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Saturday, 14 December 2019

जीवन परिचय- हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल जी का जीवन परिचय
Biography of maharaja surajmal
महाराजा सूरजमल

नाम:- महाराजा सूरजमल सिंह
बचपन का नाम:- सुजान सिंह
जन्म:- 13 फरवरी 1707
मृत्यु:- 25 दिसम्बर 1763

पुरा नाम:- श्री महाराज विराजमान बृजेन्द्र महाराज सूजान सिंह जी बहादुर
अन्य नाम:- भूपाल पालक भूमिपति बदनेश नँद सुजान, सिंह सूरज कुमार, सिंह सूरज सुजान, रविमल्ल आदि

पिताश्री का नाम:- राजा बदन सिंह
पितामह का नाम:- श्री भाव सिंह सिनसिनिवार(सिनसिनी के राव चूड़ामन जी के भ्राता)
माता का नाम:- रानी देवकी जी
नानाश्री का नाम:-कॉमर के चौधरी अखेराम सिंह
प्रमुख शिक्षक- आचार्य सोमनाथ जी

कद- 7 फुट 2 इंच
वजन- लगभग 150 किलोग्राम
शरीर की बनावट- सुडौल, मजबूत, गठीली,शाही तेवर वाली मोटी आंखे, चौड़ा ललाट, लम्बी रौबदार मूंछे,लंबे तगड़े और वजनदार आवाज दबंग छवि,सुंदर नैन नक्श।

राज्य:- जटवाड़ा
राजधानी:- भरतपुर(लोहागढ़), डीग(सर्दी के मौसम में)
ध्वज- महल पर पीताम्बर ध्वज, किले पर भगवा कपिध्वज, युद्ध में भगवा और केसरिया ध्वज।
कुलदेवता- श्रीकृष्ण भगवान
कुलदेवी- राज राजेश्वरी कैला देवी
वंश प्रवर्तक- शूरसेन(सिनसिना) बाबा

पत्नी:- महारानी किशोरी बाई,महारानी खेतकौर, महारानी गंगिया, रानी हंसिया, रानी गौरी, रानी कल्याणी आदि
पुत्र:- जवाहर सिंह, रत्नसिंह, नाहर सिंह, रणजीत सिंह, नवल सिंह
भ्राता- महाराजा सूरजमल जी के 25 अन्य भ्राता थे जिनमें से वैर राजा प्रताप सिंह उनके सहोदर(अर्थात रानी देवकी से ही) भ्राता थे।

उपाधि:- कुंवर ब्रजराज बृजेन्द्र बहादुर भूमिपति भूपाल
युवराज:-1748
शासनकाल:-1755-1763
शासन अवधि:- 8 वर्ष, वैसे कुंवर पद ग्रहण करते ही उन्होंने राज्य सम्भालना शुरू कर दिया था। 1748 में सूरजमल युवराज बनाये गए तब तो बदन सिंह नाम मात्र के ही राजा थे उन्होंने सब कार्य उन्हें सम्भलवा दिया था क्योंकि उनकी आंखों में समस्या हो गयी थी लेकिन जाटो में पिता के जीवित रहते बेटा चौधर ग्रहण नहीं करता इसलिए मोहर उनके नाम की चलती थी। इसलिए उनके शासन को 1748 से गणना की जाए तो 15 वर्ष होता है।

पूर्वाधिकारी:- राजा बदन सिंह
उत्तराधिकारी:- महाराजा जवाहर सिंह
राजघराना:- जाट राजवंश
वंश:- कृष्ण वंशी शुरसेनिवार/वृष्णि(सिनसिनिवार)

प्रमुख युद्ध=

दस वर्ष की आयु में ही महाराजा सूरजमल जी ने सेना व दरबार के कार्यो में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था।
उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 80 युद्धों में भाग लिया जिनमें वे कभी भी नहीं हारे। इसी कारण उन्हें अजेय महायौद्धा कहा जाता है। उनके कुछ प्रमुख युद्ध इस प्रकार है-

★1726 में उन्होंने सोगर गढ़ी पर अधिकार किया
★1730 में मेण्डु पर अधिकार किया।

★उन्होंने 1731 में छोटी सी उम्र में #मेवात_पर_अधिकार कर  लिया था।

★टप्पा डाहरा युद्ध में मिर्जा दावर जंग ने उनकी तलवार के आगे आत्म समर्पण कर दिया था।
★उनकी तलवार ने खोहरी में भी दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर ली थी
*1738 में मथुरा आगरा के फरह, ओल अछनेरा व कुछ अन्य क्षेत्रों को आजाद करवाया।

★फरीदाबाद में #मूर्तिजा_खां_को_हराया।

★1739 में नादिरशाह के विरुद्ध दिल्ली की सहायता की और नागरिकों को शरण देकर उनकी सुरक्षा भी की।

★1740,41,44 में गंगवाना युद्ध में, जोधपुर व कोटा के विरुद्ध आदि कई बार जयपुर राज्य की मदद की।

★1745 में अली मुहम्मद रुहेले को हराया।
★1745/46 में उन्होने दिल्ली नवाब के सेनानायक अफगानी नवाब #असद_खां_को_धूल_चटाई थी।#असद_खां युद्ध में #मारा गया था।

★1748 में उन्होंने #जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह के पक्ष में लड़ाई लड़ी और उनकी विरोधी #7_सेनाओं_को_एक_साथ बुरी तरह से #हरा_दिया था व ईश्वरी सिंह राजपूत को जयपुर का ताज दिलाया था।

★1749 में #दिल्ली_के_वजीर_सफदरजंग को हराया। वजीर उनके #खौफ से लड़ने ही न पहुंचा था।

★1750 में मीर बक्शी #सलावत_खां_को_हराया और दुष्ट #हाकिम_खा_मार_डाला।

★1750 में वजीर #सफदरजंग को #फिर से मैदान में #हराया।

★1750 में #रुस्तम_खां_मार_गिराया और #अहमद_खां_बंगश को धूल चटाई।

★1751 में #बहादुर_खां_मार_गिराया।

★1752 में नवाब #जावेद_खां_को_धूल_चटाई

★1752 में #फकीर_अली व #मुगलो_खदेड़कर सिकंदराबाद व दनकौर पर शाही अधिकार खत्म कर दिया।

★1753 में ही पलवल में #इमाद_को_हराकर वहां काजी को भी पकड़ लिया था।

★1753 में घासेड़ा के बहादुर सिंह पर विजय- बहादुर सिंह घासेड़ा का जागीरदार था जो बार बार महाराजा सूरजमल के विरुद्ध अभियानों में हिस्सा लेता था। महाराज के बार बार समझाने पर भी नहीं मानने पर व सीमा में घुसपैठ करने पर महाराज ने उस पर आक्रमण की ठानी। इसी बीच जब वे दिल्ली पर आक्रमण करने जा रहे थे उसी समय बहादुर सिंह के कुछ लोगो ने महाराजा सूरजमल जी के राज्य में लूटपाट की व ऊंट चुरा लिए। महाराज ने बहादुर सिंह को कार्यवाही करने व ऊंट लौटाने को कहा। न मानने पर उन्होंने आक्रमण कर दिया। बहादुर सिंह हार की कगार पर था। युद्ध के बीच में भी सन्धि की कोशिश महाराज द्वारा की गई सन्धि हुई लेकिन कुछ ही देर में बहादुर सिंह का मन पलट गया और उसने अपनी दोनो पत्नियों को जौहर करवा दिया व बाहर निकलकर महाराजा सूरजमल की सेना पर टूट पड़ा। जिसमें उसकी हार हुई व वह युद्ध में मारा गया। इस तरह घासेड़ा पर उन्होंने विजय प्राप्त की।

★1753 में उन्होंने दिल्ली के वजीर सफदरजंग को उकसाकर उसके साथ मिलकर #दिल्ली_पर_आक्रमण कर लिया था व दिल्ली का एक बड़ा क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिया था। और मुगल बादशाह बार पत्र लिखकर गिड़गिड़ा रहा था रहम की भीख मांग रहा था। अंत में सफदरजंग की निष्क्रियता व जयपुर के राजा के बीच में आने के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी।सन्धि उन्ही की शर्तों पर हुई।

★1754 में कुम्हेर में मराठा एवं मुगल सेना ने कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध में खांडेराव होलकर मारा गया। बाद में सन्धि हो गयी थी।महाराज ने खांडेराव की छतरी बनवाई भले ही वे उनके साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए हो।

★1757 में उन्होंने मथुरा वृन्दावन व भरतपुर में से #अब्दाली को अकेले ही निकाल फेंका था।अबदाली से बल्लभगढ़, भरतपुर,कुम्हेर, चौमुंहा, गौकुल में एक साथ युद्ध लड़ा धर्मनगरी की अकेले ही रक्षा की। अबदाली ने बहुत नरसंहार किया और उन्होंने उसका निडर होकर सामना किया।हजारों जाटो ने धर्मनगरी की रक्षा हेतु बलिदान दिया। अंत में अब्दाली कुम्हेर के किले पर घेरा डालकर बहुत दिन बैठा रहा और लोहागढ़ की तरफ बढ़ने की उसकी हिम्मत न हुई। अंत में सूरजमल का रणनीतिक व धमकी भरा पत्र पढ़कर वह समझ गया कि ये शासक उससे रत्ती भर भी न डरने वाला और जाटो की तलवारों की नोको से डरकर वह वापिस लौट गया था।

★ 1757 में फरुखनगर के नवाब अफगानी #मूसा_खान को हराया।

★ उन्होंने मुगलो व अफगानों बलूचों से रोहतक झज्जर गुड़गांव पलबल फरीदाबाद रेवाड़ी आदि हरियाणा के बहुत से क्षेत्र जीत लिए थे, उत्तर प्रदेश में पूरा ब्रिज क्षेत्र और वेस्ट यूपी, राजस्थान में भरतपुर धोलपुर अलवर आदि,अलीगढ़,एटा, मेनपुरी,आगरा, मेरठ,मुजफरनगर,मथुरा आदि। दिल्ली में पालम व गाजियाबाद तक उनका राज हो गया था। मुगल कुछ ही हिस्से में सिमट गई थे जिसके कारण मुगलो की लोग खिल्ली उड़ाने लग गए थे। मुगलो को कमजोर करने व उनका शासन अंत करके भारत को आजाद करवाने में उनका मुख्य योगदान रहा है। अगर ये कहें कि मुगलो का खौफ भारत से मिटाने वाले महाराजा सूरजमल जी थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

★1761 में जब अब्दाली को मराठो से लड़ने के लिए बुलाया गया तब मराठो का किसी भी हिन्दू राजा ने साथ न दिया केवल महाराजा सूरजमल ने साथ दिया जिस कारण पेशवा ने उन्हें हिंदुस्तान का एकमात्र मर्द मानस कहा था।जबकि 1757 में यही अबदाली जब मथुरा वृन्दावन लूट रहा था तो महाराजा सूरजमल इससे अकेले लड़े थे मराठे भी उनका साथ देने नही आए थे। फिर भी वे सब भूलकर उनके साथ आये। उन्होंने मराठो का दिल्ली विजय तक साथ दिया और 1 महीने तक का पूरा खर्च अपने खजाने से दिया। दिल्ली विजय तक उन्होंने मराठो का तन मन धन से हर युद्ध में साथ दिया।
बाद में भाउ से उनके रणनीतिक मतभेद हो गए।
★उन्होंने कहा कि
ठंड में आप लड़ न पाओगे और अब्दाली ठंड में लड़ने का आदि है इसलिएहम गुरिल्ला युद्ध करे और उसे पंजाब के दूसरी तरफ ही उलझाकर रखें थोड़े दिन में मौसम बदल जायेगा अब्दाली से गर्मी सहन न होगी मौसम हमारे पक्ष में होगा।
औरतों व भारी सामान को साथ न रखें वरना आधी फौज उनकी सुरक्षा में लगेगी और लड़ने वाले निश्चिंत होकर न लड़ पाएंगे। इसलिये उन्हें ग्वालियर भेज दें या मेरे किसी किले में रखे उनकी सुरक्षा व उनका खर्च मैं वहन करूँगा।
दिल्ली मुझे दें व गाजीउद्दीन को वजीर बनाएं जिससे मुस्लिमो का भावनात्मक साथ मिल सके व अबदाली कमजोर हो।और रसद न रुके।
मुगल दरबार की छत को लालच में मत तोड़ें इससे लोगो की भावनाएं जुड़ी है अब्दाली इसे इस्लाम से जोड़कर यहां के मुस्लिमो को साथ ले जाएगा।जब न माना गया तो यह तक कहा कि इसे न तोड़ने के बदले मेरे खजाने से 5 लाख रुपये मैं दे दूंगा।
जब जब उन्होंने ये सब सुझाव दिए तो उनके इनमें से किसी भी सुझाव को न माना गया और भाउ से उनके आपसी मतभेद हुए। आपस में हर बार गरमा गर्मी वाली बहस हो गयी। भाउ ने उनका शाब्दिक रूप से अपमान भी किया व कहा कि तुम्हारे सहारे उत्तर में न आया मेरी मर्जी होगी वह करूँगा।
इस तरह की बार बार बहस होने से भाउ चिढ़ गए जबकि के सब सुझाव मराठो के हित में ही थे और उन्होंने उन्हें #बन्दी_बनाने_की_गुप्त_योजना बना ली। होलकर व सिंधिया ने यह बन्दी बनाने बात महाराज को बता दी व उन्हें आगामी झगड़ा न हो इसलिए वापिस लौटने का आग्रह किया। तब महाराजा सूरजमल जी को मजबूरन वापिस लौटना पड़ा।बता दे कि उन्होंने साथ छोड़ा नहीं था बल्कि उन्हें मजबूरन जाना पड़ा था।

★मराठो को #शरण व उनकी सहायता- युद्ध के पश्चात उन्होने भाउ की पत्नी पार्वतीबाई और व उनके परिवार और हजारों मराठा सैनिकों को घायल व भूख की अवस्था में शरण दी और उनकी सेवा की, उनका इलाज करवाया, खाना, रहना और कपड़े सबका प्रबंध किया। उस समय लगभग 10 लाख रुपये खर्च किये। और मराठो को सुरक्षित महाराष्ट्र तक पहुंचाया। मराठो को छोड़ने गए कुछ जाट सैनिक वहीं रह गए थे उनके वंशजो के आज भी महाराष्ट्र के नासिक में उन जाट सैनिकों 22 गांव मौजूद हैं। मराठो ने इस अहसान के कारण जाटो को सच्चा यार कहा था व महारानी किशोरी देवी को अपनी बहन माना था। क्योंकि इतने मतभेद के बाद व भाउ के द्वारा #बन्दी बनाने के षड्यंत्र के बाद भी उन्होंने मन में मैल न रखा और उनकी मदद की।

★1761 में आगरा में मुगल सेनापति काजील खां को हराकर वहां के लाल किले पर कब्जा जमाया। मुगल फौजदार उनके आक्रमण से पहले ही उनसे डरकर भाग गया था और ताजमहल की कब्रो पर घोड़े बांध दिए थे।
★ फरुखनगर के मसावी खां बलूच को हराया और उसे कैद करके जेल में डाल दिया।
★1763 में एक बार फिर उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया था व एक ब्राह्मण कन्या की रक्षा की थी।24 दिसम्बर तक उन्होने दिल्ली जीत ली थी। ज्यादातर हिस्सो पर उनका कब्जा था बस कुछ युद्ध ही शेष था।

★25 दिसम्बर 1763 के युद्ध के दौरान वे अपने पुत्र नाहर सिंह को कमान देकर अकेले ही हिंडौन नदी पर घूमने निकल गए थे तो पीछे से कुछ मुगल सैनिकों ने झाड़ियों से उन पर गोलियों की बौछार कर दी थी। फिर भी वे घायल अवस्था में अकेले ही उनसे वीरता से लड़े और एक लंबे संघर्ष के पश्चात वीरगति की प्राप्त हुए थे।

●निर्माण कला:- महाराजा सूरजमल भवज निर्माण कला के बहुत बड़े ज्ञाता एवं जानकार थे। उन्होंने डीग, भरतपुर, कुम्हेर आदि समेत ब्रिज में कई भव्य किलों का निर्माण किया। भरतपुर के लोहागढ़ किला तो ऐसी सामरिक बनावट में बना के उसे कभी कोई नहीं जीत सका। उन्होंने अनेकों महल बनवाएं जिनमें डीग के जलमहल, भरतपुर के महल प्रसिद्ध है।
उन्होंने गोवर्धन में भव्य सरोवर व मन्दिर बनवाये, मथुरा वृन्दावन,नन्दगाँव आदि में उन्होंने अनेको मन्दिर बनवाएं व अनेको मन्दिरो का जीर्णोद्धार किया। अब्दाली व मिगलो द्वारा तोड़े गए सभी मन्दिर व घाट फिर से बनवाएं। मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर भी आधी मस्जिद तोड़कर उन्होंने बनवाया था।
बयाना की उषा मस्जिद हटाकर फिर से उसे उषा मन्दिर बनाया था। गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर भी उन्होंने बनवाया था।दिल्ली में पहाड़ी धीरज पर शिव मंदिर बनवाया था।मथुरा के ज्यादातर घाटों की सुंदरता उनके कारण ही है।भरतपुर में बांके बिहारी मंदिर, कैला देवी मंदिर, लक्ष्मण मन्दिर आदि भव्य निर्माण कला के नमूने हैं।

★राज्य विस्तार:- भरतपुर धौलपुर समेत राजस्थान के कुछ हिस्से, आधा हरियाणा, वेस्ट यूपी, ब्रिज प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्से उनके राज्य का हिस्सा था।

★कुछ महत्वपूर्ण बातें-

महाराजा सूरजमल जी को उनके धर्म हेतु किये गए कार्यों के लिए हिंदुआ सूरज व हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम से जाना जाता है।

एक तत्कालीन मुस्लिम यात्री ने उन्हें भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट लिखा है।

उनके राज्य में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध था बताते हैं कि उनके खौफ से अवध के नवाब ने भी गौहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उनके राज्य में ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध था। उन्होने बहुत से धर्मपरिवर्तित हिन्दुओ को वापिस हिन्दू बनाया था। दलितों को भी पूरा सम्मान दिया था उनका खजांची दलित चर्मकार जाति से था।

जब भी देश के किसी भी हिस्से पर किसी विदेशी आक्रांता ने आक्रमण किया तो उन्होंने दिल खोलकर उससे पीड़ितों को शरण दी व उन्हें सुरक्षा दी।

उन्होने हमेशा गौ, ब्राह्मण, अबला, मन्दिर और साधु संतों की रक्षा की। दूर दूर से बहुत से साधु व विद्वान और कलाप्रेमी उनके राज्य में आते थे और फलते फूलते थे।

वे दोनों हाथों से तलवार चलाने में माहिर थे, उन्हें धनुष बाण भाला बन्दूक तोप आदि सब अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान था।

उनकी एक लाखा तोप तो इतनी शक्तिशाली थी कि वह भरतपुर से ही आगरा के लाल किले पर निशाना साधने में सक्षम थी।

महाराज सूरजमल जी श्रीकृष्ण भगवान, लक्ष्मण और हनुमान जी बहुत बड़े भक्त थे। उनके किले पर भगवा कपिध्वज लहराता था।
उन्होंने दिल्ली को आजाद करवाने के लिए  दो बार आक्रमण किये व दिल्ली को जीत लिया। ज्यादातर हिस्सो पर कब्जा कर लिया था परंतु अंत में कुछ गद्दारो के कारण उन्हें सन्धि करनी पड़ी,हालांकि सन्धि उनकी शर्तो पर ही हुई। दूसरी बार उन्हें धोखे से पीछे से गोली चलाकर मार दिया था।

उनकी मृत्यु के बाद भी कई दिनों तक मुगलो को विसवास न हुआ यह सबूत मिलने पर भी खौफ से उन्होंने कई दिनों तक इस बात को छुपाए रखा था।

उनका लोहागढ़ किला देश का एकमात्र अजेय किला है जिसे अफगान मुगल रुहेले कोई नहीं जीत पाया। उनके बेटे रणजीत सिंह के कार्यकाल में आंग्रेजो ने 13 बार इस किले पर आक्रमण किया परन्तु अंग्रेजो को हर बार मुंह की खानी पड़ी।

वे जब भी कोई मुगल अफगान रुहेला आदि कोई युद्ध में उनके आगे #नतमस्तक होता था तो वे उसके आगे ये #शर्ते अवश्य रखते थे कि- =वह किसी भी हिन्दू मन्दिर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, =#गौहत्या न करेगा न होने देगा, =न ही किसी का #धर्मपरिवर्तन करवाएगा, =किसी भी साधु संत अबला व गरीब को तंग नहीं करेगा, =#पीपल के पेड़ को कभी नहीं काटेगा।

★महाराजा सूरजमल देश के ऐसे एकमात्र राजा थे जिन्होंने मुगलो से दिल्ली को आजाद करवाने के लिए दो बार आक्रमण किये और मुगलो के बुरी तरह से  छक्के छुड़ाए।

★ अब्दाली जब 1757 में मथुरा वृन्दावन लुटने आया और यमुना का पानी लोगो के खून से लाल कर दिया था तो उससे लोहा लेने वाले वे एकमात्र राजा थे और उसे धर्मनगरी से निकालकर ही दम लिया था।

इसके अलावा भी महाराजा सूरजमल जी की अनेको विरताएँ हैं जिन्हें किसी एक किताब या एक पोस्ट में समेटे जाना असम्भव है।

तभी तो कहा जाता है कि
नहीं सही जाटनी ने व्यर्थ प्रसव की पीर
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर

जिसने बार बार दिल्ली में घुसकर मुगलों को फोड़ा था,
जिसके खौफ से अब्दाली ने मथुरा वृन्दावन छोड़ा था,

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था,
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था,

जिसके भालों की नौकों से सलावत खां घबराया था
होकर पराजित दुष्ट ने हिन्दुओ के आगे शीश नवाया था

आगरा के लाल किले पर जिसने भगवा फहराया था
ताजमहल की कब्रो पर जिसने घोड़ा बन्धवाया था

पठान रुहेला अफगान जिसके नाम से ही घबराता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

उषा मस्जिद को जिसने फिर से मन्दिर बनवाया था
मथुरा वृन्दावन के घाटों को फिर से जिसने सजवाया था

बगरू के महलों में जिसकी धाक गूंजती थी
विजयश्री जिसके रण में सदा चरण चूमती थी

दिल्ली का वजीर भी जिसके आगे नतमस्तक रहता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

आतंक भरे मेवात ने पहली बार सांस चैन की ली थी
भारतभूमि ने अब बहुत ज्यादती सहन कर ली थी

जिसके भालों के वार से असद खां दर्द से कहराता था
जिसके शासन में अलीगढ़ शहर रामगढ़ कहलाता था।

क्षत्रेपन की शान था वो,रण केसरिया हो जाता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था

जिसका लोहागढ़ सदा अजेय रहा शान से इतराने को
कितने ही किले महल बने है ऐश्वर्य उनका बतलाने को

न जाने उसने रणभूमि में कितनो को धूल चटाई थी
उत्तर भारत में फिर से सनातन की धाक जमाई थी

राम कृष्णवंशी यौद्धा था वो बृजराज कहलाता था
वो बदन सिंह का देवकी नन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।

वह अबला, गौ, ब्राह्मण-संतो का ही तो रक्षक था
उसका भाला धर्मविरोधी दुष्टों का ही तो भक्षक था

मुसीबत में जो फंसा हुआ उसकी छाया में ही तो आता था
उसकी शरण में आया हुआ तो ठूंठ भी हरा हो जाता था

जिसके कारण हिंदुआ ध्वज शान से लहराता था
वो बदन सिंह का देवकीनन्दन महाराजा सूरजमल कहलाता था।
हिंदुआ सूरज sketch
हिंदुआ सूरज महाराजा सूरजमल

महाराजा सूरजमल सिंहासन पर
हिदू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

Brave warrior Jat
अजेय महायौद्धा महाराजा सूरजमल

Descendant of krishana
ब्रजराज महाराजा सूरजमल

उत्तर भारत का भगवान
उत्तर भारत का भगवान महाराजा सूरजमल

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल जी की।

Thursday, 9 August 2018

कहानी मुस्लिम विश्व सुंदरी गन्ना बेगम की जो जान लुटाती थी इस हिन्दू महाराजा पर

गन्ना बेगम की कहानी-हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह पर मरती थी गन्ना बेगम
Ganna Begum
गन्ना-जवाहर का प्रेम

ताजमहल को प्रेम की निशानी कहने वालों ये होता है प्रेम
गन्ना बेगम जो अली बेग कुली खान की बेटी थी।अली बेग ईरान के शाही वंश का था जो यहां अवध के नवाब के दरबार में रहता था।अगरा में गन्ना का परिवार रहता था।

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि गन्ना बेगम उस समय की विश्व सुंदरी थी।जब वह पान खाती थी तो उसके गले में पान की लालिमा साफ दिखाई पड़ती थी।बेगम के जन्म का नाम उसके रूप के अनुसार चांद बेगम था परंतु कोमल व सुंदर शरीर वाली बेगम गन्ने जैसी मीठी थी इसलिए वह गन्ना बेगम के नाम से मशहूर हुई। उस समय गन्ना के हुस्न पर दर्जनों राजा आह भरते थे।और उसे पाने के लिए हजारो प्रयास कर चुके थे।

एक बार गन्ना ने महाराजा जवाहर सिंह को देखा तो वह उनको पहली नजर में ही दिल दे बैठी।महाराज भी उस समय राजकुमारों में श्रेष्ठ थे और उनकी वीरता के किस्से भी गन्ना कई बार सुने थे।महाराज की भी जब नजर पड़ी तो वे भी गन्ना के हुस्न के मुरीद हो गए।

दोनो की नजरें मिली और बात आगे बढ़ती गयी। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा।आखिर जिस गन्ना को लोग देखने से तरसते थे वह महाराज से प्रेम करती थी। तो गन्ना के आशिकों के दिल जलने लगे।

इसी बिच अवध के नवाब सिराउद्दौला ने गन्ना को देखा तो वह भी आशिक बन बैठा और एकतरफा प्रेम करने लगा। उसने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन गन्ना तो पहले ही जवाहर सिंह पर मर मिटी थी।परंतु नवाब व उसके पिता अली बेग खान को यह पसन्द न आया।उसके पिता उसकी शादी मुस्लिम से ही करना चाहते थे।तो धक्के से नवाब के साथ शादी तय कर दी गयी।

गन्ना ने जवाहर सिंह से मुलाकात की व सारी बात बताई।राजकुमार जवाहर सिंह अपने पिता महाराजा सूरजमल से इस मुद्दे पर बहुत खौफ खाते थे।मगर फिर भी जवाहर ने योजना बनाई के वो रास्ते मे गन्ना का अपहरण कर लेगा। जब गन्ना को अवध भेजा जा रहा था तो फरुखाबाद आगरा के बीच रास्ते मे ही जवाहर ने वहां हमला कर दिया। सब कुछ सही चल रहा था लेकिन ऐन मौके पर महाराजा सूरजमल पहुंच गए। उन्हें किसी ने खबर दी थी के युवक जवाहर सिंह किसी काफिले को लूटने के लिए निकला है। महाराज बड़ी तेजी से 2,000 की सेना लेकर आ धमके और जवाहर सिंह को खूब धमकाया कि राहगीरों को ऐसे लूटने वाले घटिया काम हमारे क्षत्रिय जाट कुल को शोभा नहीं देते। मगर बेचारे जवाहर सिंह कैसे कहें कि वे दौलत नहीं इश्क लूटने आये थे।वे चुप चाप निराशा में डूबे हुए घोड़े पर चढ़कर वापिस भरतपुर की ओर चल पड़े। गन्ना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

महाराज ने राहगीरों को सुरक्षा का इंतजाम किया और सकुशल अपने गंतव्य की ओर जाने का आदेश दिया।
गन्ना वहां पहुंची मगर उससे पहले ही नवाब का निकाह उम्दा बेगम से धक्के शाही से कर दिया जिसे अब्दाली अपनी बहन मानता था उसने नवाब को यह शर्त भी कही के वो दूसरा निकाह नहीं करेगा।इस तरह गन्ना यहां बच गयी।लेकिन नवाब ने उसे दासी बनाने की कोशिश की जो गन्ना ने स्वीकार नहीं की।

जब अब्दाली ने दिल्ली में लूट मचाई तब दिल्ली के नागरिकों को भरतपुर ने शरण दी थी।उन शरणार्थियों में ही उम्दा बेगम व गन्ना बेगम भी थी।यहां उनकी आपस में फिर मुलाकात हुई।गन्ना जवाहर सिंह को देखकर खिल उठी उसकी आँखों मे अश्रुधारा बह रही थी। दोनों ने फिर वही अपहरण की योजना बनाई पर इस बार भी पिता के सम्मान व लोकलाज के कारण जवाहर सिंह कामयाब न हो सके।और उन्होंने गन्ना को पाने का ख्वाब छिड़ दिया।

उसके बाद गन्ना एक दिन मौका अवध से भाग गई।महाराज जवाहर सिंह से फिर मिली परन्तु उस समय महाराज अपने पिता की मृत्यु के शोक में डूबे थे और दिल्ली से प्रतिशोध के लिए आक्रमण कर दिया था।तब महाराज ने गन्ना से असमर्थता जताई।गन्ना रूष्ट हो गयी और जवाहर सिंह से नाराज होकर ग्वालियर चली गयी।

वहां गन्ना सिख का भेष बनाकर रहने लगी।और गुनी सिंह नाम रख लिया।उसने महादजी सिंधिया के जासूस के रूप में काम किया। वह एक अच्छी यौद्धा भी थी उसने महादजी की एक दो युद्धों में महत्वपूर्ण सहायता भी की थी।वह एक अच्छी शायर भी थी।
एक दिन उसकी पोल खुल गयी।महादजी भी उनके हुस्न के मुरीद हो गए।परन्तु गन्ना सिर्फ जवाहर सिंह से प्रेम करती थी।इसलिए यहां भी बात न बन पाई। महादजी ने गन्ना की असली पहचान दुनिया के सामने नहीं खोली। और वह गुनी सिंह के रूप में ही काम करती रही।

एक दिन शिजाउदौला किसी मस्जिद में मीटिंग कर रहा था। तो जासूसी के लिए गन्ना वहां पहुंची परन्तु उसने उसे पहचान लिया और सैनिको को पकड़ने का आदेश दिया। गन्ना को पता था कि अब वह उसे पकड़ लेगा व अनेकों यातनाएं देगा। सलिये गन्ना ने अंगूठी में लगा हीरा चाट लिया और जवाहर सिंह के प्रेम में फनाह हो गयी।यह अंगूठी भी बताते हैं जवाहर सिंह की ही निशानी के तौर पर दी गयी थी।

महादजी ने भी अपना प्रेम निभाया और उसकी एक मजार बनवाई जो ग्वालियर से 35 km दूर नुराबाद में है।
उस पर उन्होंने गन्ना की मातृ भाषा फ़ारसी में "आह गम ए गन्ना" लिखवाया।
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराज जवाहर सिंह के प्रेम में गन्ना श्रीकृष्ण की भक्त बन गयी थी क्योंकि कृष्ण भगवान महाराज के पूर्वज थे। वह हिन्दू बनने को भी तैयार थी।

 परंतु जवाहर सिंह ने एक बेटे का फर्ज निभाया।जिस दौर में बेटा बाप को राज के लिए मार देता था उस दौर में उन्होंने पितृभक्ति दिखलाई।और वे अपने पिता की इतनी इज्जत करते थे कि उन्होंने कभी उनके सामने ये बात अपनी जुबान पर लाकर नहीं दिखलाई।महादजी ने भी अपने प्रेम का सम्मान किया व अपने राज्य में होते हुए भी गन्ना के साथ कोई धक्काशाही नहीं की। जबकि अवध के मुस्लिम नवाब ने उसे दासी की तरह रखने की कोशिश की।उसको यातनाएं भी दी। और उसके भय में उसे आत्म हत्या करनी पड़ी।उसके माता पिता ने भी उसे धक्के से दुराचारी लालची नवाब को एक तरिके से बेच दिया था।

यही फर्क हैं हमारी सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति और अरबी लुटेरों के संस्कारों में।
Jat king- Muslim Begum
हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह


और आज जो बॉलीवुड के भांड लोग जोधा अकबर से फर्जी सीरियल बना रहे हैं वे इस हकीकत व इतने रॉयल राजाओ की और एक विश्व सुंदरी प्रेमकहानी पर क्यों चुप है जिसके पूरे तथ्य प्रमाण भी हैं।जिसमें रोचकता रॉयलिटी संस्कार हीरो विलेन सब हैं।
जय हिन्दू वीर शिरोमणि महाराजा जवाहर सिंह।
        जय सूरजमल।जय भवानी।

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक- महाराजा जवाहर सिंह

देश का सबसे कट्टर हिन्दू शासक-महाराजा जवाहर सिंह
Jat Jawahar Singh -Hindu Veer Shiromani Warrior
महाराजा जवाहर सिंह

महाराजा जवाहर सिंह महाराजा सूरजमल के बेटे थे।भगवान लक्ष्मण उनके कुलदेव हैं और भगवान श्री कृष्ण के वे वंशज थे।बजरंग बली के बहुत बड़े भक्त थे।

महाराजा जवाहर सिंह ने आगरा की जामा मस्जिद को खाली करवाकर मंडी खुलवा दी थी व घोड़ो का तबेला बना दिया था।

बचपन में ही जब दिल्ली के वजीर ने उनका हाथ चुमा तो उन्होंने भरे दरबार मे फटकार लगा दी थी के हमारा हाथ छूकर अपवित्र क्यों किया।

उन्होंने अब्दाली से भी टक्कर ली थी व अपने पिता के साथ लगभग युद्धों में वीरता दिखलाते थे।

उन्होंने ऊंची आवाज में अजान देने पर एक मौलवी की जीभ कटवा दी थी।और ऊंची आवाज में अजान देने पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

उन्होंने दिल्ली को मुगलो से आजाद कराने के लिए भी पूरी कोशिश की थी पर कुछ गद्दारो के कारण जीत के बावजूद सन्धि करनी पड़ी थी।

इस दौरान वे दिल्ली से चितौड़ के अष्टधातु किवाड़ वापिस भरतपुर जीत लाये थे जो खिलजी उनसे 462 साल पहले चितौड़ से जीतकर ले गया था।

ईरानी मूल की एक गन्ना बेगम उन पर बहुत मरती थी।
लेकिन गन्ना का प्रेम सिरे न चढ़ सका और गन्ना ने सारी उम्र जवाहर के प्रेम में फ़नाह कर दी थी।

उन्होंने पुष्कर के धार्मिक स्नान को हर हिन्दू के लिए खुलवा दिया था व वहां लगी शाही पाबंदी हटवा दी थी।

उन्होंने मेवात क्षेत्र में धर्म वापसी करवाकर धर्म बढ़ाने के लिए भी बहुत कार्य किया था।

आगरा में अपने किले में एक उत्सव के दौरान वे सीढ़ियों से निहत्थे उतर रहे थे तो पीछे से किसी सुजात मेव नाम के मुस्लिम ने उन पर जहरीले चाकू से हमला किया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी थी।उस मेव को उसी समय सैनिको ने मार दिया। शायद वह मेवात में मुस्लिमो को हिन्दू बनाये जाने से नाराज था।

 7 अगस्त को हर साल उनकी पुण्यतिथि पर बलिदान दिवस मनाया जाता है।

जबरो जाट जवाहर सिंह
सूरजमल रो जायो हो
लाल किले रो फाटक तोड़यो
लोहागढ़ पहुंचायो हो
मुगल बेगमा रे महला म्ह
गाढो ही फुस भरायो रे बेली,
हर हर बम बम बोलो रे बेली

जय जवाहर जय बजरंगी।
जय सूरजमल जय भवानी।

Wednesday, 20 June 2018

राजा दयाराम सिंह- जिसने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे

भारत माता के स्वाभिमानी लाल हाथरस नरेश राजा दयाराम सिंह ठेनुआ

Jat King
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम सिंह हाथरस(उत्तर प्रदेश) के राजा थे।इनके पूर्वजो ने हिन्दू धर्म रक्षा का अनोखा इत्तिहास रचा था।और इनके वंशज राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने आजाद हिंद फौज व सरकार का निर्माण किया था।

राजा दयाराम सिंह अपने पिता राजा भूरी सिंह की मृत्यु के बाद राजा बने। उन्होंने अपने राज्य को सुदृढ किया व हाथरस किले को मजबूत बनाया। प्रजा में रोजगार के साधन बढाने के लिए बाहर से कारीगर बुलाकर प्रशिक्षित किया व किसानों की भी बहुत सहायता की।
वे भगवान दाऊ जी(बलराम) के भक्त थे उनके दरबार में दाऊ जी की नित्य पूजा होती थी। उनके पिता द्वारा निर्मित किये गये दाऊ जी मन्दिर पर मेला लगता था।

उस समय देश पर अंग्रेजो का राज था अंग्रेज सभी देशी रियासतों को छल व बल से अपने अधीन करना चाहते थे। ऐसे समय में हाथरस व मुरसान रियासत स्वतंत्र थी।

इसलिए कई सालों से वे राजा दयाराम जी पर दबाव बनाए हुए थे कि वे अंग्रेजो की अधीनता स्वीकार करें। लेकिन राजा साहब स्वाभिमानी व देशभक्त थे उन्होंने झुकना स्वीकार न किया जिस कारण अंग्रेजों और राजा साहब में कई बार तनातनी हो चुकी थी।

सामरिक रूप से राजा साहब अंग्रेजो के मुकाबले बहुत कमजोर थे लेकिन फिर भी उनके स्वाभिमानी हौसले ने दम नहीं तोड़ा।

अंत मे एक दिन 4 क्रांतिकारी युवक दयाराम जी की शरण में आ पहुँचे और बोले कि राजा साहब हमें बचाइए अंग्रेज हमें झूठे हत्या के आरोप में फंसा रहे हैं।तब राजा साहब ने उन्हें निश्चिंत रहने को कहा व किले में ही अपने साथ ठहरने का प्रबंध कर दिया।

जब यह बात अंग्रेजो को पता चली तो उन्होंने राजा साहब को चारों तथाकथित आरोपियों को अंग्रेजो के हवाले करने के लिए कहा। राजा साहब ने साफ कहा कि वे निर्दोष है और मेरे देश के नागरिकों पर मैं अत्याचार नहीं होने दूँगा।

यह सुनकर अंग्रेज घबरा गए।उन्होंने देख लिया कि हाथरस आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन सकता है।
इसलिए 1817 में अंग्रेजों ने हाथरस व मुरसान पर आक्रमण कर दिया।(मुरसान पर उन्ही के परिवार का राज था।वहां के राजा उनके चचेरे भाई भगवंत सिंह थे) मुरसान को अंग्रेजों ने फतेह कर लिया।(मुरसान व उससे कुछ साल पहले के सासनी युद्ध के बारे में फिर कभी विस्तार से लिखेंगे)

जब अंग्रेज जनरल मार्शल के नेतृत्व में हाथरस की ओर बढ़े तो राजा साहब पूर्णतः तैयार हो गए। अंग्रेजों ने किले के चारों ओर घेरा डाल दिया। हाथरस का किला मजबूत था(जो उनके पूर्वज राजा भोज सिंह ने बनवाया था और बाद में राजा सारदल सिंह, पहुप सिंह और दयाराम ने भी इसे मजबूत किया)

मुरसान पर विजय प्राप्त करते ही अंग्रेजी सेना हाथरस पहुंची। इस बीच में हाथरस वाले संभल चुके थे। वैसे हाथरस का किला मुरसान के किले से अधिक मजबूत था। अलीगढ़ और मथुरा की ओर का हिस्सा तो और भी अधिक मजबूत था। हाथरस में रणचंडी का विकट तांडव हुआ। अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे हो गए।
यह युद्ध संवत 1874 विक्रम तदनुसार 1817 ई. में हुआ था। लड़ाई कई दिन तक होती रही। राजा दयाराम ने अपने वीर सैनिकों के साथ दांत पीस-पीस कर अंग्रेजों पर हमले किए। प्राणों की बाजी लगा दी।
यह देखकर अंग्रेजों ने राजा दयाराम से सन्धि की भी बात चलाई लेकिन राजा दयाराम व उनके पुत्र नेकराम सिंह ने विचार विमर्श करके मना कर दिया।

जब अंग्रेजों ने देखा अब सन्धि नहीं होगी तो पूर्ण बल के साथ हाथरस-दुर्ग के ऊपर हमला किया। जाट भी वन-केसरी की भांति छाती फुलाकर अड़ गये। श्री दयारामसिंहजी बड़ी संलग्नता से दुर्ग की देखभाल में व्यस्त थे। राजा से लेकर सैनिक तक सभी बड़े चाव से युद्ध कर रहे थे। वे आज अपना या शत्रु का फैसला कर लेना चाहते थे। वे थोड़े थे फिर भी बड़े उत्साह से लड़ रहे थे। किले पर से शत्रु के ऊपर वे अग्नि-वर्षा कर रहे थे। उन्हें पूरी आशा थी कि मैदान उनके हाथ रहेगा, किन्तु अचानक ही सब बदल गया। बारूद की मैगजीन में अकस्मात् आग लग गई। बड़े जोर का घमाका हुआ, उनके असंख्य सैनिक भस्म हो गए। अब क्या था, शत्रु को पता लगने की देर थी, और फिर हाथरस स्वयं विजित हो गया।
Hathras
राजा दयाराम सिंह

राजा दयाराम ने अपने सैनिको के परिवार व खुद के परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल दिया व फिर वे वहां से निकल कर इधर उधर दूसरे राज्य में शरण लेने के लिए दौड़े। उनके पीछे अंग्रेज लगे हुए थे और वे अंग्रेजो के आगे आगे थे झुकने को तैयार न थे। वे भरतपुर पहुंचे लेकिन भरतपुर भी उस समय अंग्रेजों से युद्ध लड़कर कमजोर हो चुका था और वहां पर अंग्रेजी एजेंट भी कार्यरत थे। सुरक्षा की दृष्टि को देखते हुये वे जयपुर पहुंचे पर वहां भी अंग्रेजों के डर से उन्हें शरण न मिली कई दिनों तक वे इधर उधर भटकते रहे।
उनके परिवार को भी रोज रोज सताया जा रहा था।
यह देखकर उनके बेटे गोविंदसिंह ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली।
जिसके बाद राजासाहब वापिस हाथरस पहुंचे और उन्होंने अलीगढ़ में अपनी एक अलग छावनी बना ली।जहाँ वे क्रांतिकारी सैनिक तैयार कर रहे थे। वे फिर से मजबूत होकर अंग्रेजो से टक्कर लेने चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों ने उनके राज को कभी नहीं उभरने दिया व राजा दयाराम के नजदीकियों को अंग्रेजों ने तंग करके दूर कर दिया।
आज भी हाथरस के तथा आस-पास के लोग दयाराम का नाम बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ याद करते हैं। वे बड़े उदार और दानी राजा थे। अभी तक उनकी दान की हुई जमीन कितने ही मनुष्य वंश परम्परागत से भोग रहे

इस तरह वे अपने अधूरे सपने के साथ 1841 में स्वर्ग सिधार गये। बाद में उनके इस सपने को उनके प्रपोते राजा महेंद्र सिंह प्रताप ने पूरा किया व जीवनभर अंग्रेजो से लड़कर देश को आजाद करवाया।

वन्दे मातरम।देश पर मर मिटने वाले शहीदों को कोटि कोटि नमन।जय भारत माता।

1857 के सिरमौर दो वीर जाट क्षत्रिय राजा

1857 के हीरो- शहीद राजा नाहर सिंह- शहीद राजा अमानी सिंह-


जाट राजा
1857 की क्रांति

राजा नाहर सिंह- बल्लभगढ(हरियाणा) के राजा।
-ये एकमात्र ऐसे राजा थे जो 1857 कि क्रांति में अपनी रियासत सुरक्षित होते हुए भी अंग्रेजो से लड़े।
इन्होंने दिल्ली को लगभग 132 दिनों तक आजाद रखा,क्रांतिकारियों की मदद की, अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व उन्हें काटा।अंत मे धोखे से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 9 जनवरी 1858 को इन्हें दिल्ली के चांदनी चौक पर फांसी हुई।

राजा अमानी सिंह- इग्लास_अलीगढ़(उत्तर प्रदेश) के राजा।
- ये दोनों हाथों से तलवार चलाना जानते थे।
इन्होंने अंग्रेजो को युद्ध मे हराया व अपनी मातृभूमि की रक्षा की, इनकी घोड़ी भी देशभक्त थी और घोड़ी ने भी अंग्रेजो को टापों से कुचला जिसके कारण  कहावत प्रचलित हुई के अमानी तो अमानी पर घोड़ी ने भी हूँ न मानी।दूसरे युद्ध मे बारिश के कारण बंदूकें काम नहीं कर पाई जिसके कारण सैंकड़ो जाट वीर लड़ते हुए शहीद हुए और धोखे से गिरफ्तार कर लिए गए व इन्हें फांसी दी गयी।

दोनों वीरों को कोटि कोटि नमन।

Thursday, 10 May 2018

महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान2

प्रथम दिल्ली विजय अभियान (महाराजा सूरजमल)भाग-2

प्रथम भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें-महाराजा सूरजमल दिल्ली विजयगाथा भाग-1
अंतिम महान युद्ध
अंतिम हिन्दू सम्राट
हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल

अब तक हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल के अधिकार में दिल्ली के ज्यादातर महत्वपूर्ण हिस्से आ चुके थे।लेकिन मुगल सैनिकों ने रात को धोखे से हमला करके कुछ क्षेत्रों से चौकियां हटवा दी थी।
साथ ही अगले दिन महाराजा सूरजमल को खबर मिली के मुगलो के लिए कुछ अवसरवादी मुस्लिम सरदार पहुंच रहे हैं।
मुगल सेना ने अपनी मोर्चेबन्दी तैयार कर ली व उन्होंने अपनी ज्यादातर सेना इस युद्ध मे एक साथ लगा दी।

महाराजा सूरजमल ने भी रात्रि को ही अपनी सेना व्यवस्थित की। महाराजा जवाहर सिंह भी ससैन्य पहुंचे व जायजा लिया। उन्होंने 29 सितंबर प्रातःकाल मुगल सेना के आक्रमण करने से पहले ही मुगलों पर एक जोरदार आक्रमण कर दिया।एक भीषण लड़ाई छिड़ गई।महाराजा सूरजमल स्वयं इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे।हिन्दू वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने छोटी बड़ी तोप,गजनाल से सुसज्जित होकर पूर्ण वेग से मुगलई सेना पर प्रहार शुरू कर दिए।सामने खड़े मुगल समर्थित मराठा दलों पर भयंकर आक्रमण किया गया। बहुत से मुगल मराठा सैनिक मारे गए।तभी अबू तुराब खां, हमीदुद्दौला, हाफिज खां व जमिलुद्दीन बड़ी तोपें लेकर आये व मुगल सेना में मिल गए।भयंकर तीपो के प्रहार चल रहे थे। बराबर का युद्ध जारी था।सगदरजंग का मीर बक्शी थोड़ा सा घायल हो गया और व भाग खड़ा हुआ।महाराजा सूरजमल ने उसे इस कायरता के लिये बहुत धिक्कारा।फिर उन्होंने वीर जाट यौद्धा पखरमल को रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए भेजा।मुगल सेनापति इमाद के हाथी को एक गोलग लगा व हाथी मर गया। इमाद हाथी से कूदकर सुरक्षा घेरे में भाग गया। शाम तक युद्ध चलता रहा।
फिर सेना छावनी में आ गयी।
अगली सुबह 30 सितंबर को मुगल सेनापति इमाद व नजीब खां ने अचानक मन्जेसर सीही ग्राम पर आक्रमण कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया।
लेकिन कुछ समय बाद ही महान यौद्धा राजा बल्लू सिंह(बल्लभगढ) व जाट यौद्धाओ छत्रसाल,रामबल,जोधसिंह और और पाखरमल ने इमाद का सामना किया और भयंकर संघर्ष के बाद मुगल सैनिक को खदेड़ दिया व वह दिल्ली की ओर भाग निकला।

इसके कुछ समय बाद जयपुर नरेश माधोसिंह कच्छवाहा वहां पहुंच गए।इमाद व मुगल सम्राट ने उनकी आवभगत की और उनसे आग्रह किया कि वे महाराजा सूरजमल को समझाये व सन्धि का रास्ता इख्तियार करें।
फिर राजा माधोसिंह हरसौली गढ़ी पहुंचे और वहां महाराजा सूरजमल के साले कृपाराम व दानिराम जी से मिले और सन्धि का प्रस्ताव दिया। चौधरी दानिराम व कृपाराम ने उनका संदेश महाराजा तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।

इसके बाद महाराजा सूरजमल,उनके मंत्री,सेनापति ने इस पर मन्त्रणा की। सबने विचार किया कि बहुत से मुगल सरदार इस्लाम के नाम पर दिल्ली सेना में आ चुके हैं।दक्षिण से कई मराठा सरदार और पहुंच रहे हैं। अगर हामने आगे युद्ध किया तो हम हो सकता है कि सिंहासन उखाड़ फेंके लेकिन इतना रक्तपात होगा कि कुछ नहीं बचेगा।जनता का बुरा हाल हो जाएगा।
साथ ही महाराजा माधोसिंह की बात न स्वीकारी गयी तो यह उनका अपमान होगा और वे सीधे तौर पर नहीं तो पीछे से मुगल सत्ता का साथ देंगे।

इस तरह हिंदुत्व एकता में कमी रहने के कारण महाराजा सूरजमल ने विचार किया और सन्धि की शर्तें रखी के
1.जितना भी क्षेत्र उनके कब्जे में आ चुका है वह उनके ढ़ूं ही रहेगा।
2.सफदरजंग को अवध व इलाहाबाद का वापिस वजीर नियुक्त किया जाए।(इससे सुरजमल महाराज की पीठ दिल्ली दरबार में बनी रहेगी व वे वहां के निर्णयों को प्रभावित्त कर सकेंगे)

जब तक उनकी ये बाते नहीं मानी जायेगी तब तक जाट अपनी तलवार म्यान में नहीं डालेंगे।भले ही कुछ भी परिणाम हो।
मुगल बादशाह सोच रहा था कि वह सुरजमल को झुकायेगा लेकिन यहां तो सब उल्टा हो गया। उसने लाख कोशिश की के वह इन शर्तों को माने बिना ही युद्ध विराम करवा दे लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

इसके बाद दिल्ली के ज्यादातर जीते हुए क्षेत्रों पर हिन्दू सम्राट का अधिकार हो गया।मुगलों को एक हिन्दू सम्राट के आगे झुकना पड़ा।
और आपसी हिन्दू एकता न होने के कारण दिल्ली के सिंहासन पर भगवा झंडा लहराते लहराते रह गया।महाराजा सूरजमल दिल्ली जीतकर भी दिल्ली के सम्राट न बन पाए। हिन्दुओ इत्तिहास से सबक लो आज भी वही स्तिथि है दिल्ली पर हर बार हिन्दू प्रधानमंत्री ही हइट है लेकिन हमारी एकता में कमी के कारण आज भी मुस्लिम तुष्टिकरण की ही राजनीति चलती है।

 ईतिहासकार वेंदेल के अनुसार 'मुगल अहंकार की इतनी कठोर और इतनी सटीक पराजय इससे पहले कभी नहीं हुई थी'। वस्तुतः मुगल सत्ता का गर्वीला और भयावह दैत्य धराशायी हो चुका था।

इस युद्ध के परिणाम यह रहे कि पूरे भारत व अस यर्स के देशों मे महाराजा सुरजमल की ख्याति फैल गयी।दिल्ली के बहुत से हिस्सो को आजाद करवा लिया गया व मुगल सत्ता के अहंकार व शासन को बहुत अधिक कमजोर कर दिया गया।

आपको बता दें कि इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने एक बार और व उनके बेटे महाराजा जवाहर सिंह ने भी एक बार दिल्ली पर आक्रमण किया व मुगल सत्ता को न के बराबर कर दिया।

यूं ही आजादी नहीं मिली वीरों ने प्राण गवाएं थे।
कभी दुष्टों सिर काटे, कभी अपने शीश कटवाए थे।।

जय हिन्दू ह्र्दय सम्राट महाराजा सूरजमल की

हिन्दू वीर photos
महाराजा सूरजमल
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महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजय गाथा-प्रथम दिल्ली विजय अभियान

प्रथम दिल्ली विजय अभियान(महाराजा सूरजमल)भाग-1
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पृष्ठभूमि
महाराजा सूरजमल photos
हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल

हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल ने तलवार की नोंक पर चलकर बहुत ही समझदारी से 1750 तक एक विशाल साम्राज्य बना लिया था।
उन्होंने आस पास के मेव मुस्लिम, रुहेले अफगान,छोटे मुगल परस्त फौजदार, व धर्महीन राजाओ को धीरे धीरे हटा दिया या उन्हें कमजोर कर दिया था।
अब उन्हें तलाश थी कुछ बड़ा करने की।वे मौके की तलाश में थे व दिल्ली की गतिविधियों पर नजर गड़ाए बैठे थे। उन्होंने दिल्ली दरबार के कई महत्वपूर्ण लोगो को अपनी तरफ कर लिया था।

आखिर 1752 में महाराजा सूरजमल के पास वह मौका आ ही गया जिसका इन्हें इंतजार था।दिल्ली के मुगल सुल्तान अहमद शाह व उसके वजीर सफदरजंग के बीच गृह युद्ध छिड़ गया था।
यह वही सफदरजंग था जो एक बार तो महाराजा सुरजमल को युद्ध के मैदान में बुलाकर उनके डर से खुद नहीं पहुंचा था और एक बार उनसे हार भी चुका था।तब इसने माफी मांग ली थी व वफादारी का वादा किया था।

तब यह ग्रह युद्ध जारी रहा दिल्ली के एक सुन्नी व शिया मुसलमान के बीच तनातनी को सुरजमल ने यूं ही चलने दिया और सही मौके का इंतजार करने लगे।
लोहा गर्म होते ही महाराज सूरजमल ने 30 अप्रैल 1753 को सफदरजंग में पक्ष में दिल्ली में ताल ठोक दी। उन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।
महाराजा सूरजमल सिर्फ 15000 घुड़सवारों व अपनी पैदल सेना लेकर पहुंचे थे जबकि दिल्ली के मुगल बादशाह अहमद शाह के पास 1.5 लाख की फौज थी।
महाराजा सूरजमल की सेना में जाट, नागा साधू, ब्राह्मण, गुर्जर, दलित, राजपूत आदि सब हिन्दू जाती के लोग थे।
अहमद शाह की सेना में मुस्लिम व कुछ धर्म हिन हिन्दू भी शामिल हुए थे।

30 अप्रैल की रात्रि महाराजा सूरजमल ने फरीदाबाद में बिताई व सुबह गुड़गांव में शीतला माता मंदिर में पूजा की।यह भव्य मंदिर मजराजा सुरजमल ने ही बनवाया था।पहले यहां महाभारतकालीन एक छोटा सा चबूतरा था।

लेकिन महाराजा सूरजमल के पहुंचने से पहले ही सफदरजंग को उसकी सेना में से 23000 मुस्लिम सैनिक धोखा दे गए व दिल्ली के सुल्तान की तरफ जा मिले।
लेकिन महाराजा सूरजमल ने इसकी जरा भी चिंता नहीं की।क्योंकि वे दिल्ली अपने दम पर जितने आये थे सफदरजंग का तो सिर्फ नाम ही था।

आपको बता दें कि महाराजा सूरजमल ने मुख्यतया बड़े लेवल पर दो बार दिल्ली पर आक्रमण किया था व उसे जीता था। एक बार 1753 मे जिसकी हम बात कर रहे हैं और एक बार 1763 में। वैसे उन्होंने दिल्ली पर कुछ अन्य आक्रमण भी किये थे जिनका जिक्र फिर कभी किया जाएगा।

 पुरानी दिल्ली पर भगवा राज
अंतिम हिन्दू सम्राट
महाराजा सूरजमल

(महाराजा सूरजमल दिल्ली में और इस्लाम खतरे में)

सुरजमल महाराज ने युद्ध की रणनीति बनानी शुरू कर दी। महाराजा सुरजमल के हौसले को देखकर मुगल बादशाह घबरा गया उसने अपने एक वकील महबूब द्दीन को औरंगाबाद से मलहराव होल्कर को बुला लाने के लिए भेजा। लेकिन पलवल के निकट रास्ते मे ही उसे महाराजा सूरजमल के सैनिको ने पकड़ लिया व बंदी बना लिया।
फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को उकसाया कि 15000 रूहेले अफगानों के साथ आ रहे नजीब को रास्ते मे ही पकड़ ले लेकिन कायर व अय्याश सफदरजंग इसमे कामयाब न हो सका।

फिर महाराजा सूरजमल ने स्वयं ही मोर्चा संभाला और 9 मई को पुरानी दिल्ली की अनाज मंडी पर हमला कर दिया ताकि मुगलो की रसद राशन की लाइन टूट जाये।
उनके सेनापति राजेन्द्र गिरी गोंसाई के साथ नाग साधु व जाट सैनिकों ने प्रातः 10 मई को अनाज मंडी पर कब्जा कर लिया।इसी पहली जीत की खुशी में हर वर्ष दिल्ली विजय दिवस मनाया जाता है।
राजेन्द्र गिरी गोंसाई एक साधु थे उनकी नागा बाबाओं की सेना महाराजा सूरजमल के दल में शामिल हुई थी जिसका नाम महाराजा सूरजमल ने रामदल सेना रखा था।
इसके बाद महाराजा सूरजमल के वीर जटवाड़ा सिपाहियों ने लाल दरवाजे के पास शहर के पूर्वी हिस्से, सैयद्द बाड़ा,पँचकुई,अब्दुल्ला नगर, तारक गंज व बिजल मस्जिद के आस पास के इलाकों,चुनरिया,वकिलपुरा पर कब्जा कर लिया। अब पुरानी दिल्ली का ज्यादातर हिस्सा जाटो के कब्जे में था भगवा हर जगह छा रहा था। महाराजा सूरजमल के वीर सिपाही गिरिराज महाराज का जयकारा लगाते हुए दिल्ली की गलियों में राजा की तरह घूम रहे थे। जहां भी मुगल समर्थित मुस्लिम व्यापारी, सैनिक दिखाई दिया वहीं उसका काम तमाम कर दिया गया।
लोगो का खून चूसकर बनाई गई बड़ी बड़ी हवेलियों को तोड़ दिया गया व उनमें जितना भी माल था वह कब्जे में करके सेना के गरीब सैनिको में बांट दिया गया।

पूरे शहर को आतंकित करके तहलका मचा दिया गया। बहुत से मुगल व्यापारी व कर्मचारी मौका देखकर दिल्ली से भाग रहे थे।उनमे से कईयो को जटवाड़ा सिपाहियों ने कब्जे में ले लिया।
उस समय दिल्ली में सफदरजंग की सेना के शिया मुस्लिमो को छोड़कर ऐसा कोई मुस्लिम नहीं था जिसका कलेजा डर के मारे जोर जोर से न धड़क रहा हो।और यह डर जरूरी है।

पुरानी दिल्ली में महाराजा सूरजमल के इस तांडव को देखकर शहंशाह कांपने लग गया था। उसने तुरंत अपने वजीर की छुट्टी कर दी व इन्तिजाम उद दौला को नया वजीर नियुक्त किया।

अहमद शाह ने नारा दिया कि "सुरजमल दिल्ली में है और इस्लाम खतरे में है"
उसने सभी सुन्नी मुस्लिमो को अपने पक्ष में कर लिया व धर्मगुरुओं को भी यह नारा लगाने को कहा कि इस्लाम खतरे में है इन निर्दयी जाटो को सबक सिखाओ।

इस तरह महाराजा सूरजमल ने पुरानी दिल्ली के बहुत से हिस्सो पर कब्जा कर लिया व इस्लाम उनकव देखकर खतरे में आ गया। इसी खौफ भरे दिन को मुगलों के इत्तिहास में में जाटगर्दी के नाम से जाना जाता है।
और इसी दिन जनता का खून चूसने वाले मुगलो की हवेलियां तोड़ने व उनके ऊपर तांडव करने और उनके धन को छीनकर गरीब सैनिको को बांटने को मुगलों की नाजयज औलाद वामपंथी इत्तिहासकर दिल्ली की लूट कहते हैं।

दिल्ली में अलग अलग जगह युद्ध,वीरों के बलिदान

पुरानी दिल्ली के महत्वपूर्ण हिस्सो पर कब्जा करने के बाद मुगल शहंशाह काफी बौखला गया था उसने इस्लाम खतरे में है क्योंकि सुरजमल दिल्ली में है यह कहकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश की।
साथ ही उसने महाराजा सूरजमल को दूत भेजकर दरबार मे भारी सम्मान जागीरें आदि का वादा करके लोभ में लाने की कोशिश की लेकिन हिन्दुआ सम्राट ने शहंशाह के लिये कहा कि कायरता को लोभ लालच से छुपाना छोड़ दो अहमद शाह,अगर बाजुओं में दम है तो मैदान में आकर सीधे लड़ो।
फिर 17 मई को महाराजा सूरजमल ने मुगलो को गाजर मूली की तरह काटकर फिरोजशाह कोटला किले पर कब्जा कर लिया।मुगल सेना ने किले पर तोपें चढ़ा दी व गोले फेंके लेकिन हिन्दू वीर जाट अपनी जगह पर अडिग खड़े रहे और धीरे धीरे मुगलिया सेना को खत्म करने लग गए और हिन्दू वीर सेना के सामने मुगल नहीं टिक सके।

इसी बीच छोटे मोटे हमले चलते रहे।12 जून को ईदगाह के ब
पास एक मुठभेड़ हुई। निहत्थे हिन्दू सैनिकों पर मुगलो ने अच्चानक हमला कर दिया।इस युद्ध मे कई हिन्दू वीर जाट सैनिक शहीद हुए।
14 जून को तालकटोरा की लड़ाई हुई जिसमें मुगलों की बक्कल सी उतार दी गयी।इस युद्ध मे महाराजा सूरजमल के एक वीर उपसेनापति राजेंद्रगिरी गौसाई शहीद हो गए जिससे बहुत बड़ा झटका जाट सेना को लगा। लेकिन मुगलों की सेना इससे भी ज्यादा हिल चुकी थी।यहां एक वीर सेनापति सुरतिराम जी भी शहीद हुए।

तालकटोरा लड़ाई को भले ही जीत लिया गया हो लेकिन यह बहुत बड़ा झटका था।सफदरजंग की सेना के बहुत से सैनिक व उसके रिश्तेदार महाराजा सूरजमल को छोड़कर शहंशाह की सेना में चले गए।

शनशाह ने राजा देवी दत्त और रामनाथ को महाराजा सूरजमल से शांति वार्ता व सन्धि के लिए भेजा लेकिन यह असफल रही। दिल्ली का मुगल बादशाह थर्रा रहा था कि यह किस मिट्टी का बना हुआ है?

इसी बीच एक जुलाई को एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें तोपखाने को बड़े स्तर पर प्रयुक्त किया गया।शहीद सुरतिराम का भाई जाट बख्शी गौकुलराम अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था और इस सेना में वह हत्यारा भी था। गौकुलराम ने क्रुद्ध होकर जाट सेना के साथ मुगलो पर हमला कर दिया। इस भयंकर युद्ध मे मुगलो के पांव उखेड़ दिए।मुगल भाग खड़े हुए लेकिन गौकुलराम को एक गोला लगा जिसमे वह बुरी तरह से घायल हो गया। महाराजा सूरजमल ने उसे सम्भाल उसके अंतिम शब्द यही थे कि महाराज जी उनका पीछा करो वे बचने नहीं चाहिए। महाराजा सूरजमल को अपने वीर बक्शी की मृत्यु का बहुत धक्का लगा उन्होंने बिजली से वेग से मुगलो का पीछा किया व दोनो वीरों की शहादत के जिम्मेदार दुष्टो व अनेकों मुगल सैनिको को काटकर फेंक दिया।

फिर महाराजा सूरजमल ने सफदरजंग को कहा कि हमें शत्रु को खुले में सीधे आमने सामने भिड़ने के लिए  मजबूर किया जाए। इसलिए रणनीति के तहत महाराजा सूरजमल 16 जुलाई को वीर भूमि तिलपत पहुंच गए।
तिलपत वहीं वीर भूमि है जहां पर वीर गौकुला के नेतृत्व में धर्म रक्षा हेतु औरँगेजेब के खिलाफ लड़ते हुए हजारों जाट शहीद हुए थे।

इसी बीच मुगलों की रूहेला फौज ने दिल्ली के पास के कुछ इलाकों में रात्रि को आम नागरिकों पर हमला किया व धन दौलत लूटी और कई औरतों का अपमान किया।

इस पर हिंदुआ सम्राट महाराजा सूरजमल क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने बेटे वीर जवाहर सिंह, बल्लभगढ के राजा बलराम सिंह व उनके साथ ही राज गुजर को रुहेलों को दंड देने के लिए भेजा।महाराजा जवाहर सिंह ने रुहेलों के किले गढ़ी मैदान पर हमला कर दिया।एक लंबी व भीषण लड़ाई छिड़ गई। रुहेले मुल्लो को गाजर मूली की तरह काट दिया गया।सिर्फ वे ही बचे जो युद्ध के बीच मे ही मौका देखकर भाग निकले थे।इस तरह महाराज जवाहर सिह ने हिन्दुओ के अपमान का बदला लिया।

मुगलिया सल्तनत हिल गयी थी लेकिन इसी बीच 2000 जेटा गुजर व 4000 मराठे मुगलो के पक्ष में आ गए। मुगलो ने उन्हें लड़ने के लिए पैसा देने का वादा किया था।

लेकिन अब भी महाराजा सूरजमल ने जरा भी चिंता नहीं की।
30 जुलाई रमजान के दिन महाराजा सूरजमल व शाही सेना के बीच झड़प हुई लेकिन अंततः मुगलो को ही भागना पड़ा।रमजान की नमाज उनके भाग में नहीं रहने दी गई।
इसी तरह कई जगह छिटपुट लड़ाई चली रही।19 जुलाई को जाट सेनापति शिवसिंह व मुगल सेना समर्थित मराठे आमने सामने हो गए।एक दिशन युद्ध हुआ बहुत से जाट व मराठे मारे गए। हिन्दू वीर शिवसिंह अपनी धर्मरक्षा पर अडिग रहे उनके पांव में एक भाला लग गया जिसके कारण वे घायल हो गए। युद्ध अनिर्णायक रहा।रात्रि होते ही युद्ध समाप्त हो गया हिन्दू वीर जाट व मुगल समर्थित मराठे अपने अपने शिविरों में चले गए।
शिवसिंह का यह घाव संक्रमित हो गया जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी।

फिर 5-6 सितंबर को 5000 जटवाड़ा सिपाही फरीदाबाद में मुगलो से भिड़ गए। मुगलिया सेना को मैदान छोड़कर भागना पड़ा।मुगलो की रसद का मार्ग काट दिया गया। हालांकि इस कार्यवाही में वीर जाट सरदार मोहकम सिंह जी शहीद हो गए।

इसके बाद मुगलों का सेनापति इमाद बुरी तरह से घबरा गया था उसने होल्कर व शिंदे से सहायता मांगी व उन्हें 1 करोड़ रुपए व अवध और इलाहाबाद की सूबेदारी देने का वादा किया।इससे मुगलों की ताकत और बढ़ गयी।

तगलकाबाद के यमुना तट पर भी मराठों व जाटों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ।यह ययध लंबा चला लेकिन अंत मे मुगल समर्थित मराठों को ही पीछे हटना पड़ा।
यहां महाराजा सूरजमल के वीर पुरोहित घमंडीराम(ब्राह्मण) जी घायल हो गए थे। महाराजा सूरजमल स्वयं उन्हें अपने घोड़े पर बैठाकर शिविर में लेकर गए व वहां उपचार शुरू करवाया।

दिल्ली की तरफ से फिर समझौते के लिए निमंत्रण आया लेकिन विफल रहा।

इस समय तक महाराजा सूरजमल दिल्ली के बहुत से हिस्सों पर काबिज थे लेकिन अब मुगलों के सेनापति इमाद की शक्ति बढ़ती जा रही थी।उसकी सेना की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।जिसकी चिंता महाराजा सूरजमल को ही नहीं बल्की मुगल शंहशाह अहमद शाह को भी हो रही थी। अब मुगल बादशाह को लग रहा था कि अगर सुरजमल से पीछा छूट गया तो इमाद से कौन बचाएगा उसे डर था कि कहीं इमाद बाद में विद्रोह न कर  दे व स्वयं राजा ना बन जाये।
अब मुगल बादशाह को सुरजमल के अलावा इमाद का भी भविष्य में डर था।
महाराजा सूरजमल की सेना सशक्त थी लेकिन अब इमाद की सेना संख्या में इतनी हो गयी थी के सशक्ति से भी काम न चलना था।

कायर मुगल बादशाह ने जयपुर के महाराजा माधो सिंह कच्छवाहा को सन्धि करवने के लिए बुलाया।

अंतिम महान युद्ध
आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें- महाराजा सूरजमल की दिल्ली विजयगाथा -भाग 2



Tuesday, 12 December 2017

शहीद मोहर सिंह

शहीद मोहर सिंह 1857

जन्म- 1814 शहीदी- 1857 आयु- 43 वर्ष पिता - चौधरी घासी राम

गाँव- शामली जिला- मुजफ्फर नगर (उत्तर प्रदेश) .

वे 1857 की क्रांति के एक महान योद्धा थे. चौधरी मोहर सिंह निर्वाल ने शामली तहसील के क्षेत्र में क्रांति की अलख जगाई लोगों को आजादी के लिए उकसाया व स्वतन्त्रता सेनानियों ने शामली की तहसील जलादी और कई अंग्रेजों को मार दिया था. शामली आजाद हो चुकी थी।

लेकिन क्रांति के शांत होने पर अंग्रेजो ने शामली के चारों और तोप लगादी. और पूरे गांव को फूंकने का इरादा कर लिया था। तब उस समय वीर मोहर सिंह ने सभी जिम्मेदारी खुद पर लेकर तोप के सामने खड़े होकर कहा कि यह सब मैंनें किया है सजा मुझे मीले गांव को नहीं और यह कहकर वे तोप के सामने खड़े हो गए।अंग्रेजो ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।इनके साथ क्रांतिकारी राज सिंह निर्वाल भी शहीद हुए थे जो इनके ही भाई थे।

इस तरह देश के लिए एक और वीरगाथा की रचना चौधरी मोहर सिंह ने कर दी।
वन्दे मातरम

सौजन्य से-राजा नाहर सिंह युथ ब्रिगेड।

Monday, 11 December 2017

एक ब्राह्मण बहन और जाट भाई की अमर प्रेमकथा


ढलमचंद बालियान
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वीर ढमलचन्द का जन्म संवत् 1550 (सन् 1493 ई०) में ग्राम सिसौली जिला मुजफ्फरनगर के एक रघुवंशी बालियान वंश के एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम चौधरी मेहरचन्द तथा माता का नाम श्यामो देवी था जो कि दहिया गोत्र की थी। इस वीर का वजन 52 धड़ी (6½ मन) था। यह जंगली भैंसे के सींगों को पकड़ कर उसे चक्कर कटा देता था। इसके कोई बहिन नहीं थी। अतः इसने जसवन्तनगर के हरिराम ब्राह्मण की पुत्री हरकौर को अपनी धर्मबहिन बनाया। हरकौर के कोई भाई नहीं था सो उसने इसको धर्मभाई बना लिया। हरकौर ने ही ढमलचन्द का उपनाम ढलैत रखा। ढलैत की शक्ति व योग्यता को जानकर रीवा के राजा वीरसिंह बघेला ने इसको अपनी सेना में भरती कर लिया और 200 घुड़सवारों और 300 पैदल सैनिकों का सरदार बना दिया। एक बार राजा वीरसिंह ढलैत को साथ लेकर किसी जंगल में से जा रहे थे। वहां पर एक शेर ने राजा पर अकस्मात् आक्रमण करके, उसके घोड़े को एक ही थाप में मार दिया। राजा पर वार करने से पहले ही ढलैत ने शेर की थाप को अपनी ढाल पर रोक लिया और अपनी 15 सेर वजन की तलवार से एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिये। इससे प्रसन्न होकर राजा ने ढलैत को 2000 सवारों का मनसबदार नियुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ढलैत ने अपने पुराने साथियों कीर्तिमल और भीमपाल उपकरण को महाराज की सेना में ऊँचे पदों पर लगवा दिया। राजा वीरसिंह का एक राजपूत भीमपाल नामक 7 गांव का जागीरदार था। उसकी पुत्री राजकली थी। यह 28 धड़ी वजन के पत्थर के मुदगर को दोनों हाथों से कई-कई बार ऊपर-नीचे कर देती थी। एक बार राजा वीरसिंह बघेला अपने साथ ढलैत वीर योद्धा को लेकर जागीरदार भीमपाल के निवास-स्थान पर आये थे। वहां पर मल्लों की युद्धकला का प्रदर्शन हुआ। राजकली भी प्रदर्शन देख रही थी। महाराजा की आज्ञा से ढलैत ने राजकली के उस 28 धड़ी के मुदगर को कभी दायें हाथ और कभी बायें हाथ से ऊपर नीचे और चारों ओर घुमाकर भूमि पर दूर फेंक दिया। तीन बार ऊपर फेंककर अपने कन्धों पर रोककर नीचे गिरा दिया। इससे भी भारी मुदगरों को उठाने की कला दिखलाकर दर्शकों को चकित कर दिया। उसी अवसर पर एक मरखना हाथी बिगड़कर इस प्रदर्शन स्थल पर आ गया। उसे देखकर लोग भागने लगे। इतने में ढलैत ने बड़ी तेजी से आगे बढ़कर 19 धड़ी की मोगरी उस हाथी के माथे पर जोर से मारी जिसके लगते ही हाथी पीछे को भाग गया। इस अद्भुत मल्ल युद्ध की कला को देखकर उपस्थित जनसमूह ने जोर-जोर से जयकारे लगाये “ढलैत की जय हो । ढलैत की जय हो।” उसी समय उस राजपूत लड़की राजकली ने ढलैत को मन से अपना पति मान लिया और उससे स्वयंवर विवाह कर लिया। ढलैत की धर्मबहिन ब्राह्मण लड़की हरकौर का विवाह पण्डित प्रेमनाथ के पुत्र अध्यापक देवव्रत के साथ हुआ। देवव्रत हरद्वार में अध्यापक थे और वहां के निकट गांव बाहपुर के निवासी थे। एक दिन हरकौर अपने देवर जयभगवान के साथ बहली में बैठकर अपने गांव जसवन्तनगर से अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते के जंगल में हैदरगढ़ के नवाब के बेटे हसनखां ने अपने शस्त्रधारियों सहित बहली पर आक्रमण कर दिया और हरकौर को हैदरगढ़ के किले में ले गया। यह घटना संवत् 1580 (सन् 1523 ई०) की है। उस समय इब्राहीम लोधी दिल्ली का बादशाह था। , हसनरज़ाखान हरकौर से निकाह (विवाह) करने के प्रयत्न करता रहा। परन्तु वह इन्कार करती रही। हरकौर ने अपनी अंगरक्षक एक मुस्लिम फकीरनी के माध्यम से उसके पोते रमजान को पत्र देकर अपने धर्मभाई ढलैत के पास भेजा। रमजान ने यह पत्र ढलैत को मथुरा के राजा के कैम्प में दिया।


ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के सतीत्व को बचाने के लिये राजा वीरसिंह से आज्ञा लेकर अपने साथ कीर्तिमल, भीमपाल उपकरण तथा 200 घुड़सवार लिए और हैदरगढ को चल दिया। इनके साथ राजकली भी ऊँटनी पर सवार होकर चली। वहां पहुंचकर इन वीर योद्धाओं ने हैदरगढ़ किले को घेर लिया और बड़ी युक्ति से धावा करके नवाब के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजकली ने हसनरजा के उन 5 सैनिकों का अपनी तलवार से सिर उतार दिया जो कि हरकौर को जबरदस्ती ले जाकर हसनरजाखान के साथ निकाह करवाना चाहते थे।
वीर योद्धा ढलैत ने अपनी तलवार से हसनरज़ाखान का सिर काट दिया। इस तरह से ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के प्राण एवं सम्मान को बचा लिया। ढलैत की वीरता तथा हरकौर के सतीत्व की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह है ढलैत की वीरगाथा। , ढलैत की पत्नी राजकली की 48 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् वीर ढलैत साथु बन गया। एक बार ढलैत अपनी धर्मबहिन हरकौर, मित्र कीर्तिमल एवं भीमपाल उपकरण के साथ शुक्रताल (जि० मुजफ्फरनगर) गंगा के तट पर स्नान करने गया। ये सब तीन दिन तक साधु सन्तों से धर्मकथा सुनते रहे। चौथे दिन ढलैत योद्धा का अकसमात् देहान्त हो गया। उसका दाह संस्कार वहीं गंगा तट पर किया गया। सतीदेवी हरकौर को अपने धर्म-भाई ढलैत की मृत्यु का भारी आघात पहुंचा। वह ढलैत की चिता के पास बैठकर “मेरा भाई ढलैत, मेरा भाई ढलैत” कहने लगी और तीन घण्टे पश्चात् अपने प्राण त्याग दिये। यह है भाई-बहिन के सच्चे प्यार का उदाहरण।

Wednesday, 18 October 2017

हिन्दू वीर जाटवान सिंह मलिक- हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

बात 1192 की है जब देश पर मुस्लिम सत्ता की शुरुआत हुई थी।और गौरी का गुलामी में कुतुबुद्दीन ऐबक देश पर अघोषित राज कर रहा था।
➡ये वही कुतुबुद्दीन है जिसने 700 मंदिर तोड़कर मस्जिदे बनाई,जिसने 1लाख 33000 लोगो का धर्म के नाम पर कत्ल किया,जिसने 80000 जीवो की हत्या की।

➡जाटो को ये अत्याचारी अधर्मी राजा सहन नही हुआ और उन्होंने हिन्दू वीर यौद्धा 💪 जाटवान मालिक के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
और मूसल सैनिकों को काटना शुरू कर दिया।रोहतक हरियाणा में जन्मे जाटवान ने युही ऐबक से लोहा लिया और फिर एक दिन  हाँसी में मुस्लिम बादशाह के किलेदार नसरुद्दीन को घेर लिया।और हाँसी को इस अत्याचारी शासक से स्वतंत्र कर लिया।
तभी कुतुबुद्दीन खबर मिलते ही अपनी सेना के साथ रातों रात भागा।

हांसी पहुंचते ही जाटवान और मुस्लिम शासक के बीच घमाशान युद्ध शुरू हुआ।🏇⚔🏇
➡खुद मुस्लिम लेखक लिखते हैं कि जैसे दो पहाड़ आपस में टकरा गए हों।धरती रक्त से #लाल हो गई थी।जाट थोड़े थे पर उन्होंने मुस्लिम बादशाह को नको चने चबवा दिए।
बाद में जाटवान ने अपने 💪20 मजबूत सैनिकों को चुना और सीधा कतुबुद्दीन के सुरक्षा घेरे में घुस गया।
उसने तलवार से हजारों का रक्त बहा दिया और कतुबुद्दीन को हाथी से नीचे उतरकर लड़ने के लिए ललकारा।

➡पर वो कायर उतरा नही और उसने मना कर दिया।

➡ये युद्ध तीन दिन और तीन रात चला।
आखिर कब तक दिल्ली के बादशाह की बड़ी सेना के आगे ये छोटी सी यौद्धाओं की सेना टिक पाती।
अंत में महान हिन्दू वीर चौधरी जाटवान सिंह मलिक शहीद हो गए।

लेखक आगे लिखते है जाटवान भले ही शहीद हो गए हो पर गुलाम वंश मुस्लिम बादशाह को इतना नुकसान हुआ कि वो दहाड़े मार मार कर रोया
और बोला कि अगर मैं इस यौद्धा से संधि करके बहला लेता तो अपने साम्राज्य का बहुत विस्तार कर सकता था।

इस तरह इस हिन्दू वीर यौद्धा ने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।ॐ🚩ॐ
पर कितने शर्म की बात है कि इस अत्याचारी कुतुबुद्दीन को #स्कूली किताबो में #महान बताया गया है

और धर्म व देश की खातिर तीन दिन तीन रात छोटी सी सेना के साथ इस गुलाम मुस्लिम बादशाह से लड़कर अपना बलिदान देने के बाद भी आज देश और हरियाणा के इतिहास में इस वीर को उचित जगह नही दी गई।

याद रखो इन बलिदानों को जिन्होंने अपना सिर कटा लिया पर कभी देश और धर्म का सिर नही झुकने दिया
               🚩🚩🚩🚩🇮🇳🚩🚩🚩🚩
           जय जाटवान।जय हिन्दुत्व।जय भारत।

Sunday, 24 September 2017

वीरांगना राजकुमारी सोमादेवी और राजा मालदेव चाहर


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संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पटाने के लिए पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी।और बलबन पहले से ही जाटो पर खुश था क्योंकि जब देश पर क्रूर विदेशी मंगोलों ने आक्रमण किया था तो खाप सेना ने ही उसके साथ मिलकर मंगोलों को हराया था।

इसलिए बादशाह ने उनकी इच्छा अनुसार कांजण (बीकानेर के पास) और सिद्धमुख(चुरू) का राज्य दे दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवन ने राज्य किया।(1268 से 1416 तक यहां जाट क्षत्रियो का राज रहा।)

बात उस समय की है जब वहां 1416 में राजा मालदेव चाहर शक्तिशाली स्तिथि में राज कर रहे थे।और इन्होंने अपना राज्य भी विस्तार कर लिया था।

वहां के आस पास दिल्ली के मुस्लिम बादशाह टैक्स लेते थे।और अपने कुछ लम्बरदार बना रखे थे।
तो 7 जाट लम्बरदारो ने टैक्स देने से मना कर दिया।

उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शासक खिज्र खां का शासन था।उसने बाजखां पठान के नेतृत्व में एक सेना उन 7 लम्बरदारो को पकड़ने के लिए भेजी।जब बाजखां उन्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा था तो राजा मालदेव ने उसे रोका।और उसे उन लम्बरदारो को छोड़ने के लिए कहा परन्तु उसने मना कर दिया।

फिर वहां भीषण युद्ध हुआ।और उस युद्ध में मुस्लिम सेनापति की सेना मारी गई।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात गोत के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।और इन्होंने खिज्र खां को टैक्स के लिए मना करके वीरता का काम किया क्योंकि उस समय ऐसा करना मौत के मुह में हाथ डालने के समान था।क्योंकि दिल्ली पर क्रूर शासकों का कब्जा था।

गुस्से में लाल होकर स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या राजकुमारी सोमादेवी थी। 
उसी समय दो सांड आपस में लड़ने लगे तो कुछ मुस्लिम सैनिक डरकर भागने लगे।
तब राजकुमारी सोमादेवी ने आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर दिया था।ये देखकर बादशाह के एक खास सेनापति की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा।

 स्वाभिमानी मालदेव ये सुनते ही गुस्से में हो गया और कहा कि हम अपनी कन्या एक मुसलमान को नही दे सकते।
महाराजा मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। 

चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में घोड़े पर तलवार लेकर वीरता से लड़ी।सोमादेवी ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को काट दिया।

परन्तु इतनी विशाल सेना के आगे कब तक टिकते अंत में अपने धर्म पथ पर चलते हुए युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं लगभग सेना रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

चाहर जाट गोत्र(एक नजर)
ऋषि-भृगु
वंश-अग्नि
कुलदेव-भगवान सोमनाथ
कुलदेवी-ज्वालामुखी

जय जटवाडा जय हिन्दुत्व जय भारत।