Showing posts with label Jat warriors. Show all posts
Showing posts with label Jat warriors. Show all posts

Thursday, 9 August 2018

1857 के अमर शहीद यौद्धा बाबा शाहमल तोमर

1857 के अमर क्रांतिकारी शहीद बाबा शाहमल तोमर

शहीद क्रांतिकारी शाहमल जाट
अमर शहीद क्रांतिकारी बाबा शाहमल

बाबा शाहमल सिंह तोमर बागपत जिले में #बिजरौल गांव के एक साधारण परन्तु आजादी के दिवाने क्रांतिकारी #किसान थे।उनका जन्म 17 फरवरी 1797 के दिन एक साधारण #जाट_क्षत्री परिवार में हुआ थाIइनके पिता का नाम चौधरी अमीचन्द तोमर था व माता धनवंती देवी थी। वे मेरठ और दिल्ली समेत आसपास के इलाके में बेहद लोकप्रिय थे। मेरठ जिले के समस्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में अंग्रेजों के लिए भारी खतरा उत्पन्न करने वाले बाबा शाहमल ऐसे ही क्रांतिदूत थे। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए इस महान व्यक्ति ने लम्बे अरसे तक #अंग्रेजों को चैन से नहीं सोने दिया था।

अंग्रेज हकुमत से पहले यहाँ #बेगम समरू राज्य करती थी. बेगम के राजस्व मंत्री ने यहाँ के किसानों के साथ बड़ा अन्याय किया. यह क्षेत्र १८३६ में अंग्रेजों के #अधीन आ गया. अंग्रेज अदिकारी प्लाउड ने जमीन का #बंदोबस्त करते समय किसानों के साथ हुए अत्याचार को कुछ सुधारा परन्तु #मालगुजारी देना बढा दिया. पैदावार अच्छी थी. किसान मेहनती थे सो बढ़ी हुई मालगुजारी भी देकर खेती करते रहे थे। खेती के बंदोबस्त और बढ़ी मालगुजारी से किसानों में भारी असंतोष था जिसने १८५७ की क्रांति के समय आग में घी का काम किया.

शाहमल का गाँव बिजरौल काफी बड़ा गाँव था . 1857 की क्रान्ति के समय इस गाँव में दो पट्टियाँ थी. उस समय शाहमल एक पट्टी का नेतृत्व करते थे.

इसी बीच बाबा शाहमल ने आजादी के लिए क्रांति का बिगुल बज दिया।शाहमल की क्रान्ति प्रारंभ में स्थानीय स्तर की थी परन्तु समय पाकर विस्तार पकड़ती गई. आस-पास के लम्बरदार विशेष तौर पर बडौत के लम्बरदार शौन सिंह और बुध सिंह और जौहरी, जफर्वाद और जोट के लम्बरदार बदन और गुलाम भी विद्रोही सेना में अपनी-अपनी जगह पर आ जमे. शाहमल के मुख्य सिपहसलार बगुता और सज्जा थे और जाटों के दो बड़े गाँव बाबली और बडौत अपनी जनसँख्या और रसद की तादाद के सहारे शाहमल के केंद्र बन गए.

१० मई को मेरठ से शुरू विद्रोह की लपटें इलाके में फ़ैल गई. शाहमल ने जाटो के साथ जहानपुर कर अन्य किसान गुर्जर आदि को भी साथ लेकर बडौत तहसील पर चढाई करदी. उन्होंने तहसील के खजाने को लूट कर उसकी अमानत को बरबाद कर दिया. बंजारा सौदागरों की लूट से खेती की उपज की कमी को पूरा कर लिया. मई और जून में आस पास के गांवों में उनकी धाक जम गई. फिर मेरठ से छूटे हुये #कैदियों ने उनकी की फौज को और बढा दिया. उनके प्रभुत्व और नेतृत्व को देख कर दिल्ली दरबार में उसे सूबेदारी दी.

12 व 13 मई 1857 को बाबा शाहमल ने सर्वप्रथम साथियों समेत अंग्रेज #समर्थित बंजारा व्यापारियों पर आक्रमण कर काफी संपत्ति कब्जे में ले ली और बड़ौत तहसील और पुलिस चौकी पर हमला बोल की तोड़फोड़ व लूटपाट की। दिल्ली के क्रांतिकारियों को उन्होंने बड़ी मदद की। क्रांति के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण की भावना ने जल्दी ही उनको #क्रांतिवीरों का सूबेदार बना दिया। बाबा शाहमल तलवारबाजी में निपुण व बहुत बड़े करतबबाज थे।
शाहमल ने बिलोचपुरा के ए व्यक्ति को अपना दूत बनाकर दिल्ली भेजा ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए मदद व सैनिक मिल सकें। बागपत के आस पास के सभी क्रान्तिकारियो से शाहमल से अच्छे सम्बन्ध थे। इन सभी ने शाहमल को बादशाह के सामने पेश करते हुए कहा कि वह क्रांतिकारियो के लिए बहुत सहायक हो सकते है और ऐसा ही हुआ शाहमल ने न केवल अंग्रेजों के संचार साधनों को ठप किया बल्कि अपने इलाके को दिल्ली के क्रांतिवीरों के लिए आपूर्ति क्षेत्र में बदल दिया।

अपनी बढ़ती #फौज की ताकत से उन्होंने बागपत के नजदीक जमुना पर बने पुल को नष्ट कर दिया. उनकी इन सफलताओं से उन्हें 84 गांवों का आधिपत्य मिल गया. उसे आज तक देश खाप की #चौरासी कह कर पुकारा जाता है. वह एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में संगठित कर लिया गया और इस प्रकार वह जमुना के बाएं किनारे का #राजा बन बैठा, जिससे कि दिल्ली की उभरती फौजों को रसद जाना कतई बंद हो गया और मेरठ के क्रांतिकारियों को मदद पहुंचती रही. इस प्रकार वह एक छोटे किसान से बड़े क्षेत्र के अधिपति बन गए.

कुछ अंग्रेजों जिनमें हैवेट, फारेस्ट ग्राम्हीर, वॉटसन कोर्रेट, गफ और थॉमस प्रमुख थे को यूरोपियन फ्रासू जो बेगम समरू का दरबारी कवि भी था, ने अपने गांव #हरचंदपुर में शरण दे दी। इसका पता चलते ही शाहमल ने #निरपत सिंह व #लाजराम जाट के साथ #फ्रासू के हाथ पैर बांधकर काफी पिटाई की और बतौर सजा उसके घर को लूट लिया। बनाली के महाजन ने काफी रुपया देकर उसकी जान बचायी। मेरठ से दिल्ली जाते हुए डनलप, विलियम्स और ट्रम्बल ने भी फ्रासू की रक्षा की। फ्रासू को उसके पड़ौस के गांव सुन्हैड़ा के लोगों ने बताया कि इस्माइल, रामभाई और जासूदी के नेतृत्व में अनेक गांव अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए है। शाहमल के प्रयत्‍‌नों से हर वर्ग से सब भारतीय एक साथ मिलकर लड़े और हरचंदपुर, ननवा काजिम, नानूहन, सरखलान, बिजरौल, जौहड़ी, बिजवाड़ा, पूठ, धनौरा, बुढ़ैरा, पोईस, गुराना, नंगला, गुलाब बड़ौली, बलि बनाली (निम्बाली), बागू, सन्तोखपुर, हिलवाड़ी, बड़ौत, औसख, नादिर असलत और असलत खर्मास गांव के लोगों ने उनके नेतृत्व में संगठित होकर क्रांति का #बिगुल बजाया।

कुछ बेदखल हुये जमींदारों ने जब शाहमल का साथ छोड़कर अंग्रेज अफसर डनलप की फौज का साथ दिया तो शाहमल ने ३०० सिपाही लेकर बसौड़ गाँव पर कब्जा कर लिया. जब अंग्रेजी फौज ने गाँव का घेरा डाला तो शाहमल उससे पहले गाँव छोड़ चुका था. #अंग्रेज_फौज ने बचे सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया और ८००० मन गेहूं जब्त कर लिया. इलाके में शाहमल के दबदबे का इस बात से पता लगता है कि अंग्रेजों को इस अनाज को मोल लेने के लिए किसान नहीं मिले और न ही किसी व्यापारी ने बोली बोली. गांव वालों को सेना ने बाहर निकाल दिया।

 शाहमल ने यमुना नहर पर सिंचाई #विभाग के बंगले को मुख्यालय बना लिया था और अपनी गुप्तचर सेना कायम कर ली थी। हमले की पूर्व सूचना मिलने पर एक बार उन्होंने 129 अंग्रेजी सैनिकों की हालत खराब कर दी थी।

इलियट ने १८३० में लिखा है कि पगड़ी बांधने की प्रथा व्यक्ति को आदर देने की प्रथा ही नहीं थी, बल्कि उन्हें नेतृत्व प्रदान करने की संज्ञा भी थी. शाहमल ने इस प्रथा का पूरा उपयोग किया. शाहमल बसौड़ गाँव से भाग कर निकलने के बाद वह गांवों में गया और करीब ५० गावों की नई फौज बनाकर मैदान में उतर पड़ा.

दिल्ली दरबार और शाहमल की आपस में उल्लेखित संधि थी. अंग्रेजों ने समझ लिया कि दिल्ली की मुग़ल सता को बर्बाद करना है तो शाहमल की शक्ति को दुरुस्त करना आवश्यक है. उन्होंने शाहमल को जिन्दा या मुर्दा उसका सर काटकर लाने वाले के लिए १०००० रुपये #इनाम घोषित किया.

#डनलप जो कि अंग्रेजी फौज का नेतृत्व कर रहा था, को शाहमल की फौजों के सामने से भागना पड़ा. इसने अपनी डायरी में लिखा है -

"चारों तरफ से उभरते हुये जाट नगाड़े बजाते हुये चले जा रहे थे और उस आंधी के सामने अंग्रेजी फौजों का जिसे '#खाकी रिसाला' कहा जाता था, का टिकना नामुमकिन था."
एक सैन्य अधिकारी ने उनके बारे में लिखा है कि

एक जाट (शाहमल) ने जो बड़ौत परगने का गवर्नर हो गया था और जिसने #राजा_की_पदवी धारण कर ली थी, उसने तीन-चार अन्य परगनों पर नियंत्रण कर लिया था। दिल्ली के घेरे के समय जनता और दिल्ली इसी व्यक्ति के कारण जीवित रह सकी।
छपरा गांव के त्यागियों, बसोद के जादूगर और बिचपुरी के गूर्जरों ने भी शाहमल के नेतृत्व में क्रांति में पूरी शिरकत की। अम्हेड़ा के किसानों ने बड़ौत व बागपत की लूट व एक महत्वपूर्ण पुल को नष्ट करने में हिस्सा लिया। सिसरौली के जाटों ने शाहमल के सहयोगी सूरजमल की मदद की जबकि दाढ़ी वाले सिख ने क्रांतिकारी किसानों का नेतृत्व किया।

जुलाई 1857 में क्रांतिकारी नेता शाहमल को पकड़ने के लिए अंग्रेजी सेना संकल्पबद्ध हुई पर लगभग 7 हजार सैनिकों सशस्त्र किसानों व जमींदारों ने डटकर मुकाबला किया। शाहमल के भतीजे भगत के हमले से बाल-बाल बचकर सेना का नेतृत्व कर रहा डनलप #भाग खड़ा हुआ और भगत ने उसे बड़ौत तक खदेड़ा। इस समय शाहमल के साथ 2000 शक्तिशाली किसान मौजूद थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में विशेष महारत हासिल करने वाले शाहमल और उनके अनुयायियों का बड़ौत के दक्षिण के एक बाग में खाकी रिसाला से आमने सामने घमासान #युद्ध हुआ.

डनलप शाहमल के भतीजे भगता के हाथों से बाल-बाल बचकर भागा. परन्तु शाहमल जो अपने घोडे पर एक अंग रक्षक के साथ लड़ रहा था, #फिरंगियों के बीच घिर गया. उसने अपनी तलवार के वो #करतब दिखाए कि फिरंगी दंग रह गए. तलवार के गिर जाने पर शाहमल अपने भाले से दुश्मनों पर वार करता रहा. इस दौर में उसकी पगड़ी खुल गई और घोडे के पैरों में फंस गई. जिसका फायदा उठाकर एक फिरंगी सवार ने उसे घोड़े से गिरा दिया. अंग्रेज अफसर पारकर, जो शाहमल को पहचानता था, ने शाहमल के शरीर के टुकडे-टुकडे करवा दिए।यह 18 जुलाई का दिन था और 21 जुलाई उनका सर काट कर एक भाले के ऊपर टंगवा दिया.

फिरंगियों के लिए यह सबसे बड़ी विजय पताका थी. डनलप ने अपने कागजात पर लिखा है कि अंग्रेजों के खाखी रिशाले के एक भाले पर अंग्रेजी झंडा था और दूसरे भाले पर शाहमल का सर टांगकर पूरे इलाके में परेड करवाई गई. चौरासी गांवों के 'देश' की किसान सेना ने फिर भी हार नहीं मानी. और शाहमल के सर को वापिस लेने के लिए सूरज मल और भगता स्थान-स्थान पर फिरंगियों पर हमला करते रहे. इसमें सब वर्गों के किसानों ने बढ़-चढ़ कर साथ दिया. शाहमल के गाँव सालों तक युद्ध चलाते रहे.

21 जुलाई 1857 को तार द्वारा अंग्रेज उच्चाधिकारियों को सूचना दी गई कि मेरठ से आयी फौजों के विरुद्ध लड़ते हुए शाहमल अपने 6000 साथियों सहित मारा गया। शाहमल का #सिर_काट लिया गया और सार्वजनिक रूप से इसकी प्रदर्शनी लगाई गई।

पर इस शहादत ने क्रांति को और मजबूत किया तथा 23 अगस्त 1857 को शाहमल के पौत्र लिज्जामल जाट ने बड़ौत क्षेत्र में पुन: जंग की शुरुआत कर दी। अंग्रेजों ने इसे कुचलने के लिए खाकी रिसाला भेजा जिसने पांचली बुजुर्ग, नंगला और फुपरा में कार्रवाई कर क्रांतिकारियों का दमन कर दिया। लिज्जामल को बंदी बना कर साथियों जिनकी संख्या 32 बताई जाती है, को #फांसी दे दी गई।

शाहमल मैदान में काम आया, परन्तु उसकी जगाई #क्रांति के बीज बडौत के आस पास प्रस्फुटित होते रहे. बिजरौल गाँव में शाहमल का एक छोटा सा #स्मारक बना है जो गाँव को उसकी याद दिलाता रहता है.

आज इन अमर क्रान्तिकारियो देशभक्तों के विचारों व प्रयास को फिर से युवा पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है।

17 बूचड़खाने तोड़ने वाले विश्व के सबसे बड़े गौरक्षक की जीवनी

वीर हरफूल सिंह-सबसे बड़ा गौरक्षक

गौरक्षक वीर हरफूल
गौरक्षक वीर हरफूल सिंह

जन्म-

वीर हरफूल का जन्म 1892 ई० में भिवानी जिले के लोहारू तहसील के गांव बारवास में एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था।उनके पिता एक किसान थे।
बारवास गांव के इन्द्रायण पाने में उनके पिता चौधरी चतरू राम सिंह रहते थे।उनके दादा का नाम चौधरी किताराम सिंह था। 1899 में हरफूल के पिताजी की प्लेग के कारण मृत्यु हो गयी। इसी बीच ऊनका परिवार जुलानी(जींद) गांव में आ गया।यहीं के नाम से उन्हें वीर हरफूल जाट जुलानी वाला कहा जाता है।

हरफूल की माता जी को उनके देवर रत्ना का लत्ता उढा दिया गया।
हरफूल अपने मामा के यहां तोशाम के पास संडवा(भिवानी) गांव में चले गये।
जब वे वापिस आये तो उनके चाचा के लड़कों ने उसे प्रोपर्टी में शेयर देने से मना कर दिया।जिस पर बहुत झगड़ा हुआ।और हरफूल को झूठी गवाही देकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।और हरफूल पर थानेदार ने बहुत अत्याचार किये।
उनकी माता ने हरफूल का पक्ष लिया मगर उनकी एक न चली बाद में उनकी देखभाल भी बन्द हो गयी।

सेना में 10 साल

उसके बाद हरफूल सेना में भर्ती हो गए।उन्होंने 10 साल सेना में काम किया।उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भी भाग लिया। उस दौरान ब्रिटिश आर्मी के किसी अफसर के बच्चों व औरत को घेर लिया।तब हरफूल ने बड़ी वीरता दिखलाई व बच्चों की रक्षा की।अकेले ही दुश्मनों को मार भगाया।

फिर हरफूल ने सेना छोड़ दी।जब सेना छोड़ी तो उस अफसर ने उन्हें गिफ्ट मांगने को कहा गया तो उन्होंने फोल्डिंग गन मांगी।फिर वह बंदूक अफसर ने उन्हें दी।

थानेदार व अपने परिवार से बदला-
उसके बाद हरफूल ने सबसे पहले आते ही टोहाना के उस थानेदार को ठोक दिया जिसने उसे झूठा पकड़ा व टॉर्चर किया था।फिर उसने अपने परिवार से जमीन में हिस्सा मांगा तो चौधरी कुरड़ाराम जी के अलावा किसी ने सपोर्ट न किया और भला बुरा कहा।वे उनकी माता की मृत्यु के भी जिम्मेदार थे तो बाकियो को हरफूल ने ठोक दिया।
फिर हरफूल बागी हो गया उसने अपना बाद का जीवन गौरक्षा व गरीबों की सहायता में बिताया।
Harful Jat Julani Wala
Veer Harful Singh

गौरक्षा- सवा शेर

पहला हत्था तोड़ने का किस्सा-23July1930
टोहाना में मुस्लिम राँघड़ो का एक गाय काटने का एक कसाईखाना था।वहां की 52 गांवों की नैन खाप ने इसका कई बार विरोध किया।कई बार हमला भी किया जिसमें नैन खाप के कई नौजवान शहीद हुए व कुछ कसाइ भी मारे गए।लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई।क्योंकि ब्रिटिश सरकार मुस्लिमों के साथ थी।और खाप के पास हथियार भी नहीं थे।
तब नैन खाप ने वीर हरफूल को बुलाया व अपनी समस्या सुनाई।हिन्दू वीर हरफूल भी गौहत्या की बात सुनकर लाल पीले हो गए और फिर नैन खाप के लिए हथियारों का प्रबंध किया।हरफूल ने युक्ति बनाकर दिमाग से काम लिया। उन्होंने एक औरत का रूप धरकर कसाईखाने के मुस्लिम सैनिको और कसाइयों का ध्यान बांट दिया।फिर नौजवान अंदर घुस गए उसके बाद हरफूल ने ऐसी तबाही मचाई के बड़े बड़े कसाई उनके नाम से ही कांपने लगे।उन्होंने कसाइयों पर कोई रहम नहीं खाया।सैंकआईड़ो मुस्लिम राँघड़ो को मौत के घाट उतार दिया।और गऊओ को मुक्त करवाया।अंग्रेजों के समय बूचड़खाने तोड़ने की यह प्रथम घटना थी।

इस महान साहसिक कार्य के लिए नैन खाप ने उन्हें सवा शेर की उपाधि दी व पगड़ी भेंट की।
गौरक्षक दिवस 27 जुलाई
विश्व गौरक्षक दिवस 27 July

उसके बाद तो हरफूल ने ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी जहां उन्हें पता चला कि कसाईखाना है वहीं जाकर धावा बोल देते थे।
उन्होंने जींद,नरवाना,गौहाना,रोहतक आदि में 17 गौहत्थे तोड़े।ऊनका नाम पूरे उत्तर भारत में फैल गया।कसाई उनके नाम से ही थर्राने लगे ।उनके आने की खबर सुनकर ही कसाई सब छोड़कर भाग जाते थे। मुसलमान और अंग्रेजों का क्साइवाड़े का धंधा चौपट हो गया।
इसलिए अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी। मगर हरफूल कभी हाथ न आये।कोई अग्रेजो को उनका पता बताने को तैयार नहीं हुआ।

गरीबों का मसीहा-

वीर हरफूल उस समय चलती फिरती कोर्ट के नाम से भी मशहूर थे।जहाँ भी गरीब या औरत के साथ अन्याय होता था वे वहीं उसे न्याय दिलाने पहुंच जाते थे।उनके न्याय के भी बहुत से किस्से प्रचलित हैं।

हरफूल की गिरफ्तारी व बलिदान


अंग्रेजों ने हरफूल के ऊपर इनाम रख दिया और उन्हें पकड़ने की कवायद शुरू कर दी।

इसलिए हरफूल अपनी एक ब्राह्मण धर्म बहन के पास झुंझनु(रजस्थान) के पंचेरी कलां पहुंच गए। इस ब्राह्मण बहन की शादी भी हरफूल ने ही करवाई थी।
यहां का एक ठाकुर भी उनका दोस्त था।
वह इनाम के लालच में आ गया व उसने अंग्रेजों के हाथों अपना जमीर बेचकर दोस्त व धर्म से गद्दारी की।

अंग्रेजों ने हरफूल को सोते हुए गिरफ्तार कर लिया।कुछ दिन जींद जेल में रखा लेकिन उन्हें छुड़वाने के लिये हिन्दुओ ने जेल में सुरंग बनाकर सेंध लगाने की कोशिश की और विद्रोह कर दिया।सलिये अंग्रेजों ने उन्हें फिरोजपुर जेल में चुपके से ट्रांसफर कर दिया।
गौरक्षक हिन्दू वीर हरफूल जुलानी वाला

बाद में 27 जुलाई 1936 को चुपके से पंजाब की फिरोजपुर जेल में अंग्रेजों ने उन्हें रात को फांसी दे दी। उन्होंने विद्रोह के डर से इस बात को लोगो के सामने स्पष्ट नहीं किया। व उनके पार्थिव शरीर को भी हिन्दुओ को नहीं दिया गया। उनके शरीर को सतलुज नदी में बहा दिया गया।

इस तरह देश के सबसे बड़े गौरक्षक, गरीबो के मसीहा, उत्तर भारत के रॉबिनहुड कहे जाने वाले वीर हरफूल सिंह ने अपना सर्वस्व गौमाता की सेवा में कुर्बान कर दिया।

मगर कितने शर्म की बात है कि बहुत कम लोग आज उनके बारे में जानते हैं।कई गौरक्षक सन्गठन भी उनको याद नहीं करते। गौशालाओं में भी गौमाता के इस लाल की मूर्तियां नहीं है।

ऐसे महान गौरक्षक को मैं नमन करता हूँ।

जय हरफूल।जय गौमाता।
जय सूरजमल।जय भवानी।

Wednesday, 20 June 2018

अगर आप जाट हैं तो यह जरूर पढ़ें

जाट समाज के लिए एक जरूरी संदेश-

इसे पढ़ें और समझने की कोशिश करें-
महाक्षत्रिय
जाट क्षत्रिय स्वाभिमान

1.खुद को पहचानों- जाट का अर्थ होता है प्रधान, शीर्ष,राजा और राजा व राजाओ के अंश ही एकमात्र क्षत्रिय कहें गये है। और देव संहिता में तो जाटो को महाक्षत्रिय लिखा गया है जिसके श्लोक खाप इत्तिहास में अंकित है।
जाट वही प्राचीन सनातनी क्षत्रिय हैं जिनमें भगवान राम, पांडव-कौरव, भगवान श्री कृष्ण जैसे यौद्धा हुए हैं।
महाजट महादेव से लेकर महाराजा सूरजमल तक और आज तक भी हम कभी भी अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख नहीं हुए।आज हमें वही महाक्षत्रिय संस्कार बचाने की जरूरत है क्योंकि आधुनिकता व गंदी राजनीति की दौड़ में संस्कारों को बचाये रखना बहुत कठिन है।

2.वामपंथी व बेतुके इतिहासकारों से सावधान- अंग्रेजों मुगलों से हमारे जाट पूर्वजों ने खूब लोहा लिया था इसलिए कुछ नकली लोग व उनके समर्थक हमसे जलते थे और आज भी कुछ ऐसे ही लोग हैं और कुछ राजनेताओ के चमचे हमारी जाति में भी हैं उनसे सावधान रहें वे आपके महाक्षत्रिय जाट संस्कारों को मिटाने की कोशिश करेंगे। जो संस्कार हमें भगवान श्रीकृष्ण,वीर गौकुला,महाराजा सूरजमल,वीर हरफूल जैसे पूर्वजों से विरासत में मिले हैं उन पर ही भरोसा रखें किसी की बनावटी बातों पर नहीं।

3.सब से भाईचारा- हम हिन्दू हैं और हमारे पूर्वजों ने अपने सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के लिए बलिदान दिया है। इसलिए सभी हिन्दू जातियों से मिलकर रहना हमारा कर्तव्य है। शुरुआत में हम सब एक ही थे समयानुसार व कर्मानुसार वर्णों में बंटे फिर जातियों में सिख भी हमारा ही हिस्सा है।और एक क्षत्रिय होने के नाते किसान जवान देश धर्म गौ की रक्षा करना हमारा धर्म है।

4.अपने इत्तिहास को जानो- इत्तिहास हमारी पूंजी है और जो कौम इत्तिहास को भूल जाती है वह मिट जाती है। अगर वहम हो तो यूनान मिश्र को देख लो।
इसलिए अपना इत्तिहास जानो और सबको बताओ। और हर जाति के महापुरुषों का सम्मान करों। क्योंकि महापुरुष किसी भी जाति का हो उसने कभी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि सबके लिए संघर्ष किया था। और हमारे पूर्वजों ने भी सबका सम्मान करने की ही शिक्षा दी है।

5.आदर्श वीरो को बनाओ न कि राजनेताओ को- जैसे आदर्श होंगे वैसे ही उनको फॉलो करने वाले होंगे। इसलिए हमेशा से अपना अपनी कौम व अपने बच्चों का आदर्श सोच समझकर ही बनाना चाहिए। जिन लोगों ने स्वार्थ की जिंदगी जी हो या जिन्होंने राजनीति की हो उन्है कभी भी आप अपना आदर्श न बनाएं क्योंकि उन्होंने अपने स्वार्थ या राजनीति के लिए बहुत से गलत कदम भी समयानुसार उठाये होंगे जिस कारण कभी भी उनकी असली सोच हम नहीं जान पाते।आप एक अच्छे राजनेता का सम्मान कर सकते हैं पर उसे आदर्श नहीं बना सकते।
इसलिए अपना आदर्श राजा नाहर सिंह,महाराजा सुरजमल, वीर हरफूल, कान्हा रावत, भगत सिंह, वीर गौकुला,महाराजा रणजीत सिंह, बाबा दीप सिंह,वीर तेजाजी,वीर बिग्गाजी जैसे शेरों में से बनाएं।

6.नेताओं के चमचे न बनों- इन नेताओं के चमचे बनकर कभी भी जाति या धर्म को नुकसान न पहुंचाए। न ही इनके लिए किसी से लड़ें। एक राजनेता कभी भी किसी जाति का न हो सकता।आप खुद सोचिए अगर चौटाला हुड्डा जाती की सोचते तो क्या खाजकुमार की इतनी हिम्मत थी के वो कुछ बोल सके और पूरे हरियाणा में हरफूल,राजा नाहर सिंह,महाराजा सूरजमल की मूर्ति होती,अगर अजित सिंह जाती की सोचता तो मुजफरनगर से न भागता, अगर हनुमान बेनीवाल सोचता तो गोगामेड़ी की इतनी हिम्मत न होती।
आप इन्हें वोट दो या ओर को मगर इन्हें जाती से न जोड़ो।क्योंकि अगर ऐसा करोगे तो इनके गलत काम का फल भी हमारी जाती पर ही जायेगा।

7.आपस मे लड़ाने वालों से सावधान- कुछ राजनैतिक,देशद्रोही व अन्य हमें बदनाम करके अन्य जातियों से लड़ाना चाहते हैं अपनी जाति व दूसरों सबमें ऐसे लोग हैं। ये एक दूसरे को गाली देते हैं फिर उसी के स्क्रीनशॉट,वीडियो फैलाकर लोगो को भड़काते हैं।

8.आरक्षण- यह हमारे देश को खा रहा है हर जाट इसके खिलाफ है लेकिन अभी हमारे समाज के कुछ राजनैतिक लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं।हालांकि यह भी गलत नहीं लेकिन वे लोग सिर्फ इस पर राजनीति कर रहे हैं हम सब इस बात को जान चुके हैं पिछली बार भी इन तथाकथित जाट नेताओं ने व सरकार के कुछ लोगों ने आंदोलन को भड़का दिया इसमें दोनो तरफ की भूमिका थी।आपको ठीक लगे तो आन्दोलनों में जाइये लेकिन जिन लोगो ने भड़काया वही नेतृत्व करें या राजनेताओ के चमचे नेतृत्व करें तो कभी भी ऊँका सहयोग न करें।वे हल नहीं चाहते बस अपनी राजनीति चाहते हैं।

9.समाज मे बहुत से नए हिन्दूवादी नेता, जाट नेता, इत्तिहास पर काम करने वाले युवक आदि निकल रहे हैं ऊँका सहयोग करें। किसी सन्गठन या किसी पार्टी से न तो हद से ज्यादा प्रेम करें न हु नफरत।हर जगह ऐसे लोग पहुंचाए जो भारत भर में हमारा नाम कर सकें।

अगर इन बातों को समाज समझ गया तो मेरे हिसाब से हम हर जगह आगे रहेंगे अपने पूर्वजों की तरह।
कोई गलती हो गयी हो तो अपना शुभचिंतक समझकर क्षमा करना।पोस्ट अछि लगे तो कॉपी पेस्ट शेयर करके आगे बढ़ाना।
जाट राजा
महाजट महादेव

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल
By-चौधरी जयदीप सिंह नैन