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Tuesday, 1 May 2018

262 हिन्दू वीरांगनाओं का शौर्य एवं बलिदान

262 हिन्दू वीरांगनाओं का शौर्य एवं बलिदान
दुष्ट जाफर अली का वध
हिन्दू वीरांगनाएँ
हिन्दू वीर जाट वीरांगना

संवत् 1374 (सन् 1317 ई०) की वैशाखी अमावस्या के दिन कोताना (जि० मेरठ) के पास सूर्योदय के समय 262 आर्यदेवियां यमुना नदी में स्नान कर रही थीं।

ये हिन्दू देवियां जाट, राजपूत और ब्राह्मण घरानों की थीं। 

खिलजीवंश का सरदार जाफिर अली कोताना का अधिकारी था। उसने अपने सैनिकों को साथ लेकर उन वीरांगनाओं को जा घेरा।

इन नरपिशाचों को भले ही स्कूली किताबों में महकन बताया जाता है लेकिन वास्तव मे ये हवस के पुजारी थे व हिन्दुओ के हत्यारे थे।

तो वह दुष्ट जाफर अली एक हिन्दू वीरांगना जाट लड़की पर मोहित हो गया। उसको आता देखकर सब हिन्दू वीरांगनाओं ने अपने शस्त्र सम्भाल लिये। एक लड़की ने उस सरदार से कहा कि “तुम एक बार हमारी बहन की बात सुन लो।”

वह विषयीकीड़ा सरदार घोड़े से उतरकर उनके पास पहुंचा और उस वीरांगना जाट लड़की को अपनी बीबी बनने के लिए कहा। यह शब्द सुनते ही उस जाट वीरांगना ने अपनी तलवार से एक ही वार में उस पिशाच जाफिर अली का सिर काट दिया।

उस सरदार के मरते ही मुसलमान सैनिकों और उन वीरांगनाओं में तलवारें चलने लगीं। देखते-देखते 262 आर्य देवियां धर्म की बलिवेदी पर प्राणों की आहुति दे गईं।

सभी क्षत्राणियां लड़ते लड़ते शहीद हो गयी लेकिन किसी मुसलमान का हाथ अपने शरीर पर नहीं लगने दिया।

इन महान हिन्दू वीरांगनाओं के बलिदान को कोटि कोटि नमन।
(संदर्भ-श्री जगदेवसिंह शास्त्री सिद्धान्ती का लेख, बलिदान विशेषांक, पृ० 252 पर एवं सर्वखाप पंचायत रेकॉर्ड)

http://jatwada.blogspot.in/2018/04/blog-post_30.html?m=1

Sunday, 29 April 2018

माता खेतकौर के 242 वे जौहर दिवस पर उनकी स्वाभिमानी वीरगाथा जरूर पढ़ें

महारानी खेतरकौर का जौहर- भारत का अंतिम जौहर
30 अप्रैल 1776
Mata khetkumari
 महारानी माता खेतकौर(खेतकुमारी)
महारानी खेतकौर(खेतकुमारी) बाजना(उतर प्रदेश) के चौधरी भागमल नौहवार की बेटी थी।
उनका विवाह भरतपुर के हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल से हुआ था।
1763 में महाराजा सूरजमल वीरगति के प्राप्त हो चुके थे।
बात उस समय की है जब भरतपर के महाराजा केशरी सिंह थे। जो अल्पवयस्क सिर्फ 9 वर्ष के थे।
1775 के अंत में दिल्ली के बादशाह दुष्ट मिर्जा नजफ़ खां ने भरतपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया था।

यह युद्ध भरतपुर साम्राज्य में अलग अलग करके अलग अलग जगह पर कई बार लड़ा गया। यह संघर्ष करीब सात माह तक जारी रहा।
अल्पवयस्क महाराजा केशरी सिंह के भाई महाराजा रणजीत सिंह ने इस युद्ध मे दुष्ट मुस्लिम सैनिको का वीरता से सामना किया।

बात उस समय की है जब डीग पर मिर्जा ने धोखे से अचानक हमला कर दिया था।
जाट वीरों ने डटकर मुकाबला किया लेकिन संख्या कम होने व अच्चानक हमला होने के कारण हालात बिगड़ते जा रहे थे।
तो माता खेतकौर ने अपने बेटे महाराजा रणजीत सिंह को उनके भाई केशरी सिंह की सुरक्षा करने के लिए बोला व उन्हें कुम्हैर किले में सुरक्षित पहुंचाने के लिए आदेश दिया।

29 अप्रैल 1776 को महाराजा रणजीत सिंह ने डीग के राजा बदन सिंह महल के रनिवास की रक्षा के लिए अपने विश्वस्त और वीर यौद्धा सैनिको को छोड़ दिया व खुद महाराजा केहरी सिंह को सुरक्षित कुम्हेर पहुंचाने के लिए निकल पड़े। मिर्जा के सैनिको से लड़ते हुए उन्होंने रहीम दाद खान के  पुत्र को बंदी बना लिया था।

उधर मुस्लिम सैनिक डीग शहर में घुस गए। जाट वीरों ने उनका डटकर मुकाबला किया लेकिन संख्या कम होने के कारण वे ज्यादा देर न टिक सके।
इस्लामी मद में चूर होकर शहर में तांडव मचा दिया।
शहर के देवालयों की मूर्तियों को भी खंडित किया।
ज्यों ही मुस्लिम सेना राजा बदन सिंह महल के निकट पहुंची तो रनिवास की सुरक्षा में नियुक्त प्रहरियों ने गोलियों की भारी बौछार शुरू कर दी जिससे मिर्जा के बहुत से सैनिक मारे गए व कई घायल हो गए और मुगलों की सेना में मातम छा गया।

इस प्रकार ड्योढ़ी प्रहरियों ने अपनी आखिरी सांस तक अपने कर्तव्य का निर्वाह किया।

लेकिन स्तिथि को पहचानते हुए एक डयोढ़ीवान(द्वारपाल) जो एक बावरिया गुर्जर था। उसने रनिवास में प्रवेश किया जहाँ महारानी खेतकौर व राजा नवलसिंह की विधवा रानियां व कुछ जाट सरदारों की ठकुरानियाँ व कुछ रनिवास में काम करने वाली गुर्जर धात्री(धात्री-बच्चों का पालन पोषण करने वाली माताएं) उपस्थित थी।
उसने माता खेतकुमारी को प्रणाम किया व शत्रु के शहर पर कब्जा होने के दुःखद समाचारों से अवगत करवाया।

और उसने महारानी से कहा " माताजी, यदि स्वेच्छा से प्राणोत्सर्ग नहीं किया गया तो हम सब शत्रु के हाथों में पड़ जाएंगे और हमें बेइज्जत किया जाएगा। जब तक महाराजा रणजीत सिंह पहुंचेंगे तब तक बहुत देर हो जाएगी।" इसके बाद वह आज्ञा लेकर चला गया।

माता खेतकौर सहित अन्य रानियों ने अपमानित होने की बजाय मृत्यु आलिंगन को श्रेयस्कर समझा।
उन्होंने डयोढ़ीवान को बुलाकर मुट के साधन उपलब्ध करवाने के लिए भेजा।
डयोढ़ीवान बावरिया ने भूमि पर एक कालीन बिछा दिया।
तीनो रानियां विधिपूर्वक पूजा करके उस पर लेट गयी।
बावरियाँ ने तीनों माताओं का एक एक करके सिर धड़ से अलग कर दिया। तीनो वीरांगनाओं के चेहरे पर जटवाड़ा स्वाभिमान की मुस्कान थी। अन्य महिलाओं का भी यही हाल हुआ।
फिर बावरिया ने अपना सिर भी कलम करके सम्मान की इस वीरगाथा का अंत कर दिया।
यह घटना 30 अप्रैल 1776 की है।
जब मिर्जा महल की और बढ़ा तो जाट प्रहरियों ने उससे लोहा लिया व अपने क्षत्रीय धर्म की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।

मिर्जा जब महल में पहुंचा तो वह भौचक्का रह गया।उसे निराशा हुई कि वह भरतपुर के स्वाभिमान को नहीं तोड़ सका। लेकिन उसने वीरांगनाओं के बलिदान के आगे घुटने टेक दिए। और सभी माताओं का हिन्दू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया।
इस तरह जौहर का व्रत धारण करके माताओं ने सतीत्व की रक्षा की।

माता खेतकुमारी व अन्य वीरांगनाओं के सतीत्व को कोटि कोटि नमन।

आज 30 अप्रैल को माता खेतकौर के बलिदान का 242 वां जौहर दिवस है।
कृपया अपने बच्चों को यह स्वाभिमानी गाथा अवश्य सुनाए और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

तलवार की धार पर गर्दन रखकर माता खेतकौर जी सोई थी,
स्वाभिमान की रक्षा खातिर जौहर करके सती जाटनी होइ थी।

जय माता खेतकौर,जय जटवाड़ा स्वाभिमान,जय सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की।