Wednesday, 13 December 2017

वीर गौकुला जी की बहन हिन्दू वीरांगना भंवरी कौर जी की वीर गाथा


भँवर कौर, हिन्दू, वीरांगना, जाट, क्षत्राणी, औरंगजेब, युद्ध क्षत्राणी शहीद भंवरी कौर जी बृज बाला शहीद क्षत्राणी भंवरी कौर अमर शहीद गोकुल सिंह की बहिन थी. 

भंवर कौर का मुग़ल सैनिकों से मुकाबला पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अंसार १६६९ के श्रावण मास की हरयाली तीज के दिन शिखन खां ने घुड़सवारों तथा अंगरक्षकों के साथ तिलपत से बाहर गाँव के पास बाग़ को घेर लिया. भंवर कौर अपनी पूर्ण यौवनावस्था में थी, दायित्व और वीरत्व के संस्कार उसे विरासत में मिले थे. अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण वह अन्य सहेलियों से सर्वोपरि लग रही थी. गाँव से बाहर बाग़ में झूले पड़े हुए थे और मीठी सुरीली आवाज में सखियाँ मल्हार गाने लगी. वे झोटा दे रही थी और मस्ती में ठिठोली और अठखेलियाँ कर रही थी. शिखन खान, कल्पना और वासना से बेहद पीड़ित हो रहा था. वह बेकाबू मन को न रोक सका और अनायास ही लड़कियों के झुंड के पास पहुँचा. उसके साथियों ने लड़कियों पर झपट्टा मरकर उन्हें हतास करना चाह परन्तु वीर बालाएँ इन अजूबे वेशधारियों से न तो भयभीत हुई और न भागी. शिखन खान ने जैसे ही भंवर कौर की और कुदृष्टि से हाथ बढ़ाना चाहा तो

उस बृज बाला ने कहा - "ठहर जा, गीदड़, कुत्ते, हरामी, तेरी शामत तुझे यहाँ ले आई है. मेरी और हाथ बढ़ने का मतलब बर्रों के छाते में हाथ डालना होगा". भंवर कौर की दहाड़ से शिखन खां बेहयाई से हंसा और कहा कि "ऐ जाने मन, तू जितनी ऊपर से सुंदर दिखती है उतनी ही अन्दर से गर्म मिजाज मालूम पड़ती है. तू यहाँ इन गवारों के बीच रहने लायक नही है तुझे तो महलों में होना चाहिए". "बेहूदे, बदतमीज़ तेरी बहन बेटी नहीं है क्या? यदि तेरी बहन बेटी है तो उसे ले आ उसे मैं अपनी भाभी रानी बना लूंगी." भंवर कौर की गर्जना से शिखन खां और चिढ़ गया. वह आगे कुछ कर पाता इससे पहले ही भंवर कौर ने झूला उतारकर उसकी रस्सी में पटली बाँध कर गोफन की तरह घुमाते हुए शिखन खां की और फेंकी जो कि उसके सर में लगी- इसके लगते ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया. उसने अपनी अन्य सखियों को इन घुड़सवारों से मुकाबला करने को ललकारा.

 भंवर कौर और सखियाँ आनन-फानन में पटली और झूले वाली रस्सियों से सुसज्जित हो गयी. मुग़ल सैनिक इन वीरांगनाओं के निश्चय को नहीं जान पाए. भंवर कौर ने दाहिने हाथ से रस्सी घुमाकर एक सैनिक के गले पर फैंक दी. रस्सी गले के चारों और लिपट गयी. भंवर कौर ने जोर से झटका मारा और सैनिक घोड़े से नीचे धड़ाम से आ गिरा. भंवर कौर की दूसरी सखी ने पटली से वार किया. सिपाही अर्धम्रत निढाल हो गया. भंवर कौर ने बिजली जैसी चपलता से सैनिक की तलवार अपने काबू में की और एक ही वार से मुग़ल सैनिक का धड़ और सिर अलग हो गए. यही क्रम चलता रहा. इस तरह कई सिपाही मौत के शिकार हुई.

वीरांगनाओं का यह रणचातुर्य देख शिखन खां पहले तो दहल गया किंतु अविलम्ब क्रोधित हो भंवर कौर की और झपटा. भंवर कौर पहले से तैयार थी. शिफन खां ने तलवार से वार किया. भंवर कौर ने पटली आगे कर उसे ढाल का काम लिया. वार बेकार हो गया. भंवर कौर ने विद्युत-वेग से पलट कर वार किया. चालाक शिखन खां स्वयं तो बच गया किंतु उसका घोडा घायल हो गया. बाग़ के मध्य घमासान होने लगा. वीरांगनाओं ने अबतक कई घुड़सवारों को रस्सी से निचे गिराया और मौत के घाट उतार दिया. खिसियाए सैनिक इन अबलाओं पर करारे प्रहार करने लगे. वीरांगनाएं भी कट-कट कर धरासाई होने लगी. चतुर भंवर कौर ने शिखन खां के घायल घोडे पर एक और वार किया. घोडा चित्कार कर उठा और घायल घोड़ा शिखन खां को लेकर भाग खड़ा हुआ.

शिखन खां को भागते देख अन्य सैनिकों के पैर भी उखड गए. भागते सैनिकों पर उत्साहित वीरांगनाओं ने तेज और लंबे प्रहार किए. किसी कवि ने ठीक ही कहा है: अबलाएं करती थी श्रृंगार, वे बनी सिंहनी क्षत्राणी सुझा केवल श्रृंगार नहीं, तलवार धार में था पानी, कितने ही यवनों को काटा, जैसे हो फसल को काट रहीं, रण चंडी बनकर देखो वैरी रक्त को चाट रहीं भंवर कौर ने भागते हुई दो सैनिकों को धराशाई कर दिया. भंवर कौर अतिउत्साह में थी. अपनी सुरक्षा का ध्यान कम हो गया. तभी एक भागते सैनिक ने बंदूक दागी जो भंवर कौर का सीना चीरती हुई पार कर गयी. बृज वीरांगना भंवर कौर शहीद हो गयी. इस लड़ाई में 17 मुग़ल सैनिक मारे गए. भंवर कौर सहित 11 बहनें शहीद हुई. 

गढ़ी तिलपत में समाचार पहुँचा और गाँववासी बाग़ में पहुँच गए. बाग में आतताई मुग़ल सैनिकों और वीरांगनाओं की लाशें छितरी पड़ी थी. हरयाली तीज का त्यौहार शोक में बदल गया. दिवंगत वीरांगनाओं का दाह संस्कार सामूहिक रूप से बाग़ के मध्य में कर दिया गया. प्रति वर्ष हरयाली तीज पर इन शहीद वीरांगनाओं की स्मृति में शहीद मेला लगाने का गाँव-गाँव में निश्चय हुआ. यह परम्परा आज भी बृज क्षेत्र के गांवों में चल रही है।
अमर शहीद वीर गौकुलावीर, गौकुला, जाट, युद्ध, ब्रज, हिन्दू,  तिलपत की लड़ाई, क्षत्रिय

Tuesday, 12 December 2017

1857 के शहीद राजा अमानी सिंह

वीर शिरोमणि शहीद राजा अमानी सिंह(1857)
राजा, अमानी, सिंह, जाट, क्रांतिकारी, शहीद, 1857, अंग्रेज

राजा अमानी सिंह का जन्म अलीगढ़ के गहलौं गांव में हुआ था।वे लगसमा जाट रियासत के राजा थे।वे क्षत्रियो की ठकुरैल वंश में पैदा हुए थे।ठकुरैल गोत्र काकराणा की एक शाखा है।अलीगढ़ के बहुत से क्षेत्र पर उनका स्वतन्त्र राज था।
वे कुश्ती,घुड़सवारी,दोनों हाथों से तलवार चलाने व भाला चलाने में माहिर थे।
उनकी घोड़ी की वीरता के किस्से भी अलीगढ़ के देहातों में सुने जा सकते हैं।कहते हैं युद्ध मे घोड़ी भी दुश्मनों को अपनी टापों से कुचल देती थी।
1857 में ब्रिटिशों के साथ युद्ध हुआ।ब्रिटिशों ने इन पर हमला किया घमासान युद्ध हुआ ब्रिटीशियन्स की हार हुई उन्होंने इगलास लगसमा खैरा और कोइल तहसील पर कब्जा कर लिया व उनकी आर्मी ने अंग्रेजो से बंदूकें छीन ली व सैंकड़ो अंग्रेजो को काट दिया।कुछ महीने तक वे वीरता से अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष करते रहे।
उसके बाद अंग्रेजों ने फिर उन पर हमला किया इस बार भाग्य ने अमानी सिंह का साथ न दिया।बरसात व नमी के कारण उनकी बंदूकें व हथियार निष्क्रिय हो गए।
इस युद्ध मे सैंकड़ो जाट वीरों ने देश के लिए शहादत की कहानी रची।
इन युद्धों मे ठकुरैलो की बाइसी व अट्ठाइशी खाप ने भाग लिया व खाप इत्तिहास में भी एक वीरगाथा और जोड़ दी।
उनकी घोड़ी ने भी अंग्रेजो को अपनी टापों के नीचे कुचला।इसलिए क़हा जाता है अमानी तो अमानी पर घोड़ी ने भी हूँ न मानी।
राजा अमानी सिंह को धोखे पकड़ लिया गया व उन पर मुकदमा चला व उन्हें फांसी दी गयी।
इस तरह एक हिंदुस्तानी वीर ने अपने देश के लिए हंसते हंसते वीरता से अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
वन्दे मातरम  भारत माता की जय
सौजन्य से- राजा नाहर सिंह ब्रिगेड

16 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ने वाली क्रांतिकारी वीर बालिका

वीरांगना शिवदेवी तोमर

सन 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ में हुई थी। जनपद के महान क्रांतिकारी वीर जाट शाहमल तोमर ने जमकर अंग्रेजों से लोहा लिया था।

क्रांतिकारियों कों अंग्रेजों ने मौत के घाट उतारा। उन लोगों को पत्थर के कोल्हू से पीसकर चूर-चूर कर मसल दिया था। स्त्री, बूढ़े और बालकों को भी अन्न-जल के अभाव में तड़पा-तड़पा कर मारा।

तोमर जाटों के अनेक गांवों को अंग्रेजों ने बागी घोषित कर दिया तथा उनकी जमीन, मकान, चल अचल संपत्ती जब्त कर ली। 1947 तक काले अंग्रेजों ने भी इन गांवों को विशेष यातनाएं दी। केवल इतना ही अन्न दिया जाता था कि वे जिंदा रह सकें। पशुओं के लिए भूषा भी ले जाते थे।
अतः भारतीयों को घास खोदकर पेट भरना पड़ता था। घी-दूध बेचकर इन्हें अपना गुजारा
तब एक जाट-क्षत्राणी शिवदेवी तोमर  ने जब यह अत्याचार देखा तो उन्होने अंग्रेजों को मारने का निश्चय किया। शिवदेवी की उम्र उस समय मात्र 16 वर्ष ही थी।

उसकी सहेली किशनदेवी ने भी इस आजादी-यज्ञ में साथ देने का निश्चय किया।

बड़ौत के कुछ जाट युवकों के साथ शिवदेवी ने बड़ौत में ही अंग्रेजों के तंबुओं पर हमला किया। शिवदेवी के नेतृत्व में वीरों ने 17 अंग्रेजों को तलवार के घाट उतार दिया।
जबकि 25 भागकर छिपने में सफल रहे।

घायल शिवदेवी तोमर अपने घावों की मरहमपट्टी कर रही थी कि बाहर से आए अंग्रेजों ने उसे घेर लिया। अंग्रेज़ सैनिक इस सिंहनी की ओर डरते डरते बढ़े। वीर बालिका ने मरते दम तक अंग्रेजों से लोहा लेकर देश के लिए अपने पूर्वजों की उच्चतम शौर्य प्रदर्शन करने की परंपरा निभाई तथा समाज व देश को गौरवान्वित किया।

ऐसे वीर बालकों की वीरगाथाये आज बच्चों को सुनाए जाने की जरूरत है लेकिन अफसोस वामियो ने इन्हें अपने इत्तिहास मे इस गौरवशाली गाथा को कोई जगह नहीं दी।

वन्दे मातरम।                               जय भारत माता

सौजन्य से- राजा नाहर सिंह यूथ ब्रिगेड।

भाईचारे का सन्देश देने वाली अजब कविता

जाट जैसा क्षत्री नहीं
ब्राह्मण जैसा सलाहकार
राजपूत जैसा दक्षराज नहीं
बाणिये जैसा व्यापार

उस हथियार बरगी रीस नहीं
जो बणावै सिर्फ लौहार
आभूषण कित तै पहरो गे
जै ना रहे सुनार

माटी नै भगवान बणादे
यो हुनर राख्यै कुम्हार
खाती बिना फर्नीचर नहीं
ना लाग्यै ईंट का एक बी सार।

बिना फिटनस बी लत्ता जच्चै
सिर्फ दर्जी ईसा कलाकार।
जोग्गी चढ़ावा ना लेंगें तो
क्युकर कटैंगे पाप विकार।

नौन्दे बी देवै, बाल बी काटै
नाई देगा कती सिंगार।
सारे परिवार राखो भाईचारा
गाम मै हो चाहै बाहर
मत पाड़ौ ईस हरियाणे नै
राजनीती में फसकै यार..

जय भाईचारा,जय हरियाणा

भाईचारे का संदेश देने वाली यह कविता जब घूमती हुई सोशल साइट के माध्यम से हम तक पहुंची तो हमसे शेयर किए बिना न रहा गया।
नमन है कवि को।
#copied from Dinesh Sharma

शहीद मोहर सिंह

शहीद मोहर सिंह 1857

जन्म- 1814 शहीदी- 1857 आयु- 43 वर्ष पिता - चौधरी घासी राम

गाँव- शामली जिला- मुजफ्फर नगर (उत्तर प्रदेश) .

वे 1857 की क्रांति के एक महान योद्धा थे. चौधरी मोहर सिंह निर्वाल ने शामली तहसील के क्षेत्र में क्रांति की अलख जगाई लोगों को आजादी के लिए उकसाया व स्वतन्त्रता सेनानियों ने शामली की तहसील जलादी और कई अंग्रेजों को मार दिया था. शामली आजाद हो चुकी थी।

लेकिन क्रांति के शांत होने पर अंग्रेजो ने शामली के चारों और तोप लगादी. और पूरे गांव को फूंकने का इरादा कर लिया था। तब उस समय वीर मोहर सिंह ने सभी जिम्मेदारी खुद पर लेकर तोप के सामने खड़े होकर कहा कि यह सब मैंनें किया है सजा मुझे मीले गांव को नहीं और यह कहकर वे तोप के सामने खड़े हो गए।अंग्रेजो ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।इनके साथ क्रांतिकारी राज सिंह निर्वाल भी शहीद हुए थे जो इनके ही भाई थे।

इस तरह देश के लिए एक और वीरगाथा की रचना चौधरी मोहर सिंह ने कर दी।
वन्दे मातरम

सौजन्य से-राजा नाहर सिंह युथ ब्रिगेड।

Monday, 11 December 2017

इस हिन्दूवीर यौद्धा ने अकबर की अस्थियों को जलाकर राख कर दिया था।

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वीरवर राजाराम का जन्म सिनसिनी राजस्थान के एक जाट क्षत्रिय वीर भज्जाराम के घर में हुआ था।उस समय देश मे औरंगजेब का आतंक था। इन्होंने क्रांति का झंडा उठाते ही धर्म की रक्षा के लिए ब्रज के क्रांतिकारियों को एक करना शुरू किया।इन्होंने धर्म वीर सरदार रामकी चाहर (राम चेहरा सोघरिया) सोघरिया को भी अपने साथ लिया और औरंगजेब की धर्म विरोधी नीति के खिलाफ बिगुल बजा दिया। उनके गांव के पास ही अउ गढी थी जिसका सरदार लालबेग खान था जो स्त्रियों पर बुरी नजर रखता था।एक बार उसने कुए से एक स्त्री को उठा लिया तो यर खबर राजाराम के पास पहुंची तो उन्होंने हिन्दू सतीत्व की रक्षा के लिए अउ गढी पर आक्रमण कर दिया। इस तरह उस स्त्री और अउ गढ़ी को उन्होंने मुगलो से स्वतंत्र करवाया ।उसके बाद वो ब्रज क्षेत्र की ओर बढ़े। और वहां उन्होंने कूटनीति से जाटौली थून की 575 गांवो की जमीदारी सम्भाली और धर्मसेना को मजबूत किया। इस तरह कुन्तल,आगरा,फतेहपुर सीकरी और धौलपुर के जाट सरदारों को भी धर्म रक्षा ले लिए उन्होंने एकता के सूत्र में पिरोया।सैनिको को गुरिल्ला युद्ध और शाही सेना से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया। एक बार आगरा के समीप के गांवों में फसल खराब होने के कारण औरंगजेब को लगान देने से मना कर दिया तो उसने मीर अब्दुल्लाह दी असालत खां को भेजा।तो ग्रामीणों ने उसको धूल चटा दी और मुअल्लत खां को पकड़कर राजाराम के पास ले गए।तो राजाराम ने उसकी छित्तरपरेड की और उसे सैनिक न समझकर हिजड़ा कहकर छोड़ दिया।जब यह समाचार औरंगजेब के पास पहुंचा तो उसने मुअल्लत खां को जहर की पुड़िया भेजी।उसने दरबार में औरंगजेब के हाथों मरने की अपेक्षा जहर खा लिया। राजाराम ने राजाराम की अध्यक्षता में मुगलों को दण्ड देने के लिए आगरे पर हमला कर दिया। आस-पास का सारा प्रदेश उनके अधिकार में हो गया। आगरे जिले से मुगल-शासन का अन्त कर दिया। सड़कें बन्द हो गई। मुगल-हाकिम क्रूर शफीखां को किले में घेर लिया और सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। इसके थोड़े ही दिन पश्चात् धौलपुर के करीब अगरखां तूरानी को जा घेरा। अगरखां और उसका दामाद इस लड़ाई में मारे गए इसी तरह कट्टर इस्लामिक महावत खां मीर इब्राहिम हैदराबादी पर भी उन्होंने आक्रमण किया और वीरो ने तलवारो से तोपो का मुकाबला किया इसमे 400 हिन्दू वीर जाट शहीद हुए और 250 मुगल मारे गए। मई सन् 1686 ई. में सफदरजंग ने राजाराम का मुकाबला किया, किन्तु बेचारे को भागना पड़ा और अपने पुत्र आजमखां को मुकाबले के लिए भेजा। आजमखां के आने से पहले ही राजाराम ने सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। मुगलों के 400 आदमियों को जहन्नुमरशीद कर दिया और शाइस्ताखां जो कि आगरे का सूबेदार था । उसके आने से पहले ही राजाराम ने मार्च 1688 में सिकन्दरा के मकबरे पर आक्रमण कर दिया और 400 मुगल सैनिको को काट दिया।सिकन्दरा का रक्षक मीर अहमद पहले से ही राजाराम से अपनी जान बचाकर भाग रहा था।उसने कुछ नही किया वो देखता रहा और राजराम ने मकबरे में तोड़ फोड़ की।वो अकबर से हिन्दू बेटियों के डोलो से नाराज थे।ये बाते उन्होंने अपने बुजर्गो से सुनी थी।इसलिए उसने अकबर और जहांगीर की कब्र को उखाड़ा व उनकी अस्थियां निकालकर अग्नि में स्वाहा कर दी।> ढाई मसती बसती करी,खोद कब्र करी खड्ड। अकबर अरु जहांगीर के गाढ़े कढ़ी हड्ड।।
आज अकबर का मकबरा तो है लेकिन उसमे अस्थियां नहीं है खोखली है।अगर यह वीर ऐसा न करता तो आज भी कई सेक्युलर हिन्दू उस निर्दयी अकबर की मजार पर माथा टेक रहे होते। इससे औरंगजेब बहुत गुस्सा हुआ उस समय वो दक्षिण में मराठों से लड़ने में व्यस्त था।इसलिए उसने तेजी से ब्रज क्षेत्र के सूबेदारों को बदलना चालू किया और उसके वफादार आमेर(जयपुर) के राजाओं,कुछ हाड़ा राजपूत व कुछ शेखावतों को (जो उसके फौजदार थे) राजाराम के विद्रोह को कुचलने का आदेश दिया।इन्होंने सिनसिनी गढ़ी पर भी हमला किया पर राजाराम की धार युद्धनीति कामयाब रही। इसके बाद राजाराम एक महीने तक इनसे ही लड़ता रहा। इसी बीच चौहानो और शेखावतों के बीच बीजल गांव में जमीनी परगने को लेकर युद्ध शुरू हो गया।शेखावतों की तरफ आमेर के राजा,हाड़ा राजपूत और मेव मुगल थे।शेखावतों व आमेर के राजाओ की मुगल परस्ती के कारण किचौहानो ने राजाराम से सहायता मांगी तो वो अपनी सेना लेकर पहुंच गए। चौहान और राजाराम वीरता से लड़ रहे थे।राजाराम ने मुगलो की टुकड़ी पर घेरा डाला और उस पर टूट पड़े। तो धोखे से उन पर कीसी मुगल सैनिक ने पीछे से वार किया और वो शहीद हो गए और वो दिन था 4 जुलाई 1688 का।इस युद्ध मे शेखावतों की विजय हूई।उसके बाद राजाराम का सिर काटकर दरबार मे पेश किया गया और रामकी चाहर सोघरिया को जिंदा पकड़कर दरबार मे ले जाया गया जहां आगरा में उनका भी सिर कलम कर दिया गया।

एक ब्राह्मण बहन और जाट भाई की अमर प्रेमकथा


ढलमचंद बालियान
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वीर ढमलचन्द का जन्म संवत् 1550 (सन् 1493 ई०) में ग्राम सिसौली जिला मुजफ्फरनगर के एक रघुवंशी बालियान वंश के एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इसके पिता का नाम चौधरी मेहरचन्द तथा माता का नाम श्यामो देवी था जो कि दहिया गोत्र की थी। इस वीर का वजन 52 धड़ी (6½ मन) था। यह जंगली भैंसे के सींगों को पकड़ कर उसे चक्कर कटा देता था। इसके कोई बहिन नहीं थी। अतः इसने जसवन्तनगर के हरिराम ब्राह्मण की पुत्री हरकौर को अपनी धर्मबहिन बनाया। हरकौर के कोई भाई नहीं था सो उसने इसको धर्मभाई बना लिया। हरकौर ने ही ढमलचन्द का उपनाम ढलैत रखा। ढलैत की शक्ति व योग्यता को जानकर रीवा के राजा वीरसिंह बघेला ने इसको अपनी सेना में भरती कर लिया और 200 घुड़सवारों और 300 पैदल सैनिकों का सरदार बना दिया। एक बार राजा वीरसिंह ढलैत को साथ लेकर किसी जंगल में से जा रहे थे। वहां पर एक शेर ने राजा पर अकस्मात् आक्रमण करके, उसके घोड़े को एक ही थाप में मार दिया। राजा पर वार करने से पहले ही ढलैत ने शेर की थाप को अपनी ढाल पर रोक लिया और अपनी 15 सेर वजन की तलवार से एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिये। इससे प्रसन्न होकर राजा ने ढलैत को 2000 सवारों का मनसबदार नियुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ढलैत ने अपने पुराने साथियों कीर्तिमल और भीमपाल उपकरण को महाराज की सेना में ऊँचे पदों पर लगवा दिया। राजा वीरसिंह का एक राजपूत भीमपाल नामक 7 गांव का जागीरदार था। उसकी पुत्री राजकली थी। यह 28 धड़ी वजन के पत्थर के मुदगर को दोनों हाथों से कई-कई बार ऊपर-नीचे कर देती थी। एक बार राजा वीरसिंह बघेला अपने साथ ढलैत वीर योद्धा को लेकर जागीरदार भीमपाल के निवास-स्थान पर आये थे। वहां पर मल्लों की युद्धकला का प्रदर्शन हुआ। राजकली भी प्रदर्शन देख रही थी। महाराजा की आज्ञा से ढलैत ने राजकली के उस 28 धड़ी के मुदगर को कभी दायें हाथ और कभी बायें हाथ से ऊपर नीचे और चारों ओर घुमाकर भूमि पर दूर फेंक दिया। तीन बार ऊपर फेंककर अपने कन्धों पर रोककर नीचे गिरा दिया। इससे भी भारी मुदगरों को उठाने की कला दिखलाकर दर्शकों को चकित कर दिया। उसी अवसर पर एक मरखना हाथी बिगड़कर इस प्रदर्शन स्थल पर आ गया। उसे देखकर लोग भागने लगे। इतने में ढलैत ने बड़ी तेजी से आगे बढ़कर 19 धड़ी की मोगरी उस हाथी के माथे पर जोर से मारी जिसके लगते ही हाथी पीछे को भाग गया। इस अद्भुत मल्ल युद्ध की कला को देखकर उपस्थित जनसमूह ने जोर-जोर से जयकारे लगाये “ढलैत की जय हो । ढलैत की जय हो।” उसी समय उस राजपूत लड़की राजकली ने ढलैत को मन से अपना पति मान लिया और उससे स्वयंवर विवाह कर लिया। ढलैत की धर्मबहिन ब्राह्मण लड़की हरकौर का विवाह पण्डित प्रेमनाथ के पुत्र अध्यापक देवव्रत के साथ हुआ। देवव्रत हरद्वार में अध्यापक थे और वहां के निकट गांव बाहपुर के निवासी थे। एक दिन हरकौर अपने देवर जयभगवान के साथ बहली में बैठकर अपने गांव जसवन्तनगर से अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते के जंगल में हैदरगढ़ के नवाब के बेटे हसनखां ने अपने शस्त्रधारियों सहित बहली पर आक्रमण कर दिया और हरकौर को हैदरगढ़ के किले में ले गया। यह घटना संवत् 1580 (सन् 1523 ई०) की है। उस समय इब्राहीम लोधी दिल्ली का बादशाह था। , हसनरज़ाखान हरकौर से निकाह (विवाह) करने के प्रयत्न करता रहा। परन्तु वह इन्कार करती रही। हरकौर ने अपनी अंगरक्षक एक मुस्लिम फकीरनी के माध्यम से उसके पोते रमजान को पत्र देकर अपने धर्मभाई ढलैत के पास भेजा। रमजान ने यह पत्र ढलैत को मथुरा के राजा के कैम्प में दिया।


ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के सतीत्व को बचाने के लिये राजा वीरसिंह से आज्ञा लेकर अपने साथ कीर्तिमल, भीमपाल उपकरण तथा 200 घुड़सवार लिए और हैदरगढ को चल दिया। इनके साथ राजकली भी ऊँटनी पर सवार होकर चली। वहां पहुंचकर इन वीर योद्धाओं ने हैदरगढ़ किले को घेर लिया और बड़ी युक्ति से धावा करके नवाब के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजकली ने हसनरजा के उन 5 सैनिकों का अपनी तलवार से सिर उतार दिया जो कि हरकौर को जबरदस्ती ले जाकर हसनरजाखान के साथ निकाह करवाना चाहते थे।
वीर योद्धा ढलैत ने अपनी तलवार से हसनरज़ाखान का सिर काट दिया। इस तरह से ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के प्राण एवं सम्मान को बचा लिया। ढलैत की वीरता तथा हरकौर के सतीत्व की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह है ढलैत की वीरगाथा। , ढलैत की पत्नी राजकली की 48 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् वीर ढलैत साथु बन गया। एक बार ढलैत अपनी धर्मबहिन हरकौर, मित्र कीर्तिमल एवं भीमपाल उपकरण के साथ शुक्रताल (जि० मुजफ्फरनगर) गंगा के तट पर स्नान करने गया। ये सब तीन दिन तक साधु सन्तों से धर्मकथा सुनते रहे। चौथे दिन ढलैत योद्धा का अकसमात् देहान्त हो गया। उसका दाह संस्कार वहीं गंगा तट पर किया गया। सतीदेवी हरकौर को अपने धर्म-भाई ढलैत की मृत्यु का भारी आघात पहुंचा। वह ढलैत की चिता के पास बैठकर “मेरा भाई ढलैत, मेरा भाई ढलैत” कहने लगी और तीन घण्टे पश्चात् अपने प्राण त्याग दिये। यह है भाई-बहिन के सच्चे प्यार का उदाहरण।

Wednesday, 18 October 2017

हिन्दू वीर जाटवान सिंह मलिक- हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

हिंदुत्व के लिए बलिदान देने वाला पहला यौद्धा

बात 1192 की है जब देश पर मुस्लिम सत्ता की शुरुआत हुई थी।और गौरी का गुलामी में कुतुबुद्दीन ऐबक देश पर अघोषित राज कर रहा था।
➡ये वही कुतुबुद्दीन है जिसने 700 मंदिर तोड़कर मस्जिदे बनाई,जिसने 1लाख 33000 लोगो का धर्म के नाम पर कत्ल किया,जिसने 80000 जीवो की हत्या की।

➡जाटो को ये अत्याचारी अधर्मी राजा सहन नही हुआ और उन्होंने हिन्दू वीर यौद्धा 💪 जाटवान मालिक के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
और मूसल सैनिकों को काटना शुरू कर दिया।रोहतक हरियाणा में जन्मे जाटवान ने युही ऐबक से लोहा लिया और फिर एक दिन  हाँसी में मुस्लिम बादशाह के किलेदार नसरुद्दीन को घेर लिया।और हाँसी को इस अत्याचारी शासक से स्वतंत्र कर लिया।
तभी कुतुबुद्दीन खबर मिलते ही अपनी सेना के साथ रातों रात भागा।

हांसी पहुंचते ही जाटवान और मुस्लिम शासक के बीच घमाशान युद्ध शुरू हुआ।🏇⚔🏇
➡खुद मुस्लिम लेखक लिखते हैं कि जैसे दो पहाड़ आपस में टकरा गए हों।धरती रक्त से #लाल हो गई थी।जाट थोड़े थे पर उन्होंने मुस्लिम बादशाह को नको चने चबवा दिए।
बाद में जाटवान ने अपने 💪20 मजबूत सैनिकों को चुना और सीधा कतुबुद्दीन के सुरक्षा घेरे में घुस गया।
उसने तलवार से हजारों का रक्त बहा दिया और कतुबुद्दीन को हाथी से नीचे उतरकर लड़ने के लिए ललकारा।

➡पर वो कायर उतरा नही और उसने मना कर दिया।

➡ये युद्ध तीन दिन और तीन रात चला।
आखिर कब तक दिल्ली के बादशाह की बड़ी सेना के आगे ये छोटी सी यौद्धाओं की सेना टिक पाती।
अंत में महान हिन्दू वीर चौधरी जाटवान सिंह मलिक शहीद हो गए।

लेखक आगे लिखते है जाटवान भले ही शहीद हो गए हो पर गुलाम वंश मुस्लिम बादशाह को इतना नुकसान हुआ कि वो दहाड़े मार मार कर रोया
और बोला कि अगर मैं इस यौद्धा से संधि करके बहला लेता तो अपने साम्राज्य का बहुत विस्तार कर सकता था।

इस तरह इस हिन्दू वीर यौद्धा ने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।ॐ🚩ॐ
पर कितने शर्म की बात है कि इस अत्याचारी कुतुबुद्दीन को #स्कूली किताबो में #महान बताया गया है

और धर्म व देश की खातिर तीन दिन तीन रात छोटी सी सेना के साथ इस गुलाम मुस्लिम बादशाह से लड़कर अपना बलिदान देने के बाद भी आज देश और हरियाणा के इतिहास में इस वीर को उचित जगह नही दी गई।

याद रखो इन बलिदानों को जिन्होंने अपना सिर कटा लिया पर कभी देश और धर्म का सिर नही झुकने दिया
               🚩🚩🚩🚩🇮🇳🚩🚩🚩🚩
           जय जाटवान।जय हिन्दुत्व।जय भारत।

Sunday, 1 October 2017

गौरक्षक पीपल रक्षक हिन्दू सम्राट महाराजा सूरजमल

जानिए उनके एक जबरदस्त युद्ध के बारे में-


मीर बक्शी ने 30 दिसंबर 1749 को मेवात पर आक्रमण कर दिया।
और नीमराना किले पर कब्जा कर लिया।इस विजय की खुशी में मीर बक्शी की सेना ने गौमाता को काटना शुरू कर दिया हिन्दुओ को नीचा दिखाने के लिए पीपल के पेड़ व मंदिरों को हटाना शुरू कर दिया।

इसका पता चलते ही 1 जनवरी 1750 को महाराजा सूरजमल ने अपने 5000 से 6000सैनिकों के साथ
नीमराणा पर अटैक कर दिया।मध्य प्रदेश के गोहद के जाट राजा भीम सिंह राणा के 200 घुड़सवार भी सुरजमल की सेना में शामिल हुए।

इस युद्ध मे मीर बक्शी के सेनापति हकीम खान और रुस्तम खान हजारो सैनिको के साथ बुरी तरह मारे गए।
और उनकी सारी सप्लाई काट दी गयी और मेरे बक्शी की सेना बंदी बना ली गयी।

मीर बक्शी जो कहीं दूसरे शहर में भागकर छुप गया था वह बाहर नही निकला और उसने किसी को भेजकर दया की भीख मांगी।
तब एक संधि की गई जिसकी शर्ते निम्नलिखित थी-

1.मीर बक्शी का कोई भी सैनिक अपने राज्य व बाहर गौहत्या नही करेगा।
2.कोई भी सनातन संस्कृति के प्रतीक पीपल के पेड़ को नही काटेगा।
3.कोई भी हिन्दू मंदिरों को नुकसान नही पहुंचाएगा और न ही हिन्दुओ की उपासना में व्यवधान पहुंचाएगा।

इस तरह मीर बक्शी ने महाराजा सूरजमल को युद्ध का सारा खर्चा भी वापिस किया और उसने कसम खाई के वह दोबारा ऐसा कभी नही करेगा।

जय हो हिन्दू ह्रदय सम्राट सूरज सुजान की।
जय जटवाड़ा।जय भारत।जय सनातन।
Maharaja Surajmal, hindu, veer, हिन्दू ह्रदय सम्राट, युद्ध, अंतिम हिन्दू सम्राट

Sunday, 24 September 2017

वीरांगना राजकुमारी सोमादेवी और राजा मालदेव चाहर


वीरांगना, सोमादेवी, हिन्दू, राजा मालदेव चाहर, जाट
संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पटाने के लिए पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी।और बलबन पहले से ही जाटो पर खुश था क्योंकि जब देश पर क्रूर विदेशी मंगोलों ने आक्रमण किया था तो खाप सेना ने ही उसके साथ मिलकर मंगोलों को हराया था।

इसलिए बादशाह ने उनकी इच्छा अनुसार कांजण (बीकानेर के पास) और सिद्धमुख(चुरू) का राज्य दे दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवन ने राज्य किया।(1268 से 1416 तक यहां जाट क्षत्रियो का राज रहा।)

बात उस समय की है जब वहां 1416 में राजा मालदेव चाहर शक्तिशाली स्तिथि में राज कर रहे थे।और इन्होंने अपना राज्य भी विस्तार कर लिया था।

वहां के आस पास दिल्ली के मुस्लिम बादशाह टैक्स लेते थे।और अपने कुछ लम्बरदार बना रखे थे।
तो 7 जाट लम्बरदारो ने टैक्स देने से मना कर दिया।

उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शासक खिज्र खां का शासन था।उसने बाजखां पठान के नेतृत्व में एक सेना उन 7 लम्बरदारो को पकड़ने के लिए भेजी।जब बाजखां उन्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा था तो राजा मालदेव ने उसे रोका।और उसे उन लम्बरदारो को छोड़ने के लिए कहा परन्तु उसने मना कर दिया।

फिर वहां भीषण युद्ध हुआ।और उस युद्ध में मुस्लिम सेनापति की सेना मारी गई।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात गोत के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।और इन्होंने खिज्र खां को टैक्स के लिए मना करके वीरता का काम किया क्योंकि उस समय ऐसा करना मौत के मुह में हाथ डालने के समान था।क्योंकि दिल्ली पर क्रूर शासकों का कब्जा था।

गुस्से में लाल होकर स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या राजकुमारी सोमादेवी थी। 
उसी समय दो सांड आपस में लड़ने लगे तो कुछ मुस्लिम सैनिक डरकर भागने लगे।
तब राजकुमारी सोमादेवी ने आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर दिया था।ये देखकर बादशाह के एक खास सेनापति की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा।

 स्वाभिमानी मालदेव ये सुनते ही गुस्से में हो गया और कहा कि हम अपनी कन्या एक मुसलमान को नही दे सकते।
महाराजा मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। 

चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में घोड़े पर तलवार लेकर वीरता से लड़ी।सोमादेवी ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को काट दिया।

परन्तु इतनी विशाल सेना के आगे कब तक टिकते अंत में अपने धर्म पथ पर चलते हुए युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं लगभग सेना रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

चाहर जाट गोत्र(एक नजर)
ऋषि-भृगु
वंश-अग्नि
कुलदेव-भगवान सोमनाथ
कुलदेवी-ज्वालामुखी

जय जटवाडा जय हिन्दुत्व जय भारत।

गौरक्षक चौधरी लोटनसिंह अहलावत

चौधरी लोटनसिंह जी का गाँव पहाड़ी धीरज दिल्ली है| इनका जन्म एक अहलावत वंशी जाट क्षत्री के घर हुआ था|वे अपने समय के बड़े शक्तिशाली पहलवान थे|वे एक वीर यौद्धा,निडर,साहसी और कट्टर आर्य थे|लोटन सिंह जी सच्चे गौरक्षक थे|

उन्होंने वह काम पूरा किया जो भगवान का आदेश है- "गौ को मारने वाले को मार, गौ आदि पशुओ को निरंतर सुखी करो|"(ऋग्वेद मं०१/अ०१८/सू० १२०/मं०१०)|

इस वीर आर्य यौद्धा ने दिल्ली में गौवध करने वालो को मौत के घाट उतारना आरम्भ किया|
फलस्वरूप मुसलमान व् अंग्रेजी सरकार इसके विरोधी बन गये|इन्होने अपने कुछ वीर साथियों को लेकर एक मंडली बनाई| किसी से न डरकर इन्होने कई कसाईयों व उनके अन्य मुस्लिम साथियों को मौत के घाट उतार दिया|
पूरी दिल्ली के मुस्लिमो में हाहाकार मच गयी थी| कई कसाईयों ने तो इनसे डरकर गौवध करना भी बंद कर दिया था|

इस वीर ने अपनी पूरी जवानी गौमाता की रक्षा करने में लगा दी| और इसी तरह सरकार और मुस्लिमो से लड़ते लड़ते इनका पूरा जीवन निकल गया|

इस महान गौरक्षक हिन्दू वीर को शत शत नमन|

जय चौधरी लोटनसिंह जी
जय जटवाड़ा जय सनातन जय भारत|

Monday, 18 September 2017

महान यौद्धा रघुवंशी विजयराव बालियान और गोगरमल जाट

इन वीरों ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा था नालन्दा जलाने वाले खिलजी को।



खाप बालान के गांव भाजू और भनेड़ा के बीच के जंगल की सभा - संवत् 1251 (सन् 1194 ई०) ज्येष्ठ सुदि तीज को भनेड़ा और भाजू के बीच के जंगल में सर्वखाप

पंचायत की एक विशाल सभा हुई। इस में सभी जातियों के लोगों ने भाग लिया जिनमें 30,000 लोग थे जिसमे 15,000 मल्ल (पहलवान) योद्धा शामिल थे। इस सभा में अधिक संख्या जाटों की थी। 

इस सभा का अध्यक्ष चौ० विजयराव जाट जो बालान खाप के गांव सिसौली का निवासी था, को चुना गया। इस समय मल्ल योद्धा सेना का प्रधान सेनापति गोगरमल जाट को बनाया गया।
ये दोनों ही बहुत ही वीर यौद्धा और रणनेता थे।

अध्यक्ष ने जोरदार भाषण दिया उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है-

 “भारत माता के वीर योद्धाओ, अपने देश और हिन्दू धर्म की रक्षा तथा शत्रु को तलवार के घाट उतारना ही हमारा परम धर्म है। उसके लिए तैयार रहो। इस संकट के समय जनता और सैनिकों को उच्च चरित्र रखना पड़ेगा। मद्यपान से बचना पड़ेगा। सब जाति के लोगों को एक भाई बनकर रहना है। मुसलमान सेना के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार रहो।”

इस सभा में सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पास किए गये -

1.अपने देश, जनता तथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए मर मिटो।
2. गौरी जैसे अधर्मियों के अगले आक्रमण तथा उसकी लूटमार के बचावों के लिए सभी खापों से 60,000 से 100,000 तक वीरों की सेना तैयार करो।
3.चारों ओर फैली हुई बदअमनी के लिए शान्ति का वातावरण बनाओ और सब खापों में आपसी मिलाप एवं एकता करो।
4.विवाह-शादी के समय बारात के साथ हथियारबन्द रक्षक जत्थे जाने का प्रबन्ध किया जाये।

#कुतुबुद्दीन ऐबक को जासूसों द्वारा इस पंचायती कार्य का पता लग गया। उसने बख्तियार खिलजी (यह गौरी का एक गुलाम था जो खिलजी गोत्र का था) को 35,000 मुस्लिम सेना देकर सर्वखाप पंचायत पर आक्रमण करने के लिए भेजा। 

सर्वखाप पंचायत को भी यह सूचना मिल गई। पंचायती सेना चार भागों में बंट गई। जब बख्तियार की सेना वहां पहुंची तो पंचायती सेना मुस्लिम सेना पर चारों ओर से टूट पड़ी। ढ़ाई घण्टे तक घोर युद्ध हुआ। 

इस युद्ध में बख्तियार का सेनापति तथा 18,000 सैनिक मारे गये।विजयराव बालान और गोगरमल जाट अपने यौद्धाओं के साथ वीरता से लडे और दुश्मनों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा।

पंचायती सेना के केवल 800 मल्ल योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। मुस्लिम सेना रणक्षेत्र छोड़कर भाग खड़ी हुई और पंचायती सेना विजयी हुई।

इसी खिलजी ने बाद में नालन्दा विश्वविद्यालय को जलाया था अगर ये कायर इस दिन नही भागता तो इसका काम तमाम हो जाता और शायद नालन्दा विश्वविद्यालय आज हमारे सामने होता।

जय हिंदुत्व।जय जाटवाड़ा।जय भारत