।

उन्होंने मेवात क्षेत्र में धर्म वापसी करवाकर धर्म बढ़ाने के लिए भी बहुत कार्य किया था।

आगरा में अपने किले में एक उत्सव के दौरान वे सीढ़ियों से निहत्थे उतर रहे थे तो पीछे से किसी सुजात मेव नाम के मुस्लिम ने उन पर जहरीले चाकू से हमला किया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी थी।उस मेव को उसी समय सैनिको ने मार दिया। शायद वह मेवात में मुस्लिमो को हिन्दू बनाये जाने से नाराज था।

 7 अगस्त को हर साल उनकी पुण्यतिथि पर बलिदान दिवस मनाया जाता है।

जबरो जाट जवाहर सिंह
सूरजमल रो जायो हो
लाल किले रो फाटक तोड़यो
लोहागढ़ पहुंचायो हो
मुगल बेगमा रे महला म्ह
गाढो ही फुस भरायो रे बेली,
हर हर बम बम बोलो रे बेली

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

Wednesday, 27 June 2018

शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का संक्षिप्त जीवन परिचय

महाराजा रणजीत सिंह

Jat warrior
शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह

रणजीत सिंह का उपनाम शेर-ए- पंजाब था महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर, 1780 गुंजारवाला ( पश्चिम पंजाब – वर्तमान समय में पाकिस्तान का हिस्सा) एक जाट परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम महा सिंह सन्धावालिया और माता का नाम राज कौर
था महाराजा रणजीत का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उन्होंने कई शादियाँ की, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी 20 शादियाँ हुई थीं।उनकी मृत्यु सन 1839 हुई थी वो वर्तमान भारत पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक जाट साम्राज्य के संस्थापक थे

ऊँका लक्ष्य पूरे हिंदुस्तान को एक ध्वज के नीचे लाना था।

महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। पंजाब के इस महावीर नें अपने साहस और वीरता के दम पर कई भीषण युद्ध जीते थे। रणजीत सिंह के पिता सुकरचकिया मिसल के मुखिया थे। बचपन में रणजीत सिंह चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो गये थे, उसी कारण उनकी बायीं आँख दृष्टिहीन हो गयी थी।महाराजा रणजीत सिंह नें लगभग 40 वर्ष शासन किया। अपने राज्य को उन्होने इस कदर शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था कि उनके जीते जी किसी आक्रमणकारी सेना की उनके साम्राज्य की और आँख उठा नें की हिम्मत नहीं होती थी।
महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे। अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।

वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।

काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था। उन्होंने कई मन्दिर व गुरुद्वारे स्थापित किये।

वो भारत के अंतिम राजा थे जिनके पास कोहिनूर हीरा था

पंजाब के भिन्न-भिन्न मिसलों पर जीत हासिल की
ई॰ 1803 में अकालगढ़ पर विजय।
ई॰ 1804 में डांग तथा कसूर पर विजय।
ई॰ 1805 में अमृतसर पर विजय।
ई॰ 1809 में गुजरात पर विजय।
महाराजा रणजीत सिंह नें किया सतलज पार के प्रदेशो को अपने आधीन
ई 1806 में दोलाधी गाँव पर किया कब्जा।
ई॰ 1806 में ही लुधियाना पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में जीरा बदनी और नारायणगढ़ पर जीत हासिल की।
ई॰ 1807 में ही फिरोज़पुर पर विजय प्राप्त की।

कांगड़ा पर विजय (ई॰ 1809)
अमरसिंह थापा नें ई॰ 1809 में कांगड़ा पर आक्रमण कर दिया था। उस समय वहाँ संसारचंद्र राजगद्दी पर थे। मुसीबत के समय उस वक्त संसारचंद्र नें रणजीतसिंह से मदद मांगी, तब उन्होने फौरन उनकी मदद के लिए एक विशाल सेना की रवाना कर दी, सिख सेना को सामने आता देख कर ही अमरसिंह थापा की हिम्मत जवाब दे गयी और वह सेना सहित उल्टे पाँव वहाँ से भाग निकले। इस प्रकार कांगड़ा राज्य पर भी रणजीत सिंह का आधिपत्य हो गया।
मुल्तान पर विजय (ई॰ 1818)
उस समय मुल्तान के शासक मुजफ्फरखा थे उन्होने सिख सेना का वीरतापूर्ण सामना किया था पर अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। महाराजा रणजीत सिंह की और से वह युद्ध मिश्र दीवानचंद और खड्गसिंह नें लड़ा था और मुल्तान पर विजय प्राप्त की थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह नें ई॰ 1818 में मुल्तान को अपने आधीन कर लिया।
कटक राज्य पर विजय (ई॰ 1813)
वर्ष 1813 में महाराजा रणजीत सिंह ने कूटनीति द्वारा काम लेते हुए कटक राज्य पर भी अधिकार कर लिया था | ऐसा कहा जाता है की उन्होंने कटक राज्य के गर्वनर जहादांद को एक लाख रूपये की राशि भेंट दे कर ई॰ 1813 में कटक पर अधिकार प्राप्त कर लिया था|
कश्मीर पर विजय (ई॰ 1819)
महाराजा रणजीत सिंह नें 1819 ई. में मिश्र दीवानचंद के नेतृत्व मे विशाल सेना कश्मीर की और आक्रमण करने भेजी थी। उस समय कश्मीर में अफगान शासक जब्बार खां का आधिपत्य था। उन्होनें रणजीत सिंह की भेजी हुई सिख सेना का पुरज़ोर मुकाबला किया परन्तु उन्हे पराजय का स्वाद ही चखना पड़ा। अब कश्मीर पर भी रणजीत सिंह का पूर्ण अधिकार हो गया था।
डेराजात की विजय (ई॰ 1820-21)
आगे बढ़ते हुए ई॰ 1820-21 में महाराजा रणजीत सिंह ने क्रमवार डेरागाजी खा, इस्माइलखा और बन्नू पर विजय हासिल कर के अपना अधिकार सिद्ध कर लिया था।
पेशावर की विजय (ई॰ 1823-24)
पेशावर पर जीत हासिल करने हेतु ई॰ 1823. में महाराजा रणजीत सिंह ने वहाँ एक विशाल सेना भेज दी। उस समय सिक्खों ने वहाँ जहांगीर और नौशहरा की लड़ाइयो में पठानों को करारी हार दी और पेशावर राज्य पर जीत प्राप्त कर ली। महाराजा की अगवाई में ई॰ 1834 में पेशावर को पूर्ण सिक्ख साम्राज्य में सम्मलित कर लिया गया।
लद्दाख की विजय (ई॰ 1836)
ई॰ 1836 में महाराजा रणजीत सिंह के सिक्ख सेनापति जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और लद्दाखी सेना को हरा कर के लद्दाख पर आधिपत्य हासिल कर लिया|
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु
भारतीय इतिहास में अपनी जगह बनाने वाले प्रचंड पराक्रमी महाराजा रणजीत सिंह 58 साल की उम्र में सन 1839 में मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होने अपने अंतिम साँसे लाहौर में ली थी। सदियों बाद भी आज उन्हे अपने साहस और पराक्रम के लिए याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र महराजा खड़क सिंह ने उनकी गद्द्दी संभाली।

ऐसे महान यौद्धा को कोटि कोटि नमन

Sunday, 24 June 2018

जाटों की उत्पत्ति(origin of Jats)

जाट जाति की उतपत्ति-


अलग अलग विद्वानों ने जाटो के बारे में
राजपूत गुर्जर अहीर आदि जातियों की
तरह अलग अलग मत दिये है जो इस प्रकार है-

महादेव से उतपत्ति-
महाऋषि गोरख सिन्हा ने देव संहिता व खाप
इत्तिहास में जाटो की उतपति भगवान शिव से
बताई गई है। महाभारत में भगवान शिव को
महाजट कहकर पुकारा गया है।देव संहिता
के श्लोक खाप इत्तिहास में भी अंकित है।
उनमें जाट को महाक्षत्रिय महावीर कहा
गया है।महादेव की जटाओं से उतपन्न होने
का अर्थ है कि जाट जाति शीर्ष प्रधान
राजा है। जट का अर्थ भी
राजा,प्रधान,शीर्ष होता है।

भगवान श्रीकृष्ण से उतपति-
जाटों को भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बनाया गए
ज्ञाति संघ से भी जोड़ा जाता है।
जाटो में यदुवंशी गौत्र यानी भगवान के
बहुत से वंशज हैं।हिन्दू ह्रदय सम्राट
महाराजा सूरजमल भी कृष्णवंशी जाट ही
थे।

सूर्यवंश नागवंश से उतपति-
 कई इतिहासकारों ने जाटो को नागवंशी
सूर्यवँशी क्षत्रिय लिखा है। जाटों में
नागवंशी सूर्यवँशी क्षत्रियों की एक
बड़ी संख्या हैं भगवान राम के वमशज
रघुवंशी भी जाटो में है और जाट सम्राट
महाराजा हर्षवर्धन बैंस भी नागवंशी
सूर्यवँशी क्षत्रिय ही थे।व महादेव के भक्त
थे।नागवंशी जाट आज भी सांपों को
मारना उचित नहीं समझते।

युद्धिष्ठिर(पांडवो) से उतपत्ति-
युद्धिष्ठिर को ज्येष्ठ होने के कारण
ज्येष्ठ या जेठर कहा गया है जिस कारण
जाटो की उतपति को उनसे जोड़ा
जाता हैं। हालांकि जाटो में एक बड़ी
संख्या में चन्दरवंशी क्षत्रिय गौत्र हैं
पांडवो व कौरवों के वंशज तोमर पांडु व
अन्य बहुत से गौत्र हैं।
#विदेशी_मूल- बहुत से विदेशी विद्वानों
ने आर्यों को विदेशी लिखा है जिस
कारण वे जाट राजपूत गुर्जर अहीर को
विदेशी शक सीथियन आदि से लिखते हैं।
हालांकि आर्य के आक्रमण की थ्योरी
अब नष्ट हो चुकी है आर्य भारतीय ही थे।
यह भी सत्य है कि गुर्जर राजपूत अहीर
जाट आदि बहुत सी जातियों में कुछ
आधा 1% विदेशी भी आकर मिश्रित हुए
हैं।

निष्कर्ष
इन सब मतों के आधार पर यह सर्वविदित है
कि जाट महाक्षत्रिय आर्य व मूल
भारतीय हैं।जाटो में सूर्यवंश व नागवंश
(जो सूर्यवंश का ही भाग है),चन्द्रवंश व
यदुवंश (जो चन्दरवंश का ही भाग है) ये
दोनो वंश बराबर संख्या में विद्धमान है।
अत्रि,कश्यप जैसे बहुत से ऋषिकुल के गौत्र
भी जाटो में विद्यमान है।
ज्यादातर मुख्य जाट गौत्रों का जिक्र
वेद,महाभारत,पुराण आदि प्राचीन
गर्न्थो में है।
जट का अर्थ राजा शीर्ष प्रधान होता
है और यह उपाधि सर्वप्रथम भगवान शिव ने
धारण की थी।
जाट भगवान शिव,उनके रुद्रांश भगवान
बजरंग बली,भगवान श्री कृष्ण,भगवान
राम,माता शक्ति पार्वती व शेरांवाली
माता को सबसे ज्यादा पूजते हैं।इसके
अलावा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रीय व
कुलदेवता कुलदेवी को पूजते हैं।कुलदेवी के
मंदिर पर बच्चे होने पर उनका झुबला
उतरवाने व पूजा करने जरूर जाते हैं।हर साल
क्षेत्रीय या कुलदेवता का मेला लगाते हैं।
दशहरा पर शस्त्रपूजा करते हैं।
आज के समय मे मुखयतः जाट मराठा
राजपूत गुर्जर यादव खेती करते हैं आर्यों
का मुख्य व्यवसाय खेती ही था।जाटों ने
शुरू से ही सनातन वैदिक हिन्दू धर्म का
कट्टरता से पालन किया है।सबसे ज्यादा
शाकाहारी,सनातनी,गौभक्त जाती के
रूप में अपनी पहचान बनाई है। जब सनातन
धर्म पर आंच आई तो सिख पन्थ बनाया
गया था।उस समय जब गुरुओ ने सिरों की
मांग की तो सबसे ज्यादा जाटो ने ही
अपने बड़े बेटे दान किये थे। ज्यादातर जाट
गुरु अर्जुन देव जी गुरु गोविंद सिंह जी व
बन्दा सिंह बहादुर जी के साथ ही लड़ने के
लिए भर्ती हुए थे जिनमें से कई सिख बन गए।
उत्तर भारत मे हिन्दू धर्म को व भारतीय
सीमाओं को सुरक्षित करने में जाटो का
सबसे ज्यादा योगदान रहा है।
चंद्रव्याकरण में भी जट झट संघाते, अजेय
जट्टो हुनान(अर्थत जाटों ने हूणों को
हराया) लिखा है।
महाराजा शैलेन्द्र जाट का राज्य 409 ई0
के आस पास स्यालकोट से लेकर
राजस्थान तक रहा है।
अतः जाटों की प्राचीनता भी
सर्वविदित है।जाट राजक्षेत्र को
जटवाड़ा नाम से सम्बोधित किया
जाता है।
निष्कर्ष यही है कि जाट सर्वश्रेष्ठ व
प्राचीनतम क्षत्रिय हैं।

जय जय जटवाड़ा
जय महाराजा सूरजमल
ॐ।हर हर महादेव।ॐ
जय भारतभूमि

संदर्भ-इतिहासकार ठाकुर
देशराज,दिलीप सिंह अहलावत,उपेंद्रनाथ
शर्मा,कालिके रंजन,मोहनलाल गुप्ता,vs
अग्रवाल,जदुनाथ सरकार,महाऋषि
गोरख सिंह,खाप इत्तिहास आदि सबका निष्कर्ष

Wednesday, 20 June 2018

राजा दयाराम सिंह- जिसने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे

भारत माता के स्वाभिमानी लाल हाथरस नरेश राजा दयाराम सिंह ठेनुआ

Jat King
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम सिंह हाथरस(उत्तर प्रदेश) के राजा थे।इनके पूर्वजो ने हिन्दू धर्म रक्षा का अनोखा इत्तिहास रचा था।और इनके वंशज राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने आजाद हिंद फौज व सरकार का निर्माण किया था।

राजा दयाराम सिंह अपने पिता राजा भूरी सिंह की मृत्यु के बाद राजा बने। उन्होंने अपने राज्य को सुदृढ किया व हाथरस किले को मजबूत बनाया। प्रजा में रोजगार के साधन बढाने के लिए बाहर से कारीगर बुलाकर प्रशिक्षित किया व किसानों की भी बहुत सहायता की।
वे भगवान दाऊ जी(बलराम) के भक्त थे उनके दरबार में दाऊ जी की नित्य पूजा होती थी। उनके पिता द्वारा निर्मित किये गये दाऊ जी मन्दिर पर मेला लगता था।

उस समय देश पर अंग्रेजो का राज था अंग्रेज सभी देशी रियासतों को छल व बल से अपने अधीन करना चाहते थे। ऐसे समय में हाथरस व मुरसान रियासत स्वतंत्र थी।

इसलिए कई सालों से वे राजा दयाराम जी पर दबाव बनाए हुए थे कि वे अंग्रेजो की अधीनता स्वीकार करें। लेकिन राजा साहब स्वाभिमानी व देशभक्त थे उन्होंने झुकना स्वीकार न किया जिस कारण अंग्रेजों और राजा साहब में कई बार तनातनी हो चुकी थी।

सामरिक रूप से राजा साहब अंग्रेजो के मुकाबले बहुत कमजोर थे लेकिन फिर भी उनके स्वाभिमानी हौसले ने दम नहीं तोड़ा।

अंत मे एक दिन 4 क्रांतिकारी युवक दयाराम जी की शरण में आ पहुँचे और बोले कि राजा साहब हमें बचाइए अंग्रेज हमें झूठे हत्या के आरोप में फंसा रहे हैं।तब राजा साहब ने उन्हें निश्चिंत रहने को कहा व किले में ही अपने साथ ठहरने का प्रबंध कर दिया।

जब यह बात अंग्रेजो को पता चली तो उन्होंने राजा साहब को चारों तथाकथित आरोपियों को अंग्रेजो के हवाले करने के लिए कहा। राजा साहब ने साफ कहा कि वे निर्दोष है और मेरे देश के नागरिकों पर मैं अत्याचार नहीं होने दूँगा।

यह सुनकर अंग्रेज घबरा गए।उन्होंने देख लिया कि हाथरस आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन सकता है।
इसलिए 1817 में अंग्रेजों ने हाथरस व मुरसान पर आक्रमण कर दिया।(मुरसान पर उन्ही के परिवार का राज था।वहां के राजा उनके चचेरे भाई भगवंत सिंह थे) मुरसान को अंग्रेजों ने फतेह कर लिया।(मुरसान व उससे कुछ साल पहले के सासनी युद्ध के बारे में फिर कभी विस्तार से लिखेंगे)

जब अंग्रेज जनरल मार्शल के नेतृत्व में हाथरस की ओर बढ़े तो राजा साहब पूर्णतः तैयार हो गए। अंग्रेजों ने किले के चारों ओर घेरा डाल दिया। हाथरस का किला मजबूत था(जो उनके पूर्वज राजा भोज सिंह ने बनवाया था और बाद में राजा सारदल सिंह, पहुप सिंह और दयाराम ने भी इसे मजबूत किया)

मुरसान पर विजय प्राप्त करते ही अंग्रेजी सेना हाथरस पहुंची। इस बीच में हाथरस वाले संभल चुके थे। वैसे हाथरस का किला मुरसान के किले से अधिक मजबूत था। अलीगढ़ और मथुरा की ओर का हिस्सा तो और भी अधिक मजबूत था। हाथरस में रणचंडी का विकट तांडव हुआ। अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे हो गए।
यह युद्ध संवत 1874 विक्रम तदनुसार 1817 ई. में हुआ था। लड़ाई कई दिन तक होती रही। राजा दयाराम ने अपने वीर सैनिकों के साथ दांत पीस-पीस कर अंग्रेजों पर हमले किए। प्राणों की बाजी लगा दी।
यह देखकर अंग्रेजों ने राजा दयाराम से सन्धि की भी बात चलाई लेकिन राजा दयाराम व उनके पुत्र नेकराम सिंह ने विचार विमर्श करके मना कर दिया।

जब अंग्रेजों ने देखा अब सन्धि नहीं होगी तो पूर्ण बल के साथ हाथरस-दुर्ग के ऊपर हमला किया। जाट भी वन-केसरी की भांति छाती फुलाकर अड़ गये। श्री दयारामसिंहजी बड़ी संलग्नता से दुर्ग की देखभाल में व्यस्त थे। राजा से लेकर सैनिक तक सभी बड़े चाव से युद्ध कर रहे थे। वे आज अपना या शत्रु का फैसला कर लेना चाहते थे। वे थोड़े थे फिर भी बड़े उत्साह से लड़ रहे थे। किले पर से शत्रु के ऊपर वे अग्नि-वर्षा कर रहे थे। उन्हें पूरी आशा थी कि मैदान उनके हाथ रहेगा, किन्तु अचानक ही सब बदल गया। बारूद की मैगजीन में अकस्मात् आग लग गई। बड़े जोर का घमाका हुआ, उनके असंख्य सैनिक भस्म हो गए। अब क्या था, शत्रु को पता लगने की देर थी, और फिर हाथरस स्वयं विजित हो गया।
Hathras
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम ने अपने सैनिको के परिवार व खुद के परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल दिया व फिर वे वहां से निकल कर इधर उधर दूसरे राज्य में शरण लेने के लिए दौड़े। उनके पीछे अंग्रेज लगे हुए थे और वे अंग्रेजो के आगे आगे थे झुकने को तैयार न थे। वे भरतपुर पहुंचे लेकिन भरतपुर भी उस समय अंग्रेजों से युद्ध लड़कर कमजोर हो चुका था और वहां पर अंग्रेजी एजेंट भी कार्यरत थे। सुरक्षा की दृष्टि को देखते हुये वे जयपुर पहुंचे पर वहां भी अंग्रेजों के डर से उन्हें शरण न मिली कई दिनों तक वे इधर उधर भटकते रहे।
उनके परिवार को भी रोज रोज सताया जा रहा था।
यह देखकर उनके बेटे गोविंदसिंह ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली।
जिसके बाद राजासाहब वापिस हाथरस पहुंचे और उन्होंने अलीगढ़ में अपनी एक अलग छावनी बना ली।जहाँ वे क्रांतिकारी सैनिक तैयार कर रहे थे। वे फिर से मजबूत होकर अंग्रेजो से टक्कर लेने चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों ने उनके राज को कभी नहीं उभरने दिया व राजा दयाराम के नजदीकियों को अंग्रेजों ने तंग करके दूर कर दिया।
आज भी हाथरस के तथा आस-पास के लोग दयाराम का नाम बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ याद करते हैं। वे बड़े उदार और दानी राजा थे। अभी तक उनकी दान की हुई जमीन कितने ही मनुष्य वंश परम्परागत से भोग रहे

इस तरह वे अपने अधूरे सपने के साथ 1841 में स्वर्ग सिधार गये। बाद में उनके इस सपने को उनके प्रपोते राजा महेंद्र सिंह प्रताप ने पूरा किया व जीवनभर अंग्रेजो से लड़कर देश को आजाद करवाया।

वन्दे मातरम।देश पर मर मिटने वाले शहीदों को कोटि कोटि नमन।जय भारत माता।

1857 के सिरमौर दो वीर जाट क्षत्रिय राजा

1857 के हीरो- शहीद राजा नाहर सिंह- शहीद राजा अमानी सिंह-


जाट राजा
1857 की क्रांति

राजा नाहर सिंह- बल्लभगढ(हरियाणा) के राजा।
-ये एकमात्र ऐसे राजा थे जो 1857 कि क्रांति में अपनी रियासत सुरक्षित होते हुए भी अंग्रेजो से लड़े।
इन्होंने दिल्ली को लगभग 132 दिनों तक आजाद रखा,क्रांतिकारियों की मदद की, अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व उन्हें काटा।अंत मे धोखे से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 9 जनवरी 1858 को इन्हें दिल्ली के चांदनी चौक पर फांसी हुई।

राजा अमानी सिंह- इग्लास_अलीगढ़(उत्तर प्रदेश) के राजा।
- ये दोनों हाथों से तलवार चलाना जानते थे।
इन्होंने अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व अपनी मातृभूमि की रक्षा की, इनकी घोड़ी भी देशभक्त थी और घोड़ी ने भी अंग्रेजो को टापों से कुचला जिसके कारण  कहावत प्रचलित हुई के अमानी तो अमानी पर घोड़ी ने भी हूँ न मानी।दूसरे युद्ध मे बारिश के कारण बंदूकें काम नहीं कर पाई जिसके कारण सैंकड़ो जाट वीर लड़ते हुए शहीद हुए और धोखे से गिरफ्तार कर लिए गए व इन्हें फांसी दी गयी।

दोनों वीरों को कोटि कोटि नमन।

गुप्तांग काटने के बाद भी पाकिस्तान के आगे झुका नहीं यह वीर सैनिक

शहीद भीखाराम मूंड- एक महान वीरगाथा
जाट
शहीद भीखाराम

भारतीय सेना का अनन्य वीर सैनिक.
कठोर एवं पाशविक यातनाएं, अमानवीय, बर्बरतापूर्वक व्यवहार के पश्चात पाकिस्तानी सैनिकों ने नृशंसतापूर्वक इनके आँख, कान, नाक और गुप्तांग भी काट लिए फिर भी नहीं हारा था ये जवान.

जन्म - 16 जनवरी सन 1977 ई. पातासर ग्राम परपदरा तहसील बाड़मेर, राजस्थान.
बलिदान पर्व - पाकिस्तान की कैद में मृत्यु होने के पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं. 14 मई सन 1999 से 9 जून सन् 1999 के बीच अवधि के दौरान किसी दिन.

भारत-पाक के बीच हुए कारगिल युद्ध में सैकड़ों भारतीय जवानों ने शहीद होकर वीरता की इबारत लिखी थी। इनमें से कई देशभक्तों ने देश की वि़जय में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ऐसे जवानों में से ही एक जवान भीखाराम मूंढ भी थे।

 भीखाराम मूंढ राजस्थान के बाड़मेर जिले के रहने वाले थे। इनका जन्म बाड़मेर की परपदरा तहसील के पातासर गांव में 16 जनवरी 1977 को को हुआ था। सन् 1994 में भीखाराम की शादी भंवरी देवी के साथ हुई। 26 अप्रैल 1995 को भीखाराम का चयन भारतीय सेना में 4 जाट रेजिमेंट में बतौर सिपाही किया गया।

भीखाराम मूंढ को युद्ध के समय जम्मू कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में सीमा पर सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। उस समय युद्ध अपने चरम पर चल रहा था। भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के सैनिक कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे और दोनों देशों की तरफ से कूटनीतिक चालें भी चली जा रहीं थीं।

युद्ध के समय मई 1999 में लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने साथियों के साथ सीमा पर गश्त लगा रहे थे। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के समूह में भीखाराम मूंढ भी शामिल थे। उसी समय पाकिस्तान के घुसपैठियों ने उनके गश्ती समूह पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों ने पाक हमले का जमकर मुकाबला किया लेकिन 14 मई 1999 को 6 भारतीय सैनिकों को पाकिस्तान के गुप्तचर विभाग ने पकड़ लिया। इन सैनिकों पर भारत के लिए पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी करने का आरोप लगाया गया। इन सैनिकों में भीखाराम मूंढ भी थे। पाकिस्तानी सेना द्वारा इन सैनिकों के साथ बड़ा ही अमानवीय तथा बर्बरतापूर्वक व्यवहार किया गया।

पाक सैनिकों ने नृशंसतापूर्वक इनके आँख, कान, नाक और गुप्तांग काट लिए। इसके बाद उन्होंने इस सभी को एक सप्ताह तक कठोर एवं पाशविक यातनाएं दी। इन सबके बावजूद जब वे कुछ भी हासिल कर पाने में नाकाम रहे तो उन्होंने सभी की हत्या कर दी।
भीखाराम मूंढ भी इस हादसे के भुक्तभोगी थे। जब इस घटना के बारे में भारत सरकार और अन्य देशों को पता चला तो अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान को इन सैनिकों के शव भारत को सौंपने पड़े। 9 जून सन् 1999 को इन सैनिकों के क्षत-विक्षत शव भारत को प्राप्त हुए।

कोटि कोटि नमन

स्वामी इंद्रवेश जी ढाका- महान समाज सुधारक, गौरक्षक, आर्य समाजी

आर्य समाज के महान पुरोधा स्वामी इंद्रवेश ढाका जी

जाट
स्वामी इंद्रवेश जी

स्वामी इंद्रवेश जी का जन्म रोहतक के sudana गांव के एक हिन्दू जाट(ढाका गौत्र) परिवार में हुआ था।
वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे और स्वामी दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं से प्रभावित थे।
वे हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने आर्य समाज का प्रचार किया व बहुत से गुरुकुलों में अपनी सेवा प्रदान की।पदयात्राओं, शिविरों, व्यायाम-प्रदर्शनों व जनचेतना यात्राओं के माध्यम से आर्य समाज का प्रचार करने की परम्परा उन्होंने ही प्रारम्भ की ।
आर्य समाज के मूल्यों को फैलाने में ऊनका विशेष योगदान रहा।

1966 में उन्होंने गौरक्षा वांडोलन के द्वारा गौहत्या निषेध कानून बनाने के लिए भी पुरजोर आवाज उठाई।

1967 में उन्होंने आर्य युवक परिषद का गठन किया और युवाओ को वैदिक शिक्षा के प्रति जागरूक किया।

1967 में कुरुक्षेत्र से दिल्ली तक की पदयात्रा का ऐतिहासिक आयोजन किया । यह यात्रा सैंकड़ों गांवों, कस्बों व नगरों से होती हुई पन्द्रह दिन बाद दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले के समक्ष जलती मशाल हाथों में लेकर आर्य राष्ट्र की स्थापना के संकल्प के साथ सम्पन्न हुई । 

1968 में उन्होंने राजधर्म पत्रिका की शुरुआत की जो emergency के वक्त उस समय के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा बन्द कर दी गयी थी व बाद में शुरू हुई थी

1969 में उन्होंने कुंडली बूचड़खाना बन्द करवाने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

1969 में हरयाणा की जनता के द्वारा छेड़े गए चण्डीगढ़ आन्दोलन में युवावर्ग का नेतृत्व करते हुये स्वामी इन्द्रवेश व उनके साथी जेल गये । रोहतक सेन्ट्रल जेल में ही उन्होंने सन्यास लेने का संकल्प लिया ।

7 अप्रैल 1970 को दयानन्द मठ रोहतक में स्वामी इन्द्रवेश जी ने स्वामी अग्निवेश एवं स्वामी सत्यपति के साथ वेदों के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी ब्रह्ममुनि जी से सन्यास की दीक्षा ली । उसी दिन स्वामीद्वय ने आर्य राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेते हुए आर्यसभा नाम से राजनैतिक पार्टी की भी स्थापना कर ली तथा सक्रिय राजनीति में उतर गये ।

1972 में विधानसभा के चुनावों में आर्यसभा के दो विधायक चुने गये तथा आर्यसभा हरयाणा की सर्वाधिक वोट प्राप्त करने वाली विपक्षी पार्टी बन गई ।

 फिर गेंहू के मूल्य बढ़वाने के लिए किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।

सन् 1974 में आर्यसमाज की सर्वाधिक सशक्त सभा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब जिसमें दिल्ली, हरयाणा, पंजाब की आर्य समाजें, शिक्षण संस्थायें व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, कन्या गुरुकुल देहरादून, गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी आदि सम्मिलित थीं, के चुनाव में प्रधान चुने गये तथा गुरुकुल कांगड़ी के कुलाधिपति बने । यह चुनाव हाईकोर्ट की देखरेख में संपन्न हुआ था ।

1975 में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया जिसके कारण उन्हें लम्बे समय तक जेल भी जाना पड़ा।

सन् 1975 में आपातकाल के दौरान मीसा के अन्तर्गत नजरबंद किये गये । इमरजेंसी के बाद आर्यसभा का अन्य सभी पार्टियों की तरह जनता पार्टी में विलय कर दिया गया तथा सन् 1980 के लोकसभा चुनाव में आप रोहतक से लोकदल के टिकट पर सांसद चुने गये ।

1986 में पंजाब हरयाणा की boundry व जलीय बंटवारे से सम्बंधित राजीव - लोंगोवाल समझौते का विरोध किया व पंजाब में बढ़ रहे उग्रवाद के खिलाफ 21 दिन तक भूख हड़ताल की।

स्वामी जी की अध्यक्षता में गठित वेदप्रचार आयोजन समिति के तत्वाधान में वर्ष 1986 में कुम्भमेला हरद्वार में चालीस दिन का वेदप्रचार शिविर लगाया गया जिसमें गाय के घी से चतुर्वेद पारायण यज्ञ, विभिन्न सम्मेलन, योग शिविर, ऐतिहासिक शोभायात्रा एवं शास्त्रार्थ की चुनौति देकर पौराणिक जगत् में हलचल पैदा की, 1986 के वेदप्रचार शिविर से पूर्व कुम्भ मेले में आर्य समाज का शिविर लगभग 60 साल पहले लगा था । स्वामी जी द्वारा प्रारम्भ किये गये उक्त क्रान्तिकारी कार्यक्रम को अभी तक प्रत्येक कुम्भ मेले में चलाया जा रहा है । सन् 1986 के कुम्भ मेले पर स्वामी प्रकाशानन्द व स्वामी योगानन्द सहित दस सन्यासी बने थे।

1987 में उन्होंने एक राजपूत विधवा रूप कंवर को धक्के से सती करने के खिलाफ दिल्ली-देवराला(देवराला राजस्थान जहां एक राजपूत स्त्री को जिंदा जलाने की कोशिश की गई)पदयात्रा निकाली व अपराधियो पर कार्यवाही और सती प्रथा बन्द के लिए आवाज उठाई।जिसके कारण सरकार को संसद के तहत कानून बनाना पड़ा।

न् 1987 में ही दिल्ली से पुरा महादेव (मेरठ) तक आयोजित पदयात्रा का संरक्षण स्वामी इन्द्रवेश जी ने किया । यह यात्रा भी पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ को सती के सवाल पर शास्त्रार्थ की चुनौति देने के लिए आयोजित की गई थी । इस कार्य में पूरे आर्य जगत में नई ऊर्जा पैदा हुई थी ।

1993 में उन्होंने दिल्ली से हिसार तक शराब बंदी के लिए यात्रा निकाली व शराब के बुरे प्रभावों के बारे में लोगो को जागृत किया।

बागपत में मायात्यागी काण्ड के बाद ग्यारह सौ सत्याग्रहियों के साथ सत्याग्रह करके एक महीने तक बरेली जेल में रहे तथा बाद में हरयाणा लोक संघर्ष समिति के माध्यम से हरयाणा में जोरदार जेल भरो आन्दोलन चलाया । विदित हो कि मायात्यागी को पुलिस ने भरे बाजार में नंगा करके घुमाया तथा अपमानित किया था जो महिलाओं पर किये जाने वाले अत्याचार का ज्वलन्त उदाहरण था ।

उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी लोगो को जागृत किया और शिक्षा के प्रसार प्रचार में बहुत बड़ा योगदाब दिया।

1998 में bjp join की और रोहतक से चुनाव लड़ा।

सन् 2001 में आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा के प्रधान निर्वाचित हुये । वर्तमान में आप आर्य विद्यासभा गुरुकुल कांगड़ी के प्रधान पद को सुशोभित कर रहे थे ।

ब्रह्मचर्य, व्यायाम प्रशिक्षण एवं युवानिर्माण शिविरों के माध्यम से पूरे देश में युवक क्रान्ति अभियान चलाया त्था आर्यसमाज में नया जीवन फूँका । शिविरों के माध्यम से लाखों युवकों को आर्यसमाज से जोड़ा ।और सैंकड़ो को सन्यास व ब्रह्मचर्य की दीक्षा भी दी।

स्वामी इन्द्रवेश जी ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समाज परिवर्तन के लिए लगाया । उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपना जीवन समाज सेवा में अर्पित किया । उनकी पुण्यतिथि पर हमें एक ही संकल्प लेना चाहिये कि जिस पवित्र निष्ठा के साथ स्वामी जी ने महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष किया उसी प्रकार हम सब सप्तक्रान्ति अर्थात् जातिमुक्त, साम्प्रदायिकतामुक्त, नशामुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त, नारी उत्पीड़नमुक्त एवं शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कृतसंकल्प रहेंगे । हम आपस के सभी भेदभाव मिटाकर इस मिशन में जुटें, यही स्वामी जी की अन्तिम इच्छा थी ।

12 जून 2006 को उनका देहांत हो गया वे अन्य कई आर्य संस्थानो एवं सँगठनो के अध्यक्ष रहे।कई किताबें व आंदोलन किया।भयत से गुरुकलों को उन्होंने अपनी सेवा से जीवंत कर दिया।

इस महान आत्मा को कोटि कोटि नमन।

Thursday, 31 May 2018

कैराना उपचुनाव: क्या जाटों ने नहीं दिए RLD को वोट

जाट बाहुल्य सीटों पर BJP की बढ़त
Jatwada News
कैराना उपचुनाव के पश्चात ही जाटो के रुख पर मीडिया व सोशल मीडिया दोनो जगह ही तेज बहस चल रही थी।
नतीजे आने के बाद RLD के कुछ समर्थक जाटो के वोटो का श्रेय लेते दिखे तो कुछ BJP भक्त भी हार का ठीकरा जाटों पर फोड़ते मिले। हालांकि कुछ ज्ञानी BJP विश्लेषक जाटो का वोट BJP को मिलने की भी बात कर रहे थे।

तो चलिए विश्लेषण करके देखते हैं कि जाटों का रुख किस्य ओर रहा।
कैराना लोकसभा में थानाभवन, शामली, कैराना, गंगोह और नकुड़ सीटें शामिल हैं जिनमे से शामली व कैराना जाट बाहुल्य सीट हैं।
BJP की शामली व कैराना दो जगह पर ही बढ़त रही और गौरतलब है कि ये दोनों सीट ही जाट बहुल है। 

इन नतीजो से यह बात तो स्पष्ट है कि जाटो का रुख BJP की ओर ही रहा।

अब अगर सम्पूर्ण नतीजों पर निगाह डाले तो 
कैराना लोकसभा सीट पर 5 लाख मुस्लिम वोट हैं तथा 5.5 लाख हिन्दू वोट बैंक है। हिन्दुओ में 2.5 लाख दलित वोट हैं तो 3 लाख बाकी जातियों की वोट संख्या है जिसमे से जाटो के वोट लगभग 1 लाख 20,000 हैं। जो शामली व कैराना क्षेत्र में ज्यादा हैं।

कैराना की हार के सच से मुंह चुरा रहे हैं राजनीतिक और न्यूजचैनली मठाधीश।- सतीश चंद्र
ना कोई जाट मुस्लिम एकता हुई। ना कोई दलित लामबंदी हुई। ना ही कोई किसानों नौजवानो की नाराजगी थी। न्यूजचैनलों पर राजनीति और मीडिया के प्रायोजित मठाधीश अपने ऐसे डॉयलॉगों से हमारी आपकी आंखों में धूल झोंक रहे हैं। कैराना उपचुनाव के परिणामों के मूल कारणों से मुंह चुरा रहे न्यूजचैनली/मीडियाई मठाधीश दरअसल यह स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं कि कैराना में धुर साम्प्रदायिक आधार पर प्रचण्ड मुस्लिम ध्रुवीकरण हुआ। ध्यान रहे कि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 20 से 50 प्रतिशत तक हैं। 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़ें के साथ कैराना इन्हीं 16 लोकसभा सीटों की सूची में शामिल है। 
#अब जरा इन तथ्यों और आंकड़ों को पूरा और ध्यान से पढ़िए...
कैराना लोकसभा सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 16,90,000 मतदाता हैं। इसमें मुस्लिम मतदातों की संख्या लगभग 35%, अर्थात कैराना में लगभग 5 लाख 65 हज़ार मुस्लिम मतदाता हैं। 
इस उपचुनाव में कैराना में लगभग 55%  मतदान हुआ था। अर्थात लगभग 9 लाख 43 हज़ार मत पड़े थे।
यह जग जाहिर तथ्य है कि कैराना लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का मतदान प्रतिशत सामान्य मतदान से अधिक प्रतिशत में हुआ था। 
अतः बहुत कंजूसी से यदि यह मान लीजिए कि मुस्लिम मतदाताओं का मतदान कुल मतदान से केवल 5% अधिक हुआ तो कैराना में कुल मुस्लिम वोट लगभग 3,40,000 पड़ा। जबकि वास्तविकता संख्या इससे अधिक ही होगी। दिल्ली से लेकर देवबंद तक जारी हुए मोदी-योगी हराओ वाले फतवों और भाजपा बनाम सब की चुनावी स्थिति के बाद यह 3,40,000 मुस्लिम वोट भाजपा के पक्ष में गए होंगे, ऐसा मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष राजनीतिक धरातल की कठोर और कटु सच्चाई से पूरी तरह अनभिज्ञ कोई राजनीतिक अनपढ़/गंवार ही निकाल सकता है। मेरा अपना मानना है कि इनमें से ज्यादा से ज्यादा 5 से 10 हज़ार मत ही भाजपा को मिले होंगे। सम्भव यह भी है कि वो भी नहीं मिले होंगे। 
2014 में कैराना में 15,31,642 मतदाता थे। उस समय सपा बसपा और RLD-कांग्रेस गठबन्धन अलग अलग चुनाव लड़े थे। उनके तीनों प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 5,32,201 मत मिले थे। 
इसबार इन सारे दलों के गठबन्धन की संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम हसन को 481182 मत मिले हैं। इनमें अर्थात गठबन्धन प्रत्याशी को 2014 की तुलना में लगभग 51 हज़ार मत कम मिले हैं। यहां यह ध्यान रखिये कि 2014 में 73.08% मतदान हुआ था। जबकि इस उपचुनाव में 55% मतदान हुआ है। अर्थात 2014 की तुलना में लगभग 2 लाख मत कम पड़े हैं। यहां यह भी ध्यान रखिये कि 2014 में तीनों दलों के प्रत्याशी अलग अलग थे। उन तीनों दलों के प्रत्याशियों और उनकी कोर टीम के सदस्यों के व्यक्तिगत प्रभाव वाले मत भी 5,32,201 मतों में शामिल थे। राजनीति के रसायन को समझने वाले यह भलीभांति जानते हैं कि किसी भी दल के प्रत्याशी के व्यक्तिगत सम्बन्धों/सम्पर्कों वाले मतों का दलीय राजनीति से कोई लेनादेना नहीं होता।
उस समय तीनों दलों को मिले वोटों में कम से कम 5-6% वोट उन प्रत्याशियों का व्यक्तिगत वोट था।
अतः आंकड़ों की उपरोक्त सच्चाई यह तो बता ही रही है कि 2014 में गठबन्धन को जितने मत मिले थे उससे मात्र 20-25 हज़ार कम मत उसे इसबार कम मिले हैं। यानी कि मोदी विरोधी राजनीतिक ताकतों का प्रदर्शन जितना सम्भव हो सकता था उतना ही हुआ। इसके बावजूद भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह मात्र 44618 मतों से हारी हैं। उन्हें 4,36,564 मत मिले हैं। भाजपा को 2014 की तुलना में लगभग 1,30,000 मत कम मिले हैं, क्योंकि 2014 में भाजपा को 5,65,909 मत मिले थे। लेकिन यह 1,30,000 मत विपक्षी गठबन्धन के खाते में नहीं गए। इसके बजाय भाजपा का यह वोटर मतदान के लिए नहीं निकला। इसके कई कारण हैं। पहला तो यही है कि इस उपचुनाव का देश या प्रदेश की सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था। उपचुनाव में भाजपा का मतदाता उदासीन रहता ही है।
अनुमान लगाइए कि 2019 में जिस समय 2019 मे देश का प्रधानमंत्री, सरकार चुनने के लिए जब वोट डाले जाएंगे तब मृगांका सिंह की 44 हज़ार मतों से हार का अन्तर किस तरह निष्प्रभावी होगा।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम मतदाता 20 से 50 प्रतिशत तक हैं। 35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के आंकड़ें के साथ कैराना इन्हीं 16 लोकसभा सीटों की सूची में शामिल है। अतः ऐसे कैराना लोकसभा क्षेत्र में गठबन्धन की पूरी ताकत झोंकने के बाद केवल 44 हज़ार मतों की हार एक सुखद सन्देश है कि फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की साख बरकरार है और 2019 की कसौटी के लिए पूरी तरह तैयार है।

उपरोक्त तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि जाटो ने वोट जातिवाद में न फंसकर हिंदुत्व के आधार पर ही दिया है।
व यह हार BJP की खामियों एवं हिन्दुओ की वोट डालने के प्रति उदासीनता के कारण हुई है।BJP को अगर आगे भी ये वोट चाहिए तो उसे हिन्दू जाट वोट बैंक को और मजबूत करना चाहिए व किसानों, रोजगार, रोजमर्रा की सुविधाओं और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए और मुस्लिम वोट का प्रलोभन कम कर देना चाहिए क्योंकि उन वोट का धुर्वीकरण साम्प्रदायिक आधार पर ज्यादा होता है।

RLD भी जाट वोट बैंक के खिसकने की बात छुपा रही है अब उसे इस सच को स्वीकार लेना चाहिए कि जाटो को अपने साथ रखना है तो जाटो को सिर्फ वोट बैंक समझने की राजनीति का त्याग करना होगा। और साथ ही अपना वजूद बढ़ाना होगा क्योंकि अब जाट फिर से कोई चौधरी चरण सिंह चाहते हैं व हिन्दू धर्म और आस्था के रूप में भी सम्मान चाहते हैं।

Wednesday, 30 May 2018

इस वीर के शरीर के औरँगेजेब ने टुकड़े टुकड़े करके कुत्तो को फेंक लेकिन इन्होंने अपना हिन्दू धर्म न छोड़ा

हिन्दू वीर जोरावर सिंह 
दुष्ट औरँगेजेब से लोहा लेने वाले महान यौद्धा
Hindu veer jorawar singh
वीर जोरावर सिंह

टुकड़े टुकड़े हुआ शरीर धर्म न छोड़ा मिट गया वीर।
कुत्तो के आगे फेंक दिया बोटी बोटी नोच लिया,
झुकूं नहीं दुष्टों के आगे उसने भी था सोच लिया।।

वीर जोरावर सिंह अकबर की कब्र उखाड़कर उसकी हड्डियां जालान वाले महान धर्म यौद्धा राजाराम जाट के ज्येष्ठ पुत्र थे।
अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने दादा सरदार भज्जा सिंह की देख रेख में वीर जोरावर सिंह ने सिनसिनी गढ़ी का प्रभार संभाला।
वीर जोरावर सिंह ने राजाराम के बाद बृज क्षेत्र में कमजोर होती हिन्दू शक्ति को संगठित करने का प्रयास किया व औरँगेजेब के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई।
उनके पिता ने अकबर की हड्डिया जला दी थी व औरँगेजेब से लोहा लिया था और ऊपर सेउसने औरँगेजेब के क्षेत्र में गश्त करना शुरू कर दिया था जिससे धर्मांध व क्रूर औरगजेब बहुत चिड़ गया। लेकिन उसमे स्वयं में जाटो से एक बार फिर पंगा लेने की हिम्मत न थी। इसलिए उसने अजेमर के राजा बिशनसिंह कछवाह का साथ लिया व अपने पोते बेदारबख्त सिंह के नेतृत्व में गद्दार बिशन सिंह को भेजा। इन दोनों की सेना ने मिलकर 1688 को सिनसिनी गढ़ी पर आक्रमण किया।

सिनसिनी दुर्ग पर घेरा

सिनसिनी से पहले उन्होंने सोंख व महावन की जक्त गढियो(छोटे किले) पर आक्रमण किया वहां भी धर्म वीरों ने डटकर मुकाबला किया।उस युध के बारे में विस्तार से बाद में जिक्र करेंगे।

बिशन सिंह व बेदारबख्त ने सिनसिनी गढ़ी तक जैसे तैसे अपनी पहुंच बनाई व वहां पर घेरा डाल दिया।लेकिन उन दोनों का सिनसिनी पर आक्रमण करने का दुस्साहस न हो रहा था।
क्योंकि कुछ क्रान्तिकारियो ने उनकी छवनी पर धावा बोला व सब कुछ तहस नहस कर डीएम बहुत से सैनिको को काट दिया गया व उनकी रसद उठाकर उनके वहां पहुंचने से पहले ही गढ़ी में चले गए।वीरता के उस मंजर को देखकर उनकी हिम्मत न हो रही थी।

फिर उन्होंने और रसद मंगवाई तो रास्ते में ही उस पर कुछ जाटवीरों ने हमला कर दिया लेकिन संख्या कम होने के कारण वे शहीद हो गए।बेदारबख्त ने शहीदों के शवों को जंगली रास्ते पर टँगवा दिया ताकि आने जाने वाले उससे भय खाये।गढ़ी का घेरा 24 महीने यानी 2 साल तक चला था। बार बार क्रांतिकारी हिन्दू वीर जाट उन्हें मात दे रहे थे।
घेरा डाले हुए जब 8 महीने बीत चुके थे लेकिन मुगल व राजोपुत सेनाएं आगे नहीं बढ़ रही थी।उनमें इतना भी भय हो गया था कि वे छवनी छोड़कर बाहर भी न निकल सकते थे।स्वयं औरँगेजेब लिखता है कि सेना में जाटो का इतना भी व्याप्त हो गया था कि वे कुछ क्षण भी याराम नहिज फरमा सकते थे।
यह क्षेत्र जाटो का प्रमुख गढ़ था यहाँ के अन्य जातियों के सरदार भी जाटो का ही साथ दे रहे थे।वहां की जनता पूर्ण रुव से जाटो के साथ थी। जिस कारण रसद पहुंचाने में दिक्कतें आ रही थी।

उसके बाद बाहर कामां परगने में सिनसिनी की सहायता के लिए हिन्दू पंचायत हुई उसकी खबर बिशन सिंह के सेनापति हरिसिंह खनग्रोत को मिल गयी उसने वहां उसने व बेदारबख्त ने रात को धावा बोल दिया व बहुत से वीर क्रान्तिकारियो को काट दिया। उसने वहां अस पास के गांवों पर अधिकार ही न किया बल्कि बरबाद भी कर डीएम यहां तक कि उसने स्वजातीय राजपूत नागरिकों को भी नहीं बख्शा।

आस पास के जो कुछ अन्य जाट व राजपुत सरदार जोरावर सिंह के साथ थे उन्हें एक एक करके शक्ति से दबा दिया व एक राजपूत प्रताप सिंह नरुका जो जाटो के साथ था उसे लालच देकर अपनी और मिला लिया गया।

प्रथम युद्ध
11 महीने तक मुगल सेना सिनसिनी से 10 मिल दूर बैठी रही एक इच भी आगे नहीं बढ़ी। गढ़ी के अंदर हालात खराब होते जा रहे थे।

अंत मे हालात देखकर मुगलो ने हिन्दू दुर्ग सिनसिनी पर आक्रमण कर दिया। वीर जोरावर सिंह अपनी तलवार के साथ गढ़ी की सुरक्षा के लिए ततपर हो गया।
इस प्रथम आक्रमण में बिशन युद्ध हुआ मुगल सैनिकों के छके छुड़ा दिए गए। रात को मुगलों ने गढ़ी के दरवाजे को बारूद की सुरंग से उड़ाने का फैसला किया तो यहबख़बर जोरावर सिंह जी तक पहुंच गई। उन्होजे गढ़ी का पिछला दरवाजा बड़े बड़े मजबूत पत्थरो से ढक दिया जिस कारण धमाका करने पर गढ़ी में नुकसान कम हुआ गढ़ी की छत उड़ गई व उसकी धमक उल्टी पडने से मुगल सेना के अनेक तोपची व राजपूत सेनापति व कई योग्य सैनिक झुलस कर मारे गए व घायल भी हो गए।
मुगल सेना में हलचल मच गई जिस कारण उसे पीछे हटना पड़ा।

द्वितीय युद्ध
उसके बाद जनवरी 1690 में औरँगेजेब के पोते व गद्दार बिशनसिंह की सेना ने गढ़ी पर आक्रमण किया। उन्होंने एक महीने में गुप्त रूप से जाट दुर्ग के चारों ओर बारूदी सुरंग बिछा दी। जिसके कारण एक जोरदार धमाका हुआ। दुर्ग के रखा बारूद भी आग पकड़ गया बहुत से वीर क्रांतिकारी शहीद हो गए।
लेकिन बचे खुचे सैनिको के साथ जोरवर सिंह ने दुष्टों से लोहा लिया व 200 मुगल सैनिको और 700 बिशनसिंह के सैनिको को काट दिया।

लेकिन विशाल सेना व मजबूत हथियारों के आगे वीरों में अंतिम सांस तक यह लड़ाई लड़ी। सब सैनिक शहीद हो गए वीर जोरावर सिंह , उनकी पत्नी व बच्चो को बंदी बना लिया गया।

बलिदान
उन्हे मथुरा छावनी में रखा गया उसके बाद दक्षिण में औरँगेजेब के सामने पेश किया गया।

औरँगेजेब ने उन्हें झुकने व इस्लाम स्वीकार के लिए कहा लेकिन धर्मवीर जोरावर सिंह ने झुकने से इनकार कर दिया।
औरँगेजेब ने उनकी पत्नी व बच्चो को उनके सामने ही काट दिया पर वीर अपने धर्म पर अडिग रहा। उसके बाद औरँगेजेब ने गुस्से में भरकर उसके शरीर को अंगहीन करके जंगली कुत्तो के आगे फेंक दिया। कुत्ते उनके शरीर को नोचते रहे।जोरावर सिंह दरडी सहते रहे। लेकिन औरँगेजेब उनकी आंखों में चमक को देखकर जल जा रहा था।सिनसिनी दुर्ग पर इस अधिकार पर अपने पोते बेदारबख्त को शाबाशी दी व इस तरह जश्न मनाया जैसे उसने दूसरी  काबुल फतेह की हो।

इस तरह एक धर्म यौद्धा ने अपने परिवार,अपने राज को इसलिए कुर्बान कर दिया कि हिंदुत्व जिंदा रहे।